Thursday, February 24, 2011

मैं समय और अन्तरिक्ष से पुराना हूं

पुर्तगाली महाकवि-चिन्तक फ़र्नान्दो पेसोआ से कबाड़ख़ाने के पाठक अपरिचित नहीं. उनके सघन गद्य की बानगी एकाधिक बार इस ब्लॉग पर प्रस्तुत की जा चुकी है. हाल ही में उनकी पुस्तक द बुक ऑफ़ डिस्क्वायट मुझ तक मेरे एक मित्र के मार्फ़त पहुंची है. फ़िलहाल के वास्ते पेश कर रहा हूं इस अद्भुत पुस्तक के कुछ चुनिन्दा टुकड़े


१७२.

यह ढाल पनचक्की तक पहुंचता है लेकिन मेहनत कहीं नहीं पहुंचती.

शुरूआती शरद की दोपहर थी, आसमान में एक ठंडी, मृत ऊष्मा थी और बादल नमी के अपने कम्बल से रोशनी को कुचले दे रहे थे.

नियति ने मुझे फ़क़त दो चीज़ें दीं - बहीखातों का हिसाबकिताब रख सकना और सपने देखने की प्रतिभा.

१८६.

अगर नियति का कोई मतलब होता तो मेरा दिल देवताओं के पास चला जाता! अगर देवताओं की कोई नियति होती तो मैं नियति के पास चला जाता!

कभी कभी मैं रातों को जाग जाता हूं. मुझे अहसास होता है कि अदृश्य हाथ मेरी नियति को बुन रहे हैं.

यहां पड़ा है मेरा जीवन. मेरे भीतर की कोई भी चीज़ कहीं कोई ख़लल नहीं डालती.

१८८.

चाहे उसका जीवन कितना ही मुश्किलों भरा क्यों न हो, किसी भी साधारण इन्सान को कम से कम यह सुख तो है कि वह उस बारे में न सोचे. जीवन को जस का तस जीना, किसी कुत्ते या बिल्ली जैसे बाहरी तौर पर जीवित रहना - ज़्यादातर लोग इसी तरह जीते हैं, अगर हमारे भीतर कुते-बिल्ली जैसा सन्तोष आ जाए तो जीवन को ऐसे ही जिया जाना चाहिए.

सोचने का मतलब है विनाश. सोचने की प्रक्रिया में खुद विचार नष्ट हो जाता है, क्योंकि सोचने का मतलब होता ही क्षय करना है. अगर इन्सानों को पता होता कि जीवन के रहस्य के बारे में कैसे विचार किया जाए, अगर उन्हें पता होता कि किसी भी कार्य की एक-एक तफ़सील की आत्मा पर जासूसी करती हज़ारों जटिलताओं को कैसे महसूस किया जाए, तो वे कभी कोई काम नहीं करते - वे तो जीते भी नहीं. वे डर के कारण अपनी हत्या कर लेते, ठीक उन्हीं की तरह जो अगले दिन गिलोटीन पर गरदन काटे जाने से बचने के लिए आत्महत्या कर लेते हैं.

१८९.

बरसाती दिन

हवा नकाबपोश पीली है, जिस तरह ज़र्द पीला नज़र आएगा गंदले सफ़ेद से देखे जाने पर. सलेटी हवा में बमुश्किल कहीं पीला है, लेकिन सलेटी के ज़र्दपन की उदासी में एक पीला रंग है.

२१८

मैं समय और अन्तरिक्ष से पुराना हूं क्योंकि मैं चेतन हूं. चीज़ें मुझसे बनती हैं; प्रकृति मेरी सनसनियों की सन्तान है.

मैं खोजता हूं और मुझे नहीं मिलता. मैं इच्छा करता हूं पर वह मेरे पास नहीं हो सकता.

मेरे बिना सूरज उगता है और मर जाता है; मेरे बिना बरसात गिरती है और हवा दहाड़ती है. यह मेरे कारण नहीं है कि समय बीतता है, बारह महीने होते हैं, मौसम होते हैं.

पृथ्वी की ज़मीनों की तरह मेरे भीतर संसार का बादशाह, जिसे मैं अपने साथ ले कर नहीं जा सकता ...

Wednesday, February 23, 2011

दून्या मिखाइल की एक कविता

चर्चित ईराक़ी कवयित्री दून्या मिखाइल की एक कविता पेश है:



मोची

एक निपुण मोची ने
अपनी समूची ज़िन्दगी
कीलें ठोकी हैं
और मुलायम बनाया है चमड़े को
अलग अलग तरह के पैरों के लिए:
बच निकलने वाले पैर
लात मारने वाले पैर
धंस जाने वाले पैर
दौड़ने वाले पैर
ठोकर खाने वाले पैर
धराशाई हो जाने वाले पैर
कूदने वाले पैर
अटकने वाले पैर
पैर जो स्थिर होते हैं
पैर जो कांपते हैं
पैर जो नाचते हैं
पैर जो लौटते हैं ...
जीवन एक मोची के हाथों में
मुठ्ठीभर कीलें होता है.

संगत सन्तन की कर ले



कबीरदास जी का भजन, स्वर पंडित भीमसेन जोशी का



डाउनलोड लिंक: http://www.divshare.com/download/14131442-487

युवा आबिदा परवीन को देखिए-सुनिए


सूफ़ी संगीत के क्षेत्र में आबिदा परवीन एक जाना पहचाना नाम हैं. पाकिस्तान के ख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद ग़ुलाम हैदर की पुत्री आबिदा इस मायने में भाग्यशाली रहीं कि उन्हें उनके पिता ने तमाम रिवायतों को दरकिनार कर बाक़ायदा संगीत शिक्षा दी और वे उन्हें तमाम महफ़िलों में भी ले जाया करते थे. बाद में उस्ताद सलामत अली ख़ान साहेब ने उनके टेलेन्ट को निखारा.

आज देखिये बेहद युवा आबिदा परवीन और वहीद अली ख़ान का एक दुर्लभ वीडियो -

Tuesday, February 22, 2011

खाने पीने को पैसा होय तो जोरू बन्दगी करे



पंडित भीमसेन जोशी सुना रहे हैं सन्त कबीर की रचना - सब पैसे के भाई



(शुरू के पांच-सात सेकेन्ड तक शायद कुछ भी सुनाई न दे. कुछ तकनीकी ख़ामी है. माफ़ी!)

यहां से डाउनलोड करें: http://www.divshare.com/download/14131317-eac

अरुणा साईंराम की आवाज़ में अभंग


कर्नाटक संगीत में अरुणा साईराम एक जाना पहचाना नाम हैं. अपनी माता श्रीमती राजलक्ष्मी सेतुरमन से संगीत की पहली शिक्षा ग्रहण करने वाली अरुणा ने ख्यात कर्नाटक संगीतकारों मदुराई सोमसुन्दरम और टी. वृंदा से बाकायदा प्रशिक्षण प्राप्त किया. पल्लवी गायन उन्होंने टी. आर. सुब्रह्मण्यम से सीखा.

आज की पोस्ट में देखिये-सुनिये अरुणा जी को अभंग गाते हुए. विठ्ठल देवता (विठ्ठोबा) की प्रशंसा में गाए जाने वाले इन भजनों को सबसे पहले सन्त नामदेव ने मराठी में गाना शुरू किया था.

पेश है कर्नाटक संगीत में गाई गई अभंग की यह बेजोड़ प्रस्तुति

(साभार यूट्यूब)

Monday, February 21, 2011

ओ हेलेन, क्या बारिश है

महमूद दरवेश की कई रचनाएँ कबाड़ख़ाने पर पेश की जा चुकी हैं. उसी कड़ी में अज उनकी एक और कविता:


ओ हेलेन, क्या बारिश है

एक मंगलवार को मेरी मुलाक़ात हुई हेलेन से
तीन बजा था, अनन्त ऊब का पल
लेकिन
हेलेन जैसी स्त्री के साथ
बारिश की ध्वनि
यात्रा के साथ किसी गीत जैसी थी.
उफ़ क्या बारिश है
और उफ़ क्या इच्छा
ख़ुद अपने लिए स्वर्ग की इच्छा
और उफ़ क्या कराहें
अपनों के लिए भेड़ियों की कराहें
सुखाई हुई छतों पर बारिश
गिरजाघरों में मूर्तियों का सुखाया गया सोना
रोटी बेचनेवाला एक अजनबी, हेलेन से कहता है:
"धरती मुझसे कितना दूर है और
तुमसे कितनी दूर है प्रेम?"

अजनबी हेलेन से कहता है,
एक गली में जो हेलेन के स्टॉकिंग जितनी संकरी है,
"केवल एक ही शब्द है और बारिश
पेड़ों के लिए प्यासी बारिश
पत्थरों के लिए प्यासी बारिश."

रोटी बेचने वाले से अजनबी कहता है
"हेलेन, हेलेन,
क्या इस पल डबलरोटी की महक तुम से उठती हुई
एक सुदूर देश की बालकनी में
होमर के शब्दों की जगह नहीं ले रही?
क्या कविता के सूखे पेड़ों से होकर
नमी तुम्हारे कन्धों से भाप बनकर नहीं उठ रही."

हेलेन जवाब देती है, "क्या बारिश है! क्या बारिश है!"


अजनबी उससे कहता है:
"मैं चाहता हूं कि नारसिसस पानी को निहारे,
मेरे शरीर में तुम्हारे पानी को.
ओ हेलेन, हमारे स्वप्नों के पानी को निहारो
और अपने किनारों पर तुम सुनोगी
मृतक तुम्हारे नाम का जाप कर रहे होंगे.
ओ हेलेन, हेलेन,
हमें अकेला मत छोड़ो
चन्द्रमा जितना अकेला!"

वह जवाब देती है, "क्या बारिश है! क्या बारिश है!"
अजनबी उससे कहता है,
"मैं लड़ा करता था तुम्हारी अपनी जुड़वां खन्दकों में -
मेरे एशियाई रक्त से कभी मुक्त नहीं होओगी तुम
उस अनजान रक्त से कभी मुक्त नहीं होओगी तुम
जो बह रहा है तुम्हारे ग़ुलाबों की नसों में!
कितने क्रूर थे यूनानी उन दिनों
अपनी गाथा की खोज में
कितनी शिद्दत से यात्राएं किया करता था वह जंगली ओडीसियस !"

मैंने हेलेन से जो नहीं कहा, वह कहा
और जो कहा वह मैंने नहीं कहा.
लेकिन हेलेन जानती है कि अजनबी ने क्या छोड़ दिया अनकहा
और जो वह कहता है बारिश में
घुलाती अपनी महक वाली डबलरोटी से.
सो वह उसे जवाब देती है:
"ट्रॉय का युद्ध कभी हुआ ही नहीं था
कभी नहीं
कभी नहीं"


क्या बारिश है!
क्या बारिश!

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हेलेन: हेलेन ऑफ़ ट्रॉय के नाम से जानी जाने वाली ज़ीयस और लीडा की पुत्री.

होमर: ईसा से करीब आठ सौ साल पहले जन्मे एक महान प्राचीन यूनानी कवि जो अपने महाकाव्यों इलियाड और ओडिसी के लिए जाने जाते हैं.

नारसिसस: यूनानी गाथाओं के मुताबिक एक अति सुदर्शन युवक जिसे तालाब में दिख रही अपनी ही परछाई से प्यार हो गया था जो उसकी मृत्यु का कारण बनी.

ओडीसियस: होमर की महागाथा ओडिसी का नायक एक यूनानी राजा.

ट्रॉय का युद्ध: पेरिस नामक एक योद्धा द्वारा हेलेन का अपहरण कर लिए जाने के परिणामस्वरूप ट्रॉय का युद्ध हुआ था.

The Reluctant Fundamentalist


मोहसिन हामिद की किताब The Reluctant Fundamentalist एक पाकिस्तानी युवा चंगेज़ का एकालाप है. लाहौर के एक रेस्तरां में चंगेज़ और उसका अमेरिकी मेहमान मेज़ पर आमने सामने बैठ कर रात का भोजन कर रहे हैं. अमेरिकी मेहमान और उसकी पहचान के बारे में हमें कुछ ज्यादा पता नहीं चलता. बस समय समय पर चंगेज़ उसे संबोधित करता हुआ कथा को थोड़ी देर का विराम ज़रूर देता है. ऐसा कहीं कहीं लगता है की अमेरिकी संभवतः चंगेज़ का पीछा करता रहा है क्योंकि चंगेज़ हाल के समय में अमेरिकियों के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों का नेतृत्व करने लगा है. अमेरिकी एक खास मिशन पर है, ऐसा लग सकता है - शायद उसके पास कोई हथियार भी है.

चंगेज़ अमेरिकी मेहमान को अपने जीवन के बारे में विस्तार से बताता है. पढने-लिखने में खासा तेज़ चंगेज़ ९/११ घटने से पहले प्रिंसटन जैसे बड़े संस्थान से डिग्री हासिल करने के बाद एक नामचीन्ह फ़र्म में ऊंची तनख्वाह वाली नौकरी कर रहा था और कॉर्पोरेट जगत में उसका भविष्य बेहद उज्ज्वल नज़र आ रहा था. वह एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में मनीला गया होता है जहाँ टीवी पर उसे ९/११ के आतंकवादी हमलों की जानकारी मिलती है.

यह किताब सिर्फ ९/११ के पहले और उसके बाद जैसी थीम पर ही नहीं है. इसमें चंगेज़ का एक अटपट तरह का प्रेम-प्रसंग भी है - एरिका नाम की युवती से जो किशोरावस्था में मर गए अपने पहले प्रेमी की याद से ओब्सेस्ड रहती है और अंततः आत्महत्या कर लेती है.

उपन्यास का शीर्षक की विडम्बना समझाने के लिए हामिद हमसे बार-बार पूछते है कि क्या किसी भी मुस्लिम देश में रहने वाला कोई भी अमेरिका-विरोधी कट्टरपंथी घोषित कर दिया जन चाहिए या यह कि क्या यह शब्द (कट्टरपंथी) विशुद्ध रूप से अमेरिकी उच्च पूंजीपति समुदाय के लिए उचित नहीं है. अमेरिका में अपने शुरुआती दिनों के दौरान जब एक बार उसे अपने अमीर अमेरिकी साथियों के साथ लम्बी छुट्टी पर जाने का अवसर मिलता है तो धन के उनके भौंडे प्रदर्शन को देख कर हैरान चंगेज़ सोचता है:

“I ... found myself wondering by what quirk of human history my companions — many of whom I would have regarded as upstarts in my own country, so devoid of refinement were they — were in a position to conduct themselves in the world as though they were its ruling class.”

९/११ के बाद अमेरिका कि प्रतिक्रिया भी चंगेज़ को हैरत में डालती है:

"t seemed to me that America, too, was increasingly giving itself over to a dangerous nostalgia at that time. There was something undeniably retro about the flags and uniforms, about generals addressing cameras in war rooms and newspaper headlines featuring such words as duty and honor. I had always thought of America as a nation that looked forward; for the first time I was struck by its determination to look back."

किताब की शुरुआत में चंगेज़ ऐलान करता है कि वह अमेरिका से प्रेम करता है. लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती जाती है अमेरिका के ढीठ और संवेदनाहीन रवैये के प्रति उसका तार्किक विरोध उत्तरोत्तर मुखर होता जाता है:

"As a society, you were unwilling to reflect upon the shared pain that united you with those who attacked you. You retreated into myths of your own difference, assumptions of your own superiority. And you acted out these beliefs on the stage of the world, so that the entire planet was rocked by the repercussions of your tantrums, not least my family"

१९७१ में पाकिस्तान में जन्मे मोहसिन हामिद ने अपने बचपन के कुछ साल अमेरिका में गुज़ारे जहाँ उनके पिता स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में अपने शोध के सिलसिले में रह रहे थे. ९ वर्ष कि आयु में वे वापस पाकिस्तान आ गए. उच्च शिक्षा के लिए वे १८ का होने पर पुनः अमेरिका गए जहाँ उन्होंने प्रिन्सटन विश्वविद्यालय में पढाई करते हुए नोबेल पुरुस्कार प्राप्त लेखिका टोनी मॉरिसन जैसे अध्यापकों से शिक्षा पाई.

हार्वर्ड से कानून कि शिक्षा पाने के बाद हामिद २००१ में लन्दन आ गए. २००९ तक लन्दन में कई नौकरियां करने के बाद वे अपनी पत्नी और पुत्री के साथ लाहौर शिफ्ट हो गए. मोहसिन हामिद फिलहाल अपना समय लाहौर, लन्दन, न्यूयॉर्क, इटली, यूनान वगैरह जगहों पर बिताते हैं अपने लेखन के बारे में उनका कहना है - "अक्सर एक उपन्यास किसी खंडित व्यक्ति का अपने खुद के साथ संवाद भी हो सकता है"

मान बुकर अवार्ड के लिए नामित की गई हामिद की किताब The Reluctant Fundamentalist कोई क्लासिक तो नहीं कही जा सकती पर एक बार पढ़े जाने की दरकार ज़रूर रखती है.

Saturday, February 19, 2011

जाड़े की वो रात-- (That February Night)




































































































































चौदह फ़रवरी दो हज़ार ग्यारह, रात नौ से साढ़े ग्यारह के दरम्यान तोक्यो की सड़कों और कावासाकी के गली-कूचों में खेंची गयी चंद  तस्वीरें. ब- ज़रिये --तोशिबा टी सिफ़र-सिफ़र पाँच
(जापान  में मोबाइल कनेक्शन के साथ मुफ़्त बँटने वाला एक मामूली  मोबाइल कैम - फ़ोन)




रोनाल्डो! रोनाल्डो!!

आज से क्रिकेट का विश्वकप शुरू हो रहा है. लेकिन खेल जगत में फ़रवरी २०११ एक और घटना के लिए याद की जाती रहेगी - ब्राज़ील के फ़ुटबॉलर रोनाल्डो ने इस महीने खेल से संन्यास ले लिया. जादुई लातीन अमेरिकी फ़ुटबॉल के सम्भवतः अन्तिम प्रतिनिधि रोनाल्डो के रिटायरमैन्ट पर भाई शिवप्रसाद जोशी ने यह लेख कबाड़ख़ाने के लिए भेजा है.


धूप और परछाई के फ़ुटबॉल में

शिवप्रसाद जोशी

नौ साल पहले की सुखद स्मृतियों और उसके बाद विवादों आरोपों कलहों द्वंद्वों तनावों और चोटों के अजीबोग़रीब सिलसिलों के बाद 2011 की फ़रवरी में ब्राज़ीली खिलाड़ी रोनाल्डो ने आख़िर फ़ुटबॉल से संन्यास ले लिया. उस खेल से जिसके वो सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में से एक माने जाते रहे हैं. फ़ुटबॉल के इतिहास में फ़्रांस के ज़ेनादिन ज़ेदान और रोनाल्डो ही दुनिया के सिर्फ़ दो ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्हें खेल की शीर्ष संस्था फ़ीफ़ा का प्लेयर ऑफ़ द इयर अवार्ड तीन बार हासिल हुआ है.

रोनाल्डो के नाम और भी कई रिकॉर्ड हैं. विश्व कप फ़ुटबॉल में सबसे ज़्यादा 15 गोलों का रिकॉर्ड उन्हीं के नाम है. 2007 में हुए एक पोल में उन्हें सर्वकालिक टीम के ग्यारह खिलाड़ियों में से एक चुना गया. फ़ुटबॉल के जादुगर पेले ने दुनिया के महानतम फ़ुटबॉलरों की सूची तैयार की थी, उसमें रोनाल्डो का भी नाम था. पिछले साल ही फ़ुटबॉल की एक मशहूर वेबसाइट गोल डॉट कॉम के एक ऑनलाइन पोल में दशक के खिलाड़ी के रूप में रोनाल्डो को सबसे ज़्यादा वोट मिले.

2010 की फ़रवरी में रोनाल्डो ने कहा था कि वो 2011 में खेल से रिटायर हो जाएंगें. अपनी धुन के पक्के रोनाल्डो ने ठीक एक साल बाद ये एलान भी कर दिया.

22 सितंबर 1976 को रोनाल्डो लुइस नज़ारियो दि लिमा नाम के साथ जन्मे रोनाल्डो फ़ुटबॉल खेल जगत में उस समय चमक के साथ प्रकट हुए थे जब 20वीं सदी का आखिरी दशक चल रहा था और 21वीं सदी आ रही थी.

21 साल की उम्र में अपना पहला खिताब पाने वाले रोनाल्डो फ़ुटबॉल की उस जादुई चमक और उस रहस्य भरे लातिनी शौर्य के आख़िरी रचनाकार हैं जिसकी झलक पेले और माराडोना ने दिखाई थी.

गठीला बदन चौड़ा मुंह खुला ललाट उभरा हुआ जबड़ा धंसी हुई आंखें और तीक्ष्ण गहरी निगाहें. पेले और माराडोना के बाद रोनाल्डो समकालीन लातिन फ़ुटबॉल के सर्वाधिक खिलाड़ियों में एक हैं. मैदान पर वो एक सोचते हुए खिलाड़ी की तरह खेलते रहे हैं जो मौक़ा लगते ही गेंद और गोल पर बाघ की तरह नहीं झपटता था बल्कि विपक्षी टीम के हाफ़ में एक रणनीति के साथ कहीं पर ठहरा हुआ अपनी जगह पर हिलडुल करता हुआ सा आवेग था. गेंद झपटने के लिए रोनाल्डो हमला नहीं करते थे वो न जाने कैसे एक शांत स्थिरता लगभग ख़ामोश चपलता से विपक्षी डिफ़ेंस के पांवों में फंसी गेंद को अपनी कलात्मकता की दर्शनीय उलझन में ले आते थे. वो डिफ़ेंस को तितरबितर नहीं करते थे. रोनाल्डो के उल्लेखनीय गोल अगर आप देखें तो पाएंगें कि विपक्षी खिलाड़ी उनके साथ बराबर बने रहते हैं. रोनाल्डो के खेल की ये रोचकता है कि उन्हें देखते ही विपक्ष दाएं बाएं नहीं हो जाता. वो उन्हें कुछ इस तरह दोस्ताना चुनौती में सहजता में साथ ले आते हैं और फिर उनके बीच अपनी वो निराली विनम्र टॉसिंग फ़्लिकिंग करते थे. वहां गेंद विपक्षी खिलाड़ी के पांव से टकराती हुई वापस रोनाल्डो के पांवों से चिपक जाती है. वो अपने दोनों पांवों को गेंद खेलाते हुए दौड़ते जाते हैं. रोनाल्डो ने बड़ी स्ट्राइकों की अपेक्षा बजाय ज़्यादातर सरकाते हुए कोण बनाते हुए ऐन गोलपोस्ट तक पहुंचते हुए छकाते हुए गोल किए हैं. गेंद भी जैसे उनके पांवों के संतुलन नियंत्रण अनुशासन और नृत्य के स्टैप्स पर लहराती झूमती गोलपोस्ट में गिरती जाती थी. रचना की कठिन चढ़ाई को पार कर रचना का एक विकट ढलान और फिर वापस. खेल का अनूठा सांबा सांबा. अपने दिग्गज अग्रजों और अपने प्रतिभाशाली समकालीन खिलाड़ियों की खेल ऊर्जा को रोनाल्डो ने अपने खेल में समाहित करने की कोशिश की थी.

रोनाल्डो ने खेल की बदौलत अपार लोकप्रियता अपार प्रतिष्ठा अपार अमीरी हासिल की.

वो उन असाधारण दिनों में अपनी पीली जर्सी पहने एक कौंध खेल में दिखा रहे थे जब बाज़ार फ़ुटबॉल के मैदान में बढ़ता ही चला आ रहा था. पीला और कई रंगों वाला ये जादू एक अभूतपूर्व आग के हवाले हो जाने वाला था जो शोहरत और कमाई के रूप में खिलाड़ियों का वक़्त और प्रतिभा और जुनून निगलती जा रही थी. और फैलती ही जाती थी.

रोनाल्डो ऐसे ही उस दौर के शिकंजे में आए हुए बीमार पस्त खिलाड़ी रह चुके थे जब 1998 के विश्व कप में उनकी टीम को फ्रांस से मात खानी पड़ी थी. इंजेक्शन देकर उन्हें मैदान पर उतारा गया था. वो फ़ाइनल खेलने लायक नहीं थे. पारिवारिक मुश्किलों अवसाद और चोटों से बीमार रोनाल्डो ड्रेसिंग रूम में उल्टी कर रहे थे. लेकिन उनकी टीम उनके देश उनकी कंपनी उनके क्लब उनके नाम का इतना भारी दबाव था कि रोनाल्डो को न उतारने की कल्पना कोई कर ही नहीं सकता था. ख़ुद रोनाल्डो हैरान थे. उस दिन उन्हें पहली बार लगा था कि प्रेत भी फ़ुटबॉल के मैदान पर जाकर भाग सकते हैं इधर उधर निरीह ढंग से गेंद को धकियाते ख़ुद को फेंकते रह सकते हैं. लेकिन रोनाल्डो बाज़ार के उस प्रेत को अपनी आदमक़द सामर्थ्य में वापस क़ैद कर सकने वाले खिलाड़ी थे. लालच और कमाई के उस विशालकाय जबड़े से चालाकी और चतुराई और चमत्कार से निकल आने वाले खिलाडी़ भी वो बने. 2002 का विश्व कप इसका गवाह है. जहां रोनाल्डो अविश्वसनीय और ऐतिहासिक ज़िद के साथ मैदान पर उतरे थे और अपनी टीम को विश्व कप जिताने में प्रमुख भूमिका उन्होंने निभाई थी.

रोनाल्डो इस जीत के बाद ब्राज़ील ही नहीं सहसा पूरे खेल के ही महानायक बन गए थे. वो एक ऐसा क़िला बन गए थे जो आसमान की बुलंदियों को न जाने कैसे ऊंचा ही उठता जाता था. रोनाल्डो को देखने के लिए नज़रें ऊपर करनी पड़ती थीं. एक बार फिर रोनाल्डो उस विकट इम्तहान में घिर गए जिससे उनका देश और समूचा लातिन अमेरिका सदियों से गुज़रता आ रहा था. रोनाल्डो एक महान खेल के एक समृद्ध संपन्न शक्तिशाली उपनिवेश बना दिए गए. रोनाल्डो जैसे धुरंधर इस “किक” से स्तब्ध रह गए. वो उन अमीर खेल क्लबों में इधर से उधर घूमते ठिठकते रहे जो इस बीच अपने खिलाड़ियों के कलात्मक हुनर और इसके पीछे पीछे उनके ग्लैमर और उनकी मांग और प्रशंसकों के बीच उनके क्रेज़ के दम पर दुनिया के कई देशों और उनकी सरकारों के सकल घरेलू उत्पाद जितना या कहीं उससे ज़्यादा कमाते रहे हैं. रोनाल्डो ने अपने रिटायरमेंट पर यही कहा कि इस ख़ूबसूरत खेल के लिए उन्होंने कई त्याग किए और अब अपने शरीर के साथ संघर्ष करते हुए वो हार चुके हैं. रोनाल्डो भले ही कह कर गए कि उन्हें कोई मलाल नहीं है. लेकिन उनके रिटायरमेंट बयान में उनकी जिस्मानी तक़लीफ़ की ओर ही इशारा नहीं है उस बड़ी फैली हुई विडंबना की ओर भी अनचाहे ही इशारा है जो एक खिलाड़ी को खेल के मैदान से इतर उसकी लोकप्रियता के रिंग में रौंद कर रख देती है.

उरुग्वे के प्रसिद्ध लेखक उपन्यासकार और पत्रकार एडुआर्दो गैलियानो की फ़ुटबॉल पर लिखी एक ऐतिहासिक किताब है सॉकर इन सन एंड शेडो. लातिन अमेरिकी फ़ुटबॉल की फ़िलॉसफ़ी पर ये दस्तावेज़ सरीखी मानी जाती है. गैलियानो फ़ुटबॉल के इतिहास की एक विहंगम झांकी दिखाते हैं कि कैसे ये खेल दक्षिण अमेरिका में आया और कैसे उसका अभिन्न हिस्सा बन गया. ब्राज़ील, अर्जेटीना, उरुग्वे और मेक्सिको जैसी टीमों वाले लातिन अमेरिका के परिप्रेक्ष्य से वो विश्व कप आयोजनों के इतिहास पर भी नज़र डालते हैं. उस इतिहास में कई किस्से कहानियां हैं. गुदगुदाने वाली घटनाएं हैं, उदास करने वाले ब्यौरे हैं. हिला देने वाली तफ़्सील हैं. गैलियानो खेल के कॉरपोरेटीकरण के बारे में भी बताते हैं. बाज़ार का प्रवेश और कैसे खेल एक उपभोक्ता सामग्री में बदल गया है और खिलाड़ी उत्पाद में. खेल में जादू रहा न करिश्मा, कलात्मकता और रचनात्मकता के लिए जगहें सिकुड़ती जा रहीं. अब कंपनियां और क्लब एथलीट ही नहीं मैनेजर भी चाहती हैं. खेल के मैदान पर अब खिलाड़ी तो उतरते हैं लेकिन असल में वे मैनेजर भी होते हैं जिन्हें कुछ करतब करने कुछ देर दौड़ने और कुछ छलांगे लगाने के लिए मैदान पर भेजा जाता है. वे शायद किसी "डोर" से बंधे होते हैं.

फ़ुटबॉल का खेल अब शोहरत-सनसनी और बुलंदी और विवादों और अफ़वाहों और अरबों खरबों यूरो-डॉलरों के महाबिजनेस में प्रोडक्ट की हैसियत से जा रहा है. 2010 का विश्व कप आख़िर एक साया खेल ही तो था. महानता विलक्षणता जीवटता जादुई कलात्मकता वाला स्पर्श ख़ून पसीने और चोटों की वे ऊबड़खाबड़ लकीरें और मैदान पर धंस जाने वाला जुनून कहां था जिसकी तड़कती तेज़ रोशनियां उस गेंद में समाती रहती थीं और सहसा वहां से रिफ़्लेक्ट होकर हमारी ज़िंदगियों में झिलमिलाती रहती थीं. खिलाड़ी उस गेंद से ही क्यों बचते हुए उसे खेलने के लिए नहीं बल्कि न खेलने के लिए महज़ सरकाते हुए उससे मानो दूर दूर भागते हुए खेल रहे हैं जिसका प्रकाश फ़ुटबॉल कहलाता है. विश्व कपों में सबसे ज़्यादा गोल दागने वाले रोनाल्डो उम्मीद है अब इस प्रकाश की दार्शनिक मानवीय छाया में रहेंगें और आत्मीयता से याद किए जाते रहेंगें

Friday, February 18, 2011

हमारे समय की कविता का 'समय'


 इसी महीने फरवरी की २५ और २६ तारीख को कविता प्रेमियों की एक टीम सहयोगी प्रयास के वार्षिक आयोजन की पहली कड़ी के रूप में 'कविता समय' शीर्षक से एक आयोजन ग्वालियर में कर रही है। इस आयोजन में  हिन्दी के बहुत से स्थापित - चर्चित व संभावनाशील कवि आलोचकों  के प्रतिभाग करने की खबर है। दो दिवसीय यह आयोजन पाँच सत्रों में  बाँटा गया है  जिसमें  पहला सत्र 'कविता और यूटोपिया', दूसरा सत्र  'काव्य पाठ एवं अलंकरण' , तीसरा सत्र ' कविता का संकट : कविता , विचार  और अस्मिता', चौथा सत्र ' प्रतिभागी कवियों का काव्य-पाठ' तथा पाँचवाँ और अंतिम सत्र 'कविता का संकट : कविता की पहुँच' पर केन्द्रित होगा। हिन्दी कविता के लिखने - पढ़ने - पढ़ाने वाले लोगों की बिरादरी के बीच इस आयोचन की चर्चा व प्रतीक्षा है। आज के प्रमुख हिन्दी समाचार  पत्रों में पहला कविता समय सम्मान चंद्रकांत देवताले को और पहला कविता समय युवा सम्मान कुमार अनुपम को देने की घोषणा प्रमुख समाचार के रूप में प्रकाशित हुई है। 'कबाड़ख़ाना' की ओर से दोनो रचनाकारों को बधाई!

 * 'कविता समय' टीम की विज्ञप्ति :

पहला कविता समय  सम्मान  हिंदी के वरिष्ठतम कवियों में एक चंद्रकांत देवताले को और पहला कविता समय युवा सम्मान युवा कवि कुमार अनुपम को दिया जायेगा. “दखल विचार मंच” और “प्रतिलिपि”  के सहयोग से हिंदी कविता के प्रसार, प्रकाशन और उस पर विचार विमर्श के लिए की गयी पहल  कविता समय के अंतर्गत दो वार्षिक कविता सम्मान स्थापित करने का निर्णय संयोजन समिति द्वारा लिया गया और समिति के चारों सदस्यों – बोधिसत्व, पवन करण, गिरिराज किराडू और अशोक कुमार पाण्डेय – ने सर्वसहमति से वर्ष २०११ के सम्मान चंद्रकांत देवताले और कुमार अनुपम को देने का फैसला लिया. कविता समय सम्मान के तहत एक प्रशस्ति पत्र और पाँच हजार रुपये की राशि तथा कविता समय युवा सम्मान के तहत एक प्रशस्ति पत्र और ढाई  हजार रुपये की राशि प्रदान की जाएगी.

कविता समय सम्मान  हर वर्ष ६० वर्ष से अधिक आयु के एक वरिष्ठ कवि को दिया जायेगा जिसकी कविता ने निरंतर मुख्यधारा कविता और उसके कैनन को प्रतिरोध देते हुए अपने ढंग से, अपनी शर्तों पर एक भिन्न काव्य-संसार निर्मित किया हो और हमारे-जैसे कविता-विरोधी समय में निरन्तर सक्रिय रहते हुए अपनी कविता को विभिन्न शक्तियों द्वारा अनुकूलित नहीं होने दिया हो. कविता समय युवा सम्मान  ४५ वर्ष से कम आयु के एक पूर्व में अपुरस्कृत ऐसे कवि को दिया जायेगा जिसकी कविता की ओर, उत्कृष्ट संभावनाओं के बावजूद,  अपेक्षित ध्यानाकर्षण न हुआ हो. इस वर्ष के  सम्मान ग्वालियर में २५-२६ फरवरी को  हो रहे  पहले कविता समय आयोजन में प्रदान किये जायेंगे.

( अखबार की कटिंग : 'अमर उजाला' / 'कविता समय' की विस्तृत जानकारी के लिए http://kavitasamay.wordpress.com पर जाया जा सकता है।) 

Thursday, February 17, 2011

गगन गिल की कविता

निस्संतान

कभी कभी वह बिलकुल भूल जाती
जिसे वह इस बार
बता रही है तीन साल का
पिछली बार वह
तेरह का था
पांचवी में पढ़ती थी
बच्ची जो
अब आठवीं में आ गयी है
जबकि उन्हें मिले अभी
छःमहीने ही गुज़रे हैं
पिछली बारी दोनों में से
एक बहुत अच्छा गाता था
जबकि इस बार कह रही है वह
दोनों अच्छे निकल रहे हैं
गणित में
नाम तक गडबड है उसकी स्मृति में
सहेलीवाले आ गए हैं
उसकी ज़ुबान पर.

बहुत दिन हुए
ईश्वर ने चुरा लिए थे
उनके बच्चे
अब वे सिर्फ उन्हें
ढूंढती फिर सकती हैं.

- गगन गिल