Thursday, April 30, 2009

फ़्रान्ज़ काफ़्का का 'द ट्रायल' - अन्तिम हिस्सा

पिछली पोस्ट से जारी



मुकदमे के विराट और हताशाभरे शून्य में काफ्का की मुलाकात दो लोगों से होती है – वकील हुल्ड और चित्रकार तितोरेली – जो उसे मुक्ति के दो परस्पर विरोधाभासी विकल्प बतलाते हैं। वकील हुल्ड उस अंधेरे में रहता है जिसे ईश्वर ने दुनिया के ऊपर फैलाया हुआ है।उसका घर अंधेरा है जहां उसकी नर्स मोमबत्ती जलाकर रोशनी करती है। इसी अंधेरे कमरे में हुल्ड लेटा रहता है : बिना हजामत बनाए। लेकिन इस अंधेरे में भी वह जोसेफ के को बताता है कि मुकदमे से बच निकल आने के लिए उसे परमात्मा का रास्ता चुनना होगा।

हुल्ड के पैरों पर लेनी नाम की नर्स नौकरानी रहती है जो एक पवित्र वेश्या का चरित्र निभाती है। ऐसा नहीं कि लेनी उस सलेटी शहर के झोपड़पट्टों में रहनेवाले हर आदमी के लिए वेश्या बन जाती है। उसकी वासना को सिर्फ वे लोग भड़का पाते हैं जिन पर न्यायालय ने कोई आरोप लगा रखे हों और जिन के भीतर आपराधिक मुकदमे की कार्रवाई ने एक अजीब सा सौन्दर्य भर दिया हो। के द्वारा भोगे जाने से पहले वह उसे अपने दांए हाथ की दो उंगलियों को जोड़नेवाली एक मांसदार झिल्ली दिखाती है। लेनी एक ऐसा आकर्षण है जिसकी तनिक बाहर उभरी काली आंखें¸ जर्द गाल¸ गोल माथा¸ लम्बा सफेद एप्रन¸ और बालसुलभ किन्तु अश्लील सम्मोहन कानून द्वारा चुने गए अपराधियों को अपने से बांधे रखता है। वह उन्हें उबकाईभरी एन्द्रिकता और भावुक अपनेपन का वह मिश्रण परोसती है जो काफ्का की स्त्रियों की विशेषता है। वह उन्हें चूमती है¸ दुलराती है¸ उनका ख्याल रखती है¸ उन्हें सहानुभूति देती है¸ उनका हौसला बढ़ाती है¸ उन्हें अपमानित करती है और उन्हें लगातार नीचे गिराती जाती है। और अगर हम उस पर यकीन करें तो वह उनके लिए अपना बलिदान भी कर सकती है ठीक जिस तरह उनकी मुक्ति के नाम पर वकील हुल्ड आत्मदाह कर लेता है।

रोबिन्सन और देलामार्चे के रूप में काफ्का ने पतन की उस रंगीनी को चित्रित किया है जो यथार्थ के केन्द्र में है। ब्लोक नाम के एक आरोपी व्यापारी के रूप में पतन हमें पवित्रता के पास जाने की अनुमति देने वला रास्ता बन जाता है। पांच सालों से चल रहे मुकदमे को ब्लोक सीधे सीधे स्वीकार कर लेता है। वह अपना घर छोड़कर वकील हुल्ड के पास रहने चला आता है और हर समय उस पवित्र किताब को पढ़ता रहता है जो उसे हुल्ड ने दी है। वह हर समय एक ही पन्ना पढ़ता रहता है और लगातार प्रार्थनारत रहता है वकील नाम के ईश्वर द्वारा बुलाए जाने का इन्तजार करता हुआ।


जब भी वकील उसे बुलाता है – हमें नहीं पता कब – क्योंकि यह वकील के मूड पर निर्भर करता है और बुलावे की घंटी रात को भी बज सकती है¸ ब्लोक अपने हाथ पीछे बांधे बहुत हौले से आगे बढ़ता है – अपने पीछे दरवाजा खुला छोड़ जाता हुआ। जब भी वह वकील की आवाज सुनता है वह लड़खड़ा जाता है मानो किसी ने उसकी छाती पर वार किया हो। वह ठहर कर अपने हाथ हवा में उठाकर दोहरा हो जाता है और बच भागने को तैयार। वकील बोलता जाता है और ब्लोक उसकी आंखों में देख पाने की हिम्मत नहीं कर पाता। उसकी निगाह किसी कोने पर ठहर जाती है जैसे कि उसके भीतर हुल्ड की गुप्त गरिमा का सामना करने की ताकत न हो। वह कांपता हुआ घुटनों पर गिर जाता है¸ भगवान की तरह हुल्ड का आहवान करता है¸ चारों हाथ पैरों पर घिसटता हुआ उस बिस्तर की तरफ बढ़ता है जहां हुल्ड लेटा होता है। वह सावधानी से उसकी पंखों वाली रजाई को सहलाता है और उसके बूढ़े हाथ को तीन बार चूमता है। फिर वह सिर झुका कर उसकी आवाज का इन्तजार करने लगता है। वह अपमान और पतन की निकृष्टतम गहराइयों में पहुंच चुका है: उसकी बुद्धिमत्ता और संवेदना उसके दिमाग में कुन्द पड़ चुके हैं। ब्रूनेल्दा की बालकनी पर रोबिन्सन की भांति नह एक कुत्ता बन चुका है: हमें आश्चर्य नहीं होगा अगर वह बिस्तर के नीचे घुस कर वहां से भौंकने लगे। लेकिन अपमान ही पर्याप्त नहीं है। हुल्ड और लेनी की मांगें और भी हैं। लेनी¸ उसे और जोसेफ के को और बाकी सारे आरोपियों को अपना बिस्तर प्रस्तुत करती है ताकि वे सारे अपना अपराध स्वीकार करें और पश्चात्ताप करें या कम से कम ऐसा करने का दिखावा करें। अपमान और पतन की इस प्रक्रिया के संपूर्ण हो चुकने के बाद ही वकील हुल्ड उनसे वादा करता है कि एक दिन न्यायालय उन्हें क्षमा कर देगा और वे सूरज की रोशनी के नीचे होंगे।

अगर हुल्ड रात के दिल में रहता है तो तितोरेली का निवास नर्क में है। हम शहर के उस गंदगी भरे हिस्से से पहले ही परिचित हो चुके हैं। इस बार हम लकड़ी के छोटे और क्षुद्र कमरे में प्रवेश करते हैं जो पोर्ट्रेटों और लैंडस्केपों से भरा हुआ है। जहां की हवा न्यायालय के गलियारों की हवा की तरह प्रदूषित और दमघोंटू है। अपनी नाइटशर्ट और कैनवस की चौड़ी पतलून पहने नंगे पांव तितोरेली जोसेफ के से बहुत देर तक बातें करता रहता है। एक तरफ तो वह न्यायालय की कुलीनता का हिस्सा है क्योंकि न्यायालय के लिए तमाम तरह के चित्र बनाने का काम उसे अपने पिता से उत्तराधिकार में मिला होता है। लेकिन दूसरी तरफ उसके पोर्ट्रेटों और लैंडस्केपों में इस कदर अनगढ़पन है कि वे हमें आधुनिक विश्व में इस कदर पतित हो चुकी एक पवित्र फॉर्म दिखाने लगते हैं। उसके भीतर हुल्ड की सी गरिमा नहीं है। सीढ़ियों पर दिखाई देने वाली लड़कियों से उसके संबंध बेहद अश्लील तरह के हैं और वे लड़कियां बात बात पर उसके कमरे में झांका करती हैं। जो उसे जानते हैं वे उसके साथ किसी भिखारी और झूठे की तरह व्यवहार करते हैं। हमें¸ जिन्होंने उसके माध्यम से न्यायालय के बाबत एक महत्वपूर्ण सूचना पाई है¸ यह अहसास होता है कि वह आधुनिक संसार में यूलिसिस जैसे हजारों चालबाजों में से एक है। उसका सबसे नजदीकी संबंधी गुइटे का मैफिस्टोफिलीज़ है जिससे उसने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि पाई है। मैफिस्टोफिलीज़ की तरह वह हमें कभी दगा नहीं देता हालांकि वह झूठा है और उस पर सत्य की आत्मा उसी तरह पसरी रहती है जैसा कर पाने में चालबाजों को महारत होती है। काफ्का के संसार में स्वर्ग को अपने और धरती के बीच माध्यम के रूप में इसी तरह के वंचित और विडम्बनापूर्ण चरित्रों को छांटने में आनन्द आता है।

न्यायालय का ब्रहमांड बेहद अजीब है। तितोरेली को न्यायालय द्वारा धार्मिक कलाकार और विश्वासपात्र के तौर पर रोजगार दिया गया है : इस कारण वह पवित्र संसार का हिस्सा है। लेकिन उसने पवित्र संसार से पीठ मोड़ ली है और वह उसके भीतर इस तरह रहता है मानो वह संसार पवित्र हो ही नहीं। विडंबनापूर्ण शालीनता के साथ वह घोषणा करता है कि उसे न तो न्यायालय की संरचना में कोई दिलचस्पी है न उच्चतम न्यायाधीश में। उसके लिए हुल्ड की मान्यताओं का कोई मतलब नहीं : उसके संसार में संपूर्ण त्याग संभव नहीं। वह मोक्ष या उसकी किसी भी उम्मीद को छोड़ चुका है। पश्चात्ताप¸ अपराध का स्वीकार या पवित्र वेश्यावृत्ति उसके लिए फालतू चीजें हैं। अपने दमघोंटू कमरे में वह जोसेफ के को बतलाता है कि वह चीजों के आगे तक टाले जाने भर की उम्मीद कर सकता है। इस तरह सारा अस्तित्व मुकदमों¸ पेशियों और टाले गए फैसलों की श्रृंखला बन कर रह जाता है। इस अनन्त हताशा में हमें बिना मुक्ति और उम्मीद के लगातार रहना होता है। तितोरेली द्वारा दिया गया प्रस्ताव असल में काफ्का के आधुनिक संसार की परिकल्पना है : ऊब और दोहराव की वह दोयम जिन्दगी जिसे जोसेफ के भली भांति पहचानता है और प्यार करता है जब तक कि उस एक सुबह उसके “बिना कुछ भी गलत किए” पहरेदार उसके कमरे में घुस आते हैं।

जोसेफ के बदल चुका है। बेनाम अपराध और मुकदमे की यातना ने उसे खुद से ऊपर उठा दिया है। वह समझ लेता है कि हुल्ड और तितोरेली दोनों के बताए रास्तों से रिहाई मिलना असंभव है और हताश साहस के साथ वह इन दोनों रास्तों को छोड़ देता है। अपनी सारी इच्छा के साथ अपने भीतर विस्मृत कर दी गई कामनाओं को खोजता है और प्रकाश का स्वप्न देखता है।

‘द ट्रायल’ लिखे जाने के एक अबूझ क्षण में काफ्का ने इस बदल गए नायक को बचाने का विचार किया था। इस का निशान हमें स्वप्नों के दो टुकड़ों में मिलता है जिनका वाल्टर साकेल ने बहुत गहन अध्ययन किया है। पहले में जोसेफ के का संपूर्ण रूपान्तरण होता है। तितोरेली उसे अपने गले लगाकर अपनी तरफ खींचता है। न्याय के भवन में पहुंचने पर वे सीढ़ियों पर दौड़ कर चढ़ना शुरू कर देते हैं¸ पहो वे ऊपर की तरफ जाते हैं फिर बारी बारी ऊपर और नीचे। ऐसा वे बिना मेहनत के करते हैं – पानी में हिचकोले खाती किसी हल्की नाव की तरह। ठीक इसी क्षण जोसेफ के अपने पैरों पर निगाह डालता है और उसका कायान्तरण शुरू हो जाता है। जो रोशनी अब तक पीछे से आ रही थी अचानक किसी विस्फोट की तरह सामने से आने लगती है। के उसे देखता है और उस पर विचार करने लगता है। क्या भीषण परिवर्तन है? तब तक जोसेफ के ने सोचा था कि न्याय बहुत भारी बोझे जैसा होता है लेकिन अब उसकी समझ में आने लगता है कि न्यायरूपी ईश्वर असल में रोशनी की तरह हल्का होता है और उसमें दूसरों को भी अलौकिक तरीके से हल्का बना देने का गुण होता है।

दूसरे स्वप्न में जोसेफ के एक कब्रिस्तान में टहल रहा है। बेहद शानदार दिन है : चारों तरफ का वातावरण बहुत खुशनुमा है और वह करीब करीब तैरता सा चल रहा है जैसा कि सपनों में अमूमन होता है। पत्थर वाली एक कब्र पर उसका ध्यान जाता है। एक कलाकार अपनी पेन्सिल से पत्थर के ऊपरी हिस्से में कुछ लिखना शुरू करता है। वह सुन्दर सुनहरे शब्दों में लिख रहा है। “यहां लेटा है …” वह इन तीन शब्दों को लिखने के बाद अचानक पलट कर जोसेफ के को देखता है। अब वह काम नहीं कर पाता और उसे शर्म आने लगती है। वह दुबारा से जोसेफ को देखने लगता है। अब तक की सारी खुशनुमा चीजें गायब हो जातi हैं। चित्रकार की शर्म देखकर जोसेफ हताश हो जाता है और अपने चेहरे पर हाथ रख कर रोने लगता है। वह बहुत देर तक सुबकता रहता है। उसके शान्त होने पर कलाकार दुबारा बेमन से काम शुरू करता हे पर इस दफा उसके शब्द कम सुन्दर बनते हैं। जैसे ही वह एक ‘जे’ लिखना खत्म करता है जोसेफ उसके बेमन से काम करने को समझ जाता है। वह कब्र दरअसल उसी के लिए बनाई जा रही है। अब वह अपनी उंगलियों से मिट्टी उलीचने लगता है और गड्ढे में धंस जाता है। जहां नीचे उसे अभेद्य गंभीरता का आश्रय मिलता है ऊपर पत्थर पर उसका नाम तैरता रहता है। इस क्षण वह जाग जाता है – खुशी से भरा हुआ। इन शानदार पन्नों में हमें 'द जजमेन्ट' और 'द मेटामॉरफॉसिस के अन्त की याद आती है हालांकि यहां अनुभव किया गया आनन्द कहीं अधिक है। अपने स्वप्न में जोसेफ के समझ जाता है कि अब उसका जीवन और उसकी देह बाधा बन चुके हैं; इसलिए बिना किसी तरह का दुख या प्रतिवाद किए वह अपनी कब्र में धंसकर अपनी बलि दे देता है ताकि उसकी मौत संसार के विजयी संगीत को फूट पड़ने में मदद दे। वह खुश होकर मरता है जबकि कला का तिलिस्म सुनहरे अक्षरों में उसकी कब्र के पत्थर के गिर्द मंडराता रहता है।

ठीक जिस तरह काफ्का ने ‘निरपराध’ कार्ल रोसमान को बचाने का विचार किया था यहां वह ‘अपराधी’ जोसेफ के को बचाने का विचार करता है। स्वप्न के हवा में टंग जाने में वह अपने नायक को दो महान चीजें बख्शता है : अध्यात्मिक आलोक और अपनी नियति और मृत्यु के साथ आनन्दपूर्ण समझौता। ‘द ट्रायल’ भी इसी तरह समाप्त होगी। हम नहीं जानते जोसेफ के कितने समय बचा रहा : कुछ घंटे¸ कुछ दिन या कुछ हफ्ते। फिर काफ्का पर खुद उसकी नियति अधिकार कर लेती है। वह समझ जाता है कि उसके संसार में जोसेफ के को नहीं बचाया जा सकता। उसे विश्वास करना पड़ेगा कि ईश्वर अन्धकार¸ हिंसा¸ भार और दमन है। उसे रात क ेवक्त अपमान और शर्म के साथ किसी कुत्ते की तरह समर्पण कर देना होगा। सुनहरे शब्दों से उसकी मदद करने वाला कोई कलाकार भी नहीं होगा और दो दुष्ट हत्यारे उसके दिल में कसाई का लम्बा चाकू उतार देंगे।

किताब के अन्त तक पहुंचते पहुंचते देर शरद के एक बरसाती दिन जोसेफ के का सीधा सामना न्याय के प्रतिनिधियों से होता है। यह ‘मुलाकात’ ‘संयोगवश’ एक गिरजाघर में होती है। तमाम अध्यात्मिक अर्थों से भरपूर गिरजाघर में होने वाली घटनाओं के बाद जोसेफ के के चरित्र की एक और कमजोरी सामने आती है : वह प्रतीक्षा करने में अक्षम है।
गिरजाघर के दृश्य और ‘द ट्रायल’ आखिरी अध्याय के बीच एक विशाल खालीपन है। हम नहीं जानते कि देर शरद से देर बसंत के महीनों में जोसेफ के ने क्या किया¸ उसके पास कौन सी उम्मीदें बची हुई थीं या उसने क्या प्रयास किए। हमारी मुलाकात उसकी इकतीसवीं सालगिरह से पिछली शाम का ेदेर वसंत के मौसम में होती है। जैसा कि न्यायालय का आदेश है वह अनुष्ठानों वाला काला सूट पहन कर आया है और दरवाजे के पास की कुर्सी पर बैठा हुआ है। वह अपने जल्लादों का इन्तजार कर रहा है : हालांकि किसी ने भी उनके आगमन की घोषणा नहीं की है लेकिन उसे इस बात का भान हो जाता है। करीब नौ बजे फ़्रॉक कोट पहने दो आदमी उसके घर आते हैं। वे एक भी शब्द नहीं बोलते। वे प्लास्टिक के बने मशीनी मानवों जैसे हैं। ठीक इसी क्षण जोसेफ के अपने आप को बतलाता है कि उसे किसी और का इन्तजार था। उसे किसका इन्तजार था? क्या वह कम अपमानभरी और कम रंगमंचीय मृत्यु का इन्तजार कर रहा था? शायद वह उस पादरी का इन्तजार कर रहा था जिसने उसे अंधेरे में चलना सिखाया था?

वह खिड़की के पास चला जाता है – और एक बार फिर से अंधेरी सड़क को देखता है। गली के उस तरफ की खिड़कियों पर भी उसकी निगाह जाती है जहां 'उस' सुबह उसकी यातना का लुत्फ उठाने को दर्शक जमा थे। उनमें से ज्यादातर खिड़कियां अंधेरे में हैं या उनके परदे खिंचे हुए हैं। लेकिन अब भी रोशन एक खिड़की से आखिरी बार जीवन का गतिमान दृश्य दिखाई देता है जो कि जोसेफ के की मौत के बाद भी खुद को लगातार नया करता जाएगा :अभी तक चलना न सीखे कुछ बच्चे खेल रहे हैं और एक दूसरे की तरफ हाथ बढ़ा रहे हैं। जोसेफ और दोनों जल्लाद सीढ़ियां उतर कर सड़क पर पहुंचते हैं। वे एक वीरान चौराहा पार करके एक पुल पर पहुंचते हैं। एक पल को ठहर कर जोसेफ के नदी के बहाव को देखता है। फिर वे चलना जारी रखते हैं और गलियों से होते हुए शहर के बाहर आकर पत्थर की एक छोटी खदान में पहुंचते हैं। इस परित्यक्त सी खदान में शहरी चरित्र लिए एक मकान है। “हर जगह चन्द्रमा की चमक थी ¸ नैसर्गिक और शान्त¸ जैसा किसी और रोशनी के साथ नहीं होता।” दिल को किस कदर छील कर रख देते हैं ये शब्द ! पूरी किताब में पहली बार प्रकृति अपनी अनुपस्थिति से जागती है और जोसेफ के के ऊपर वह शान्ति और कोमलता निछावर करती है जिस पर वह कभी अधिकार नहीं कर सकेगा।

औपचारिक अभिवादनों के बाद दो में से एक आदमी जोसेफ के के पास आता है और उसकी जैकेट¸ कमीज और बनियान उतार देता है। के कांपता है। खदान की दीवार के नजदीक एक बड़ा पत्थर उठ आता है। दोनों आदमी के को सीधा खड़ा करके उसके सिर को चट्टान पर व्यवस्थित करते हैं। फिर एक आदमी अपना फ़्रॉक कोट उतारता है और भीतर से एक पतला लम्बा तीखा दुधारी चाकू निकालता है। वह उसे रोशनी में लाकर परखता है। एक बार फिर वही भौंडी औपचारिकताएं होती हैं। चाकूवाला आदमी जोसेफ के की पसरी हुई देह के ऊपर से चाकू दूसरे को जांचने को देता है और थोड़ी देर बाद दूसरा वाला उसी तरह जोसेफ के के ऊपर ही से चाकू पहले वाले को थमाता है। जोसेफ के अपने आसपास देखता है। उसकी निगाह खदान के पास के मकान कै सबसे ऊपरी मंजिल पर टिक जाती है। खिड़की के शटर एक चमकीली रोशनी के साथ खुलते हैं और एक धुंधली मरियल आकृति बाहर झांकती है और अपनी बांहों को आगे तक पसारती है। “वह कौन है? कोई दोस्त? कोई भला आदमी? कोई ऐसा जिसे उस से सहानुभूति है? कोई मददगार? क्या वह सिर्फ एक ही आदमी था? या बहुत सारे थे? क्या अब भी कोई उम्मीद है? कहां हैं वे न्यायाधीश जिन्हें उसने कभी नहीं देखा? कहां है वह न्यायालय जहां वह कभी नहीं पहुंच सका?”

मृत्यु से पहले ये आखिरी सवाल के की आखिरी उम्मीदें हैं : ऐसी उम्मीदें जिन्हें मृत्यु निरर्थक साबित करेगी। तो भी यह कराह मौत के आगे तक जाती है और हत्या के बावजूद इसे दबाया नहीं जा सकता। न्यायालय हमें याद दिलाता है कि न्याय आदमी की प्रतीक्षा करता है और ऊपर एक धुंधली आकृति ही की सही शक्ल में अपनी बाहें पसारता है। काफ्का के संसार में उम्मीद के लिर रास्ता खुला हुआ है और इस उम्मीद को पहचाना जा सकता है क्योंकि अगर ऐसा न होता तो वह उम्मीद नहीं होती। हम केवल एक सामान्य तथ्य को स्थापित कर सकते हैं : हम सब जानते हैं कि उम्मीद कभी पूरी नहीं होती¸ पादरी के कोे धोखा देता है और जल्लाद उसे मार डालते हैं। “क्या इस परिचित संसार के परे कहीं उम्मीद है?" मैक्स ब्राड ने अपने दोस्त से पूछा था। काफ्का मुस्कराया था : "निश्चित ही अनन्त उम्मीद है लेकिन हमारे लिए नहीं।" काफ्का का यह उत्तर 'द ट्रायल' के अन्त को सुनिश्चित करता है। अगर काफ्का का संसार बिना उम्मीद का होता तो उसमें रहना आसान होता। यह उम्मीद है जो काफ्का के संसार को इस कदर हताश¸ त्रासद और असहनीय बनाती है।

काफ्का दण्ड के आनन्द को जानता था। ‘डायरीज़’ में उसने एक सपने का जिक्र किया है जिसमें सजा मिलने पर उसने अपार आनन्द महसूस किया था। “यह आनन्द इस बात में निहित था कि सजा को मैंने इस कदर मुक्त¸ विश्वस्त और प्रसन्न होकर स्वीकार किया था। यह ऐसा दृश्य था जिसे देखकर देवता भी हिल गए होंगे। मैंने देवताओं के तकरीबन रोने की इस गहन संवेदना का अनुभव भी किया था।” यहां ‘द ट्रायल’ के आखिरी पन्नों में जोसेफ के को सजा से कोई आनन्द नहीं मिलता। वह उसे जानता ही नहीं। वह मुक्त¸ विश्वस्त और प्रसन्न होकर उसे स्वीकार नहीं करता। उसके ऊपर हम भी ऐसी किसी संवेदना को महसूस नहीं करते।

जोसेफ के के गले के गिर्द एक जल्लाद के हाथ कस जाते हैं जबकि दूसरा उसके दिल में चाकू उतार कर उसे दो दफा मरोड़ता है। रोशनी खोती अपनी आंखों से जोसेफ के अपने चेहरे के नजदीक आदमी का चेहरा देखता है जो उसकी मृत्यु को देख रहा है। कोई भी मौत अधिक सनसनीखेज और अपमानभरी नहीं हो सकती। कुछ भी उसे सुधार नहीं सकता। यह अपनी सबसे काली गहराइयों में मौत है : अपने अर्थ की पूरी बेशर्मी के साथ। उसमें न्यायालय द्वारा किए गए पाप की शर्म है¸ उस कृत्य की शर्म है¸ और जोसेफ के के अपराधबोध की शर्म है जो सजा दिए जाने के बाद भी बनी रहती है। पवित्रता के आतंक ने इसके पहले कभी इस कदर भयाक्रान्त कर देने वाला तरीका अख़्तियार नहीं किया था जैसा कि इन पंक्तियों में हम देखते हैं।

फ़्रान्ज़ काफ़्का का 'द ट्रायल' - ३

(पिछली पोस्ट से जारी)




मुकदमे की अन्तहीन प्रक्रिया में फैसला ही इकलौता निश्चित हिस्सा साबित होता है। वकील हुल्ड कई दफे मुकदमे के "सुखान्त" की तरफ इशारा करता है¸ लेकिन वह हमें कोई विवरण उपलब्ध नहीं कराता¸ फिलहाल उसका काम अपने मुवक्किल को उम्मीद की हताश मनस्थिति में बनाए रखना है। तितोरेली कहता है कि उसने कभी "किसी वास्तविक रिहाई" के बारे में नहीं सुना है। दो और लोगों का भी यही मानना है। यह कहता हुआ जोसेफ़ के गलत नहीं है कि “इकलौता जल्लाद इस समूचे न्यायालय की जगह ले सकता है।” जैसा कि 'इन द पैनल कालोनी' में काफ्का कहता है "अपराध हमेशा निश्चित होता है।"

जोसेफ के का सृजन करने के बाद¸ जिसे काफ्का ने अपनी आयु और अपने नाम का अंश और अपने कमरे का हिस्सा दिया¸ काफ्का ने अपने सारे नामोनिशान मिटा लिए: वह अपने आप से इतनी दूर एक जगह में चला गया जहां उसका अपना गुरू फ्लाबेयर भी फ़्रेडरिक मोरो के माध्यम से नहीं पहुंच पाया था। कार्ल रोसमान के साथ वह एक मुलायम प्रेम से जुड़ा हुआ था। ‘द कासल’ में वह के॰ के साहसिक अध्यात्मिक अभियान के लिए प्रशंसा से भरा हुआ है; लेकिन इस "औसत आधुनिक आदमी" के लिए उसके मन में क्या हो सकता है जो एक बढ़िया बैंक क्लर्क है और न ईश्वर पर यकीन करता है न अदृश्य शक्ति पर यकीन? जैसा कि काफ्का जोसेफ के को हमारे सामने रखता है¸ जोसेफ एक रूखा अकेला शख्स है¸ उसे पता है उसके लिए क्या भला है क्या बुरा¸ सांसारिक सफलता के लिए उसके मन में लालच है। उसके भीतर "आधुनिक आदमी" के सारे दोष हैं। कार्ल रोसमान के बरखिलाफ उसने अपने भीतर से बचपन के सारे निशान मिटा दिए हैं¸ वह किसी अचेतन से किसी तरह का पोषण प्राप्त नहीं करता¸ वह अपने दिल में झांकने से मना कर देता है¸ अपने अनुभवों से कुछ नहीं सीखता¸ अवसर द्वारा पैदा होने वाले व्यवधानों से उसे नफरत है और उसे उम्मीद है कि उसकी लौह इच्छा के सामने यथार्थ अन्तत: हार मान लेगा। हालांकि वह पाप करने में विश्वास नहीं रखता¸ सारे आम आदमियों की तरह वह भी अपराधबोध से भरा हुआ है। उसकी दोयम दर्ज़े की जिन्दगी में एक यही कमी है। मुकदमे की पूरी प्रक्रिया मानो उसे मुक्त करने के उद्देश्य से उसके इस अपराधबोध को परिपक्व और अधिक जटिल बना देती है ; उसकी बुद्धि ज्यादा बेचैन हो जाती है और ऐसा समय भी आता है जब वह उन शब्दों को वाणी देता है जिनके बारे में पहले वह सोच पाने की भी हिम्मत नहीं कर सकता था।

एक सुबह जोसेफ के को गिरफ्तार कर लिया जाता है। मकानमालकिन का रसोइया जो हर रोज करीब आठ बजे उसके लिए नाश्ता ले कर आता है उस दिन उसके कमरे में नहीं आता। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है। जब के घंटी बजाता है उसके कमरे में काला सूट पहने एक दुबला लेकिन तन्दुरूस्त अजनबी आदमी प्रवेश करता है जबकि बोर्डिंग हाउस के बाकी के कमरों में भी उसी तरह के अजनबी पुलिसिए घुस चुके होते हैं। ‘मैटामॉरफासिस’ की तरह ही यह किताब भी एक व्यवधान से शुरू होती है। एक आशातीत घटना ¸ पत्थर बन चुके रोजमर्रा के जीवन को हिंसा के साथ झकझोरती है। यह व्यवधान सुबह के समय होता है : दिन का सबसे जोखिमभरा समय¸ क्योंकि इसमें यह खतरा समाहित रहता है कि हो सकता है रात भर में सब कुछ बदल गया हो और जब हमारी नींद खुले हम खुद को अलग तरह की दीवारों¸ फनीर्चर इत्यादि से घिरा हुआ किसी नितान्त अपरिचित देश या ग्रह या सौरमण्डल में पाएं जहां हमारे बारे में या हमारी आदतों के बारे में कोई कुछ नहीं जानता। उस दिन तक के को नहीं मालूम कि मुकदमे की प्रक्रिया हर आदमी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। और यह प्रक्रिया स्वयं को उसके सामने पूरी तरह से उदघाटित करती है। लेकिन एक दूसरी बात भी होती है। गिरफ्तार किए गए जोसेफ के को रिहा कर दिया जाता है ठीक जिस तरह पोरफिरी पेत्रोविच द्वारा रास्कोलनिकोव को मुक्त किया जाता है। न्यायालय को¸ जो हर जगह विद्यमान है¸ जोसेफ के को कारागार में रखने की कोई जरूरत नहीं है। वह मुक्त भी है और बन्दी भी¸ वह बिना जंजीरों का कैदी है – हम सब लोगों की तरह जो बिना सलाखों वाली कैद में लगातार जीवित रहते हैं।

जब पहरेदार जोसेफ के को गिरफ्तार करते हैं¸ वह न्यायालय¸ कानून और ईश्वर को लेकर कई सवाल पूछता है। “मैं किसी कानून को नहीं जानता” वह कहता है। इस बेनाम आधुनिक नगर में शायद मिस बर्सट्नर के अलावा वह इकलौता शख्स है जो नहीं जानता कि कानून हर जगह है और बिना किसी की निगाह में आए वह दुनिया भर की तकदीरों को निर्देशित कर रहा है। वह अपनी गिरफ्तारी को स्वीकार नहीं करता¸ वह पहरेदारों से कागज दिखाने की मांग करता है¸ वह उनसे नफरत करता है हालांकि उनके भीतर ईश्वर के कानून की बची खुची चमक बाकी है¸ वह निश्चित है कि वह निर्दोष है जैसा कि किसी ने भी नहीं होना चाहिए। वह चाहता है कि अपने कमरे की कुर्सियों को और नाश्ते की तश्तरी वगैरह को वापस करीने से लगाए और पहरेदारों की उपस्थिति के नामोनिशान मिटा दे। उसे उम्मीद है कि वह अपने जीवन में आए इस व्यवधान को हरा पाएगा। जब वह पहली पेशी पर जाता है तो उसे आश्चर्य होता है कि वह एक ऐसी जगह पर है जहां हर तरह के दस्तावेजों वगैरह को अस्वीकृत कर दिया जाता है। वह नहीं समझ पाता कि ईश्वर का कानून हर तरह की दुनियावी चीज से नफरत करता है। अनुष्ठानों जैसी पोशाकों और दाढ़ियों के सामने खुद को पाने पर वह अन्याय के खिलाफ लड़ रहे किसी योद्धा की तरह व्यवहार करने लगता है। जैसा कि काफ्का हमें बताना चाहता है¸ जोसेफ के को नहीं मालूम कि उसके साथ क्या बीत चुका है। उसका सबसे बड़ा पाप है चीजों पर ध्यान न देना। उसके भीतर सब कुछ चुपचाप स्वीकार कर लेने वाला वह धैर्य नहीं है जो अध्यात्मिक मामलों में हमारी सहायता करने वाला इकलौता गुण होता है। कुछ ही घंटों के भीतर मुकदमे और फैसले का शिकंजा उसके गिर्द कस जाता है। कोई भी उससे हाथ नहीं मिलाता¸ बूढ़ा ग्रूबाख भी नहीं¸ मानो वह हैजे जैसी किसी बीमारी से ग्रस्त हो। ऐसा लगता है कि उसके भाग्य पर मुहर लगाई जा चुकी है।

गिरफ्तारी के बाद भी जोसेफ के पहले जैसा जीवन बिताता रहता है। वह बैंक में काम करता रहता है¸ अपनी दोयम आदतों को बनाए रखता है¸ और पहले की ही तरह दुनिया की सलेटी आवाजों और रंगों से जूझता रहता है। लेकिन आजाद घूमने वाला यह इन्सान एक तरह से सलाखों के पीछे बन्द भी है। सबसे नीच दर्ज़े के आरोपियों की तरह वह अदालत के दायरे से बाहर नहीं जा सकता। वह उस सुबह को¸ उन पहरेदारों को और न्यायाधीशों को भुला ही नहीं पाता। अगर उसे भुला सकना आता होता तो वे पहरेदार¸ न्यायाधीश और कानून के पेंच सारे गायब हो चुके होते। अपराध की विराट छाया उसे पूरी तरह ढंक लेती है। जब वह सड़क पर चल रहा होता है उसे लगता है कि वास्तविक या काल्पनिक आंखें उसकी जासूसी कर रही हैं। जब वह घर पर होता है वह संदेहों से भरा होता है और बिना किसी के बुलाए हुए न्यायालय चला जाता है। महीनों के बीतने के साथ ही वह अपनी सारी ताकत खो देता है। सुबह होने के साथ ही वह अपने को कुचला हुआ पाता है। दफ्तर में वह किसी हवा निकाले निर्जीव आदमी की तरह सिर झुकाए बैठा रहता है। वह अपने ग्राहकों से बात नहीं करता और बिना थमे घंटों तक खिड़की के बाहर गिर रही बर्फ को देखता रहता है। सोए या जागे में वह बेहद मामूली विवरणों पर ध्यान देता रहता है। वह फंतासियों में डूब जाता है और अपने दिमाग में घूम रही छवियों से खेला करता है। उसके लिए उसका नाम¸ उसका व्यक्तित्व¸ और उसका शरीर सब कुछ एक बोझ बन जाता है। उसे लगने लगता है कि सारे ब्रहमाण्ड में एक वही आरोपी है और बाकी के लोग उस पर आरोप लगाने वाले। खिड़की पर खड़े होकर हताशा के साथ जीवन के बारे में सोचा करना और जीवन से बच निकलने की सोचना – इस निरंतरता में के के माध्यम से काफ्का की अपनी नियति को एक तरह की मुक्ति मिलती नजर आती है।

जोसेफ के. को अपने वकील पर जरा भी विश्वास नहीं है और वह अपना मुकदमा खुद लड़ने का फैसला कर लेता है। चूंकि न्यायालय उस पर लगे आरोप को बताता नहीं इसलिए उसे खुद अपने आप से लगातार सवालात करने होंगे और खुद अपनी आत्मकथा लिखनी होगी। इस तरह हताशा के साथ वह इस अनन्त श्रम में सन्नद्ध हो जाता है। वह दफ्तर से छुट्टी लेता है ताकि अपने अपराध को पहचानने के लिए स्वयं को अलग अलग आयामों से देख सके और अपने भीतर उस जगह को चिन्हित कर सके जहां आखिरकार न्यायालय का फैसला उसे डंक मारेगा। अगर उसने अपने आप को बचाना है तो उसने जीना बन्द करना होगा¸ नौकरी छोड़नी होगी¸ आदतों और विचारों से मुक्त होना होगा और सुबह¸ शाम और रात के होने से मिलने वाली सहानुभूति को भी छोड़ देना होगा। इस तरह¸ जैसा कि खुद काफ्का के साथ हुआ था¸ अपराध के खिलाफ अपना बचाव ही जीवन का स्थानापन्न बन जाता है। यह एक श्रमसाध्य काम है जिसमें उसे आरोप के पक्ष और विपक्ष दोनों के बारे में लिखना है। लेकिन क्या यह आत्मकथात्मक संस्मरण जोसेफ के की एक और गलती नहीं माना जाएगा? उसे कौन बता पाएगा कि खुद से पूछे गए उसके सवाल वही हैं जो न्यायालय के होते? कौन विश्वास करेगा कि वह अपने जीवन के क्षुद्रतम विवरणों को खोज निकालेगा? कौन इस बात की कल्पना कर सकता है कि वह अपनी आत्मा की गहराइयों तक पहुंच सकेगा जहां उसका अपराध छिपा हुआ है? जैसा कि काफ्का का विचार था¸ आत्मकथा¸ जो कि तार्किक 'मैं' का शस्त्र होती है¸ हमें जरा भी आश्वस्त नहीं कर सकती कि उसकी सहायता से हम अपने अन्दरूनी सत्य तक पहुंच ही जाएंगे। इस सत्य तक पहुंचने के लिए ‘मैं’ का स्वयं ही विनाश करना पड़ता है या अपने आप को बाहरी संबंधों के ताने बाने में गायब करना होता है।

इस दरम्यान आत्मकथा की ही तरह अनन्त मुकदमा चलता जाता है। हम जानते हैं कि बाकी आरोपियों से हफ्ते में कई बार पूछताछ की जाती है। जहां तक जोसेफ के का सवाल है हमें केवल पहली पेशी के बारे में मालूम है जब वह न्यायालय पर आरोप लगाता है और एक दूसरी पेशी के बारे में जिसका विवरण उसके कज़िन द्वारा पिता को लिखी गई एक चिठ्ठी में मिलता है। इसके अलावा कुछ नहीं। या तो काफ्का ने मुकदमे की पेशियों के बारे में दूसरे अध्यायों में लिखने का मन बनाया था जिन्हें उसने लिखा नहीं या फिर वह मुकदमे के बारे में लिखना ही नहीं चाहता था। इसमें दूसरी वाली बात ज्यादा सही लगती है। ईश्वर का नाम हटा देने के बाद यह किताब में दूसरी बड़ी अनुपस्थिति है। काफ्का किताब के केन्द्र में एक ऐसा खालीपन रख देता है जिसे भरा जाना असंभव है। किताब के बाकी पात्रों द्वारा न्यायालय के बारे में कही गई तमाम बातें हमें किसी निश्चित चीज की तरफ नहीं ले जातीं।

(जारी. अगली किस्त में समाप्त.)

Wednesday, April 29, 2009

फ़्रान्ज़ काफ़्का का 'द ट्रायल' - २

(पिछली पोस्ट से जारी)



बदतर हो चुकी पवित्रता के लिए विशिष्ट भवन अभी भी हैं। ये वही भवन हैं जहां आधी शताब्दी पहले दोस्तोव्स्की का सबसे महत्वपूर्ण नायक प्रकट हुआ था। जब रास्कोल्निकोव को एक नई इमारत की चौथी मंजिल पर पुलिस स्टेशन बुलाया जाता है वह दुनिया के “अंडरग्राउन्ड” में प्रविष्ट होता है। सीढ़ियां संकरी और गन्दी हैं। चारों मंजिलों पर स्थित सारे अपार्टमेन्टों के दरवाजे सीढ़ियों की तरफ खुलते हैं और उनकी रसोइयों से तमाम किस्म की सड़ांध निकलती रहती है। पुलिस स्टेशन के छोटे छोटे कमरों में भी सस्ते वार्निश की बू अटी पड़ी है और यहां रास्कोल्निकोव अचेत हो जाता है।

'द ट्रायल' लिखते हुए काफ्का ने अपने महान उस्ताद को याद करते हुए न्यायालय के पहले दफ्तर को ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ के पुलिस स्टेशन से मिलता जुलता दिखाया है। न्यायालय की पहली इमारत ऊंची और सलेटी है जहां गरीब लोग रहते हैं। प्रवेश करने का अहाता तालाबंद वैनों से भरा हुआ है। तीन प्रवेशद्वारों से तीन ही ज़ीनों को रास्ता खुलता है ; जोसेफ के सीढ़ियों से होता चढ़ रहा होता है और अपार्टमेन्टों के दरवाजे खुले होते हैं जिनकी छोटी रसोइयों में औरतें बच्चों को थामे चूल्हों पर झुकी दिखाई देती हैं और अधनंगी लड़कियां व्यस्त होकर यहां वहां दौड़ती फिरती दिखती हैं। पांचवीं मंजिल पर जहां न्यायालय है ¸ एक जवान स्त्री टब में बच्चे के कपड़े धो रही है। बगल के संकरे कमरे में भाप भरी हुई है; सूरज की मैली किरणों ने वातावरण को सफेद और चुंधियाने वाला बना दिया है। उसके बाद अगली मंजिल पए एक लम्बा गलियारा है जिसमें टूटे दरवाजों वाले पार्टीशन लगे हैं; लकड़ी की बेन्चों पर फरियादी भिखारियों की तरह झुके बैठे हैं। इमारत के बाशिन्दों के कपड़े सूखने को टंगे हुए हैं और भीतर हवा इस कदर दमघोंटू है कि जोसेफ के. बेहोश होने की हालत में पहुंच जाता है जिस तरह पीटर्सबर्ग के पुलिस स्टेशन में रास्कोलनिकोव के साथ होता है। न्यायालय की दूसरी इमारत जिससे हमारा परिचय कुछ महीनों बाद होता है ¸ और भी घिनौनी है। वहां रहने वाले और भी गरीब हैं¸ घर ज्यादा अंधेरे हैं और गलियां गन्दगी और पिघलती बर्फ से पटी पड़ी हैं।

इन्हीं घृणास्पद जगहों पर न्यायालय के सबसे घटिया प्रतिनिधि रहते हैं : कुत्तों की तरह परजीवी भ्रष्ट सिपाही; कुरुचिपूर्ण कपड़े पहने क्लर्क; परिचित न्यायाधीश; कुख्यात चित्रकार; दलाल और वैश्याएं जो हर किसी को अपना बचकाना और अशालीन आकर्षण प्रस्तुत करते हैं ; यहां जासूस भी हैं मुखबिर भी और अपराधी भी। कानून की सबसे निचली सीढ़ी पर का यह संसार सबसे ज्यादा गन्दगीभरा है। लेकिन तो भी सामान्य जीवन से कहीं नीचे रह रहे ये लोग किसी रहस्यमय और विडंबनापूर्ण तरीके से हमें कानून के बारे में कुछ बताते हैं। उन सिपाहियों के पास ¸जिनसे जोसेफ के. को नफरत है¸ दैवीय संसार के बारे में कुछ धुंधला सा ज्ञान भी है। अपराध और कानून के बारे में वे वही बातें करते हैं जैसी कुछ महीनों बाद पादरी करता है। सिर्फ एक ही न्यायालय है। ऊपर और नीचे दोनों ही जगह कानून एक सा है : सर्वोच्च न्यायाधीश में भी और रंगीन पंखों वाले फरिश्ते में भी ¸ जो शायद उस बेनाम ईश्वर के रहस्यों को जानते हैं¸ एक दूसरे का खाना चुराने वाले सिपाहियों में भी और पोनोर्ग्राफी पढ़ने वाले न्यायाधीशों में भी। “ईश्वर को किसी आदमी ने नहीं देखा है” (जॉन 1:18) और हम सीधा उस तक नहीं पहुंच सकते और जैसा कि 'द कासल' में दोहराया गया है ऐसा करने के लिए हमें असंख्य बिचौलियों के दरम्यान से होकर गुजरना होगा। शायद ईश्वर की असहनीय रोशनी को किसी अंधेरे परदे के पीछे करना होगा; शायद उसकी गरिमा को किसी घृणित चीज के साथ रखने से ही उचित संतुलन बनता हो या शायद जो सबसे उदात्त है वह दुनिया की सबसे निकृष्ट चीजों के माध्यम से स्वयं को प्रकट कर सकता हो। ये ईश्वर के रहस्य थे जिनके सामने काफ्का का सिर ताजिन्दगी झुका रहा ; जिन्हें रूमी या अत्तार या सन्त तेरेसा जैसे अध्यात्मिक संत पाने की कोशिश कर सकते थे न कि जोसेफ के जैसा एक बेचारा बैंक क्लर्क।

हम इस तरह के न्यायालय की सारी गतिविधियों के बारे में नहीं जानते। अगर हमें काफ्का की 'द ट्रायल' पर यकीन करना ही हो तो आज न्यायालय का सिर्फ एक ही काम है : मुकदमे चलाना। लेकिन ये खास तरह के मुकदमे होते हैं। न्यायालय आरोपी पर किसी विशेष नियम को तोड़ने का आरोप नहीं लगाता ¸ जैसा आम न्यायालयों में होता है या जैसा 'द पैनल कालोनी' में होता है जहां तोड़े गए कानून को अपराधी के बदन में गोद दिया जाता है। जब जोसेफ के को गिरफ्तार किया जाता है¸ सिपाहियों के पास लगाने को पर्याप्त आरोप नहीं हैं; बाद में भी नहीं जब मुकदमा काफी दिन चल चुका होता है। जल्लाद की छुरी के सामने पहुंचने पर भी जोसेफ के को अपना अपराध मालूम नहीं चलना है। हमें क्या सोचना चाहिए? या क्या जोसेफ के का अपराध वही पहला पाप है जिसने मानव की आत्मा पर सदा के लिए दाग लगा दिया है? लेकिन यह संभव नहीं लगता क्योंकि 'द ट्रायल' में थोड़े ही लोगों पर आरोप लगाए जाते हैं। हर बात हमें यह सोचने पर विवश करती है कि जोसेफ के का अपराध कुछ दूसरा ही है। उसके अपराध का न कोई नाम है न मन्तव्य। संक्षेप में कहा जाए तो उसका अपराध असल में अपराधबोध की वह भीषण अनुभूति है जिसने फ़्रान्ज काफ्का को जीवन भर प्रताड़ित किया।

तो इस न्यायालय को सिपाहियों या पूछताछ करने वाले अफसरों की जरूरत नहीं है जैसा कि मानवीय न्यायालयों में होता है जहां यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि किसी प्रतिबंधित कार्य को अंजाम दिया गया या नहीं¸ क्या रास्कोल्नीकोव ने वाकई उन दो स्त्रियों को लूट कर उनका कत्ल किया था। एक सिपाही अपनी बात को बहुत स्पष्ट शब्दों में रख कर कहता है “हमारे अधिकारीगण लोगों के अपराधों की खोज नहीं करते। वे स्वयं अपराध द्वारा आकर्षित कर लिए जाते हैं जैसा कि कानून में लिखा हुआ है।” न्यायालय के पास एक उच्चतर बोध है जो उसे पाप की उपस्थिति का भान करा देती है : यह एक तरह की जादुई घ्राणशक्ति है जो यह जान लेती है कि किस आदमी ने वह बेनाम अपराध किया है। इस तरह एक महिला सिपाही जिसने जोसेफ के को कभी नहीं देखा है उसे पहचान लेती है। गिरजाघर के अन्धकार तक में भी यही होता है।`

जैसा काफ्का हमें ‘द पैनल कालोनी’ में बता चुका है कानून और अपराध¸ ईश्वर और पाप और न्यायाधीश और पापी के बीच एक गहरी निकटता होती है। यदि न्यायालय को अपराध आकर्षित करता है तो अपराध की प्रतिभा रखने वाले शख्स को न्यायालय आकर्षित करता है। आरोप लगाने वाले और आरोपी दोनों का एक दूसरे के बिना गुजारा नहीं है और किसी जादू की तरह उनके बीच संवाद पैदा होता है। पहली सुनवाई के दिन जोसेफ के को कोई नहीं बताता कि उसका मामला कब सुना जाएगा या कहां पर लेकिन वह नियत समय पर नियत न्यायालय में पहुंच जाता है। जीवन की अन्तिम शाम को शोक वाली पोशाक अपनी पहने जोसेफ के जल्लादों की प्रतीक्षा करता है जबकि उसे किसी ने नहीं बतलाया है कि उस शाम उसे हलाक किया जाने वाला है। बाकी के कई आरोपियों के पास भी इस तरह के अंतबोर्ध की शक्ति है। जोसेफ के को अदालत में ऐसे कई लोग मिलते हैं ; अपराधबोध से इस तरह ग्रस्त ऐसे लोग उसने पहले कभी नहीं देखे हैं: थके मांदे पस्त भिखारियों जैसे¸ अपने अन्तहीन मुकदमों के असंभव अंत की प्रतीक्षा करते। जब जोसेफ उन में से एक की बांह पर अपना हाथ रखता है तो वह दिल दहला देने वाली आवाज में चिल्लाता है मानो किसी ने उसे बेहद गर्म चिमटियों से दबोच लिया हो। हमें बाद में पता लगता है कि उस आदमी ने जोसेफ के होंठों पर अपने मुकदमे का फैसला या तो पढ़ लिया था या पढ़ने की कोशिश की थी। इनमें हमें न कोई स्त्री मिलती है न कोई निर्धन व्यक्ति। काफ्का के मुताबिक ये दो लोग केवल स्पष्ट अपराध कर सकते थे और अनन्त किस्म के अपराध उनके बस के बाहर थे। वकील हुल्ड हमें बताता है कि वे सारे यहां तक कि उनमें से जिन्हें देख कर घृणा उपजती है – वे सब समय बीतने के साथ सुन्दर होते चले जाते हैं। जिस तरह 'द पैनल कालोनी' में अदालत की कोई भी कार्रवाई बस एक चुनाव होती है : न अपराध, न दण्ड, बस मुकदमा जो उन्हें क्षुद्र बनाता जाता है और साथ साथ उनके नक्शों को एक खूबसूरती भी देता जाता है।

न्यायालय की उच्चतम परम्पराओं की तरह उसकी कार्यप्रणाली को भी कोई नहीं जान सकता। न्यायाधीशों को हर सूचना पता होती है जबकि बाकी के लोगों को न उस न्याय के स्रोत का पता होता है न उसे जारी रखे रखने वाली चीज का। मानवीय संवेदनाओं और संबंधों और यथार्थ के किसी भी ज्ञान के बिना इन न्यायाधीशों को असलियत का टुकड़ा भर मालूम होता है। न तो वे यह जानते हैं कि वह कहां से आया है न ही यह कि वह किस तरफ चलता जाएगा। जहां तक वकीलों का सवाल है उन्हें बमुश्किल सहन किया जाता है: न्यायालय उनसे बेतरह नफरत करता है। वे अपराध से संबंधित किसी भी दस्तावेज को नहीं देख सकते। तो फिर लैटिन में लिखी वे पोथियां किस काम की हैं? केवल वही दृष्टि मुकदमे को उसकी संपूर्णता में समझ सकती है जो उच्चतर देवताओं के उच्चतम अंधेरों से नीचे उतरी हो। न्याय की एक लम्बी और धीमी सड़क होती है। उससे संबंधित हर चीज से टाले जाने की बू आती रहती है: एक सतत अपरिवर्तनशील गति होती है जो न ऊपर उठती है न नीचे गिरती है। आरोपी बहस करने को लालायित रहता है लेकिन न्याय अपनी प्रक्रिया को अनन्त काल तक खींचे जाने की जुगत में लगा रहता है। कभी कभी न्याय की प्रक्रिया थम जाती है और आरोपी को अस्थाई मुक्ति मिलती है लेकिन फिर किसी और न्यायाधीश के किसी आदेश पर उसकी गिरफ्तारी हो सकती है। सो जांच फिर से शुरू होती है और न्याय धूलभरे कागजों में घिसटता रहता है। अचानक एक दिन बिना किसी अग्रिम चेतावनी के सारा का सारा मुकदमा कहीं और स्थानान्तरित कर दिया जाता है। सारा कुछ उन अदृश्य देवताओं के न्यायालय में भेजा जा चुका होता है जहां से एक दिन अचानक फैसला सुनाया जाएगा।

(जारी)

(फ़ोटो: टैंग्लिन ट्रस्ट स्कूल, सिंगापुर के छात्रों द्वारा मंचित 'द ट्रायल' का पोस्टर)

मास्टर जी के पान में सिंदूर...

आधुनिक भारत में पारसी थियेटर जो प्रकारांतर से हिन्दी सिनेमा की नींव भी बना, के अन्यतम अभिनेता-निर्देशक और बहुआयामी व्यक्तित्व के इन्सान मास्टर फिदा हुसैन के बारे में महामहोपाध्याय अशोक पांडे ने कुछ दिनों पहले कबाड़खाना पर परिचयात्मक पोस्ट लगाई थी जिसे देखकर याद आया कि हमारे ख़ज़ाने में भी मास्टरजी पर कुछ दुर्लभ सामग्री है। हमने यूं भी उसे कबाड़खाना पर ही सजाने का सोचा था, पांडे जी का आदेश था कि यह काम जल्द अज़ जल्द हो जाए। शब्दों का सफ़र से फुर्सत कम ही मिलती है...फिर भी साझेदारी के सुख से न हम महरूम रहना चाहते हैं और हमसफरियों और कबाड़ियों को रखना चाहते हैं।
पेश है इस श्रंखला की पहली किस्त। हिन्दी रंगमंच की दुनिया का जाना माना नाम है प्रतिभा अग्रवाल का। कोलकाता के श्यामानंद जालान के साथ मिलकर भारतीय रंगमंच के लिए ऐतिहासिक महत्व का काम किया है। प्रतिभाजी ने 1978 से 1981 के दरम्यान मास्टरजी के साथ लगातार कई बैठकें कर उनके अतीत की यात्रा की। मास्टरजी के स्वगत कथन और बीच बीच में प्रतिभाजी के नरेशन की मिलीजुली प्रस्तुति बनी एक किताब जो मास्टरजी के जीवन के बारे में और इस बहाने पारसी रंगमंच की परम्परा और नाट्य परिदृश्य की जानकारी देनेवाला एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यहां इस पुस्तक के चुने हुए दिलचस्प अंश प्रस्तुत किए जा रहे हैं।


फिदा हुसैन साहब को बचपन से गाने का शौक था। कहीं से सुर कान में पड़ा फिर उनके लिए अपने को रोक पाना कठिन होता था। और जन्म हुआ था एक ऐसे खानदान में जो हाजी-हाफिजों का था और जिसमें गाने-बजाने की सख्त मुमानियत थी। अंदाज लगा सकते हैं रोज के वाकये का। कहीं गाने-बजाने की भनक पड़ी और फिदा हुसैन दौड़ पड़ते थे सबकी आखें बचाकर। पर पता तो चल ही जाता था और खूब पिटाई होती थी। पिटाई होती थी तो ये उस वक्त तौबा भी करते थे पर फिर जहां कानों में सुर पड़ा कि सब कुछ भूल जाते थे। सन 1911 का वाकया है। दिल्ली में पंचम जार्ज का दरबार हुआ था। देश के कोने -कोने से फनकारों को बुलाया गया था दिल्ली तमाशा दिखाने के लिए। दरबार खत्म होने पर सब अपनी-अपनी जगह को लौटे तो रास्ते में जगह-जगह रुक-रुककर तमाशा भी दिखाते चले। उनमें कठपुतली का तमाशा दिखाने वाले थे, नट का खेल दिखाने वाले थे, जादू का खेल दिखाने वाले थे।

दिल्ली से लौटने वाले मुरादाबाद भी पहुंचे और एक दिन इनके मुहल्ले में ही कठपुतली का खेल हुआ। खाट खड़ी करके, चादर बांध कर खेल दिखाया गया। कहानी थी किसी बादशाह की। बादशाह था, उसका वजीर था, सिपहसालार था, सेनापति था। कुछ कहासुनी हुई, एक दूसरे से झगड़ा हुआ और तलवारबाजी हुई। अच्छा लगा। खेल में कहानी थी और वह मन पर ऐसी छा गई कि घर आकर वही हरकतें शुरू कर दीं। कहने का मतलब यह कि नाटक और एक्टिंग की शुरुआत यहीं से हुई। खैर, यह किस्सा तो आया गया खत्म हो गया पर गाने का शौक बना रहा। रोज कहीं न कहीं सुनने पहुंच जाते और घर में पता लगने पर पिटाई होती। मां का तब तक स्वर्गवास हो चुका था, पर पिता थे, बड़े भाई थे। सबसे बड़े भाई की शादी भी हो चुकी थी। एक बार जब वे फिदा हुसैन की हरकतों से तंग आ गए तो उन्होंने बीवी के हाथों इन्हें पान में सिंदूर दिलवा दिया ताकि आवाज बंद हो जाए। वह किस्सा फिदा हुसैन साहब की जुबानी सुनिए।

``जब मैनें गाने का शौक नहीं छोड़ा तो तंग आकर भाई साहब ने भाभी के जो मुझे बहुत प्यार करती थीं, उनके हाथों से मुझे पान में सिंदूर दिलवा दिया कि आवाज ही खत्म हो जाए। और लोग भी एतराज करते थे। तो मेरी आवाज बंद हो गई। करीब चार-पांच महीने तक मेरी ये हालत रही कि मैं सांय-सांय बोलता, सर पटकता था। मगर आवाज ही नहीं। और दवाईयां जितनी कर सकता था की। लेकिन कुछ हुआ नहीं, पर लगन मेरी थी। मैं एकांत में रोता था और ईश्वर से प्रार्थना करता था कि मुझे दुनिया की कोई चीज नहीं चाहिए, बस मेरा सुर ठीक हो जाए। पर वह ठीक ही न हो। कुछ रोज के बाद जन्माष्टमी पड़ी। हमारे मुरादाबाद में किला का मंदिर है। वहां जन्माष्टमी के समय मंडलियां आती हैं, संत लोग आते हैं। तो वहां एक संत आए हुए थे। उनकी बड़ी हस्ती थी।

मैं इस तलाश में रहता था कि कोई मिले, मुझे कोई उपाय बता दे। मतलब बड़ी बुरी हालत थी। तो में वहां पहुंच गया। चौरासी घंटा मुहल्ला है मेरे मुहल्ले के पीछे ही, वहीं पहुंच गया। देखा, धूप में चबूतरे के ऊपर एक विशाल मूर्ति , बहुत सफेद दाढ़ी। वे तकिया लगाकर चारपाई पर बैठे थे और एक आदमी उनका पैर दबा रहा था। वहां बल्लम का पहरा था, भाला लेकर संतरी खड़ा था। मैं अंदर दरवाजे में जाने लगा तो उन लोगों ने रोक दिया और मैं परेशान कि क्या करुं । फासला था फिर भी उनकी नजर मुझ पर पड़ गई। उन्होंने कहा `आने दो, आने दो। मतलब ये कि जानते हुए भी कि मुसलमान है, इसीलिए इसको रोक रहे हैं, उनके मुंह से निकला `आने दो, आने दो। मैं पास आ गया। आने के साथ उनके पैर पकड़कर, पैर फैला था इतना, रोने लगा। और लोगों ने कहा कि , `ठहरों इसे अलग करों तो उन्होंने कहा `नहीं, रो लेने दो, इसका मन हलका हो जाने दो।

मैं दो-तीन मिनट तक रोता रहा। उसके बाद एक शेख खड़े थे वहां पे, उन्होंने कहा- साहब का कंठ खराब हो गया है। इसका कंठ बहुत अच्छा था। भजन-वजन में भी कभी-कभी आता था ये। तो बोले अच्छा । पास बुलाया, बोले-`कैसे हुआ। सब बता दिया तो बाले- `अच्छा दवा तो मैं खास कोई नहीं बताऊगा। एक साधना बताता हूं और संभव है कि उससे तुमको फायदा पहुंचे, लाभ मिल जाए। दवा में सिर्फ ये है कि जिसने तुमको सिंदूर दिया है (भाभी ने) उसके ही हाथ से पक्का केला घी में तलवाकर तीन रोज तक खाओ। और साधना यह कि कुएं के ऊपर लेटकर, गर्दन कुएं में लटका कर जब तक तुम्हारा सुर साफ न हो जाए सुर भरो, आ-आ करते रहो। मैं लौट आया। मकान के बाहर कुआ था। वहां तो मैं ये कर नहीं सकता था। पास ही एक जगह थी जहां कोई नहीं जाता था। पास ही एक जगह थी, जहां कोई नहीं जाता था। वहां दसमा घाट है। वहां के लिए मशहूर था कि खजूर पर कोई भूत रहता है। लेकिन मैं तो भूत-वूत को नहीं मानता था। मैं दोपहरी में वहां पहुंच जाता। एकांत रहता। कुएं पर लेटकर आ-आ करता। कोई 10-20 रोज तक यह करता रहा, पर कोई फायदा नहीं पहुचा। केले की दवा भी कर ली थी लेकिन कुछ हुआ नहीं। पर मैं हिम्मत नहीं हारा। उन्होंने कहा था जब तक न हो करते रहना। मुझे उनका कहना याल में था। कोई 20 रोज के बाद 21 दिन मुझे मालूम हुआ कि आवाज कुछ शुरू हुई। 26 दिन के अंदर्र-अंदर मेरा गला साफ हो गया। जैसा सुर वैसा फिर हो गया। जारी

ऊपर का चित्र कश्मीर हमारा है नाटक का।

Tuesday, April 28, 2009

पप्पुओं की चुनावी चकल्लस

यह कैसा चुनाव है, जिसमें चुनने को कुछ है ही नहीं। दिल्ली में सरकार किसकी और कैसी बनेगी- मीडिया के मुंहजोर विशेषज्ञ ही नहीं, खुद प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी बता रहे हैं- इस बात का फैसला वोटिंग मशीनों से नहीं, कहीं और से निकलने वाला है। चुनाव बाद कौन कितनी सीटें लेकर आता है, फिर किसके बीच कैसे समीकरण बनते हैं, इन समीकरणों को बनाने में थैलियों का कैसा और कितना रोल बनता है, इससे तय होगा कि सरकार किसकी बनेगी। कैसा चुनाव है यह, जिसमें शुरू से ही तय है कि न कोई पक्ष जीतने वाला है, न कोई हारने वाला है, सारा कुछ बस ऊपर से तय होने वाला है।

इस परिघटना को क्या कहें, सिवाय इसके कि दो-ढाई दशक पहले शुरू हुई एक प्रक्रिया इसी तरह अपनी परिणति तक पहुंच रही है। जनता सरकार के पतन के बाद लौटी इंदिरा गांधी राजनीति का जो नया हमलावर मुहावरा अपने साथ लाई थीं उसकी पूर्णाहुति उन्हें अपना शरीर देकर चुकानी पड़ी। उसे जारी रखना राजीव गांधी के बूते से बाहर था, अलबत्ता श्रीलंका में उन्होंने अपनी एक कदम आगे दो कदम पीछे वाली भकचोन्हर स्टाइल में इसे जारी रखने की कोशिश जरूर की थी।

राजनीति को आक्रामक मुहावरों से चार्ज रखने के बजाय उन्होंने खुद को राजनीति के थपेड़ों में टपले खाने के लिए छोड़ दिया और अपने लिए एक राजनीति-निरपेक्ष करीअरिस्ट कांस्टिटुएंसी बनाने की कोशिश की। लेकिन यह काम रातोंरात नहीं हो सकता था। कहें तो यह बीस साल बाद, यानी कुछ हद तक अब जाकर संभव हुआ है, जब उसे संभालने-सहेजने वाला कोई नहीं है।

पंचायती राज से लेकर कंप्यूटर तक राजीव गांधी के सारे प्रयोग देख जाइए- सभी के कुछ अच्छे नतीजे भी देश के लिए निकले हैं, जिन्हें आधार बनाकर उन्हें स्वप्नदर्शी वगैरह बताया जा सकता है, बताया जा भी रहा है। लेकिन इनका दूसरा पक्ष यह है कि पंचायती राज ने गांवों के स्तर पर भ्रष्टाचार, हिंसा और गैर-जवाबदेही को असाधारण ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है , जबकि सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग के इर्दगिर्द नए-नवेले पैसे वालों की ऐसी जमात खड़ी हो गई है जो अमेरिका में खड़े होकर सोचती है और भारत को अपने रीयल एस्टेट की तरह देखती है।

बिजली-सड़क-पानी नाम का जो महामंत्र मीडिया पिछले सात वर्षों से जप रहा है, उसका एक पहलू यह भी है कि इन मामलों में कुछ करते हुए दिखिए, फिर चाहे जो कीजिए- आपका नरेंद्र मोदी होना भी माफ है। गांवों में यह प्रधानों और प्रधानपतियों का और शहरों में दो या तीन बेडरूम वाले ब्रह्मांड के महानायकों का लोकतंत्र है, जिनके बारे में पंकज मिश्र की किताब बटर चिकन इन लुधियाना और पवन वर्मा की द ग्रेट इंडियन मिडल क्लास अच्छी खिड़कियां खोलती हैं।

राजीव गांधी के दौर की ही दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि सत्ता शिखर का भ्रष्टाचार है, जिसने राजनीति में नैतिकता की रही-सही हुड़क को भी समाप्त कर दिया। हर छह में से एक उम्मीदवार करोड़पति होने के जो आंकड़े छप रहे हैं, उससे किसी को कोई आक्रोश नहीं है। अगर आप राजनीति में हैं और जाहिर तौर पर आपके खिलाफ किसी बहुत बड़े भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है तो आप देश पर बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं। और अगर आरोप हो भी तो चिंतित होने की कोई बात नहीं है। जिन संस्थाओं से आपको ऐसा कोई डर हो सकता है, वे सब आपको बचाने के लिए जी-जान लड़ा देंगी, शर्त सिर्फ इतनी है कि आप किसी तरह सत्ता में पहुंच जाएं या उसके नजदीकी बन कर रहें।

राजीव गांधी के बाद की राजनीति में मंदिर आया, मंडल आया, बहुजन क्रांति आई, लेकिन ये सभी अब धीरे-धीरे जा रहे हैं। समाज में इनकी छापें लंबे समय तक रहेंगी लेकिन राजनीति में अब सारा कुछ उसी लेवल प्लेयिंग फील्ड में घटित होगा, जिसकी रचना राजीव गांधी करके गए हैं। देश की अस्सी फीसदी आबादी की छाती पर बुलडोजर की तरह फिरता एक या दो प्रतिशत सुपर अमीरों का लोकतंत्र, जिनके पीछे अट्ठारह-उन्नीस फीसदी मिडल क्लास झाल बजाता घूम रहा है।

बाकी लोगों के लिए चुनाव में चलने वाली कच्ची दारू है, टंडन के जलसे में बंटने वाली साड़ी है, छोटे-मोटे अपराध हैं, आत्महत्याएं हैं, पागलपन और भिखमंगापन है। ऐसे लोग वोट दें भी तो क्या, और न दें तो भी क्या- पप्पू लोग तो उन्हें पप्पू कह कर ही बुलाएंगे- और मई या जून की किसी तारीख को जब दिल्ली में उनकी मर्जी की सरकार बन चुकी होगी तो इसे लोकतंत्र की विजय बताएंगे।

फ़्रान्ज़ काफ़्का का 'द ट्रायल' - १

फ़्रान्ज़ काफ़्का किसी परिचय का मोहताज नहीं है. व्यक्तिगत रूप से मैं उसे बीसवीं सदी के विश्व साहित्य के सर्वज्ञाता ईश्वर के तौर पर पूजता हूं. पीएत्रो सिताती ने काफ़्का की जीवनी लिखी है - 'काफ़्का'. इसे पढ़्ने से पहले मैंने काफ़्का की अर्न्स्ट पावेल द्वारा लिखी जीवनी 'नाइटमेयर ऑफ़ रीज़न' पढ़ी थी और काफ़्का के प्रिय मित्र मैक्स ब्रॉड द्वारा लिखी 'फ़्रान्ज़ काफ़्का - अ बायोग्रफ़ी' भी. लेकिन सिताती वाली किताब बहुत ही शानदार है. बहुत तटस्थ और सघन गद्य है किताब का.

इसका एक अंश अनुराग वत्स ने अपने ब्लॉग पर कभी लगाया था. आज से आप इसी पुस्तक के छठे अध्याय 'द ट्रायल' पर श्रृंखला शुरू कर रहा हूं हो सकता है यह अध्याय चार किस्तों तक जाए या पांच तक. देखिये.

जोसेफ़ के. 'द ट्रायल' का नायक है जिसे अज्ञात कारणों से एक सुबह गिरफ़्तार कर लिया जाता है जैसा कि किताब की शुरुआत बताती है: “Someone must have been telling lies about Joseph K., for without having done anything wrong he was arrested one fine morning”

जोसेफ़ के. को गिरफ़्तार करने के बाद उस पर मुकदमा चलाया जाता है और ऐसे अपराध के लिए मृत्युदण्ड दे दिया जाता है जिसके बारे में खुद वह भी नहीं जानता. काफ़्का लिखता है: “The Court wants nothing from you. It receives you when you come and it dismisses you when you go”

पढ़िये सिताती की किताब का वह हिस्सा जिसमें वह इस महान किताब की पहेली को सुलझाने का प्रयास करता है.




द ट्रायल -१

काफ्का का लेखन शून्य में किसी पांसे के फेंके जाने जैसा होता है जो दिमाग में आ सकने वाली संभावनाओं की सीमा से आगे तक संभव विरोधाभासी सिद्धान्तों को एक साथ सामने लेकर आता है। एक ही समय लिखे गए ‘द ट्रायल’¸ ‘द नेचर थियेटर आफ ओकलाहामा’ और ‘इन द पैनल कालोनी’ में हमें सूचित किया जाता है कि ईश्वर की मृत्यु हो चुकी है¸ कि दंड और परमानन्द देने वाली मशीन के परखच्चे उड़ चुके हैं और यह कि ईश्वर का आखिरी भक्त अपनी सलीब पर मर चुका है और अंतत: यह कि गुनगुने सत्य के आलोकित होने का समय हमारा इन्तजार कर रहा है। ‘द ट्रायल’ के देवता¸ जिसका नाम कभी नहीं लिया जाता¸ के पास इतनी असीम शक्ति है जितनी उसके पास कभी नहीं रही थी। वह सारे यथार्थों पर धावा बोलता है¸ उस यथार्थ पर भी जो उसके लिए एकदम अजनबी होना था। पहले ही पन्ने में उसके संदेशवाहक¸ सोते हुए जोसेफ के के कमरे में घुस आते हैं और उसे गिरफ्तार कर लेते हैं।

इस देवता का नाम क्या है? या उसके नाम क्या हैं? या क्या ऐसा तो नहीं कि मामला देवताओं की अनेकता का है जिनमें से हर एक के अनन्त नाम हैं हैं और जो लगातार नए देवताओं का सृजन करते जाते हैं? काफ्का के अध्यात्म की शुरूआत ही में एक चीज को छोड़ दिया जाता हैः कोई भी यह नहीं कहता कि कानून ही देवता का निवास स्थान है या यह कि न्यायालय किसी ईश्वर की सर्जना है हालांकि हमें लगता रहता है कि हम आखिरकार उसी के रूबरू हैं। इस से हमें कोई आश्चर्य नहीं होता क्योंकि चाहे वह ईसाई अध्यात्म हो या यहूदी - दोनों ही आखिर में छलांग लगाते हुए ईश्वर के नाम से परे पहुंच जाते हैं। तो क्या हम यह मान लें कि कानून और न्यायालय अन्तत: ईश्वर के ही कारण हैं? इस किताब में हम ठीक यही काम करेंगे; हालांकि ऐसा करने में हम एक तरह का दगा भी करेंगे क्योंकि किताब में ईश्वर के नाम की अनुपस्थिति एक शून्य का निर्माण करती है¸ ईश्वर की देह की मृत्यु के शून्य का¸ जिसे हम एक भरपूर नाम के साथ अदलबदल देते हैं।

‘द ट्रायल’ के दर्शन का दूसरा वाक्य हमें बतलाता है कि ईश्वर सभी तरह की भौतिकता से परे है : अपने जीवन के आखिरी दस सालों में जिस हताश यकीन के साथ काफ्का ने ईश्वर की इस स्थिति को ठोस तरीके से रेखांकित किया वैसा किसी भी नवीन या पुरातन दर्शन ने नहीं किया था¸ चाहे वे डायेनीशियन दार्शनिक रहे हों या इस्लामी। हम कुछ भी नहीं कह सकते क्योंकि किसी भी बेनाम ईश्वर के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। ‘द ट्रायल’ के कुछ वाक्यों के आधार पर हम अपनी सोच को इस कल्पना के साथ सीमित कर लेते हैं कि ईश्वर अंतहीन सीढ़ियों वाले एक पिरामिड का निर्माण करता है और जिसके बारे में संपूर्णता के साथ कुछ भी नहीं सोचा जा सकता। सबसे ऊंची सीढ़ियों पर सर्वशक्तिमान न्यायाधीश होते हैं : जो बहुत ही दूर हैं और रहस्यमय तरीके से अदृश्य जिस तरह संसार का खोया हुआ केंद्रबिन्दु होता है या अपने महल में मृत कोई चीनी सम्राट या विस्मृत कर दिया गया वह विचार जिसने चीन की महान दीवार का निर्माण किया था। हमें नहीं पता कि वे क्या कर रहे हैं या क्या कभी किसी समय उन्होंने संसार का सृजन किया था। आज उनका काम है कानून की हिफाजत करना : कभी बेहद शानोशौकत के साथ कभी बिल्कुल रोजमर्रा तरीके से¸ कभी किसी हत्यारे के चाकू की क्रूरता के साथ तो कभी चंद्रमा की मुलायम किरणों की तरह। और भी ऊपर¸ इस सब के परे क्या कोई उपस्थित या अनुपस्थित ईश्वर है जैसा कि 'द कासल' और 'द ग्रेट वाल आफ़ चाइना' में संकेत मिलता है? या क्या यह पिरामिड अनन्त आकाश तक उठता जाता है? हम बस इतना कह सकते हैं कि ब्रह्मांड के किसी बिन्दु पर एक संपूर्ण दृष्टि है जो ‘द ट्रायल’ की पूरी जटिलता पर निगाह रखे रहती है। जहां तक हमारा सवाल है : हम जो ‘द ट्रायल’ के बीच रह रहे होते हैं¸ हम न तो किसी देवता या देवताओं की पहचान कर सकते हैं¸ न उनकी रहस्यमय संपूर्णता को आत्मसात कर सकते हैं¸ उनके साथ किसी भी तरह का नजदीकी या सुदूर संबंध बना सकना असंभव है और हमारी कोई प्रार्थना या खोज स्वर्ग की चोटी तक नहीं पहुंच सकते।

यह अमूर्त ईश्वर एक प्रकाश है और वह प्रकाश के अलावा कुछ भी नहीं हो सकता। हालांकि हम महान प्लेटोनिक ईसाई परम्परा के आखिर में खड़े हैं¸ काफ्का इस बात को दो बार सुनिश्चित शब्दों में गंभीरता के साथ हमें बतलाता है कि ईश्वर के घर के दरवाजे से एक “चौंधिया देने वाली रोशनी” निकलती है। क्या फर्क पड़ता है कि हम उसे बहुत विरले ही देख पाते हैं जैसा कि मृत्यु की अंधा बना देने वाली निकटता के समय कोई ग्रामीण देख पाता है? हर चीज के बावजूद यह तथ्य कि बिना नाम वाला वह ईश्वर कोई रोशनी है¸ हमें किसी निर्विवाद सत्य की सी सांत्वना देता है। लेकिन इस रोशनी का एक विशेष गुण भी है। जब यह हमारे संसार पर गिरती है खासतौर पर संसार की पवित्र जगहों पर¸तो वह अंधकार के मोटे कम्बलों की सर्जना करती है मानो किसी ब्रह्मांडीय कानून के कारण देवता इस बात के लिए मजबूर कर दिए गए हों कि हमें केवल रात का ज्ञान हो सके। तो यहां आपको दिखती हैं न्यायालय के गलियारों में गिर रही कब्रिस्तान की परछाइयां¸ हुल्ड के मकान की मोमबत्तियां¸ तितोरेली के मकान के ज़ीने का मद्धम प्रकाश¸ वह संपूर्ण अंधकार जो गिरजाघर को अपने आगोश में समेट लेगा। इस रोशनी का एक और गुण है। न्यायालय की छत पर गिर रही यह रोशनी कानून के गलियारे को दमघोंटू गर्मी से भर देती है। ये पवित्र स्थान बेहद संकरे होते हैं “धुंए और मकड़ी के जालों से अटे गांव के गुसलखानों की तरह” जहां जैसा कि ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में स्विद्रिगेलोव अनन्तता के निवास करने की कल्पना करता है। कानून जीवन की हवा को प्रदूषित कर देता है। वह ब्रह्मांड की ताजगी और स्वछंदता को नष्ट कर देता है और हमें आजादी से सांस लेने से रोकता है। कोई इस बात को भी जोड़ सकता है कि जोसेफ के. को ही न्यायालय की हवा दमघोंटू लगी होगी जबकि उसमें रहने काम करने वालों के लिए वह उनका नैसर्गिक वातावरण होती होगी। उनके लिए वहां की हवा शुद्ध और पवित्र होती होगी।

दर्जनों सदियों से हम यह विश्वास करने के आदी हो चुके हैं देवता सर्वोच्च सत्य और न्याय का प्रतिरूप होता है या होते हैं। ‘द ट्रायल’ का देवता अपने आप को इस अतिमानवीय छवि में कैद नहीं होने देगा। उसे सत्य शब्द पसन्द नहीं है : या अधिक स्पष्टता में कहा जाए तो वह हां या नहीं के विकल्प में कैद किसी एक सत्य से कहीं ऊपर उठा हुआ है। उसके लिए सत्य विरोधाभासी चीजों की स्वीकृति में समाहित है। ईश्वर एक ही समय में दो विरोधों से बना हुआ है : एक दूसरे के परस्पर विरोधी दो विचार उसके लिए “आवश्यक” हैं क्योंकि आवश्यकता पवित्रता के सबसे निकट की श्रेणी में आती है। इसलिए हमें जरा भी अचरज नहीं होता कि यूनानी देवताओं की तरह या गुइटे के ‘लेरयारे’ के देवताओं की तरह ‘द ट्रायल’ का देवता झूठ¸ धोखे और नाटकबाजी को तरजीह देता है। न्यायालय के सिपाही जोसेफ के. से झूठ बोलते हैं जब वे उसे बताते है कि "जल्दी ही उसे सब मालूम पड़ जाएगा"; न्यायालय झूठ बोलता है जब वह किसी बहाने से जोसेफ के को गिरजाघर में आने का लालच देता है; पादरी झूठ बोलता है और गिरजाघर और न्यायालय मिलकर एक अश्लील वैराइटी शो का सृजन करते हैं। जहां तक न्याय का सवाल है तो न्यायालय इस मामले में कतई सच्चा है : उसके निर्णय निर्विवाद हैं और उन पर किसी का भी प्रभाव नहीं पड़ने वाला हालांकि यह एक क्रूर विडंबना है कि सत्य की तसदीक एक भ्रष्ट मुखबिर करता है। तितोरेली और हुल्ड की तरह काफ्का भी आश्वस्त है कि वह गलती करता ही नहीं और कर भी नहीं सकता। अगर हमें यह नहीं बताया जाता कि किसी को रिहा किया गया या नहीं तो ऐसा इसलिए है कि मानवीय न्यायालय के बरखिलाफ अपनी जादुई अंतर्चेतना के चलते दैवीय न्यायालय केवल दोषियों पर ही आरोप मढ़ता है। लेकिन यह एक अजीब सा न्याय है। यह इतना असंदिग्ध और आदमियों से इस कदर कटा हुआ है कि कई बार ऐसा लगता है कि यह शिकार या प्रतिशोध की देवियों का प्रतिरूप है : अपने भीतर ढेर सारी विशुद्ध नफरत भरे हुए।

यहूदी¸ ईसाई या इस्लामी कानून की तरह न्यायालय का एक लिखित कानून है : किसी फरिश्ते ने उसे किसी आदमी से लिखवाया या किसी संत – पैगम्बर से उसे निगलने को कहा या फिर किसी दिल के भीतर उकेर दिया। हम पादरी को यह कहता हुआ सुनते हैं कि कहीं पर कानून का अiस्तत्व है जो हमेशा एक सा होता है और धर्मशास्त्रों को साथ लिए चलता है जिसकी तमाम व्याख्याकार लगातार अपने तरीकों से रोज नई व्याख्या करते हैं। यह एक गुप्त कानून है : केवल कुछ ही अध्येता इस की महान पुतक के पृष्ठों को पलटते हैं; और जैसा कि 'द ट्रायल' में होता है न्यायाधीशों द्वारा एकत्र की गईं तमाम सामग्री – आरोप¸ कागजात¸ निर्णय – न तो आरोपी को उपलब्ध होते हैं न वकीलों को और कई बार तो खुद न्यायाधीशों को भी नहीं। दैवीय ज्ञान गुप्त ही रहना चाहिए। अगर हम और जानना चाहते हैं तो हमें ‘इन द पैनल कालोनी’ से मुखातिब होना पड़ेगा। इस तरह लिखित कानून एक ऐसा भीषण खेल है जो दैवी शक्तियां हमारे साथ खेल रही हैं; इस खेल का मंतव्य सत्य को हमसे छिपाने का भी है और उसे हमारे सामने उद्घाटित करने का भी। जोसेफ के उस रहस्य को नहीं समझता जिसके सहारे देवता हमारी रक्षा करते हैं; वह लिखित दस्तावेजों और गिरफ्तारी के वारंट वगैरह की मांग करता है। जोसेफ के यह भी नहीं समझता कि दैवी रहस्य के परे एक बेकाम लम्बी स्क्रिप्ट भर होती है ; वकीलों के मूखर्तापूर्ण संस्मरण या आत्मकथा लिखने के उनके अर्थहीन प्रयास जिन्हें दैवीय ताकतें अपनी चौंधिया देने वाली रोशनी में उपहास की निगाह से देखती हैं।

'द ट्रायल' के देवता के हृदय तक पहुंचने के लिए हमें उसी विडंबना को दोहराना पड़ेगा जिसने तकरीबन सारी धार्मिक चेतनाओं को यातना पहुंचाई है। इस कदर अमूर्त देवता जो इतनी दूर है कि सुदूरतम और ठंडे सितारे या अपने महान महल में खोए किसी चीनी सम्राट जैसा दिखता है; वही इस संसार में हर जगह व्याप्त है और उस अनन्त वास्तविकता के भीतर उपस्थित है जिसे वह खुद इतना नापसंद करता है। यह बात हमें चित्रकार तितोरेली से मालूम पड़ती है। जब कुछ छोटी लड़कियां जोसेफ के को छेड़ती हैं तो तितोरेली झुक कर इसके कानों में कहता है :"ये लड़कियां भी न्यायालय का हिस्सा हैं।" "क्या?" अपना सिर घुमाकर तितोरेली को घूरता जोसेफ पूछता है। चित्रकार वापस अपनी कुर्सी पर बैठता है और थोड़ा मजाक और थोड़ा समझाने के स्वर में बोलता है : “हरेक चीज न्यायालय का हिस्सा है।” इसमें कोई शक नहीं है : न केवल महान गुप्त न्यायाधीशों वाला 'द ट्रायल' का वह अदृश्य शिखर बल्कि इन पृष्ठों पर आने वाली हरेक चीज : वे घृणास्पद सिपाही¸ यहां तक कि वे भ्रष्ट तेरह साल की लड़कियां – सब कुछ न्यायालय है। सारा यथार्थ कानून बन गया है : रोजमर्रा के जीवन की हर चीज पवित्र बन गई है। ईश्वर ने हर चीज में अवतार ले लिया है और वह हर चीज में ठोस तरीके से विराजमान है। इस किताब के विरोधाभासों को हम इसी तरह सुलझा सकते हैं। एक तरफ तो अपने विशाल गलियारों में उपस्थित न्यायालय गुप्त है जैसा कि एक कर्मचारी बतलाता है : “जनता को सब कुछ मालूम नहीं है।” दूसरी तरफ उसे किसी विशिष्ट भवन की जरूरत नहीं क्योंकि उसने सारे मकानों में खुद को स्थापित कर लिया है और वह सारे व्यक्तियों पर हुक्म चलाता है। यहां तक कि बैंक में भी उसी का राज चलता है जहां किसी और शक्ति की जीत होनी चाहिए थी। उसके मुखबिर हर जगह हैं और हम नहीं जानते कि ऐसा कैसे हुआ पर किताब के हर छोटे बड़े पात्र को जोसेफ के के खिलाफ चल रहे मुकदमे की जानकारी है। न्यायालय अदृश्य भी है और हर जगह खुद को प्रकट भी करता है – ठीक ईश्वर की तरह।

‘अमेरिका’ में रोबिन्सन¸ देलामार्चे और ब्रूनेल्दा का स्थान ऐसा परजीवी संसार है जो कानून की दीवारों के परे है: एक ऐसा रंगीन चरागाह जिस पर कोई ध्यान नहीं देता। यही संसार 'द ट्रायल' में कानून द्वारा स्वीकार कर लिया गया है और उसने एक अध्यात्मिक आयाम प्राप्त कर लिया है। वे कर्मचारी¸ वैश्याएं¸ चित्रकार¸ वकील और निर्णय सुनाने वाले कुछ और ही हैं। जहां ईश्वर का दायरा बढ़ा है वहीं पवित्रता का ह्रास हुआ है : उसने कुख्यात और घटिया मैदानों पर अपना तम्बू गाड़ लिया है¸ जैसा दोस्तोव्स्की के यहां पहले ही हो चुका था। एक बारोक लेखक के लिए यह एक तरह की विजय होता – ईश्वर की हर जगह उपस्थित होने के तथ्य से ज्यादा कौन सी बात उत्साहित करने वाली हो सकती है बजाय उस ब्रह्मांड के जहां उसका कानून सर्वोपरि होता हो। लेकिन काफ्का के लिए यह एक अद्वितीय त्रासदी थी। सारी वास्तविकता कानून की शक्ल ले चुकी है जबकि वह खुद जरा भी नहीं बदली है बल्कि ‘अमेरिका’ के समय से और भी बदतर हो चुकी है; वह काफ्का के विरुद्ध है और उस पर अब एक नई और अधिक भीषण शक्ति का अधिकार है।

(जारी)

गर्मी में मियां की मल्हार


इधर कई दिनों से भीषण गर्मी पड़ रही है. बारिश का नामोनिशान नहीं. तीन-चार दिनों से पहाड़ों पर आग लगने का दुर्भाग्यपूर्ण सिलसिला भी शुरू हो गया है.

गर्मी का कोई क्या करे साहब?

हां पंखा चलाकर मियां की मल्हार को तो सुना ही जा सकता है. कल्पना तो की ही जा सकती है मेघाछन्न आकाश की ... और बारिश की! यह प्रस्तुति पंडित विनायक तोरवी के स्वर में है.

१९४८ में जन्मे पंडित विनायक तोरवी को ग्वालियर घराने के गायनाचार्य गुरुराव देशपाण्डे का शिष्य बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. महान गायिका गंगूबाई हंगल के अतिरिक्त पं. मल्लिकार्जुन मंसूर और पं. बासवराज राजगुरु जैसे संगीतज्ञों से भी उन्होंने गायन की बारीकियां जानीं. फ़िलहाल पं. तोरवी शास्त्रीय गायन के साथ ही कन्नड़, मराठी और हिन्दी में भक्ति संगीत और सुगम संगीत के साथ नवीन प्रयोग करने में व्यस्त हैं

कई सम्मानों से नवाज़े जा चुके पं. तोरवी वाणिज्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त हैं और कैनरा बैंक में मैनेजर की पोस्ट पर हैं.



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Monday, April 27, 2009

वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड - भाग दो

पिछली पोस्ट से जारी:



मेन्दोज़ा: चलो किताब के बारे में बात करते हैं, बुएनदीया परिवार का एकाकीपन आता कहां से है?

मारकेज़: मेरे विचार से प्रेम की कमी से. तुम देख सकते हो कि पूरी शताब्दी में सुअर की पूंछ वाला ऑरेलियानो जन्म लेने वाला इकलौता बुएनदीया है. बुएनदीया लोग प्रेम करने में असमर्थ थे और यही उनकी कुंठा और एकाकीपन की कुंजी है. मैं मानता हूं कि एकाकीपन, भाईचारे का विलोम है.

मैं वह सवाल तुमसे नहीं करूंगा जो हर कोई करता है-कि किताब में इतने सारे ऑरेलियानो और इतने सारे होसे आरकादियो क्यों हैं - क्योंकि हम दोनों जानते हैं कि यह एक लातीन अमरीकी परंपरा है. हम सब के नाम हमारे पिताओं और दादाओं के नाम पर रखे जाते हैं और तुम्हारे परिवार में तो यह परम्परा सनक की इस हद तक पहुंची कि तुम्हारा एक अपना भाई गाब्रीएल के नाम से जाना जाता है. पर मैं समझता हूं कि ऑरेलियानो नाम के लोगों को होसे आरकादियो लोगों से फ़र्क करने में एक सूत्र है. क्या है वह?

बहुत आसान है. होसे आरकादियो नाम के लोगों के बच्चे होते हैं और ऑरेलियानों के नहीं. सिर्फ़ एक अपवाद है - होसे आरकादियो सेगुन्दो और ऑरेलियानो सेगुन्दो. ऐसा शायद इसलिये है कि एक समान जुड़वां होने के नाते जन्म के समय ही उनमें कुछ अदल-बदल हो गई थी.

किताब में पुरुषों के भीतर तमाम खोट हैं (खोजें, कीमियगरी, युद्ध, पीने के दौर) और स्त्रियों में समझदारी. क्या दोनों को तुम इसी तरह देखते हो?

मेरा मानना है कि स्त्रियां संसार को टूटने से बचाए रखती हैं जबकि पुरुष इतिहास को आगे ले जाने का प्रयास करते हैं. अंत में आप हैरत करते हैं कि दोनों में से ज्यादा सनकी कौन है?

स्त्रियां न सिर्फ अगली पीढ़ियों की सुनिश्चितता तय करती हैं बल्कि उपन्यास की भी. क्या शायद यही उसुZला की असाधारण लम्बी जिन्दगी का रहस्य नहीं?


हां, उसने गृहयुद्ध से पहले मर जाना चाहिये था जब वह सौ साल की होने वाली थी पर मुझे अहसास हुआ कि यदि उसकी मौत हो गई तो किताब ढह जायेगी. जब वह अंतत: मरती है, किताब में इतना उबाल आ चुका होता है कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आगे क्या होगा?

किताब में पेत्रा कोट्स की क्या भूमिका है?

सतही तौर पर आप उसे फर्नांदा की छवि के तौर पर देख सकते हैं, एक कैरिबियाई स्त्री जिसे आन्देस की स्त्रियों के प्रति कोई नैतिक पूर्वाग्रह नहीं है. लेकिन मैं समझता हूं उसका व्यक्तित्व बहुत कुछ उर्सुला जैसा है - वह सच्चाई के ज्यादा मोटे तौर पर समझने वाली उर्सुला है.

मैं मानता हूं कि जब तुम किताब लिख रहे थे, कई चरित्र उससे अलग बनकर सामने आये होंगे जैसा तुमने पहले तय किया होगा. क्या तुम कोई उदाहरण दे सकते हो?

हां एक तो सान्ता सोफिया दोन्या पियेदाद का होगा. किताब में, जैसा कि वास्तविकता में हुआ था, मैंने सोचा था कि जब उसे पता लगेगा कि उसे कोढ़ है वह बिना किसी को बताये घर छोड़कर चली जायेगी. हालांकि उस चरित्र का पूरा व्यक्ति समर्पण और स्व-अस्वीकार से निर्मित है, जिसके कारण यह अन्त विश्वसनीय लगता पर मुझे लगा कि मुझे इसे बेहतर बनाना होगा. वह काफी क्रूर लग रहा था.

क्या कोई चरित्र कतई बेकाबू हुआ?

तीन बेकाबू हो गये थे पूरी तरह - इस मायने में कि उनका जीवन और व्यक्तित्व वैसा सामने नहीं आया जैसा मैंने तय किया था. ऑरेलियानो होसे का अपनी आन्ट आमारान्ता के लिये प्रेम मेरे लिये हैरान करने वाला था( होसे ऑरकादियो सेगुन्दो बनाना वर्कर यूनियन का ऐसा नेता नहीं था जो मुझे पसन्द आता( और प्रशिक्षु पोप होसे ऑरकादियो एक ऐसे एडोनिस के रूप में बदल गया जो किताब में जंचता नहीं.

हममें से जो इस किताब के कुछ सूत्रों को जानते हैं, इस बात को महसूस कर सकते हैं कि एक क्षण आता है जब माकोन्दो एक कस्बा, तुम्हारा कस्बा नहीं रह जाता और एक नगर बन जाता है - बारान्कीया. क्या तुमने वहां के किसी परिचित व्यक्ति या स्थान को वहां रखा? इस बदलाव से तुम्हें कोई दिक्कतें तो नहीं आई?

माकोन्दो जगह की बनिस्बत एक मन:स्थिति ज्यादा है, सो कहानी को कस्बे से शहर में ले जाने में कोई खास दिक्कत नहीं आई - न ही किताब के माहौल में कोई परिवर्तन आया.


उपन्यास में तुम्हारे लिये सबसे मुश्किल क्षण कौन सा था?

शुरूआत करना. मुझे वह दिन अच्छे से याद है जब मैं बहुत मुश्किल के बाद पहला वाक्य पूरा कर पाया था और भयभीत होकर मैंने अपने आप से पूछा कि आगे क्या होने वाला है. असल में, जब तक जंगल के बीच वह गलियारा नहीं खोजा गया था, मैं नहीं सोचता था कि किताब का कुछ बन पायेगा. पर उसके बाद किताब लिखना एक तरह का पागलपन बन गया - हालांकि उसमें आनन्द भी आया.

क्या तुम्हें वह दिन याद है जब तुमने उसे खत्म किया? कितना बजा था? तुम्हें कैसा लगा?

अठारह महीनों तक मैं सुबह नौ से दोपहर तीन तक हर रोज लिख रहा था. मुझे पता था कि वह अंतिम दिन था पर किताब अपने नैसर्गिक अन्त पर गलत वक्त पर पहुंची - सुबह करीब ग्यारह बजे. मेरसेदेज़ घर पर नहीं थी और मुझे फोन पर कोई नहीं मिला जिसे मैं इस बारे में बता पाता. मुझे अपनी हैरत बिल्कुल अच्छे से याद है, मानो वह कल घटा हो. मुझे पता नहीं था कि समय के साथ क्या किया जाय, सो तीन बजे तक जिन्दा रहने के लिये मुझे कई तरह की चीजों की खोज करनी पड़ी.

इस किताब के कुछ आयाम जरूर होंगे जिन्हें आलोचकों ने (जिनसे तुम इतनी नफरत करते हो) नजरअन्दाज कर दिया होगा. कौन हैं वे आयाम?

एक तो किताब की सबसे उत्कृष्ट बात है - अपने बेचारे पात्रों के लिये लेखक की उद्दाम भावनाएं.

तुम्हारे ख्याल से तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ पाठक कौन है?

मेरे एक रूसी दोस्त की मुलाकात एक स्त्री से हुई. एक बहुत बूढ़ी स्त्री से जो किताब को हाथ से प्रतिलिपि बना रही थी - आखिरी पंक्ति तक. मेरे दोस्त ने उससे पूछा कि वह क्यों ऐसा कर रही है. वह बोली, "क्योंकि मैं जानना चाहती हूं कि वास्तव में पागल कौन है - लेखक या मैं, और यह जानने के लिये किताब को दुबारा लिखना पड़ेगा." मुझे इससे बेहतर पाठक की कल्पना करना मुश्किल लगता है.


कितनी भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है?

सत्रह.

कहते हैं कि अंग्रेजी अनुवाद बढ़िया हुआ है?

हां, बहुत बढ़िया है. अंग्रेजी में भाषा सघन होकर ज्यादा ताकतवर हो गई है.

और बाक़ी अनुवाद?

मैंने फ्रांसीसी और इतालवी अनुवादकों के साथ थोड़ा काम किया था. दोनों अच्छे अनुवाद हैं हालांकि कम से कम मेरे लिये फ्रांसीसी में किताब में वैसी बात नहीं है.

फ्रांस में यह बहुत ज्यादा नहीं बिकी है - इंग्लैण्ड और इटली के मुकाबले, स्पानी भाषी देशों को छोड़ दें तो, जहां यह असाधारण रूप से सफल हुई है. तुम्हारे ख्याल से ऐसा क्यों है?

शायद कार्तेसियाई परम्परा के कारण. मैं देकार्ते के अनुशासन के बदले राबेलाइस के सनकीपन के ज्यादा करीब हूं और फ्रांस में देकार्ते काफी प्रभावशाली है. शायद इसीलिये यह किताब फ्रांस में और देशों कितनी लोकप्रिय नहीं हुई, हालांकि वहां बढ़िया आलोचनाएं हुईं. रोसाना रोजान्दा ने एक बार मुझे कहा था कि सन् 1968 में जब यह किताब फ्रांस में छपी थी - व्यावसायिक सफलता के लिये वहां वह कोई उल्लेखनीय मौका नहीं था.

क्या तुम्हें `वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड´ की सफलता से हैरत होती है?

हां, बहुत ज़्यादा.

क्या तुमने कभी इसका रहस्य जानने की कोशिश की है?

नहीं, मैं जानना नहीं चाहता. मेरे ख्याल से यह पता करना बहुत ख़तरनाक होगा कि कोई किताब, जिसे मैंने बस कुछ करीबी दोस्तों को दिमाग़ में रखकर लिखा था, इस कदर बिक सकती है.

मुनीश जी की इस टिप्पणी और इसके प्रकाशन पर पर मैं कबाड़खाना छोड़ रहा हूँ !

पिछली पोस्ट पर मेरी टिप्पणी पर मुनीश जी की इस टिप्पणी और इसके प्रकाशन पर मैं कबाड़खाना छोड़ रहा हूँ। उम्मीद है मेरे इस फैसले से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ये एक मूर्ख की विदाई है ! इसे इससे ज़्यादा कुछ न समझें ! सभी दोस्तों से मुआफी !
मेरी टिप्पणी : समकालीन हिन्दी साहित्य संसार के लिए ये सपनों सरीखी बातें हैं। बहुत बढ़िया पोस्ट- बहुत बढ़िया सपना ! "सपनों के सौदागर" ! मुझे लगता है कई सालों से प्रकाशित हो रही ये किताब इस साल पुस्तक मेले में आ जाएगी।
मुनीश जी की टिप्पणी : Some of them may be ur friends , but i feel the most unwanted people in the realm of literature are none but critics! Who are they to instruct people what to read and what not to! This 'kaum' has strangulated many a budding talent in the spring of their lives . Not everyone had the nerves of steel like Marquez.

वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड - भाग एक



गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ उर्फ़ गाबो के साक्षात्कारों पर आधारित प्रसिद्ध पुस्तक 'फ़्रैगरेन्स ऑफ़ गुवावा' के एक अध्याय से कुछ टुकड़े मैंने कभी यहां लगाए थे. मेरे संग्रह में कोई बीस किताबें ऐसी हैं जिन्हें मैं हर साल पढ़ता हूं - और यह सिलसिला पिछले बारह-तेरह सालों से जारी है. गाबो का कालजयी उपन्यास 'वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड' किताबों की इस सूची में काफ़ी ऊपर आता है. कल देर रात इसे एक बार और पढ़ कर समाप्त किया.

'फ़्रैगरेन्स ऑफ़ गुवावा' का अनुवाद कई सालों से प्रकाशनाधीन है - किताब जब छपे, क्यों न आपको इस का वह हिस्सा पढ़वाऊं जिस में मारकेज़ ' वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड' की बाबत बातें कर रहे हैं अपने अभिन्न मित्र और मशहूर कोलम्बियाई पत्रकार प्लीनीयो आपूलेयो मेन्दोज़ा से. ये लीजिए पहला हिस्सा. दूसरा रात में लगा दूंगा.





जब तुमने `वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड´ लिखना शुरू किया तुम क्या करना चाहते थे?

मैं उन सारे अनुभवों को साहित्य में व्यक्त करने की राह खोजना चाहता था, जिन्होंने एक बच्चे के तौर पर मुझ पर प्रभाव डाला था.

बहुत से आलोचकों को इस किताब के भीतर मानव जाति के इतिहास की जातक कथा या एक रूपक नजर आते हैं.

नहीं, मैं बस इतना करना चाहता था कि अपने बचपन के संसार की एक साहित्यिक छवि छोड़ना चाहता था जो, जैसा तुम्हें पता है एक बड़े, बेहद उदास घर में बीच था जहां एक बहन थी जो मिट्टी खाती थी, एक नानी थी जो भविष्यवाणियां किया करती थी, और एक ही नाम वाले असंख्य रिश्तेदार थे जिनके लिये प्रसन्नता और पागलपन के बीच बहुत फर्क नहीं था.

तो भी आलोचकों को कहीं जटिल उद्देश्य नजर आते हैं.

यदि वे हैं भी तो ऐसा करने की मेरी नीयत नहीं थी. होता ये है कि लेखकों के बरअक्स आलोचकों को किताब में अपनी मनचाही चीज मिल जाती है, वह नहीं जो उसमें सचमुच है.

तुम आलोचकों के बारे में बहुत विडंबनापूर्ण बातें करते हो. तुम उन्हें इतना नापसंद क्यों करते हो?

क्योंकि ज्यादातर आलोचक इस बात को नहीं समझते कि `वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड´ एक तरह का लतीफ़ा है, जिसमें नजदीकी मित्रों के लिये कई संकेत है( सो किसी अधिकार के कारण वे किताब को `डीकोड´ करने का काम अपने ज़िम्मे ले लेते हैं और आख़िरकार मूर्खों जैसे नज़र आने लगते हैं.

मिसाल के तौर पर मुझे याद है कि एक आलोचक को लगा था कि उसे उपन्यास का सूत्र मिल गया है जब उसने गौर किया कि एक पात्र - गाब्रीएल - राबेलाइस की सम्पूर्ण कृतियां पेरिस ले जाता है. इस खोज के बाद उसने साहित्यिक प्रभाव को अतिरंजित किया. मैंने राबेलाइस की उपमा के बतौर इस्तेमाल किया है और ज़्यादातर आलोचक इस बात को देख नहीं पाये. इस बात को दरकिनार करके कि आलोचक क्या कहते हैं मेरे ख्याल से उपन्यास तुम्हारे बचपन की स्मृतियों की काव्यात्मक पुनर्रचना के आगे भी कुछ है. क्या तुमने एक बार नहीं कहा था कि बुएनदीया परिवार की कहानी लातीन अमरीकी इतिहास का वृतांत हो सकता है?

हां, मेरे विचार से ऐसा ही है. लातीन अमरीकी इतिहास भी भीषण बेकार उद्यमों से भरा हुआ है और उन महान नाटकों से भी जिन्हें घटने से पहले ही खारिज कर दिया गया. हमें स्मृति के ह्रास की हैजे की बीमारी भी है. समय बीतने पर कोई याद नहीं रखता कि बनाना कंपनी के कर्मचारियों का हत्याकांड वाकई हुआ था, उन्हें सिर्फ कर्नल ऑरेलियानो बुएनदीया की याद आती है.

और जो तैंतीस युद्ध कर्नल ऑरेलियानो बुएनदीया ने हारे सम्भवत: हमारी अपनी राजनीतिक कुंठा की अभिव्यक्ति हो सकते हैं, अगर कर्नल जीत गया होता तो क्या होता?

वह पैट्रिआर्क जैसा होता. उपन्यास को लिखते वक्त एक दफे मुझे लालच आया कि कर्नल को सत्ता मिल जाये. ऐसा होता तो मैंने `वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड´ की जगह `द ऑटम ऑफ़ द पैट्रिआर्क´ लिखा होता.

तो क्या हम यह मान लें कि भाग्य की किसी ऐतिहासिक सनक के कारण जो भी तानाशाही के खिलाफ लड़ता है, खुद सत्ता में आने के बाद तानाशाह बन जाता है?

`वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड´ में कर्नल ऑरेलियानो बुएनदीया का एक बन्दी उससे कहता है, "मुझे फिक्र इस बात की है कि सेना की प्रति तुम्हारी इतनी घृणा, उससे इतना लड़ चुकने और उसके बारे में इतना सोच लेने के बाद तुम भी वैसे ही बन चुके हो". अन्त में वह कहता है, "इस हिसाब से तुम हमारे इतिहास के सबसे बड़े खूनी तानाशाह हो."

क्या यह सच है कि तुमने यही उपन्यास तब लिखना शुरू किया था जब तुम अठारह के थे?

हां, `द हाउस´ नाम था उसका क्योंकि मैंने सोचा था कि पूरा घटनाक्रम बुएनदीया परिवार के घर के भीतर घटेगा.

उसमें तुम कहां तक पहुंचे थे? क्या तुमने सौ सालों के बारे में लिखने का सोचा था?

मैं किसी खाके तक नहीं पहुंच पाया. मैं कुछ टुकड़े अलग कर पाया, जिनमें से कुछ उस अख़बार में छपे जहां मैं उन दिनों काम करता था. सालों की संख्या से मुझे कभी चिन्ता नहीं हुई. मुझे ख़ुद नहीं पता कि असल में `वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड´ में सौ सालों की कहानी है या नहीं.

तुमने तभी उसे लिखना जारी क्यों नहीं रखा?

क्योंकि तब उस तरह की किताब लिखने के लिये न मेरे पास पर्याप्त अनुभव था न शक्ति न ही तकनीकी कौशल.

लेकिन वह कहानी तुम्हारे दिमाग में घूमती रही थी.

पन्द्रह सालों तक. मुझे सही कहानी नहीं मिल पाई थी. उसने मेरे कानों में सही-सही गूंजना था. एक दिन जब मैं मेरसेदेज और बच्चों के साथ आकापुल्को की तरफ गाड़ी से जा रहा था, वह एक कौंध की तरह मेरे दिमाग में आई. मुझे वह कहानी उसी तरह सुनानी थी जैसी मेरी नानी सुनाया करती थीं. मैं उसी दोपहर से शुरू करने वाला था जब छोटे बच्चे को उसके नाना बर्फ खोजने ले जाते हैं.

एक एकरेखीय इतिहास

एक एकरेखीय इतिहास जिसमें असाधारण तत्व सामान्य चीजों में जज़्ब हो जाते हैं, अपनी पूरी सादगी के साथ.

क्या यह सच है कि तुमने गाड़ी मोड़ ली थी और तुरन्त लिखना शुरू कर दिया था?

सच है. मैं कभी आकापुल्को नहीं पहुंच पाया.

और मेरसेदेज़?

तुम जानते हो मेरसेदेज़ ने मेरे कितने सारे ऐसे पागलपन बर्दाश्त किये हैं. उसके बिना मैं किताब नहीं लिख सकता था. उसने चीज़ों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया. मैंने कुछ ही महीने पहले कार खरीदी थी, सो उसे जमानत पर दे कर मैंने उसे पैसे दे दिया. मुझे लगा था कि मैं छ: महीने लूंगा पर किताब पूरा करने में मुझे डेढ़ साल लगे. जब पैसा ख़त्म हो गया उसने एक शब्द भी नहीं कहा. मुझे नहीं पता कि वह कैसे कर पाई लेकिन उसने कसाई को उधार पर मांस देने को, नानबाई को उधार पर डबलरोटी देने को और मकान मालिक को किराये के लिये नौ महीने रूके रहने पर राजी कर लिया. उसने मुझे बताये बिना हर चीज की देखरेख की और जब-तब मेरे लिये पांच-पांच सौ कागजों का बण्डल लाया करती थी. उन पांच सौ पन्नों के बिना मैं कभी नहीं रहा. जब किताब ख़तम हो गई तो यह मेरसेदेज़ थी जिसने पाण्डुलिपि को डाक से एदीतोरियाल सूदामेरिदाना भेजा.

उसने मुझे एक बार बताया था कि पाण्डुलिपि को डाकखाने ले जाते हुए उसने सोचा था `अगर यह किताब इतने सब के बाद उतनी अच्छी न हो पाई तो?´ मैं नहीं समझता उसने उसे पढ़ा था. पढ़ा था क्या?

नहीं, वह पाण्डुलिपियां पढ़ना पसन्द नहीं करती.

वो और तुम्हारे बेटे अक्सर तुम्हारी किताबें पढ़ने वाले आखिरी लोग होते हैं. मुझे बताओ, क्या तुम्हें निश्चित पता था कि यह किताब सफल होगी?

मुझे पता था कि आलोचकों को किताब पसंद आयेगी पर इतनी सफलता के बारे में नहीं सोचा था. मुझे लगा था कि वह करीब पांच हजार बिक जायेगी (तब तक मेरी बाक़ी किताबें की सिर्फ हजार प्रतियां बिकी थीं). एदीतोरियाल सूदामेरिकाना ज्यादा आशावान था - उनके ख्याल से किताब आठ हजार बिक सकती थी. असल में किताब का पहला संस्करण अकेले बुएनोस आयरेस में दो हफ्ते में बिक गया.

Sunday, April 26, 2009

गिरगिट जी के संग लुकाछिपी के रंग

एक हैं गिरगिट जी। ये साहब शकल - सूरत , भाव - भंगिमा से कुछ 'कवी' टाइप के जीव लग रहे है... और कई इनों से इस नाचीज को ठग रहे हैं .....
ये सब जगह पाए जाते हैं, हमारे आसपास और हमारी हिन्दी भाषा के मुहावरों की दुनिया में भी। पारखी नजर के स्वामी इन्हें इंसानों की फितरत में भी देख लेते हैं। अगर कभी एकांत में अपने से बतियाने का मौका मिले तो इन्हें खुद के भीतरी तह में भी देखा जा सकता है। किस्से -कहानियों में तो इनकी मौजूदगी आम है। इस समय इनकी बहार है और ये सबसे कहते फिर रहे हैं - कहो ना प्यार है !
एक गिरगिट जी हमारे घर के नन्हें बगीचे में कुछ दिनों से विश्राम किए हुए हैं।नाम -गाम पूछने पर आँखें मटकाते हैं और गरदन हिलाते हैं। अभी दोपहरी में जब हल्के बादल छाए हैं तब हमने इनका शिकार करने की जुगत भिड़ाई और गोली बंदूक तो अपने पास है नहीं , बरछी ,गँड़ासा ,कटार भी नहीं किन्तु कैमरा तो है , सो कर डाला शिकार। ल्यो जी ! आप भी मिलो इन प्यारे- न्यारे गिरगिट जी से.....
काम से आराम
पत्तों के बिछौने पर
पल भर विश्राम !
यह जो कनेर का तना है
फिलहाल
यही अपना घर बना है
रात की रानी की झाड़
दे रही है
धूप -घाम से आड़

सोचो
सोचने में क्या जाता है
खर्च धेला नहीं
मजा भरपूर आता है
क्या है उस पार ?
शायद नफरत
शायद प्यार
जी में उमड़ रही है शायरी
पास न कागज - न कलम
हाय किस्मत ! हाय री !

किसी गिरजाघर में चली जाओ या शादी कर लो किसी बेवकूफ़ से


अन्ना अख़्मातोवा के नाम से कबाड़ख़ाने के पाठक अपरिचित नहीं होंगे. मैंने उनकी कुछेक रचनाएं यहां लगाई हैं. इत्तेफ़ाक से आज कुछ और खोजते ढूंढते मुझे एक बार फिर गुलाबी कवर वाली उनके अनुवादों की पाण्डुलिपि मिल गई. ये अनुवाद पता नहीं कितने सालों से पड़े हैं. किताब की शक्ल में कब आएंगे, मुझे नहीं पता. फ़िलहाल अन्ना की एक और कविता.


'हैमलेट' पढ़ते हुए

एक.

कब्रों के पास का इलाका धूलभरा और गर्म था
पीछे नदी - नीली और ठण्डी,
तुमने मुझसे कहा - "किसी गिरजाघर में चली जाओ
या शादी कर लो किसी बेवकूफ़ से ..."

ऐसे ही बोला करते हैं राजकुमार - अपनी भयंकर निर्विकार आवाज़ में
मगर इन छोटे से शब्दों को संजो कर धरा हुआ है मैंने
काश ये शब्द बहते रहें चमकते रहें हज़ारों साल
जैसे कन्धों पर होता है फ़र का लबादा.

दो.

और, जैसे बेमौके
मैंने कहा, "आप ..."
प्रसन्नता की कैसी मुस्कान
फैल गई उस चेहरे पर

कही गई या सोची गई इस तरह कह दी गई बातों से
जल उठेगा हरेक गाल
मैं तुम्हें उन चालीस बहनों की तरह प्यार करती हूं
जो प्यार करती थीं और आशीष देती थीं.

Saturday, April 25, 2009

भाजपा जितना दोहरा चुकी है उससे अब उसे ज्यादा फ़ायदा नहीं

भाजपा जितना दोहरा चुकी है उससे अब उसे ज्यादा फ़ायदा नहीं. बद्री ने कहा था कि 'हिंस्र आत्माएं पहचान ली जाती हैं' हिंस्र आत्माएं शायद पहचान ली जाएँ! दो चरणों का मतदान तो हो चुका. वरना राजेश जोशी के मुहावरे में कहें तो अब अपने ही लोगों द्वारा मारे जायेंगे.

ये आडवानी जी कौन है? इन्हें जब जिन्ना पर दिए अपने बयान के चलते भाजपा के अध्यक्ष पद से हटना पड़ा था तो भाजपा के तमाम शीर्ष लोग इनको प्रणाम तक नहीं करते थे. ये इनके पीएम उम्मीदवार है!

भाषा की शालीनता सचमुच बरकरार रखनी चाहिए. शायद मैं ज्यादा तल्ख़ हो गया था. मित्रो यह संपादित पोस्ट है.

Friday, April 24, 2009

शिनाख्त़ करो दिल्ली में


सात सितम्बर १९५३ को उत्तर प्रदेश के इटावा में जन्मे जसबीर चावला के पांच कविता संग्रह छप चुके हैं. प्रबन्ध शास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री ले चुके जसबीर चावला की कविताओं पर इलाहाबाद से निकलने वाली अनियतकालीन लघुपत्रिका 'कथ्यरूप' ने एक पुस्तिका प्रकाशित की थी - 'एक टुकड़ा बादल'.कवि केदारनाथ सिंह ने इस की भूमिका लिखी थी.वे लिखते हैं: "प्रस्तुत कविताओं के रचयिता की एक खासियत यह भी है कि वह हिन्दी काव्य-परम्परा को जानता तो है पर उस से किसी भी स्तर पर आक्रान्त नहीं होता."

जसबीर चावला की कविताओं का यह संकलन बहुत सजग व्यक्ति की कविताओं से भरपूर है - आसपास के संसार को देखने की पैनी निगाह से लैस. उनकी बहुत सी कविताएं मुझे पसन्द आईं. यहां प्रस्तुत कर रहा हूं इस पुस्तिका से एक कविता:


आजकल दिल्ली

कोई भी वस्तु लावारिस हो सकती है -
इस लिए शिनाख़्त करो -
जहां बैठो नीचे झांको
जहां खड़े हो ऊपर झांको
जहां चलो आस-पास झांको
नज़र रखो -

कुछ भी पड़ा हो सकता है वैसे ही
ट्रांज़िस्टर, टिफ़िन, डब्बा,
सुर्ती-डिबिया, माचिस
या और ऐसा ही कुछ
बेमतलब ... और लावारिस
ख़तरनाक बम हो सकता है

आदमी न छुए
बस पहचान कर ले
रिपोर्ट कर दे अपना शुबहा
जिप्सी को
ईनाम जीत ले

पुलिस को तलाश है
लावारिस वस्तुओं की
वे ख़तरनाक हो सकती हैं
राजधानी में
पुलिस सफ़ाया कर देगी
खौफ़ की बू
ख़तरनाक चीज़ें
जिनका कोई वारिस नहीं.

शिनाख़्त करो -
इसलिए चीखो -
"किसकी है यह कलम?"
""किसकी है यह दवात?"
पुकारो - "कौन है यह अधमरा बूढ़ा?
किसकी है यह पोटली?
कौन है मालिक इस लुढ़के मनई का?
बौआई भीड़ का?
हेरायी बछिया का? अकुलाई जनता का?
कौन है माई-बाप इस बच्चे का?"

ख़बरदार! मानव-बम हो सकता है!

(कविता व फ़ोटो: साभार 'कथ्यरूप')

Thursday, April 23, 2009

गुलाब बाई के बहाने नौटंकी के एक विस्मृत अध्याय की चर्चा



मास्टर फ़िदा हुसैन नरसी से सम्बन्धित पिछली पोस्ट की निरन्तरता में आगे जोड़ना चाहूंगा कि अपने ज़माने को बड़े कलाकारों को याद करते हुए मास्टर साहब अक्सर गुलाब बाई का ज़िक्र किया करते थे. मास्टर साहब को इस बात की टीस थी कि मौजूदा ज़माने की तड़क-भड़क और इलैक्टोनिक संगीत के शोर में नौटंकी के क्षेत्र में गुलाब बाई के अविस्मरणीय योगदान को लोग भूल गए हैं.

मेरे लिए गुलाब बाई के बारे में कुछ भी जानकारी तब हासिल कर पाना भूसे के ढेर में ऑलपिन खोजने जैसा था. तब न इन्टरनेट इस कदर प्रचलन में था और दिल्ली-बम्बई के कला-संस्कृति के गुप्त ठीहों पर हम जैसे स्मॉल-टाउन लौंडे-मौंडों को कोई घास डालता था.

पिछले विश्व पुस्तक मेले में मैंने पेंग्विन के स्टॉल से काफ़ी किताबें खरीदी थीं. उनमें से कुछ को पढ़ने का समय चाह कर भी नहीं निकल सका था. इधर एक सप्ताह पहले तीन-सवा तीन सौ पन्नों की जो किताब समाप्त की उसे पढ़ना जैसे एक अलग ग्रह पर किसी अलग ही कालखण्ड के किसी विस्मृत घटनाक्रम से रू-ब-रू होना था.

'गुलाब बाई: द क्वीन ऑव नौटंकी थियेटर' नाम की यह किताब उन्हीं गुलाब बाई का जीवनवृत्त है जिनके बारे में मास्टर फ़िदा हुसैन बताया करते थे. दीप्ति प्रिया मेहरोत्रा की लिखी यह किताब परम्पराओं के संरक्षण के क्षेत्र में किया गया एक बेहद महत्वपूर्ण कार्य है.

उत्तर प्रदेश के फ़र्रूखा़बाद ज़िले की रहने वाली गुलाब बाई ने सन १९३१ में अपने नौटंकी करियर का आगाज़ किया फ़कत बारह की आयु में. नौटंकी में उस से पहले महिलाओं के रोल पुरुष निभाया करते थे. इस लिहाज़ से गुलाब बाई को नौटंकी की पहली महिला कलाकार होने का गौरव प्राप्त है. वे अच्छी अभिनेत्री के साथ साथ उम्दा गायिका भी थीं. गायन-संगीत का ज्ञान नौटंकी कलाकारों के लिए ज़रूरी गुण माना जाता था. 'लैला मजनूं' में लैला, 'राजा हरिश्चन्द्र' में तारामती, 'बहादुर लड़की' में फ़रीदा और 'शीरीं फ़रहाद' में शीरीं जैसे रोल निभाने वाली गुलाब बाई सन १९४० तक आते आते अपनी लोकप्रियता के चरम पर पहुंच चुकी थीं. १९४० के दशक के आते आते गुलाब बाई की तनख़्वाह सवा दो हज़ार रुपये प्रति माह के आसपास थी, जो उस ज़माने के हिसाब से अकल्पनीय रूप से बड़ी रकम थी. उन्होंने इस रकम से अपने परिवार को सहारा दिया, गांव में एक आलीशान हवेली बनवाई और फूलमती देवी का मन्दिर स्थापित किया. १९५० के दशक के मध्य में उन्होंने अपनी कम्पनी- 'गुलाब थियेट्रिकल कम्पनी' - का निर्माण किया.

नौटंकी की लोकप्रियता का ये आलम था कि रात १० बजे से शुरू होने वाले शोज़ सुबह ४-५ बजे तक चला करते और जवान-बूढ़े-बच्चे तम्बू के भीतर ठुंसे रहते. जहां नौटंकी होती थी वहां एक अनऑफ़ीशियल मेला जुटा रहता और अमूमन महीने भर तक चलता. कम्पनी हर रात नया खेल दिखाया करती.

... ख़ैर छोड़िये, इन तफ़सीलात के बारे में जानना हो तो किताब खोज कर पढ़ें. मैं कोशिश में हूं कि किसी तरह इस किताब के अनुवाद के अधिकार हासिल कर लूं और जल्द से जल्द हिन्दी के पाठकों के सम्मुख इसे रख सकूं. यह मास्टर फ़िदा हुसैन नरसी के लिए मेरी व्यक्तिगत श्रद्धांजलि भी होगी और गुलाब बाई के जीवन वृत्त के माध्यम से लोग क्रूरतापूर्वक बिसरा दी गई एक विधा का इतिहास हिन्दी में पढ़ सकेंगे.
आमीन!

१९६६ में अपनी मृत्यु से पहले अपने आख़िरी दिनों में गुलाब बाई इस बात से बेहद आहत थीं कि फ़िल्मों के चलन ने लोगों के भीतर से नौटंकी के प्रति सारा अनुराग ख़त्म कर दिया था.

इन्हीं गुलाब बाई की आवाज़ में सुनिये राग भीमपलासी का एक टुकड़ा.



(किताब की डिटेल्स: 'Gulab Bai - The Queen Of Nautanki Theatre', लेखिका: दीप्ति प्रिया मेहरोत्रा, Penguin India, 2006)

Wednesday, April 22, 2009

सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे: इक़बाल बानो


इक़बाल बानो की मृत्यु पर कल मैंने एक पोस्ट लगाई थी. असल में कबाड़ख़ाने पर उन पर पहले से प्रकाशित एक पोस्ट को दुबारा लगाया था. आज शाम को हमारे आदरणीय श्री असद ज़ैदी ने फ़ोन पर इस बाबत मेरी एक ग़लती को रेखांकित करते हुए स्व. इक़बाल बानो के बारे में कुछेक बातें बतलाईं और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की उस नज़्म का ज़िक्र भी किया जिसे सुनाते हुए वे अपने सुनने वालों को रुला दिया करती थीं.

इक़बाल बानो पर एक विस्तृत पोस्ट लिखनी ही थी सो आज ही सही. बड़े भाई असद ज़ैदी की नज़्र.

इक़बाल बानो का ताल्लुक रोहतक से था. बचपन से ही उनके भीतर संगीत की प्रतिभा थी जिसे उनके पिता के एक हिन्दू मित्र ने पहचाना और उनकी संगीत शिक्षा का रास्ता आसान बनाया. इन साहब ने इक़बाल बानो के पिता से कहा: "बेटियां तो मेरी भी अच्छा गा लेती हैं पर इक़बाल को गायन का आशीर्वाद मिला हुआ है. संगीत की तालीम दी जाए तो वह बहुत नाम कमाएगी."

मित्र के इसरार पर उनकी संगीत शिक्षा का क्रम दिल्ली में शुरू कराया गया - दिल्ली घराने के उस्ताद चांद ख़ान की शागिर्दी में. इक़बाल बानो ने दादरा और ठुमरी सीखना शुरू किया. उस्ताद की सिफ़ारिश पर ही बाद में उन्हें ऑल इन्डिया रेडियो के लिए गाने के मौके मिले.

वे १९५० के आसपास पाकिस्तान चली गईं जहां १९५२ में मुल्तान के इलाके के एक ज़मींदार ने इस वायदे पर सत्रह साल की इक़बाल बानो से निकाह रचा लिया कि उनकी संगीत यात्रा पर कोई रोक नहीं आने दी जाएगी. यह वायदा उनके पति ने १९८० तक अपने इन्तकाल तक बाकायदा निभाया. पति की मृत्यु के बाद वे लाहौर आ गईं.

ठुमरी, दादरा और ग़ज़ल के लिए उनकी आवाज़ बेहद उपयुक्त थी और उन्होंने अपने जीवन काल में एक से एक बेहतरीन प्रस्तुतियां दीं.

मरहूम इन्कलाबी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब की नज़्म "हम देखेंगे" की रेन्डरिंग को उनके गायन कैरियर का सबसे अहम मरहला माना जाता है. ज़िया उल हक़ के शासन के चरम के समय लाहौर के फ़ैज़ फ़ेस्टीवल में उन्होंने पचास हज़ार की भीड़ के आगे इसे गाया था.

इस प्रस्तुति ने ख़ासी हलचल पैदा की थी और सैनिक शासन ने इस वजह से उन्हें काफ़ी परेशान भी किया. लेकिन उनके इस कारनामे ने उन्हें पाकिस्तान में बहुत ज़्यादा लोकप्रिय बना दिया था.

२००३ के बाद से उनकी तबीयत नासाज़ चल रही थी और उन्होंने महफ़िलों में गाना तकरीबन बन्द कर दिया.
२१ अप्रैल २००९ को उनका देहान्त हो गया.

फ़ैज़ साहब की इस नज़्म के इक़बाल बानो द्वारा गाये जाने के पीछे यह विख्यात है कि ख़ुद फ़ैज़ साहब इसे उनकी आवाज़ में सुनकर रो दिये थे.

ख़ास तौर पर आदरणीय असद ज़ैदी जी की फ़रमाइश पर प्रस्तुत है यह अलौकिक, एक्सक्लूसिव रचना:



हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौह-ए-अजल में लिखा है
जब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी

हम देखेंगे
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो नाज़िर भी है मन्ज़र भी
उट्ठेगा अनल - हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

(यहां से डाउनलोड करें: http://www.divshare.com/download/7170033-48d)

पारसी थियेटर का बादशाह : मास्टर फ़िदा हुसैन 'नरसी'



कोई पन्द्रह साल पहले नैनीताल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सौजन्य से एक ज़बरदस्त थियेटर वर्कशॉप आयोजित की गई थी जिसमें बी. वी. कारन्त के अलावा मास्टर फ़िदा हुसैन नरसी ने बतौर प्रशिक्षक शिरकत की थी. मास्टर फ़िदा हुसैन तब सौ साल के हुआ चाहते थे. लम्बे कद के मास्टर साहब की फ़िटनेस और कड़कती आवाज़ नौजवानों में ईर्ष्या का विषय बना करते थे. उन के खाने और सोने-जागने के घन्टे तय होते थे. छोटी मोटी ऊंचाई चढ़ते हुए उनकी सांस ज़रा भी नहीं फूलती थी और रिहर्सल के वक़्त उनकी उपस्थिति में किस की मजाल कि थोड़ी सी भी अनुशासनहीनता दिखाए.

मास्टर साहब नैनीताल के रंगकर्मी युवाओं से 'ख़ूबसूरत बला' नाम का नाटक तैयार करा रहे थे. बी. वी. कारन्त साहब नाटक का संगीत तैयार कर रहे थे (इस अद्भुत प्रस्तुति के अद्भुत संगीत को नैनीताल के रंगकर्मी अब भी बड़ी मोहब्बत से याद करते हैं). फ़िलहाल रिहर्सल्स के बाद उनके साथ मेरी तीन-चार लम्बी मुलाकातें हुईं थीं जिनमें उन्होंने बड़े उत्साह के साथ नौटंकी से जुड़े अपने अनुभव सुनाए थे.

११ मार्च १८९४ को मुरादाबाद में जन्मे मास्टर फ़िदा हुसैन को पारसी थियेटर का बादशाह माना जाता था. पारसी थियेटर का जन्म बहुत दिलचस्प तरीके से हुआ था. अंग्रेज़ों के समय में गोरों के मनोरंजन के लिए विलायती ड्रामा कम्पनियां आया करती थीं. भारत में ये कम्पनियां अच्छा खासा मुनाफ़ा बटोरा करती थीं सो पारसी समुदाय के कुछ लोगों के मन में विचार आया कि इन्हीं विलायती कम्पनियों की तरह यहां भी थियेटर कम्पनियां बना कर अच्छा पैसा कमाया जा सकता है. इस सिलसिले में एलिज़ाबेथन नाटकों की तर्ज़ पर अतिशय ड्रामाई तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए नाटकों का मंचन शुरू हो गया. यह दीगर है कि पारसी मालिकान को भारतीय जनमानस या संस्कृति से बहुत लेनादेना न था. पारसी थियेटर में ठेठ भारतीय थीम्स का प्रवेश धीरे धीरे लेकिन एक निश्चितता के साथ हुआ.

१९११ में एक कठपुतली शो देखने के बाद मास्टर फ़िदा को लग गया था कि उनकी ज़िन्दगी इसी क्षेत्र में काम करने को बनी है. १९१७ में मुरादाबाद के रामदयाल ड्रेमेटिक क्लब के नाटक 'शाही फ़कीर' में उन्हें उनके गोरे रंग और मधुर आवाज़ के दम पर लीड स्त्री किरदार निभाने को कहा गया. यहां एक बात का ज़िक्र बहुत ज़रूरी है कि उनके परिवार में कला-संगीत वगैरह जैसे पेशों के लिए कोई विशेष आदर का भाव नहीं था. सारे परिवार के विरोध के बावजूद वे इस मैदान में कूद पाए तो इस के पीछे उनके पिता का प्रोत्साहन था. १९१८ में उन्होंने रॉयल अल्फ़्रेड कम्पनी की नौकरी कर ली जहां पण्डित राधेश्याम कथावाचक के साथ अगले बारह सालों तक उनकी ज़बरदस्त जुगलबन्दी बैठी और कम्पनी ने एक से एक सफल नाटक किए. 'नरसी मेहता' में लीड किरदार निभाने वाले फ़िदा हुसैन के अभिनय का ऐसा सिक्का चला कि उनके नाम के आगे नरसी उपनाम जुड़ गया.

१९३२ में मास्टर साहब ने फ़िल्मों में भी काम करना शुरू कर दिया - 'रामायण', 'मस्ताना', 'डाकू का लड़का' जैसी फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय किया और गाने भी गाए. मस्ताना का एक गीत बहुत विख्यात हुआ:


जिधर उनकी तिरछी नज़र हो गई
क़यामत ही बर्पा उधर हो गई

वो फिर-फिर के देखें मुझे जाते-जाते
मुहब्बत मेरी पुर-असर हो गई

किया राज़ अफ़शाँ निगाहों ने दिल का
छुपाते-छुपाते ख़बर हो गई

किया क़त्ल चुटकी में 'आज़ाद' को भी
निगाह उनकी कैसी निडर हो गई

शब-ए-वस्ल भी दिल के अरमाँ न निकले
मनाते-मनाते सहर हो गई




उनके प्रशंसकों की फ़ेहरिस्त ख़ासी लम्बी हुआ करती थी जिसमें कुन्दनलाल सहगल, सोहराब मोदी, जिगर मुरादाबादी से लेकर महात्मा गांधी, पं मदन मोहन मालवीय से लेकर राममनोहर लोहिया और इन्दिरा गांधी जैसी हस्तियां शुमार हैं.

फ़िल्मों से वापस आकर उन्होंने दोबारा रंगमंच का रुख़ किया और १९४८ में अपनी कम्पनी 'मूनलाइट' स्थापित की. बीस साल यानी १९६८ तक काम करने के बाद उन्होंने अभिनय से सन्यास ले लिया. छब्बीस साल बाद वे नैनीताल में थे और बच्चों को रंगमंच के गुर सिखला रहे थे.

१०५ वर्ष की आयु में यानी १९९९ में उनका देहान्त हुआ. मास्टर साहब से हुई बहुत ज़्यादा बातें जस की तस तो याद नहीं हैं पर उन्होंने उन पांच प्रतिज्ञाओं का ज़िक्र हर मुलाकात में किया जो उन से उन के पिता ने थियेटर में जाने की अनुमति देते हुए लिए थे:

१. चरित्र मजबूत रखना
२. झूठ न बोलना
३. जुआ न खेलना
४. नशा न करना
५. दूसरे की अमानत पर निगाह न धरना.

मास्टर साहब ने इन वचनों को ताज़िन्दगी निभाया और एक अद्वितीय जीवन जिया. ऐसे व्यक्तित्व की आज के ज़माने में कल्पना तक नहीं की जा सकती.

मास्टर फ़िदा हुसैन की स्मृतियों को नमन!

(फ़ोटो: दूसरी फ़ोटो में मास्टर फ़िदा हुसैन फ़िल्म 'मस्ताना' के नायक के रूप में. दोनों फ़ोटो 'संदर्श' पुस्तिका २ से साभार)

इक़बाल बानो नहीं रहीं

इक़बाल बानो का इन्तकाल हो गया.

संगीत जगत के लिए यह एक अपूरणीय क्षति है.

उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए मैं इसी ब्लॉग से कभी उन पर लगाई गई एक पोस्ट को दोबारा लगा रहा हूं.



इक़बाल बानो का नाम ग़ज़ल प्रेमियों में विशिष्ट स्थान रखता है. भारतीय मूल की इस बेहतरीन पाकिस्तानी गायिका ने बहुत सारी ग़ज़लों को स्वरबद्ध किया है. मिर्ज़ा ग़ालिब की संभवतः सबसे लम्बी ग़ज़ल है "मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए". मुझे याद पड़ता है किसी किताब या पत्रिका में मैंने फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' साहब का एक लम्बा लेख देखा था इस ग़ज़ल के बारे में. हमारे गुलज़ार साहब का बनाया, भूपिन्दर का गाया गीत "दिल ढूंढता है" इसी ग़ज़ल के एक शेर से 'प्रेरित' है.


इक़बाल बानो ने इस कालजयी ग़ज़ल के चन्द शेर गाये हैं. लुत्फ़ उठाइए.





मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए
जोश-ए-कदः से बज़्म चराग़ां किये हुए

करता हूं जमा फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त को
अर्सा हुआ है दावत-ए-मिज़गां किये हुए

फिर पुरसिस-ए-जराहत-ए-दिल को चला है इश्क़
सामान-ए-सद-हज़ार नमकदां किये हुए

मांगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस
ज़ुल्फ़-ए-सियह रुख़ पे परीशां किये हुए

चाहे है फिर किसी को मुकाबिल में आरज़ू
सुरमे से तेज़ दश्ना-ए-मिज़गां किये हुए

इक नौबहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह
चेहरा फ़रोग़-ए-मै से गुलिस्तां किये हुए

ग़ालिब हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से
बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ां किये हुए

Tuesday, April 21, 2009

हिंदी बोलेंगे ओबामा, गर ठान लें...

अजब हंगामा बरपा है। समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाने की बात क्या कही गई, तूफान मच गया। उन अंगरेजी अखबारों को तो छोड़िए, जिन्होंने 1857 के संग्राम को खुलेआम विरोध किया था या भारत की आजादी की खबर इस अंदाज में छापी थी जैसे कोई अनहोनी हो गई, हिंदी मीडिया का भी एक तबका छाती पीट रहा है। जैसे अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करना गैरकानूनी बात हो, या पहली बार कही जा रही हो। बाकी हिंदी समाज में भी इस हमले को लेकर एक खास तरह की उदासीनता है। दिमागी गुलामी का इससे बेहतर उदाहरण मिलना मुश्किल है।

इसमें शक नहीं कि मुलायम सिंह यादव हिंदी के लिए उतने ही प्रतिबद्ध हैं जितने कि समाजवाद के लिए। तीन बार देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद दोनों ही मसलों पर उनकी ओर से कोई ऐसी रचनात्मक और सकारात्मक पहलकदमी नहीं हुई जिससे कोई गुणात्मक फर्क पड़ता। लेकिन हिंदी का मसला उनका भी है जो मुलायम की राजनीति से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। क्योंकि अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करके मातृभाषा को स्थापित करने की लड़ाई भावना का नहीं, जनतंत्र का प्रश्न है।

अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाना दरअसल संविधान का संकल्प है। आजादी के आंदोलन के दौरान हिंदी को अखिल भारतीय संपर्क और राजकाज की भाषा बनाने का सपना इसलिए देखा गया था क्योंकि गुलामी सिर्फ भौगोलिक और शारीरिक नहीं होती, सांस्कृतिक भी होती है। और आजाद भारत में हिंदी इसी सांस्कृतिक आजादी की अभिव्यक्ति के लिए चुनी गई थी। ध्यान देने वाली बात ये है कि ये हिंदी पहले से मौजूद नहीं थी। बल्कि लगातार बनाई जा रही थी। हिंदी क्षेत्र में भी मातृभाषा तो अवधी, भोजपुरी, मगही, बघेली, बुंदेली जैसी बोलियां थीं जिन्हें पीछे छोड़ हिंदी की प्रतिष्ठा की जानी थी। ये स्वाभिमान का प्रश्न था। इसीलिए आजादी के बाद महात्मा गांधी ने बीबीसी के संवाददाताओं से अंग्रेजी में बात करने से इंकार करते हुए कहा था-दुनिया से कह दो, गांधी को अंग्रेजी नहीं आती। बाद में अरसे तक डा.लोहिया हिंदी को लेकर जूझते रहे और अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करना समाजवादी आंदोलन की प्रमुख मांग बनी रही

जाहिर है, आज जो अंग्रेजी की ओर उंगली उठने पर बौखला रहे हैं वे मन ही मन गांधी जी और डा.लोहिया को भी मूर्ख मानते होंगे। ये तबका बेहद शातिर है। उसने बड़ी चालाकी से अंग्रेजों की अनिवार्यता हटाने के वाक्य से "अनिवार्यता" शब्द को गायब कर दिया। और बताने लगे कि अंग्रेजी हटाने की बात करना 21वीं सदी में मूर्खता है। इससे देश पीछे चला जाएगा या फिर मुलायम के अपने बच्चे क्यों अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े,वगैरह-वगैरह। वैसे तो, महात्मा गांधी और डा.लोहिया ने भी विदेश जाकर अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाई की थी। क्या इस तर्क पर हिंदी के बारे में उनके विचार गलत ठहराए जा सकते हैं।

दरअसल, ये सारे तर्क मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए हैं। बात सिर्फ इतनी है कि करीब 50 करोड़ हिंदी भाषी, अंग्रेजी न जानने के बावजूद कैसे तरक्की कर सकें। कैसे डाक्टर, इंजीनियर, मैनेजर बन सकें। जिन्हें अंग्रेजी पढ़ना हो पढ़ें, पर जिन्हें अंग्रेजी न आती हो, उन्हें खामियाजा न भुगतना पड़े। आखिर रूस, चीन, जर्मनी, जापान, फ्रांस, स्पेन जैसे देश बिना अंग्रेजी के तरक्की कर सकते हैं, तो हिंदी वाले क्यों नहीं। ये हक हिंदी ही नहीं सभी भारतीय भाषाओं को मिलना चाहिए।

वैसे भी, सिर्फ अंग्रेजी जानना ही विकास की गारंटी होती तो अमेरिका में लाखों लोग खुले आसमान के नीचे जिंदगी गुजारने को मजबूर नहीं होते। इक्कीसवीं सदी का एक चेहरा ये भी है कि अंग्रेजी जिस आर्थिक व्यवस्था के केंद्र में थी, वो दिवालिया हो गई है और जिस आउटसोर्सिंग का फायदा उठाने के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी माना जाता था, उसे बंद करने के लिए अमेरिका में जुलूस निकल रहे हैं। यानी, मनमनोहन सिंह का अंग्रेजी सिखाने के लिए आक्सफोर्ड जाकर अंग्रेजों को शुक्रिया कहना बेकार जा सकता है। वैसे भी, अंग्रेजी का सारा तूमार गलत तथ्यों के आधार पर बांधा गया है। अंग्रेजी पूरी दुनिया की नहीं, सिर्फ इंग्लैंड, अमेरिका, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया और आधे कनाडा की भाषा है। यानी साढ़े चार देश। बाकी इन देशों के पूर्व उपनिवेशों के एक-आध फीसदी लोग इस भाषा का व्यवहार करते हैं।

दिमागी गुलामी को स्वर्ग का सुख मान रहे वर्ग की चिंता ये है कि अंग्रेजी की अनिवार्यता हटते ही करोड़ों-करोड़ आम लोग तेजी से कुलीनतंत्र के शामियाने में घुसने की कोशिश करेंगे। तब आम और खास का फर्क ही मिट जाएगा। शासक वर्ग भी इस फर्क को बनाए रखना चाहता है। उसकी चिंता देश के दो-चार करोड़ अंग्रेजी जानने वालों को लेकर ही रहती है। ये वर्ग मुखर है और सत्ता प्रतिष्ठान के हर कोने में कब्जा जमाए हुए है।

देखा जाए तो, आग और पहिये के बाद भाषा मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार है। और दुनिया भर के शिक्षाशास्त्री बताते हैं कि मातृभाषा में शिक्षा से ही मेधा निखरती है। मौलिक अभिव्यक्तियां मातृभाषा में ही संभव होती हैं। जनतंत्र का तकाजा ये है कि जनता और शासन की भाषा एक हो, पर हिंदी समाज में मुंसिफ और मुल्जिम, मुवक्किल और वकील, डाक्टर और मरीज, अफसर और क्लर्क की भाषा अलग है। अंग्रेजी में निष्णात होने के प्रयास में हिंदी वाला पैर में पत्थर बांधकर दौड़ता है और अक्सर पिछड़ जाता है। ऐसे में जरूरत नए महाप्रयास की है। ये सही है कि ज्ञान-विज्ञान के तमाम क्षेत्रों में हिंदी किताबे उपलब्ध नहीं हैं। पर ये कोई मुश्किल काम नहीं है। अगर ठान लिया जाए तो पांच साल में दुनिया का सारा ज्ञान हिंदी में उपलब्ध हो सकता है। वैसे भी, आईआईटी,कानपुर के वैज्ञानिक ऐसा साफ्टवेयर विकसित करने के करीब पहुच गए हैं जो बटन दबाते ही सटीक अनुवाद पेश करेगा। यानी तकनीक भी काम आसान कर रही है। जरूरत है, इरादे की। याद करिए, तुर्की के कमाल पाशा को। उसने विद्वानों से पूछा कि तुर्की लागू करने के लिए कितना वक्त चाहिए। जवाब मिला-दस साल। कमाल पाशा ने कहा-समझ लो दस साल इसी वक्त खत्म हो गए, और तुर्की भाषा लागू हो गई।

कवि त्रिलोचन शास्त्री कहते थे कि हिंदी वालों में अपनी भाषा को लेकर अनुराग नहीं है। बात सही है। अनुराग होता तो समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में अंग्रेजी की बात पर न कांग्रेस आलोचना करने की हिम्मत करती, न बीजेपी। लेकिन उन्हें पता है कि हिंदी के नाम पर वोट नहीं पड़ते। जाति और धर्म के नाम पर पड़ते हैं। सोचिए, हिंदी का मजाक उड़ाने वाले मराठी की बात आते ही कैसे मिमियाने लगते हैं। बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां रातो-रात अपने बोर्ड मराठी में कर लेती हैं और मैकडॉनल्ड की दुकानों में बटाटा बड़ा बिकने लगता है। क्योंकि उन्हें राज ठाकरे जैसों के लट्ठ का डर है। पर हिंदी को न राज ठाकरे चाहिए न जूता चलाने वाले जरनैल। उसे तो जामवंतों की जरूरत है जो हिंदी वालों को उनकी ताकत का अहसास करा सके। 50 करोड़ जाग्रत हिंदी भाषियों के बाजार में घुसने के लिए तो ओबामा भी हिंदी सीख लेंगे।