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Thursday, January 7, 2016

क्योंकि दुनिया को इतना ही प्यार करना ज़रूरी है

नाज़िम हिकमत की कविता: अनुवाद वीरेन डंगवाल का 


जीने के बारे में 

एक.

जीना कोई हंसी खेल नहीं
आपको जीना चाहिये बड़ी संजीदगी के साथ
मसलन किसी गिलहरी की तरह -
मेरा मतलब है जीवन से सुदूर और ऊपर की किसी
चीज़ की तलाश किये बग़ैर,
मेरा मतलब है ज़िन्दा रहना आपका मुकम्मिल काम होना चाहिये.
जीना कोई हंसी खेल नहीं
आपको इसे गंभीरता से लेना चाहिये,
ऐसी और इस हद तक
किमिसाल के तौर परआपके हाथ बंधे आपकी पीठ पर,
आपकी पीठ दीवाल पर,
या फिर किसी प्रयोगशाला में
अपने सफ़ेद कोट और हिफ़ाज़ती चश्मों में
आप मर सकें लोगों के लिये -
उन लोगों तक के लिये जिनके चेहरे भी आपने कभी नहीं देखे,
गो कि जानते हैं आप
कि जीवन सबसे ज़्यादा वास्तविकसबसे सुन्दर चीज़ है.
मेरा मतलब हैआपको इतनी संजीदगी से लेना चाहिये जीवन को
किउदाहरण के लियेसत्तर की उम्र में भी आप रोपें जैतून का पौधा -
और यह नहीं कि अपने बच्चों के लियेबल्कि इसलिये कि
हालांकि आप मृत्यु से डरते हैं
पर उस पर विश्वास नहीं करते
क्योंकि जीवनमेरा मतलब हैज़्यादा वज़नदार चीज़ है.

दो.

मान लीजिये हम बहुत बीमार हैं - ऑपरेशन की ज़रूरत है -
जिसका मतलब है कि हो सकता है हम उठ भी न सकें
उस सफ़ेद मेज़ से
गो कि यह असंभव है अफ़सोस महसूस न करना
थोड़ा जल्दी चले जाने के बारे में
हम फिर भी हंसेंगे चुटकुले सुनते हुए,
हम देखेंगे खिड़की के बाहर कि बारिश तो नहीं हो रही,
या चिन्ताकुल प्रतीक्षा करेंगे
ताज़ा समाचार प्रसारण की ...
मान लीजिये हम मोर्चे पर हैं -
लड़ने लायक किसी चीज़ के लिये.
वहां पहले ही हमले मेंउसी दिन
हम औंधे गिर सकते हैं मुंह के बलमुर्दा.
हम जानते होंगे इसे एक अजीब गुस्से के साथ,
फिर भी हम सोचते - सोचते हलकान कर लेंगे ख़ुद को
उस युद्ध के नतीज़े की बाबत जो बरसों चल सकता है.
मान लीजिये हम जेल में हैं
और पचास की उम्र की लपेट में,
और लगाइये कि अभी अठ्ठारह बरस बाक़ी हैं
लौह फ़ाटकों के खुलने में.
हम फिर भी जियेंगे बाहर की दुनिया के साथ,
इसके लोगोंपशुओंसंघर्षों और हवा के -
मेरा मतलब कि दीवारों के पार की दुनिया के साथ
मेरा मतलबकैसे भी कहीं भी हों हम
हमें यों जीना चाहिये जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं.

तीन.

यह धरती ठण्डी हो जायेगी एक दिन
सितारों में एक सितारा
ऊपर से सबसे नन्हा
नीले मख़मल पर एक सुनहली ज़र्रा -
मेरा मतलब है - यही -हमारी महान पृथ्वी
यह पृथ्वी ठण्डी हो जायेगी एक दिन,
बर्फ़ की सिल्ली की तरह नहीं
मुर्दा बादल की तरह भी नहीं
बल्कि एक खोखले अखरोट की तरह यह लुढ़कती होगी,
घनघोर काले शून्य में ...
अभी इसी वक़्त आपको इसका दुःख मनाना चाहिये
-अभीइसी वक़्त ज़रूरी है आपके लिये
यह अफ़सोस महसूस करना -
क्योंकि दुनिया को इतना ही प्यार करना ज़रूरी है
अगर आपको कहना है "मैं जिया".

Saturday, January 10, 2015

और तुम्हें देखकर खौफ़ लगता है, मेरे भाई


धरती पर सबसे विचित्र जानवर

-नाज़िम हिकमत

तुम एक बिच्छू जैसे हो, मेरे भाई,
ज़िन्दा रहते हो कायर अँधेरे में
एक बिच्छू की तरह.

तुम एक गौरैया जैसे हो, मेरे भाई,
रहते हो हमेशा एक गौरैया की फड़फड़ाहट में.
तुम एक सीपी जैसे हो, मेरे भाई,
एक सीपी की तरह बंद, संतुष्ट,
और तुम्हें देखकर खौफ़ लगता है, मेरे भाई,
जैसे लगता है किसी मरे ज्वालामुखी के मुहाने से.

एक नहीं,
पांच नहीं -
बदकिस्मती से लाखों हो तुम.

तुम भेड़ जैसे हो, मेरे भाई:
                             लबादा पहने चरवाहा जैसे ही उठाता है अपनी छड़ी,
                             तुम जल्दी से हिस्सा बन जाते हो झुण्ड का
और, लगभग गर्व के साथ, भागना शुरू कर देते हो कसाईघर की तरफ़.

मेरा मतलब है, धरती पर सबसे विचित्र जानवर हो तुम–
मछली से भी अधिक विचित्र
जो पानी के लिए समुद्र तक को नहीं देख पाती.

और इस दुनिया के अत्याचार
-वे हैं तुम्हारी वजह से.

और अगर हम भूखे, थके और खून में लिथड़े हुए हैं,
और अब भी कुचले जा रहे हैं अपनी शराब के लिए अंगूरों जैसे
-तुम्हारी वजह से है ऐसा.

मुझे कहना नहीं आ रहा,

लेकिन सबसे ज़्यादा ग़लती तुम्हारी है, मेरे प्यारे भाई.  

Thursday, December 25, 2014

जीना! एक दरख्त की तरह अकेले और आज़ाद

नाज़िम हिकमत और पिराये, उनकी पत्नी, जिन पर उन्होंने जेल से कुछ प्रेम-कवितायेँ  लिखी थीं,
जो अब विश्व साहित्य की धरोहर हैं.

दलील

-नाज़िम हिकमत

किसी घोड़ी के सिर की जैसी आकृति वाला यह मुल्क
सुदूर एशिया से दौड़ता चला आता है
भूमध्यसागर तलक पसरते जाने को
हमारा है यह मुल्क.

खून सनी कलाइयां, भिंचे हुए दांत,
नंगे पैर,
बेशकीमती रेशमी गलीचे सरीखी धरती,
हमारा यह नरक, यह स्वर्ग हमारा है.

बंद हो जाने दो दरवाजों को जो हमारे हैं
कभी न खुलने दो उन्हें
ख़त्म करो आदमी का आदमी को गुलाम बनाना
हमारी है यह दलील.

जीना! एक दरख्त की तरह अकेले और आज़ाद
भाईचारे में रह रहे एक जंगल की मानिन्द

                             यह ख्वाहिश हमारी है. 

(नोट: कहीं-कहीं इस कविता को 'घुड़सवार का गीत' शीर्षक भी दिया जाता है.)

समझना यह बात, मेरी जान


पांच पंक्तियाँ

- नाज़िम हिकमत

परे जा पाना दिल, सड़कों और किताबों में रखे झूठों से
माँ की लोरियों से
ख़बरों से जिन्हें समाचारवाचक पढ़ता है
समझना यह बात, मेरी जान, कितना आनंदभरा है यह सब

समझना, क्या जा चुका और क्या है अभी आने को.

मोहब्बत करता हूँ तुमसे, जैसे होता है शुक्रिया करना परवरदिगार का


आई लव यू

-नाज़िम हिकमत

तुमसे मोहब्बत करता हूँ
जैसे डबलरोटी में नमक लगाना होता है और खाना उसे
जैसे रात को जागना तेज़ बुख़ार में
और होता है टोंटी पर लगा अपना मुंह लगाये पानी पीना,,
जैसे फड़फड़ाते, ख़ुश होते, शंकाओं से भरे खोलना होता है
डाकिये का लाया भारी पार्सल
जिसके भीतर, कतई नहीं मालूम क्या है
तुमसे मोहब्बत करता हूँ
जैसे हवाई जहाज़ में पहली बार समुन्दर के ऊपर सफ़र करना होता है
जैसे कोई चीज़ खिसकती है मेरे भीतर
जब हौले से अँधेरा घिरता है इस्ताम्बूल में
मोहब्बत करता हूँ तुमसे
जैसे होता है शुक्रिया करना परवरदिगार का कि जी रहे हैं हम.

Thursday, May 1, 2014

हालांकि आप मृत्यु से डरते हैं पर उस पर विश्वास नहीं करते


तुर्की के महाकवि नाज़िम हिकमत १९४८ में यह कविता लिखते समय जेल में थे.

जीने के बारे में

एक.

जीना कोई हंसी खेल नहीं
आपको जीना चाहिये बड़ी संजीदगी के साथ
मसलन किसी गिलहरी की तरह -
मेरा मतलब है जीवन से सुदूर और ऊपर की किसी
चीज़ की तलाश किये बग़ैर,
मेरा मतलब है ज़िन्दा रहना आपका मुकम्मिल काम होना चाहिये.
जीना कोई हंसी खेल नहीं
आपको इसे गंभीरता से लेना चाहिये,
ऐसी और इस हद तक
कि, मिसाल के तौर पर, आपके हाथ बंधे आपकी पीठ पर,
आपकी पीठ दीवाल पर,
या फिर किसी प्रयोगशाला में
अपने सफ़ेद कोट और हिफ़ाज़ती चश्मों में
आप मर सकें लोगों के लिये -
उन लोगों तक के लिये जिनके चेहरे भी आपने कभी नहीं देखे,
गो कि जानते हैं आप
कि जीवन सबसे ज़्यादा वास्तविक, सबसे सुन्दर चीज़ है.
मेरा मतलब है, आपको इतनी संजीदगी से लेना चाहिये जीवन को
कि, उदाहरण के लिये, सत्तर की उम्र में भी आप रोपें जैतून का पौधा -
और यह नहीं कि अपने बच्चों के लिये, बल्कि इसलिये कि
हालांकि आप मृत्यु से डरते हैं
पर उस पर विश्वास नहीं करते
क्योंकि जीवन, मेरा मतलब है, ज़्यादा वज़नदार चीज़ है.

दो.

मान लीजिये हम बहुत बीमार हैं - ऑपरेशन की ज़रूरत है -
जिसका मतलब है कि हो सकता है हम उठ भी न सकें
उस सफ़ेद मेज़ से
गो कि यह असंभव है अफ़सोस महसूस न करना
थोड़ा जल्दी चले जाने के बारे में
हम फिर भी हंसेंगे चुटकुले सुनते हुए,
हम देखेंगे खिड़की के बाहर कि बारिश तो नहीं हो रही,
या चिन्ताकुल प्रतीक्षा करेंगे
ताज़ा समाचार प्रसारण की ...
मान लीजिये हम मोर्चे पर हैं -
लड़ने लायक किसी चीज़ के लिये.
वहां पहले ही हमले में, उसी दिन
हम औंधे गिर सकते हैं मुंह के बल, मुर्दा.
हम जानते होंगे इसे एक अजीब गुस्से के साथ,
फिर भी हम सोचते - सोचते हलकान कर लेंगे ख़ुद को
उस युद्ध के नतीज़े की बाबत जो बरसों चल सकता है.
मान लीजिये हम जेल में हैं
और पचास की उम्र की लपेट में,
और लगाइये कि अभी अठ्ठारह बरस बाक़ी हैं
लौह फ़ाटकों के खुलने में.
हम फिर भी जियेंगे बाहर की दुनिया के साथ,
इसके लोगों, पशुओं, संघर्षों और हवा के -
मेरा मतलब कि दीवारों के पार की दुनिया के साथ
मेरा मतलब, कैसे भी कहीं भी हों हम
हमें यों जीना चाहिये जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं.

तीन.

यह धरती ठण्डी हो जायेगी एक दिन
सितारों में एक सितारा
ऊपर से सबसे नन्हा
नीले मख़मल पर एक सुनहली ज़र्रा -
मेरा मतलब है - यही -हमारी महान पृथ्वी
यह पृथ्वी ठण्डी हो जायेगी एक दिन,
बर्फ़ की सिल्ली की तरह नहीं
मुर्दा बादल की तरह भी नहीं
बल्कि एक खोखले अखरोट की तरह यह लुढ़कती होगी,
घनघोर काले शून्य में ...
अभी इसी वक़्त आपको इसका दुःख मनाना चाहिये
-अभी, इसी वक़्त ज़रूरी है आपके लिये
यह अफ़सोस महसूस करना -
क्योंकि दुनिया को इतना ही प्यार करना ज़रूरी है
अगर आपको कहना है "मैं जिया".

नोट- ये अनुवाद कई वर्ष पहले वीरेन डंगवाल ने किये थे जिन्हें 'पहल' ने पुस्तिका के बतौर १९९४ में छपा था. कबाड़खाने पर ये कवितायेँ पहले कभी लग चुकी हैं.

Wednesday, July 23, 2008

नाज़िम हिकमत की रुबाइयां

नाज़िम हिकमत की कविता कल आपने उन्हीं की आवाज़ में सुनी थी. यह बात बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि नाज़िम ने रुबाइयां भी लिखी थीं. 'पहल' के ७५वें अंक में इन में से चुनिन्दा के वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल डंगवाल द्वारा किए गए अनुवाद प्रकाशित हुए थे. कहीं रूमानी, कहीं विद्रोही, कहीं दार्शनिक - नाज़िम के तमाम स्वरों को इन रचनाओं में सुना जा सकता है.

पहली श्रृंखला

१.

जो दुनिया तुमने देखी रूमी, वो असल थी, न कोई छाया वगैरह
यह सीमाहीन है और अनंत, इसका चितेरा नहीं है कोई अल्लाह वगैरह
और सबसे अच्छी रूबाई जो तुम्हारी धधकती देह ने हमारे लिए छोड़ी
वो तो हरगिज़ नहीं जो कहती है - "सारी आकृतियाँ परछाई हैं" वगैरह

२.

न चूम सकूं, न प्यार कर सकूं, तुम्हारी तस्वीर को
पर मेरे उस शहर में तुम रहती हो रक्त-मांस समेत
और तुम्हारा सुर्ख़ मूं, वो जो मुझे निषिद्ध शहद, तुम्हारी वो बड़ी बड़ी आंखें सचमुच हैं
और बेताब भंवर जैसा तुम्हारा समर्पण, तुम्हारा गोरापन मैं छू तक नहीं सकता !

३.

ये बाग़, ये नम मिट्टी, ये चमेली की ख़ुशबू, ये चांदनी रात
ये तब भी जगमगाएगी जब मैं बीत जाऊंगा रोशनी से
क्योंकि ये मेरे आने से पहले थी और बाद में मेरा हिस्सा न थी -
इस मूल की सिर्फ़ एक प्रतिलिपि मुझमें दिखाई दी.

४.

एक दिन मां कुदरत कहेगी, "अब चलो ...
अब और न हंसी, न आंसू, मेरे बच्चे ..."
और अन्तहीन एक बार और ये शुरू होगी
ज़िन्दगी जो न देखे, न बोले, और न सोचा करे.

दूसरी श्रृंखला

१.

अपना प्याला शराब से भर लो इस से पहले कि तुम्हारा
प्याला भर उठे ख़ाक से, "खैय्याम ने कहा
हड्डही नाक और बग़ैर जूतों वाला आदमी उसे ताका किया
उसके ग़ुलाब बाग़ में;
"सितारों से भी ज़्यादा दुआओं से भरी इस दुनियां में", वो आदमी
बोला, "मैं भूखा मर रहा हूं;
मेरे पास रोटी ख़रीदने तक को पैसा नहीं,
शराब की तो बात छोड़ो."

२.

"ज़िन्दगी बीत रही है, लूट लो वक़्त का वैभव, इसके पहले कि सो जाओ
नींद न टूटने वाली;
भर लो कांच के पैमाने को सुर्ख़ शराब से नौजवान, भोर हुई जग जाओ"
अपने नंगे बर्फ़ीले ठण्डे कमरे में नौजवान उठा सुनकर चीत्कार
फ़ैक्ट्री की सीटी की, जो देरी के लिए माफ़ नहीं करती.

३.

मुझे बीते दिनों की याद नहीं आती
-सिवा गर्मी की वो रात.
और आख़िरी कौंध भी मेरी आंखों की
तुम को बतलाएगी आने वाले दिनों की बात

तीसरी श्रृंखला

या तो लोग तुम्हें प्यार करे हैं, या वो तुम्हारे दुश्मन हैं
या तो तुम यों विस्मृत होते गोया तुम कभी थे ही नहीं
या फिर तुम एक पल के लिए , दिल से बाहर जाते नहीं ...
कांच सा साफ़ सर्दी का एक बेदाग़ दिन
दांत गड़ाना एक स्वस्थ सेब की पुष्ट-गौर देह पर
मेरी जान, यह सांस लेने जैसा सुखदाई है एक बर्फ़ीले
चीड़ वन में यह तुम्हें प्यार करना.

('पहल' से साभार. नाज़िम की अन्य रचनाएं पढ़ने और उनके लिंक देखने के लिए पिछली पोस्ट को देखें.)

Tuesday, July 22, 2008

नाज़िम हिकमत की आवाज़ में 'अखरोट का पेड़'

बीसवीं सदी की विश्वकविता में तुर्की के नाज़िम हिकमत कबाड़ख़ाने के नियमित पाठकों के लिए नया नाम नहीं है. वीरेन डंगवाल द्वारा किए गए उनके कई ऐतिहासिक महत्व के अनुवाद यहां प्रकाशित किये जा चुके हैं. नाज़िम की एक कविता 'अखरोट का पेड़' प्रस्तुत है पहले स्वयं नाज़िम हिकमत की आवाज़ में तुर्की भाषा में, बाद में इसका वीरेन डंगवाल द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद. इसे जेल में लिखा गया था. अपनी दूसरी पत्नी को सम्बोधित यह कविता नाज़िम ने १९५५ में इस्ताम्बूल रेडियो के लिए रिकॉर्ड करवाई थी:



अखरोट का पेड़

मैं एक अखरोट का पेड हूँ गुल्हान पार्क में
न तुम ये बात जानती हो न पुलिस !

मैं एक अखरोट का पेड हूँ गुल्हान पार्क में
मेरी पत्तियां चपल हैं, चपल जैसे पानी में मछलियाँ
मेरी पत्तियां निखालिस हैं, निखालिस जैसे एक रेशमी रूमाल
उठा लो, पोंछो मेरी गुलाब अपनी आंखों में आंसू एक सौ हज़ार

मेरी पत्तियां मेरे हाथ हैं, मेरे हैं एक सौ हज़ार
मैं तुम्हें छूता हूँ एक सौ हज़ार हाथों से, मैं छूता हूँ इस्ताम्बुल को
मेरी पत्तियां मेरी आंखें हैं, मैं देखता हूँ अचरज से
मैं देखता हूँ तुम्हें एक सौ हज़ार आंखों से, मैं देखता हूँ इस्ताम्बुल को

एक हज़ार दिलों की तरह धड़को - धड़को मेरी पत्तियो

मैं एक अखरोट का पेड हूँ गुल्हान पार्क में
न तुम ये बात जानती हो न पुलिस !

*नाज़िम के बारे में जानने के लिए इन पोस्टों को देखें:

९-१० रात्रि की कविताएं: भाग १
जीना एक संगीन मामला है तुम्हें प्यार करने की तरह
आज नाज़िम हिकमत की स्त्री को लगना चाहिये सुन्दर - एक बाग़ी झण्डे की तरह
हमें यों जीना चाहिये जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं

Friday, May 2, 2008

हमें यों जीना चाहिये जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं


बल्गारिया में एक फ़ैक्ट्री के मज़दूरों के समक्ष काव्यपाठ करते नाज़िम हिकमत

नाज़िम हिकमत की ९-१० रात्रि की कविताएं श्रृंखला आप पढ़ चुके हैं। आज पढ़िये तुर्की के इस महान कवि की एक बड़ी कविता 'जीने के बारे में'। १९४८ में यह कविता लिखते समय भी नाज़िम जेल में थे.

जीने के बारे में

एक

जीना कोई हंसी खेल नहीं
आपको जीना चाहिये बड़ी संजीदगी के साथ
मसलन किसी गिलहरी की तरह -
मेरा मतलब है जीवन से सुदूर और ऊपर की किसी
चीज़ की तलाश किये बग़ैर,
मेरा मतलब है ज़िन्दा रहना आपका मुकम्मिल काम होना चाहिये.
जीना कोई हंसी खेल नहीं
आपको इसे गंभीरता से लेना चाहिये,
ऐसी और इस हद तक
कि, मिसाल के तौर पर, आपके हाथ बंधे आपकी पीठ पर,
आपकी पीठ दीवाल पर,
या फिर किसी प्रयोगशाला में
अपने सफ़ेद कोट और हिफ़ाज़ती चश्मों में
आप मर सकें लोगों के लिये -
उन लोगों तक के लिये जिनके चेहरे भी आपने कभी नहीं देखे,
गो कि जानते हैं आप
कि जीवन सबसे ज़्यादा वास्तविक, सबसे सुन्दर चीज़ है.
मेरा मतलब है, आपको इतनी संजीदगी से लेना चाहिये जीवन को
कि, उदाहरण के लिये, सत्तर की उम्र में भी आप रोपें जैतून का पौधा -
और यह नहीं कि अपने बच्चों के लिये, बल्कि इसलिये कि
हालांकि आप मृत्यु से डरते हैं
पर उस पर विश्वास नहीं करते
क्योंकि जीवन, मेरा मतलब है, ज़्यादा वज़नदार चीज़ है.

दो

मान लीजिये हम बहुत बीमार हैं - ऑपरेशन की ज़रूरत है -
जिसका मतलब है कि हो सकता है हम उठ भी न सकें
उस सफ़ेद मेज़ से
गो कि यह असंभव है अफ़सोस महसूस न करना
थोड़ा जल्दी चले जाने के बारे में
हम फिर भी हंसेंगे चुटकुले सुनते हुए,
हम देखेंगे खिड़की के बाहर कि बारिश तो नहीं हो रही,
या चिन्ताकुल प्रतीक्षा करेंगे
ताज़ा समाचार प्रसारण की ...
मान लीजिये हम मोर्चे पर हैं -
लड़ने लायक किसी चीज़ के लिये.
वहां पहले ही हमले में, उसी दिन
हम औंधे गिर सकते हैं मुंह के बल, मुर्दा.
हम जानते होंगे इसे एक अजीब गुस्से के साथ,
फिर भी हम सोचते - सोचते हलकान कर लेंगे ख़ुद को
उस युद्ध के नतीज़े की बाबत जो बरसों चल सकता है.
मान लीजिये हम जेल में हैं
और पचास की उम्र की लपेट में,
और लगाइये कि अभी अठ्ठारह बरस बाक़ी हैं
लौह फ़ाटकों के खुलने में.
हम फिर भी जियेंगे बाहर की दुनिया के साथ,
इसके लोगों, पशुओं, संघर्षों और हवा के -
मेरा मतलब कि दीवारों के पार की दुनिया के साथ
मेरा मतलब, कैसे भी कहीं भी हों हम
हमें यों जीना चाहिये जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं.

तीन

यह धरती ठण्डी हो जायेगी एक दिन
सितारों में एक सितारा
ऊपर से सबसे नन्हा
नीले मख़मल पर एक सुनहली ज़र्रा -
मेरा मतलब है - यही -हमारी महान पृथ्वी
यह पृथ्वी ठण्डी हो जायेगी एक दिन,
बर्फ़ की सिल्ली की तरह नहीं
मुर्दा बादल की तरह भी नहीं
बल्कि एक खोखले अखरोट की तरह यह लुढ़कती होगी,
घनघोर काले शून्य में ...
अभी इसी वक़्त आपको इसका दुःख मनाना चाहिये
-अभी, इसी वक़्त ज़रूरी है आपके लिये
यह अफ़सोस महसूस करना -
क्योंकि दुनिया को इतना ही प्यार करना ज़रूरी है
अगर आपको कहना है "मैं जिया".

सारे अनुवाद: वीरेन डंगवाल (१९९४), 'पहल' पुस्तिका से साभार.

नाज़िम की कुछ कविताएं यहां भी देखें :

http://kabaadkhaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_4781.html

http://kabaadkhaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_28.html

http://kabaadkhaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_27.html

Monday, April 28, 2008

आज नाज़िम हिकमत की स्त्री को लगना चाहिये सुन्दर - एक बाग़ी झण्डे की तरह

नाज़िम और पिराये

नाज़िम हिकमत यदा - कदा चित्रकारी पर भी हाथ आज़माया करते थे. ये रहे जेल में उनके बनाये पिराये के दो पोर्ट्रेट:


'९-१० रात्रि की कविताएं' शीर्षक श्रृंखला का तीसरा और आखिरी हिस्सा प्रस्तुत है. इस श्रृंखला के बारे में जानने हेतु यहां और यहां देखें.

२७ अक्टूबर १९४५

हम हैं एक सेब का आधा हिस्सा,
बाक़ी का आधा है यह पूरी दुनिया.
हम हैं एक सेब का आधा हिस्सा
बाक़ी का आधा हैं हमारे जन.
तुम हो एक सेब का आधा हिस्सा
बाक़ी का आधा हूं मैं,
हम दोनों ...

५ नवम्बर १९४५

भूल जाओ फूलते बादामों को.
वे इस लायक नहीं:
इस धंधे में
याद नहीं करते उसे जिसका लौटना मुमकिन नहीं.
सुखाओ अपने केश धूप में:
भीगे -भारी सुर्ख़ वे चमकें
पके फल की अलसता के साथ ...
मेरी प्रिया, मेरी प्यारी,
मौसम
पतझड़ ...


८ नवम्बर १९४५

मेरे सुदूर शहर की छतों के ऊपर से
मार्मरा सागर की तलहटी से
और पतझड़ लदी धरती के आर पार
तुम्हारी आवाज़ आई
सघन और तरल.
तीन मिनट तक.
फिर फ़ोन काला पड़ गया.


१२ नवम्बर १९४५

दक्षिणी वायु के आख़्रिरी ऊष्म झोंके बहते हैं
गुनगुनाते जैसे रक्त फूटता किसी धमनी से.
मैं सुनता हूं हवा को:
धीमी पड़ गई है नब्ज़.
उलुदाग़ पर्वत पर बर्फ़ है,
और चेरी पहाड़ी के भालू चले गए हैं सोने
पांगर की सुर्ख़ पत्तियों पर गुड़ी मुड़ी और भव्य.
मैदान में कपड़े उतार रहे हैं चिनार.
रेशमी कीड़ों के अण्डे सहेजे जा रहे हैं भीतर सर्दियों के लिये,
पतझड़ अब लगभग ख़त्म है,
धरती डूब रही है अपनी गर्भवती नींद में.
और हम गुज़ारेंगे एक और सर्दी
अपने महान ग़ुस्से में,
अपनी पवित्र आशा की आग तापते हुए ...


१३ नवम्बर १९४५

इस्तांबूल की ग़रीबी - वे बताते हैं - बयान के बाहर है,
भूख ने - वे बताते हैं - रौंद डाला है लोगों को,
टीबी -वे बताते हैं - हर कहीं है.
छोटी बच्चियां इतनी-इतनी - वे बताते हैं -
मण्डराती जली हुई इमारतों, सिनेमाघरों में ...
बुरी ख़बरें आती हैं मेरे सुदूर शहर से
ईमानदार, मेहनती ग़रीब लोगो -
असली इस्तांबूल की -
जो तुम्हारा घर है मेरी प्यारी,
और जिसे ढोता घूमता हूं अपनी पीठ के झोले में
मैं जहां कहीं निर्वासित होऊं जिस किसी जेल में
इस शहर को मैं लिये चलता हूं अपने दिल में
औलाद की मौत के शोक की तरह
वैसे ही जैसे अपनी आंखों में तुम्हारी तस्वीर को ...


४ दिसम्बर १९४५

वही पोशाक निकालो जिसमें पहले पहल देखा था मैंने तुम्हें,
सुन्दरतम सजो,
सजो वसन्त वृक्षों की तरह ...
अपने बालों में लगाओ
वह गुलाबी कार्नेशन फूल जो मैंने भेजा था जेल से
अपने पत्र में तुम्हें,
उठाओ अपना चूमने क़ाबिल रेखा-खिंचा चौड़ा गोरा माथा.
आज नाज़िम हिकमत की स्त्री को लगना चाहिये सुन्दर
- एक बाग़ी झण्डे की तरह.


५ दिसम्बर १९४५

पोत ने लंगर झटक दिया है
ग़ुलाम तोड़ रहे हैं अपनी ज़ंजीरें.
वह बह चली है उत्तर पूर्वा,
पटक कर चूर कर डालेगी वह पेंदे को चट्टानों पर.
यह संसार, यह दस्यु पोत, डूब जायेगा -
जहन्न्म आये चाहे ऊंचे थपेड़े, यह डूब जाएगा.
और हम बनाएंगे एक दुनियां इतनी उम्मीद भरी, स्वतंत्र और खुली
जैसे तुम्हारा माथा, मेरी पिराये ...


६ दिसम्बर १९४५

मेरी प्यारी, वे दुश्मन हैं उम्मीद के
बहते पानी के
और फलदार पेड़ के
विकसित होते खिलते जीवन के.
मौत दाग़ चुकी है उन्हें -
झड़ते दांत, सड़ती खाल -
और जल्द ही मरकर वे हमेशा के लिये ख़त्म हो जाएंगे.
और हां, मेरी प्रिया,
आज़ादी घूमेगी चहुं ओर बाहें झुलाती
अपनी सर्वोत्तम रविवारी पोशाक - मजूर की डांगरी में!
हां इस सुन्दर देश में आज़ादी ...


७ दिसम्बर १९४५

वे दुश्मन हैं रजब, बस्ती के उस बुनकर के
कराबुक, फ़ैक्ट्री के फ़िटर हसन के,
ग़रीब किसान औरत हातिजे के,
दिहाड़ी मज़दूर सुलेमान के
वे तुम्हारे दुश्मन हैं और मेरे
हरेक उस आदमी के जो सोचता है
और यह देश उन लोगों का घर -
मेरी प्यारी वे दुश्मन हैं इस देश के ...

१२ दिसम्बर १९४५


मैदानों के दरख़्त एक आखिरी कोशिश करते हैं चमकने की
चमचमाता सोना
तांबा
कांसा और काठ ...
बैलों के पैर आहिस्ता से धंसते हैं नम धरती पर.
और पहाड़ डूबे हैं कोहरे में;
गहरा, सलेटी, गीला-टपटपाता ...
यानी -
अन्तत: आज पतझड़ पूरी तरह ख़त्म हो जाएगा.
जंगली मुर्ग़ाबियां तड़तड़ाती हुईं गुज़रीं अभी-अभी
शायद इज़निक झील को जातीं.
हवा शीतल है
और महकती है कुछ-कुछ काजल जैसी:
हवा में बर्फ़ की गन्ध है.
इस समय बाहर होना
घोड़े पर सवार हो पहाड़ों की तरफ़ चौकड़ियां मारना ...
तुम कहोगी, "तुम्हें आता ही कहां है घोड़े पर सवारी करना"
पर हंसो नहीं
न जलो:
इधर मैंने एक नई आदत डाल ली है जेल में,
मैं प्रकृति को क़रीब इतना ही प्यार करता हूं जितना तुम्हें.
और तुम दोनों ही बहुत दूर ...

१३ दिसम्बर १९४५

रात बर्फ़ अचानक गिरी.
सुबह थी
सफ़ेद शाखाओं पर विस्फोट करते कौए.
बर्सा के मैदान में जहां तक आंखें देख सकती हैं सर्दियां:
एक अन्तहीन संसार.
मेरी प्यारी, मौसम बदल गया है
कठिम श्रमसाध्य एक लम्बी छलांग में.
और बर्फ़ तले गर्वीला
कर्मठ जीवन
जारी है ...

१४ दिसम्बर १९४५

सत्यानास,
इतनी भयानक ठण्ड पड़ रही है ...
तुम और मेरा सच्चा इस्तांबूल, कौन जाने कैसे हो तुम?
क्या कोयला है तुम्हारे पास?
क्या मुमकिन हो पाया लकड़ियां ख़रीदना?
खिड़कियों में अख़बार मढ़ देना.
ज़रा सो जाया करना जल्दी.
बेचने काबिल तो शायद कुछ भी न बचा हो घर में.
ठण्डा और अधपेट खाकर रहना:
यहां भी हम बहुसंख्यक हैं
दुनियां में, अपने देश में, और अपने शहर में ...


(सभी अनुवाद: वीरेन डंगवाल, 'पहल' पुस्तिका - जनवरी-फ़रवरी १९९४ से साभार)

जीना एक संगीन मामला है तुम्हें प्यार करने की तरह


पिछली पोस्ट में आपने नाज़िम हिकमत की इस कविता श्रृंखला का पहला हिस्सा पढ़ा था. जेल से अपनी पत्नी पिराये को लिखी इन कविताओं में आप नाज़िम के विचारों की सच्ची और उदात्त उड़ान को देख सकते हैं. वह अपनी पत्नी को भी उतना ही प्रेम करता है जितना ईमानदार, मेहनती, भले लोगों को. नाज़िम ने एक जगह लिखा था:

दोस्त-
उन्हें कभी मैंने नहीं देखा है
फिर भी हम एक साथ मरने को उद्यत हैं
एक - सी आज़ादी पर
एक - सी रोटी पर
एक - सी उम्मीद पर

(सभी अनुवाद: वीरेन डंगवाल, 'पहल' पुस्तिका - जनवरी-फ़रवरी १९९४ से साभार)

२० सितम्बर १९४५

इतनी देर गये
पतझड़ की इस रात
मैं भरा हूं तुम्हारे शब्दों से
शब्द
अन्तहीन जैसे समय और पदार्थ
नग्न जैसे आंखें
भारी जैसे हाथ
और चमकीले जैसे सितारे
तुम्हारे शब्द आये
तुम्हारे दिल, देह और दिमाग़ से.
वे तुम्हें लाये:
मां
पत्नी
और दोस्त.
वे थे उदास पीड़ादायी प्रसन्न उम्मीदभरे बहादुर -
तुम्हारे शब्द मानवीय थे ...


२१ सितम्बर १९४५

हमारा बेटा बीमार है
उसका पिता है जेल में
थके हाथों में तुम्हारा भारी सिर
हमारू क़िस्मत है दुनियां की क़िस्मत जैसी ...
लोग लाते हैं अच्छे दिन
हमारा बेटा ठीक हो जाता है
जेल से बाहर आ जाता है उसका पिता
तुम्हारी सुनहली आंखें मुस्कुराती हैं:
हमारी क़िस्मत है दुनियां की क़िस्मत जैसी.

२२ सितम्बर १९४५

मैं एक किताब पढ़ता हूं
तुम हो उनमें
मैं एक गीत सुनता हूं
तुम हो उनमें
मैं रोटी खाता हूं
तुम मेरे सामने बैठी हो;
मैं काम करता हूं
और तुम बैठी देखती हो मुझे.
तुम जो हो हर कहीं मेरी 'सदा विद्यमान'
मैं तुम से बात नहीं कर सकता,
हम एक दूसरे की आवाज़ें नहीं सुन सकते:
तुम हो मेरी आठ साला विधवा ...


२३ सितम्बर १९४५

वह क्या कर रही होगी अभी
ठीक अभी, इसी पल?
क्या वह घर में है? या बाहर?
क्या वह काम कर रही है? लेटी है? या खड़ी है?
शायद उसने अभी-अभी उठाई अपनी बांह -
वाह, ऐसे में कैसे उसकी गोरी गदबदी कलाई उघड़ जाती है!
वह क्या कर रही होगी अभी?
ठीक अभी? इसी पल?
शायद वह थपथपा रही है
गोद में एक बिल्ली का बच्चा.
या शायद वह टहल रही है, रखने को ही एक कदम -
वे प्यारे पांव जो ले आते हैं उसे सीधे मुझ तक
मेरे इन अन्धेरे दिनों में -
और वह किस चीज़ के बारे में सोच रही है -
मेरे?
उफ़ मुझे नहीं मालूम
गली क्यों नहीं ये सेमें?
या शायद
क्यों ज़्यादातर लोग हैं इतने नाख़ुश?
वह क्या कर रही होगी अभी?
ठीक अभी? इसी पल?

२४ सितम्बर १९४५

सबसे सुन्दर समुद्र
अभी तक लांघा नहीं गया.
सबसे सुन्दर बच्चा
अभी बड़ा नहीं हुआ.
हमारे सब से सुन्दर दिन
अभी देखे नहीं हमने.
और सबसे सुन्दर शब्द जो मैं तुमसे कहना चाहता था
अभी कहे नहीं मैंने ...

२५ सितम्बर १९४५

नौ बजे.
गजर बजा शहर के चौराहे पर
किसी भी क्षण बन्द हो जाएंगे वार्ड के दरवाज़े.
इस बार कुछ ज़्यादा ही लम्बी खिंची जेल:
... आठ साल.
जीना उम्मीद का मामला है मेरी प्यारी.
जीना
एक संगीन मामला है
तुम्हें प्यार करने की तरह

२६ सितम्बर १९४५

उन्होंने हमें पकड़ लिया,
उन्होंने हमें तालाबन्द किया:
मुझे दीवारों के भीतर,
तुम्हें बाहर.
मगर यह कुछ नहीं.
सबसे बुरा होता है
जब लोग - जाने - अनजाने -
अपने भीतर क़ैद्ख़ाने लिये चलते हैं ...
ज़्यादातर लोग ऐसा करने को मजबूर हुए हैं,
ईमानदार, मेहनती, भले लोग
जो उतना ही प्यार करने लायक हैं
जितना मैं तुम्हें करता हूं ...

३० सितम्बर १९४५

तुम्हारे बारे में सोचना सुन्दर है
और उम्मीद भरा
जैसे सुनना दुनिया की सबसे बढ़िया आवाज़ को
गाना सबसे प्यारा गीत.
मगर उम्मीद काफ़ी नहीं मेरे लिये:
मैं अब सिर्फ़ सुनते ही नहीं रहना चाहता,
मैं गाना चाहता हूं गीत ...

६ अक्टूबर १९४५

बादल गुज़रते हैं लदे हुए ख़बरों से.
मैं मसलता हूं वह ख़त हाथों में जो आया ही नहीं.
मेरा दिल है मेरी पलकों की कोरों पर.
असीसता पृथ्वी को जो विलीन होती जाती दूरी में.
मैं पुकार डालना चाहता हूं - "पि रा ये !
पि रा ये !"