Thursday, September 1, 2011
आई लव रम
"भौजैया बनावें हलवा" और "सोनार तेरी सोना पे मेरी बिस्वास है" जैसा शानदार चटनी संगीत कबाड़ख़ाने में पहले भी लगाया जा चुका है. इसके लिए हमें अपने कबाड़ी भाई विमल वर्मा का कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने इस संगीत से हमारा पहला परिचय कराया था. कैरिबियाई द्वीपों में रहने वाले भारतीयों की हालिया दो पीढ़ियों ने इसी तरह के संगीत से अपनी भारतीयता को बचाया हुआ है. हेमन्त कुमार के गाए एक अत्यन्त लोकप्रिय फ़िल्मी गीत के बैकग्राउन्ड में रचा गया यह गीत ख़ास आप के लिए खोज कर लाया हूं. गायक हैं निषाद सुल्तान -
(यह पोस्ट रम प्रेमी मित्रों दीपराज मेहरा, अक्षय शाह और लखनऊ में रहने वाले बड़े भाई अशोक शाह जी के साथ साथ रम के सभी चाहने वालों के वास्ते)
उन्हीं को इब्तेदा कहिये, उन्हीं को इन्तेहा कहिये
बाबा नुसरत से सुनिये यह कम सुनी गई क़व्वाली - अर्श-ए-आज़म का दूल्हा बड़ी चीज़ है.
नुसरत फ़तेह अली ख़ान
Wednesday, August 31, 2011
कबाड़ख़ाने की दो हज़ारवीं पोस्ट
यह कबाड़ख़ाने की दो हज़ारवीं पोस्ट है. विन्सेन्ट वान गॉग की जीवनी "लस्ट फ़ॉर लाइफ़" का यह टुकड़ा इस ब्लॉग के लिए लगातार एक पथप्रदर्शक का कार्य करता रहा है -
"दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है. आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है. वह ऐसे ही ईमानदार बनने को भी नहीं आया है. वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है. वह उदारता प्राप्त करने को आया है. वह उस बेहूदगी को पार करने आया है जिस में ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है."
इन शब्दों को याद करता हुआ मैं इस पोस्ट में अतुलनीय चित्रकार और मनुष्य विन्सेन्ट वान गॉग की कुछ महान पेन्टिंग्स साझा कर रहा हूं.
और विन्सेन्ट की याद में डॉन मैक्लीन का गाया गीत "स्टारी स्टारी नाइट" -
और अन्त में प्रिय कवयित्री अनीता वर्मा की एक कविता -
वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत
अनीता वर्मा
एक पुराने परिचित चेहरे पर
न टूटने की पुरानी चाह थी
आंखें बेधक तनी हुई नाक
छिपने की कोशिश करता था कटा हुआ कान
दूसरा कान सुनता था दुनिया की बेरहमी को
व्यापार की दुनिया में वह आदमी प्यार का इन्तज़ार करता था
मैंने जंगल की आग जैसी उसकी दाढ़ी को छुआ
उसे थोड़ा सा क्या नहीं किया जा सकता था काला
आंखें कुछ कोमल कुछ तरल
तनी हुई एक हरी नस ज़रा सा हिली जैसे कहती हो
जीवन के जलते अनुभवों के बारे में क्या जानती हो तुम
हम वहां चल कर नहीं जा सकते
वहां आंखों को चौंधियाता हुआ यथार्थ है और अन्धेरी हवा है
जन्म लेते हैं सच आत्मा अपने कपड़े उतारती है
और हम गिरते हैं वहीं बेदम
ये आंखें कितनी अलग हैं
इनकी चमक भीतर तक उतरती हुई कहती है
प्यार मांगना मूर्खता है
वह सिर्फ किया जा सकता है
भूख और दुख सिर्फ सहने के लिए हैं
मुझे याद आईं विन्सेन्ट वान गॉग की तस्वीरें
विन्सेन्ट नीले या लाल रंग में विन्सेन्ट बुखार में
विन्सेन्ट बिना सिगार या सिगार के साथ
विन्सेन्ट दुखों के बीच या हरी लपटों वाली आंखों के साथ
या उसका समुद्र का चेहरा
मैंने देखा उसके सोने का कमरा
वहां दो दरवाज़े थे
एक से आता था जीवन
दूसरे से गुज़रता निकल जाता था
वे दोनों कुर्सियां अन्तत: खाली रहीं
एक काली मुस्कान उसकी तितलियों गेहूं के खेतों
तारों भरे आकाश फूलों और चिमनियों पर मंडराती थी
और एक भ्रम जैसी बेचैनी
जो पूरी हो जाती थी और बनी रहती थी
जिसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता था
एक शान्त पागलपन तारों की तरह चमकता रहा कुछ देर
विन्सेन्ट बोला मेरा रास्ता आसान नहीं था
मैं चाहता था उसे जो गहराई और कठिनाई है
जो सचमुच प्यार है अपनी पवित्रता में
इसलिए मैंने खुद को अकेला किया
मुझे यातना देते रहे मेरे अपने रंग
इन लकीरों में अन्याय छिपे हैं
यह सब एक कठिन शान्ति तक पहुंचना था
पनचक्कियां मेरी कमजोरी रहीं
ज़रूरी है कि हवा उन्हें चलाती रहे
मैं गिड़गिड़ाना नहीं चाहता
आलू खाने वालों और शराव पीने वालों के लिए भी नहीं
मैंने उन्हें जीवन की तरह चाहा है
अलविदा मैंने हाथ मिलाया उससे
कहो कुछ कुछ हमारे लिए करो
कटे होंठों में भी मुस्कराते विन्सेन्ट बोला
समय तब भी तारों की तरह बिखरा हुआ था
इस नरक में भी नृत्य करती रही मेरी आत्मा
फ़सल काटने वाली मशीन की तरह
मैं काटता रहा दुख की फ़सल
आत्मा भी एक रंग है
एक प्रकाश भूरा नीला
और दुख उसे फैलाता जाता है।
"दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है. आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है. वह ऐसे ही ईमानदार बनने को भी नहीं आया है. वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है. वह उदारता प्राप्त करने को आया है. वह उस बेहूदगी को पार करने आया है जिस में ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है."
इन शब्दों को याद करता हुआ मैं इस पोस्ट में अतुलनीय चित्रकार और मनुष्य विन्सेन्ट वान गॉग की कुछ महान पेन्टिंग्स साझा कर रहा हूं.
और विन्सेन्ट की याद में डॉन मैक्लीन का गाया गीत "स्टारी स्टारी नाइट" -
और अन्त में प्रिय कवयित्री अनीता वर्मा की एक कविता -
वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत
अनीता वर्मा
एक पुराने परिचित चेहरे पर
न टूटने की पुरानी चाह थी
आंखें बेधक तनी हुई नाक
छिपने की कोशिश करता था कटा हुआ कान
दूसरा कान सुनता था दुनिया की बेरहमी को
व्यापार की दुनिया में वह आदमी प्यार का इन्तज़ार करता था
मैंने जंगल की आग जैसी उसकी दाढ़ी को छुआ
उसे थोड़ा सा क्या नहीं किया जा सकता था काला
आंखें कुछ कोमल कुछ तरल
तनी हुई एक हरी नस ज़रा सा हिली जैसे कहती हो
जीवन के जलते अनुभवों के बारे में क्या जानती हो तुम
हम वहां चल कर नहीं जा सकते
वहां आंखों को चौंधियाता हुआ यथार्थ है और अन्धेरी हवा है
जन्म लेते हैं सच आत्मा अपने कपड़े उतारती है
और हम गिरते हैं वहीं बेदम
ये आंखें कितनी अलग हैं
इनकी चमक भीतर तक उतरती हुई कहती है
प्यार मांगना मूर्खता है
वह सिर्फ किया जा सकता है
भूख और दुख सिर्फ सहने के लिए हैं
मुझे याद आईं विन्सेन्ट वान गॉग की तस्वीरें
विन्सेन्ट नीले या लाल रंग में विन्सेन्ट बुखार में
विन्सेन्ट बिना सिगार या सिगार के साथ
विन्सेन्ट दुखों के बीच या हरी लपटों वाली आंखों के साथ
या उसका समुद्र का चेहरा
मैंने देखा उसके सोने का कमरा
वहां दो दरवाज़े थे
एक से आता था जीवन
दूसरे से गुज़रता निकल जाता था
वे दोनों कुर्सियां अन्तत: खाली रहीं
एक काली मुस्कान उसकी तितलियों गेहूं के खेतों
तारों भरे आकाश फूलों और चिमनियों पर मंडराती थी
और एक भ्रम जैसी बेचैनी
जो पूरी हो जाती थी और बनी रहती थी
जिसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता था
एक शान्त पागलपन तारों की तरह चमकता रहा कुछ देर
विन्सेन्ट बोला मेरा रास्ता आसान नहीं था
मैं चाहता था उसे जो गहराई और कठिनाई है
जो सचमुच प्यार है अपनी पवित्रता में
इसलिए मैंने खुद को अकेला किया
मुझे यातना देते रहे मेरे अपने रंग
इन लकीरों में अन्याय छिपे हैं
यह सब एक कठिन शान्ति तक पहुंचना था
पनचक्कियां मेरी कमजोरी रहीं
ज़रूरी है कि हवा उन्हें चलाती रहे
मैं गिड़गिड़ाना नहीं चाहता
आलू खाने वालों और शराव पीने वालों के लिए भी नहीं
मैंने उन्हें जीवन की तरह चाहा है
अलविदा मैंने हाथ मिलाया उससे
कहो कुछ कुछ हमारे लिए करो
कटे होंठों में भी मुस्कराते विन्सेन्ट बोला
समय तब भी तारों की तरह बिखरा हुआ था
इस नरक में भी नृत्य करती रही मेरी आत्मा
फ़सल काटने वाली मशीन की तरह
मैं काटता रहा दुख की फ़सल
आत्मा भी एक रंग है
एक प्रकाश भूरा नीला
और दुख उसे फैलाता जाता है।
Tuesday, August 30, 2011
मानें या न मानें: अन्ना परिघटना पर कुछ सवाल
व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार
आनंद स्वरूप वर्मा, संपादक, समकालीन तीसरी दुनिया
जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाय। व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधें का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। शासन की बागडोर किसके हाथ में हो इस मुद्दे पर सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न गुटों के बीच चलती खींचतान से आम जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है पर जहां तक इस वर्ग के उदधारक् की साख बनाये रखने की बात है, विभिन्न गुटों के बीच अद्भुत एकता है। यह एकता 27 अगस्त को छुट्टी के दिन लोकसभा की विशेष बैठक में देखने को मिली जब कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी और भाजपा की सुषमा स्वराज दोनों के सुर एक हो गये और उससे जो संगीत उपजा उसने रामलीला मैदान में एक नयी लहर पैदा कर दी। सदन में शरद यादव के भाषण से सबक लेते हुए अगले दिन अपना अनशन समाप्त करते समय अण्णा ने बाबा साहेब आंबेडकर को तो याद ही किया, अनशन तोड़ते समय जूस पिलाने के लिए दलित वर्ग और मुस्लिम समुदाय से दो बच्चों को चुना।
अण्णा हजारे का 13 दिनों का यह आंदोलन भारत के इतिहास की एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें लाखों लोगों की भागीदारी रही या टीवी चैनलों ने लगातार रात दिन इसका प्रसारण किया। किसी भी आंदोलन की ताकत या समाज पर पड़ने वाले उसके दूरगामी परिणामों का आकलन मात्र इस बात से नहीं किया जा सकता कि उसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। अगर ऐसा होता तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स को केंद्र में रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट पर आरक्षण विरोधी आंदोलन जैसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान हुए ऐसे आंदोलनों में लाखों की संख्या में लोगों की हिस्सेदारी रही। किसी भी आंदोलन का समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेलने में सफल/ असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस आंदोलन को नेतृत्व देने वाले कौन लोग हैं और उनका ‘विजन’ क्या है? अब तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना कर जनभावनाओं का दोहन किया जाता रहा है। अण्णा के व्यक्तित्व की यह खूबी है कि इस खतरे से लोग निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि रालेगण सिदधी के इस फकीरनुमा आदमी को सत्ता नहीं चाहिए।
अण्णा का आंदोलन अतीत के इन आंदोलनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न है क्योंकि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों के बीच यह ध्रुवीकरण का काम करेगा। किसी भी हालत में इस आंदोलन के मुकाबले देश की वामपंथी क्रांतिकारी शक्तियां न तो लोगों को जुटा सकती हैं और न इतने लंबे समय तक टिका सकती हैं जितने लंबे समय तक अण्णा हजारे रामलीला मैदान में टिके रहे। इसकी सीधी वजह यह है कि यह व्यवस्था आंदोलन के मूल चरित्र के अनुसार तय करती है कि उसे उस आंदोलन के प्रति किस तरह का सुलूक करना है। मीडिया भी इसी आधार पर निर्णय लेता है। आप कल्पना करें कि क्या अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/ अघनिष्ठ रूप से जुड़े/ बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध् फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उदधारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है।
क्या इस तथ्य को बार बार रेखांकित करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार का मूल स्रोत सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं? इन नीतियों ने ही पिछले 20-22 वर्षों में इस देश में एक तरफ तो कुछ लोगों को अरबपति बनाया और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मेहनतकश लोगों को लगातार हाशिये पर ठेल दिया। इन नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए अपार संभावनाओं का द्वार खोल दिया और जल, जंगल, जमीन पर गुजर बसर करने वालों को अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापित किया और प्रतिरोध् करने पर उनका सफाया कर दिया। इन नीतियों की ही बदौलत आज मीडिया को इतनी ताकत मिल गयी कि वह सत्ता समीकरण का एक मुख्य घटक हो गया। जिन लोगों को इन नीतियों से लगातार लाभ मिल रहा है वे भला क्यों चाहेंगे कि ये नीतियां समाप्त हों। इन नीतियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जो उथल-पुथल चल रही है उससे सत्ताधारी वर्ग के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है जिसका जीवन निष्कलंक हो, जिसके अंदर सत्ता का लोभ न दिखायी देता हो और जो ऐसे संघर्ष को नेतृत्व दे रहा हो जिसका मकसद समस्या की जड़ पर प्रहार करना न हो तो उसे यह व्यवस्था हाथों हाथ लेगी क्योंकि उसके लिए इससे बड़ा उदधारक कोई नहीं हो सकता। अण्णा की गिरफ्रतारी, रिहाई, अनशन स्थल को लेकर विवाद आदि राजनीतिक फायदे-नुकसान के आकलन में लगे सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोधें की वजह से सामने आते रहे हैं। इनकी वजह से मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
अण्णा के आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रहों और आंदोलनों की उन लोगों को याद दिला दी जिन्होंने तस्वीरों या फील्मों के माध्यम से उस आंदोलन को देखा था। गांधी के समय भी एक दूसरी धारा थी जो गांधी के दर्शन का विरोध् करती थी और जिसका नेतृत्व भगत सिंह करते थे। जहां तक विचारों का सवाल है भगत सिंह के विचार गांधी से काफी आगे थे। भगत सिंह ने 1928-30 में ही कह दिया था कि गांधी के तरीके से हम जो आजादी हासिल करेंगे उसमें गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हो जायेंगे क्योंकि व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा। तकरीबन 80 साल बाद रामलीला मैदान से अण्णा हजारे को भी यही बात कहनी पड़ी कि गोरे अंग्रेज चले गये पर काले अंग्रेजों का शासन है। इन सबके बावजूद भगत सिंह के मुकाबले गांधी को उस समय के मीडिया ने और उस समय की व्यवस्था ने जबर्दस्त ‘स्पेस’ दिया। वह तो टीआरपी का जमाना भी नहीं था क्योंकि टेलीविजन का अभी आविष्कार ही नहीं हुआ था। तो भी शहीद सुखदेव ने चंद्रशेखर आजाद को लिखे एक पत्र में इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि मीडिया हमारे बयानों को नहीं छापता है और हम अपनी आवाज जनता तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जब भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने वाली ताकतें सर उठाती हैं तो उन्हें वहीं खामोश करने की कोशिश होती है। अगर आप अंदर के रोग से मरणासन्न व्यवस्था को बचाने की कोई भी कोशिश करते हुए दिखायी देते हैं तो यह व्यवस्था आपके लिए हर सुविधा मुहैया करने को तत्पर मिलेगी।
अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ , दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।
आनंद स्वरूप वर्मा, संपादक, समकालीन तीसरी दुनिया
जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाय। व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधें का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। शासन की बागडोर किसके हाथ में हो इस मुद्दे पर सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न गुटों के बीच चलती खींचतान से आम जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है पर जहां तक इस वर्ग के उदधारक् की साख बनाये रखने की बात है, विभिन्न गुटों के बीच अद्भुत एकता है। यह एकता 27 अगस्त को छुट्टी के दिन लोकसभा की विशेष बैठक में देखने को मिली जब कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी और भाजपा की सुषमा स्वराज दोनों के सुर एक हो गये और उससे जो संगीत उपजा उसने रामलीला मैदान में एक नयी लहर पैदा कर दी। सदन में शरद यादव के भाषण से सबक लेते हुए अगले दिन अपना अनशन समाप्त करते समय अण्णा ने बाबा साहेब आंबेडकर को तो याद ही किया, अनशन तोड़ते समय जूस पिलाने के लिए दलित वर्ग और मुस्लिम समुदाय से दो बच्चों को चुना।
अण्णा हजारे का 13 दिनों का यह आंदोलन भारत के इतिहास की एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें लाखों लोगों की भागीदारी रही या टीवी चैनलों ने लगातार रात दिन इसका प्रसारण किया। किसी भी आंदोलन की ताकत या समाज पर पड़ने वाले उसके दूरगामी परिणामों का आकलन मात्र इस बात से नहीं किया जा सकता कि उसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। अगर ऐसा होता तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स को केंद्र में रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट पर आरक्षण विरोधी आंदोलन जैसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान हुए ऐसे आंदोलनों में लाखों की संख्या में लोगों की हिस्सेदारी रही। किसी भी आंदोलन का समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेलने में सफल/ असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस आंदोलन को नेतृत्व देने वाले कौन लोग हैं और उनका ‘विजन’ क्या है? अब तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना कर जनभावनाओं का दोहन किया जाता रहा है। अण्णा के व्यक्तित्व की यह खूबी है कि इस खतरे से लोग निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि रालेगण सिदधी के इस फकीरनुमा आदमी को सत्ता नहीं चाहिए।
अण्णा का आंदोलन अतीत के इन आंदोलनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न है क्योंकि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों के बीच यह ध्रुवीकरण का काम करेगा। किसी भी हालत में इस आंदोलन के मुकाबले देश की वामपंथी क्रांतिकारी शक्तियां न तो लोगों को जुटा सकती हैं और न इतने लंबे समय तक टिका सकती हैं जितने लंबे समय तक अण्णा हजारे रामलीला मैदान में टिके रहे। इसकी सीधी वजह यह है कि यह व्यवस्था आंदोलन के मूल चरित्र के अनुसार तय करती है कि उसे उस आंदोलन के प्रति किस तरह का सुलूक करना है। मीडिया भी इसी आधार पर निर्णय लेता है। आप कल्पना करें कि क्या अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/ अघनिष्ठ रूप से जुड़े/ बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध् फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उदधारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है।
क्या इस तथ्य को बार बार रेखांकित करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार का मूल स्रोत सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं? इन नीतियों ने ही पिछले 20-22 वर्षों में इस देश में एक तरफ तो कुछ लोगों को अरबपति बनाया और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मेहनतकश लोगों को लगातार हाशिये पर ठेल दिया। इन नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए अपार संभावनाओं का द्वार खोल दिया और जल, जंगल, जमीन पर गुजर बसर करने वालों को अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापित किया और प्रतिरोध् करने पर उनका सफाया कर दिया। इन नीतियों की ही बदौलत आज मीडिया को इतनी ताकत मिल गयी कि वह सत्ता समीकरण का एक मुख्य घटक हो गया। जिन लोगों को इन नीतियों से लगातार लाभ मिल रहा है वे भला क्यों चाहेंगे कि ये नीतियां समाप्त हों। इन नीतियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जो उथल-पुथल चल रही है उससे सत्ताधारी वर्ग के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है जिसका जीवन निष्कलंक हो, जिसके अंदर सत्ता का लोभ न दिखायी देता हो और जो ऐसे संघर्ष को नेतृत्व दे रहा हो जिसका मकसद समस्या की जड़ पर प्रहार करना न हो तो उसे यह व्यवस्था हाथों हाथ लेगी क्योंकि उसके लिए इससे बड़ा उदधारक कोई नहीं हो सकता। अण्णा की गिरफ्रतारी, रिहाई, अनशन स्थल को लेकर विवाद आदि राजनीतिक फायदे-नुकसान के आकलन में लगे सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोधें की वजह से सामने आते रहे हैं। इनकी वजह से मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
अण्णा के आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रहों और आंदोलनों की उन लोगों को याद दिला दी जिन्होंने तस्वीरों या फील्मों के माध्यम से उस आंदोलन को देखा था। गांधी के समय भी एक दूसरी धारा थी जो गांधी के दर्शन का विरोध् करती थी और जिसका नेतृत्व भगत सिंह करते थे। जहां तक विचारों का सवाल है भगत सिंह के विचार गांधी से काफी आगे थे। भगत सिंह ने 1928-30 में ही कह दिया था कि गांधी के तरीके से हम जो आजादी हासिल करेंगे उसमें गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हो जायेंगे क्योंकि व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा। तकरीबन 80 साल बाद रामलीला मैदान से अण्णा हजारे को भी यही बात कहनी पड़ी कि गोरे अंग्रेज चले गये पर काले अंग्रेजों का शासन है। इन सबके बावजूद भगत सिंह के मुकाबले गांधी को उस समय के मीडिया ने और उस समय की व्यवस्था ने जबर्दस्त ‘स्पेस’ दिया। वह तो टीआरपी का जमाना भी नहीं था क्योंकि टेलीविजन का अभी आविष्कार ही नहीं हुआ था। तो भी शहीद सुखदेव ने चंद्रशेखर आजाद को लिखे एक पत्र में इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि मीडिया हमारे बयानों को नहीं छापता है और हम अपनी आवाज जनता तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जब भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने वाली ताकतें सर उठाती हैं तो उन्हें वहीं खामोश करने की कोशिश होती है। अगर आप अंदर के रोग से मरणासन्न व्यवस्था को बचाने की कोई भी कोशिश करते हुए दिखायी देते हैं तो यह व्यवस्था आपके लिए हर सुविधा मुहैया करने को तत्पर मिलेगी।
अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ , दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।
उसके भीतर से समुद्र गायब हो गया है शायद
प्रिय कवि चन्द्रकान्त देवताले की एक कविता और -
वह औरत
चन्द्रकान्त देवताले
रेतीले मैदान के बीचोबीच
हमेशा अपनी किसी गुमशुदा चीज़ को
तलाशती हुई आँखों के साथ एक औरत
सफ़ेद चट्टान की तरह खड़ी है
उसके हाथों में ज़रूर टहनियों की
वैसी हरकत है जिसे कोई
बारिश का इन्तज़ार कह सकता है
उसके भीतर से समुद्र गायब हो गया है शायद
और सफ़ेद रोशनी की जगह
एक काला पत्थर रख दिया है किसी ने
अपने अँधेरे को कुछ-कुछ जानकर भी
वह अदृश्य जल-प्रवाह को सुनती है
और उसके होंठों पर नन्हें पक्षियों की तरह
भयभीत शब्द फड़फड़ाते हैं
वह औरत अपने को सहसा
एक पेड़ की तरह
और फिर उससे निकट कर
अंधी उँगलियों से टोहती है एक फूल
उसी पेड़ पर
जो वह ख़ुद अभी थी
वह औरत
चन्द्रकान्त देवताले
रेतीले मैदान के बीचोबीच
हमेशा अपनी किसी गुमशुदा चीज़ को
तलाशती हुई आँखों के साथ एक औरत
सफ़ेद चट्टान की तरह खड़ी है
उसके हाथों में ज़रूर टहनियों की
वैसी हरकत है जिसे कोई
बारिश का इन्तज़ार कह सकता है
उसके भीतर से समुद्र गायब हो गया है शायद
और सफ़ेद रोशनी की जगह
एक काला पत्थर रख दिया है किसी ने
अपने अँधेरे को कुछ-कुछ जानकर भी
वह अदृश्य जल-प्रवाह को सुनती है
और उसके होंठों पर नन्हें पक्षियों की तरह
भयभीत शब्द फड़फड़ाते हैं
वह औरत अपने को सहसा
एक पेड़ की तरह
और फिर उससे निकट कर
अंधी उँगलियों से टोहती है एक फूल
उसी पेड़ पर
जो वह ख़ुद अभी थी
फ़ीरोज़ दस्तूर की आवाज़ में राग मिश्र काफ़ी
किराना घराने से ताल्लुक रखने वाले फ़ीरोज़ दस्तूर ने अपने करियर का प्रारम्भ बम्बई की फ़िल्म इन्डस्ट्री से किया. उन्होंने वाडिया मूवीटोन और कुछ अन्य बैनरों तले अभिनय भी किया. लेकिन उन्हें ख्याति शास्त्रीय संगीत ने ही दिलाई. वे सवाई गन्धर्व के शिष्य रहे और अस्सी के होने के बाद तक गायन के क्षेत्र में सक्रिय थे. २००९ में ८९ साल की आयु में उनका देहान्त हुआ. आज सुनिए उनसे राग मिश्र काफ़ी-
(फ़ोटो में फ़ीरोज़ दस्तूर पंडित भीमसेन जोशी के साथ)
Monday, August 29, 2011
यह फूल एक तीसरी ही लड़की का नाम था
काली लड़की
चन्द्रकान्त देवताले
वह शीशम के सबसे सुन्दर फूल की तरह
मेरी आँख के भीतर खुप रही थी
अपने बालों में पीले फूलों को खोंसकर
वह शब्दों के लिए ग़ैरहाजिर
पर आँखों के लिए मौज़ूद थी
मैं बोलता जा रहा था
पर शब्द जहाँ से आ रहे थे
वहाँ एक दूसरी ही लड़की एक नदी थी
और यह सामने बैठी हुई लड़की
उस नदी से लेकर
एक बैंजनी फूल मुझे दे रही थी
और यह फूल
एक तीसरी ही लड़की का नाम था
और यह सब करते हुए वह
एक-दो-तीन नहीं
हज़ारों दिनों को तहस-नहस कर रही थी
बोरिस स्मेलोव के फ़ोटोग्राफ़
बोरिस स्मेलोव कुल सैंतालीस साल (१९५१-१९९८) जिये. यह रूसी फ़ोटोग्राफ़र सर्वसम्मति से बीसवीं सदी के यूरोप के दो-तीन चुनिन्दा ख़लीफ़ा फ़ोटो कलाकारों में गिना जाता है. उन का विस्तृत परिचय अगली बार. आज देखिए उनके चार फ़ोटो -
अपोलो इन द समर गार्डन, १९७८
फ़ाख़्ता, १९७५
स्प्रिंग फ़्रॉग हन्ट १९९५
अ मैन विद अ बकेट १९७४
अपोलो इन द समर गार्डन, १९७८
फ़ाख़्ता, १९७५
स्प्रिंग फ़्रॉग हन्ट १९९५
अ मैन विद अ बकेट १९७४
कब है बदला ये ज़माना, तू ज़माने को बदल
अहमद हुसैन - मोहम्मद हुसैन बन्धुओं से सुनिए हसरत जयपुरी साहब की यह मीठी रचना-
चल मेरे साथ ही चल ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल
इन समाजों के बनाये हुये बंधन से निकल, चल
हम वहाँ जाये जहाँ प्यार पे पहरे न लगें
दिल की दौलत पे जहाँ कोई लुटेरे न लगें
कब है बदला ये ज़माना, तू ज़माने को बदल, चल
प्यार सच्चा हो तो राहें भी निकल आती हैं
बिजलियाँ अर्श से ख़ुद रास्ता दिखलाती हैं
तू भी बिजली की तरह ग़म के अँधेरों से निकल, चल
अपने मिलने पे जहाँ कोई भी उँगली न उठे
अपनी चाहत पे जहाँ कोई दुश्मन न हँसे
छेड़ दे प्यार से तू साज़-ए-मोहब्बत-ए-ग़ज़ल, चल
पीछे मत देख न शामिल हो गुनाहगारों में
सामने देख कि मंज़िल है तेरी तारों में
बात बनती है अगर दिल में इरादे हों अटल, चल
(यहां से डाउनलोड करें - चल मेरे साथ ही चल)
एक युवा कवि को पत्र - 5 - रेनर मारिया रिल्के
(पत्र १, पत्र २, पत्र ३, पत्र-४ से आगे)
रोम
२९ अक्टूबर १९०३
प्रिय मान्यवर,
आपका २९ अगस्त का पत्र मुझे फ़्लोरेन्स में मिल गया था और जवाब लिखने में मुझे ये दो लम्बे महीने लग गए हैं. कृपया मुझे इस लेटलतीफ़ी के लिए माफ़ करें लेकिन मुझे यात्राएं करते समय पत्र लिखना अच्छा नहीं लगता क्योंकि उस के लिए मुझे सबसे ज़रूरी उपकरणों के अलावा भी कुछ चाहिए होता है: थोड़ी सी ख़ामोशी और अकेलापन और बहुत अपरिचित जगह नहीं.
हम कोई छः हफ़्ते पहले रोम पहुंचे, ऐसे समय जब वह ख़ाली, गर्म और प्रत्यक्षतः बुखार में पड़ा हुआ रोम था, और इस परिस्थिति के साथ साथ रहने की जगह खोजने की हमारी कोशिशों ने हमारे आसपास की बेचैनी को इतना बढ़ा दिया जैसे कि वह कभी ख़त्म ही नहीं होगी, और अपरिचितता हम पर बेघर होने के भार की तरह लद गई. इसके अलावा शुरुआती दिनों में रोम (अगर आप उस से परिचित न हुए हों तो) उदासी से आपका दम घोंटा करता है: अपने अन्धेरे संग्रहालयों सरीखे बेजान वातावरण के कारण जिसे यह अपनी सांस में छोड़ता है, इसके बीते समयों की प्रचुरताओं के कारण जिन्हें सामने लाकर सश्रम खड़ा किया जाता है (इन बीते समयों पर एक नन्हा सा वर्तमान ठहरा रहता है), उस भयंकर अति-मूल्यांकन के कारण जिसे विद्वानों और भाषाशास्त्रियों ने बचाकर रखा हुआ है और जिसकी नकल इटली में आए सैलानी किया करते हैं, इन सारी विकृत और क्षयग्रस्त चीज़ों के कारण जो अन्ततः एक दूसरे समय के इत्तफ़ाक़न बच रहे अवशेषों के अलावा कुछ नहीं वे किसी दूसरे जीवन की चीज़ें हैं जो हमारी नहीं होतीं और नहीं होनी चाहिए. आख़िरकार, हफ़्तों के रोजमर्रा प्रतिरोध के बाद आप अपने को थोड़ा बहुत प्रकृतिस्थ पाते हैं अलबत्ता अभी भी कुछ सशंकित, और आप ख़ुद से कहते हैं: नहीं, यहां दूसरी जगहों से अधिक सुन्दरता नहीं है, और ये तमाम चीज़ें जिन्हें देखकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग आश्चर्य करते रहे हैं, जिनकी मरम्मत और रखरखाव कारीगरों ने अपने हाथों से की है, इनका कोई अर्थ नहीं, ये कुछ नहीं हैं, इनके पास न कोई हृदय है न कोई मूल्य; लेकिन यहां इतनी सारी सुन्दरता है क्योंकि हर जगह इतनी सारी सुन्दरता है. जीवन से भरे पानी प्राचीन नहरों से होकर महान नगर में आते हैं और पत्थर के बने जलकुण्डों में तमाम चौराहों पर और फैले हुए विशाल और विस्तीर्ण तालाबों में नृत्य करते हैं, वे दिन के वक़्त कलरव करते रहते हैं और रात को अपनी आवाज़ें बढ़ा देते हैं, रात जो यहां असीम होती है और तारोंभरी और हवाओं से मुलायम. और यहां बाग़ीचे हैं, अविस्मरणीय रास्ते और माइकेलएन्जेलो के डिज़ाइन किए हुए ज़ीने, नीचे की तरफ़ फिसलते पानियों के पैटर्न पर बनाए गए ज़ीने जो उतरते हुए फैलती हुई सीढ़ियों को जन्म देते जाते हैं जैसे कि वह किसी लहर से निकली लहरें हो. ऐसी छवियों से आप अपने आप को सम्हालते हैं, अपने को वापस प्राप्त करते हुए उस सख़्त बहुतायत से जो यहां-वहां बोलती-बड़बड़ करती रहती है (और किस कदर बातूनी), और हौले हौले आप उन कुछ चीज़ों को पहचानना शुरू करते हैं जिनके भीतर कोई अनन्त वस्तु बची रह गई है और जिसे आप प्रेम कर सकते हैं और कोई एकाकी चीज़ जिसमें आप नम्रतापूर्वक हिस्सा ले सकते हैं.
मैं अब भी शहर में रह रहा हूं, कैपिटॉल पर, यह रोमन कला से आई सुन्दरतम अश्वारोही मूर्ति से बहुत दूर नहीं है - मार्कस ऑरेलियस की मूर्ति; लेकिन कुछ ही हफ़्तों में मैं एक शान्त, सादगीभरे कमरे में चला जाऊंगा - एक पुराने समरहाउस में जो शहर, उसके शोर और घटनाओं से छुपा हुआ, एक बड़े से पार्क में कहीं खोया सा हुआ है. वहां मैं पूरी सर्दियों भर रहूंगा और महान शान्ति का आनन्द उठाऊंगा, जिससे मुझे कार्य से भरे कुछ प्रसन्न क्षणों की उम्मीद है ...
वहां से, जहां मैं ज़्यादा अपने घर जैसा महसूस करूंगा, मैं आपको एक लम्बा पत्र लिखूंगा, जिसमें मैं उस बारे में ज़्यादा कहूंगा जिस बाबत आपने लिखा है. आज मैं आप को यह बताना चाहता हूं (और शायद ऐसा पहले न कह पाना मेरी ग़लती रही है) कि जो किताब आपने मुझे भेजी थी (आपने अपने पत्र में ज़िक्र किया था कि उसमें आपका भी कुछ काम था) अब तक नहीं पहुंची है. क्या वह आपको सम्भवतः वोर्पस्वीड से वापस भेज दी गई है? (वे वहां से विदेशों को पार्सल फ़ॉरवर्ड नहीं करते). यही सबसे आशावान सम्भावना है, और मुझे इस बाबत निश्चित जानकर अच्छा लगेगा. मुझे आशा है बन्डल खोया नहीं है - दुर्भाग्यवश जैसी इतालवी डाक-व्यवस्था है, वह कोई असामान्य बात नहीं होगी.
मुझे उस पुस्तक का अपने पास होना भला लगता (जैसा कि आप की तरफ़ से मुझ तक आई हर चीज़ के साथ होता है); और इस दरम्यान जो भी कविताएं उपजी होंगी तो मैं हमेशा (अगर आप उन्हें मुझे सौंपेंगे तो) उन्हें बार-बार पढ़ूंगा और जितना अच्छी तरह से उन्हें महसूस कर सकूंगा करूंगा. शुभकामनाएं.
आपका
रेनर मारिया रिल्के
रोम
२९ अक्टूबर १९०३
प्रिय मान्यवर,
आपका २९ अगस्त का पत्र मुझे फ़्लोरेन्स में मिल गया था और जवाब लिखने में मुझे ये दो लम्बे महीने लग गए हैं. कृपया मुझे इस लेटलतीफ़ी के लिए माफ़ करें लेकिन मुझे यात्राएं करते समय पत्र लिखना अच्छा नहीं लगता क्योंकि उस के लिए मुझे सबसे ज़रूरी उपकरणों के अलावा भी कुछ चाहिए होता है: थोड़ी सी ख़ामोशी और अकेलापन और बहुत अपरिचित जगह नहीं.
हम कोई छः हफ़्ते पहले रोम पहुंचे, ऐसे समय जब वह ख़ाली, गर्म और प्रत्यक्षतः बुखार में पड़ा हुआ रोम था, और इस परिस्थिति के साथ साथ रहने की जगह खोजने की हमारी कोशिशों ने हमारे आसपास की बेचैनी को इतना बढ़ा दिया जैसे कि वह कभी ख़त्म ही नहीं होगी, और अपरिचितता हम पर बेघर होने के भार की तरह लद गई. इसके अलावा शुरुआती दिनों में रोम (अगर आप उस से परिचित न हुए हों तो) उदासी से आपका दम घोंटा करता है: अपने अन्धेरे संग्रहालयों सरीखे बेजान वातावरण के कारण जिसे यह अपनी सांस में छोड़ता है, इसके बीते समयों की प्रचुरताओं के कारण जिन्हें सामने लाकर सश्रम खड़ा किया जाता है (इन बीते समयों पर एक नन्हा सा वर्तमान ठहरा रहता है), उस भयंकर अति-मूल्यांकन के कारण जिसे विद्वानों और भाषाशास्त्रियों ने बचाकर रखा हुआ है और जिसकी नकल इटली में आए सैलानी किया करते हैं, इन सारी विकृत और क्षयग्रस्त चीज़ों के कारण जो अन्ततः एक दूसरे समय के इत्तफ़ाक़न बच रहे अवशेषों के अलावा कुछ नहीं वे किसी दूसरे जीवन की चीज़ें हैं जो हमारी नहीं होतीं और नहीं होनी चाहिए. आख़िरकार, हफ़्तों के रोजमर्रा प्रतिरोध के बाद आप अपने को थोड़ा बहुत प्रकृतिस्थ पाते हैं अलबत्ता अभी भी कुछ सशंकित, और आप ख़ुद से कहते हैं: नहीं, यहां दूसरी जगहों से अधिक सुन्दरता नहीं है, और ये तमाम चीज़ें जिन्हें देखकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग आश्चर्य करते रहे हैं, जिनकी मरम्मत और रखरखाव कारीगरों ने अपने हाथों से की है, इनका कोई अर्थ नहीं, ये कुछ नहीं हैं, इनके पास न कोई हृदय है न कोई मूल्य; लेकिन यहां इतनी सारी सुन्दरता है क्योंकि हर जगह इतनी सारी सुन्दरता है. जीवन से भरे पानी प्राचीन नहरों से होकर महान नगर में आते हैं और पत्थर के बने जलकुण्डों में तमाम चौराहों पर और फैले हुए विशाल और विस्तीर्ण तालाबों में नृत्य करते हैं, वे दिन के वक़्त कलरव करते रहते हैं और रात को अपनी आवाज़ें बढ़ा देते हैं, रात जो यहां असीम होती है और तारोंभरी और हवाओं से मुलायम. और यहां बाग़ीचे हैं, अविस्मरणीय रास्ते और माइकेलएन्जेलो के डिज़ाइन किए हुए ज़ीने, नीचे की तरफ़ फिसलते पानियों के पैटर्न पर बनाए गए ज़ीने जो उतरते हुए फैलती हुई सीढ़ियों को जन्म देते जाते हैं जैसे कि वह किसी लहर से निकली लहरें हो. ऐसी छवियों से आप अपने आप को सम्हालते हैं, अपने को वापस प्राप्त करते हुए उस सख़्त बहुतायत से जो यहां-वहां बोलती-बड़बड़ करती रहती है (और किस कदर बातूनी), और हौले हौले आप उन कुछ चीज़ों को पहचानना शुरू करते हैं जिनके भीतर कोई अनन्त वस्तु बची रह गई है और जिसे आप प्रेम कर सकते हैं और कोई एकाकी चीज़ जिसमें आप नम्रतापूर्वक हिस्सा ले सकते हैं.
मैं अब भी शहर में रह रहा हूं, कैपिटॉल पर, यह रोमन कला से आई सुन्दरतम अश्वारोही मूर्ति से बहुत दूर नहीं है - मार्कस ऑरेलियस की मूर्ति; लेकिन कुछ ही हफ़्तों में मैं एक शान्त, सादगीभरे कमरे में चला जाऊंगा - एक पुराने समरहाउस में जो शहर, उसके शोर और घटनाओं से छुपा हुआ, एक बड़े से पार्क में कहीं खोया सा हुआ है. वहां मैं पूरी सर्दियों भर रहूंगा और महान शान्ति का आनन्द उठाऊंगा, जिससे मुझे कार्य से भरे कुछ प्रसन्न क्षणों की उम्मीद है ...
वहां से, जहां मैं ज़्यादा अपने घर जैसा महसूस करूंगा, मैं आपको एक लम्बा पत्र लिखूंगा, जिसमें मैं उस बारे में ज़्यादा कहूंगा जिस बाबत आपने लिखा है. आज मैं आप को यह बताना चाहता हूं (और शायद ऐसा पहले न कह पाना मेरी ग़लती रही है) कि जो किताब आपने मुझे भेजी थी (आपने अपने पत्र में ज़िक्र किया था कि उसमें आपका भी कुछ काम था) अब तक नहीं पहुंची है. क्या वह आपको सम्भवतः वोर्पस्वीड से वापस भेज दी गई है? (वे वहां से विदेशों को पार्सल फ़ॉरवर्ड नहीं करते). यही सबसे आशावान सम्भावना है, और मुझे इस बाबत निश्चित जानकर अच्छा लगेगा. मुझे आशा है बन्डल खोया नहीं है - दुर्भाग्यवश जैसी इतालवी डाक-व्यवस्था है, वह कोई असामान्य बात नहीं होगी.
मुझे उस पुस्तक का अपने पास होना भला लगता (जैसा कि आप की तरफ़ से मुझ तक आई हर चीज़ के साथ होता है); और इस दरम्यान जो भी कविताएं उपजी होंगी तो मैं हमेशा (अगर आप उन्हें मुझे सौंपेंगे तो) उन्हें बार-बार पढ़ूंगा और जितना अच्छी तरह से उन्हें महसूस कर सकूंगा करूंगा. शुभकामनाएं.
आपका
रेनर मारिया रिल्के
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