Tuesday, February 15, 2011

मेरी ख्वाहिश है कि मैं हो जाता अँधेरे में एक कंदील


विश्व कविता के प्रेमियों के लिए फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश ( १३ मार्च १९४१ - ०९ अगस्त २००८ )  कोई अपरिचित - अनचीन्हा नाम नहीं है। हिन्दी पढ़ने - पढ़ाने वालों की दुनिया में उन्हें खूब अनूदित किया गया है और खूब पढ़ा गया है / खूब पढ़ा जाता रहेगा। नेरुदा, लोर्का , नाजिम हिकमत की तरह उन्हें चाहने वालों की कतार कभी छोटी नहीं होगी।  आइए आज देखते - पढ़ते हैं उनकी एक प्रसिद्ध कविता : 'दूसरों के बारे में सोचो'।



महमूद दरवेश की कविता

दूसरों के बारे में सोचो
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

जब तुम तैयार कर रहे होते हो अपना नाश्ता
दूसरों के बारे में सोचो
( भूल मत जाना कबूतरों को दाने डालना )

जब तुम लड़ रहे होते हो अपने युद्ध
दूसरों के बारे में सोचो
( मत भूलो उनके बारे में जो चाहते हैं शान्ति )

जब तुम चुकता कर रहे होते हो पानी का बिल
दूसरों के बारे में सोचो
( उनके बारे में जो टकटकी लगाए ताक रहे हैं मेघों को )

जब तुम जा रहे होते हो अपने घर की तरफ
दूसरों के बारे में सोचो
(उन्हें मत भूल जाओ जो तंबुओं - छोलदारियों में कर रहे हैं निवास)

जब तुम सोते समय गिन रहे होते हो ग्रह - नक्षत्र - तारकदल
दूसरों के बारे में सोचो
( यहाँ वे भी हैं जिनके पास नहीं है सिर छिपाने की जगह )

जब तुम रूपकों से स्वयं को कर रहे होते हो विमुक्त
दूसरों के बारे में सोचो
( उनके बारे में जिनसे छीन लिया गया है बोलने का अधिकार )

जब तुम सोच रहे हो दूरस्थ दूसरों के बारे में
अपने बारे में सोचो
( कहो : मेरी ख्वाहिश है कि मैं हो जाता अँधेरे में एक कंदील)

Monday, February 14, 2011

न गँवाओ नावके-नीमकश, दिले-रेज़ा रेज़ा गँवा दिया

तुम जो ठहर जाओ तो ये रात, महताब
ये सब्ज़ा, ये गुलाब और हम दोनों के ख़्वाब
सब के सब ऐसे मुबहम हों कि हक़ीक़त हो जायें
*
आज फरवरी माह की चौदहवीं तिथि  को जब तमाम दुनिया  प्रेम दिवस को अपने - अपने तरीके से  'सेलिब्रेट' करने में व्यस्त है तब  शायरी और मौसीकी के समुद्र में अवगाहन - स्नान करते हुए  अपने  भीतर की कोमलता को टच करने या  दुनिया के शबो - रोज में होते तमाशे  को देखते , उसका हिस्सा बनते, उससे रीझते खीझते,उस पर पड़ गई धूल को झाड़ते - पोँछते  आज  (एक बार फिर) फ़ैज़ की शायरी का आनंद लेते हैं। याद है यह वही शायर है जिसने कहा था कि 'और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा' और यह भी कि 'तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है '। कहने की बात नहीं है कि फ़ैज़ के यहाँ प्रेम दुनिया -ए- फानी से पलायन नहीं बल्कि इसी दुनिया को सुंदर दुनिया बनाने व इसकी सुंदरता को बिगड़ने से बचाने के प्रयत्न / प्रेरणा  का  सहचर है। और क्या कहा जाय .. तो आइए सुनते है फ़ैज़ की शायरी.. स्वर है उस्ताद मेंहदी हसन साहब का...




गँवाओ नावके-नीमकश, दिल-ए-रेज़ा रेज़ा गँवा दिया.          
जो बचे हैं संग समेट लो, तने-दाग़ दाग़ लुटा दिया.


मेरे चारागर को नवेद हो, सफ़े-दुश्मनाँ को ख़बर करो
जो वो क़र्ज़ रखते थे जान पर, वो हिसाब आज चुका दिया.

करो कज जबीं पे सरे-कफ़न, मेरे क़ातिलों को गुमाँ न हो
कि ग़ुरूरे-इश्क़ का बाँकपन, पसे-मर्ग हमने भुला दिया.

उधर एक हर्फ़ कि कुश्तनी, यहाँ लाख उज़्र था गुफ़्तनी .
जो कहा तो सुन के उड़ा दिया, जो लिखा तो पढ़ के मिटा दिया.

जो रुके तो कोहे-गराँ थे हम, जो चले तो जाँ से गुज़र गये
रहे-यार हमने क़दम क़दम, तुझे यादगार बना दिया.

Sunday, February 13, 2011

फै़ज : आज तुम याद बेहिसाब आए


* जन्मशती पर फ़ैज अहमद फ़ैज़ को याद करते हुए उनकी कविता के साए में बड़ी हुई  पीढ़ी तथा   देश - दुनिया के प्रति संवेदनशीलता व समझदारी हासिल करने वालों की तरफ से स्मरण :



 / स्वर : रूना लैला

*
आए कुछ अब्र कुछ शराब आए ।
उसके बाद आए जो अज़ाब आए।

बाम-ए-मीना से महताब उतरे
दस्त-ए-साकी में आफ़ताब आए।

हर रग-ए-ख़ूँ में फिर चरागाँ हो
सामने फिर वो बेनक़ाब आए।

कर रहा था ग़मे-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आए।

ना गई तेरे ग़म  की सरदारी
दिल में यूं रोज इनकिलाब आए।

इस तरह अपनी खामोशी गूँजी
गोया हर सिम्त से जवाब आए।

‘फ़ैज़’ थी राह सर-बसर मंज़िल
हम जहाँ पहुँचे क़ामयाब आए।

Saturday, February 12, 2011

सहस स्वाद सो पावै एक कौर जो खाइ

आजकल शादी - ब्याह का सीजन है। बीच - बीच में दावत भी हो जाती है।  बड़े  शहरों  - महानगरों  और धुर अन्चीन्हे इलाकों की शादियों की दावतों की तो खबर नहीं लेकिन जहाँ अपना कयाम - मुकाम है वहाँ की शादियों में खाना अक्सर एक जैसा ही  लगता है - देखने में भी और खाने में भी। ऐसे में हिन्दी कविता की समृद्ध परंपरा के सर्वाधिक प्रसिद्ध महाकाव्यों में से एक 'पद्मावत' ( मलिक मोहम्मद जायसी ) के 'रत्नसेन-पद्मावती-विवाह-खंड' में वर्णित शाही भोज की याद हो आती है। यह एक तरह से हमारे विलोपित होते पाकशास्त्रीय परंपरा व उत्तरोत्तर परिवर्तित स्वाद की विरासत की ऐतिहासिक यात्रा  है .. आइए देखते हैं .



पाँति पाँति सब बैठे, भाँति भाँति जेवनार ।
कनक-पत्र दोनन्ह तर, कनक-पत्र पनवार ॥

पहिले भात परोसे आना । जनहुँ सुबास कपूर बसाना ॥
झालर माँडे आए पोई । देखत उजर पाग जस धोई ॥
लुचुई और सोहारी धरी । एक तौ ताती औ सुठि कोंवरी ॥
खँडरा बचका औ डुभकौरी । बरी एकोतर सौ, कोहड़ौरी ॥
पुनि सँघाने आए बसाधे । दूध दही के मुरंडा बाँधे ॥
औ छप्पन परकार जो आए । नहिं अस देख, न कबहूँ खाए ॥
पुनि जाउरि पछियाउरि आई । घिरति खाँड़ कै बनी मिठाई ॥

जेंवत अधिक सुबासित, मुँह मँह परत बिलाइ ।
सहस स्वाद सो पावै , एक कौर जो खाइ ॥

Thursday, February 10, 2011

लचके है ज़र्द जामा में खूबां की जो कमर

यह पोस्ट एक्सक्लूसिवली हमारे एक बहुमूल्य और सुधी पाठक जनाब एबीसीडी (असल नाम से तार्रुफ़ नहीं है) की डिमांड को नज्र है. सही है पिछले बरस मैंने बसंत के समय बाबा नज़ीर अकबराबादी की बसंत से सम्बंधित एकाधिक रचनाएँ आपको पढवाई थीं पर इस बरस कुछ और ही तरह के हालात पैदा होने की वजह से ऐसा कुछ न कर सका. उम्मीद करता हूँ मार्च के महीने से मैं यहाँ अपने इस अड्डे पर ज्यादा सक्रिय हो सकूंगा.

फ़िलहाल नज़ीर



आने को आज धूम इधर है बसंत की
कुछ तुमको मेरी जान ख़बर है बसंत की.

होते हैं जिससे ज़र्द ज़मीं-ओ-ज़मां तमाम
ऐ महर तलअतो वह सहर है बसंत की.

लचके है ज़र्द जामा में खूबां की जो कमर
उसकी कमर नहीं वह कमर है बसंत की.

जोड़ा बसंती तुमको सुहाता नहीं ज़रा
मेरी नज़र में है वह नज़र है बसंत की.

आता है यार तेरा वह हो के बसंत रू
तुझ को भी कुछ "नज़ीर" ख़बर है बसंत की.

Tuesday, February 8, 2011

चित्रों में झांकता जैसलमेर

"घोड़ा कीजे काठ का, पिंड कीजे पाषाण
बख्तर कीजे लोह का, तब देखो जैसाण."
जो जैसलमेर आना चाहे उसके पास ऐसा घोड़ा हो जो थके नहीं (सिर्फ काठ का निर्जीव ही ऐसा हो सकता है), उसका शरीर पत्थर का हो,उस पर उसने लोहे का बख्तर पहन रखा हो तभी वो जैसलमेर पहुँच सकता है.
जैसलमेर के दुर्गम्य होने की बातें हमेशा कही जाती रही है.कुछ साल पहले तक सरकारी महकमे में जैसलमेर- बाड़मेर ट्रान्सफर का मतलब काले पानी जाना होता था. सरकारी तबादले में जैसलमेर जाने के लिए 'जा-साले-मर !' कहना चलन में रहा है.पर सारी बातें अब पुरानी और बासी हो चुकी है.लोग आज भी चाहे वहां ट्रान्सफर लेना पसंद न करते हों,घूमने के लिहाज से एक कम्प्लीट पैकेज है जैसलमेर.
तो लीजिये साहेबान,पेश है जैसलमेर की कुछ छंटेल फोटुएं.



Sunday, February 6, 2011

कविता समय





आगामी 25-26 फरवरी को ग्वालियर में  दख़ल विचार मंच तथा प्रतिलिपि पत्रिका के सहयोग से समकालीन कविता पर केन्द्रित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘कविता समय’ का आयोजन  पड़ाव स्थित कला वीथिका में  किया जा रहा है। कविता का यूटोपिया और संकटविषय पर केन्द्रित इस आयोजन में देश भर के कवि तथा आलोचक हिस्सा लेंगे। देश भर में अपनी तरह के इस अनूठे दो दिवसीय आयोजन में नामवर सिंह, अशोक बाजपेयी, ज्ञानेन्द्रपति, आलोक धन्वा, वीरेन डंगवाल, अरुण कमल, नरेश अग्रवाल, राजेश जोशी, असद जैदी, कुमार अंबुज, लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप, बोधिसत्व, जितेन्द्र श्रीवास्तव,  गिरिराज किराडू, पंकज राग, गीत चतुर्वेदी सहित चालीस से अधिक कवि तथा आलोचक हिस्सेदारी करेंगे। इस दौरान न केवल समकालीन कविता की चुनौतियों तथा संकटों पर गहन विचार विमर्श होगा अपितु 25 से अधिक कवियों का विभिन्न सत्रों के काव्यपाठ भी होगा। ज्ञातव्य है कि ग्वालियर से शुरु हो रही यह शृंखला प्रतिवर्ष अलग-अलग शहरों में आयोजित होगी।

इस आयोजन के दौरान शहर के युवा कलाकारों के लिये कविता पोस्टर की एक कार्यशाला जाने-माने कलाकार विनय अम्बर (जबलपुर) तथा पंकज दीक्षित (अशोकनगर) के निर्देशन में संपन्न होगी तथा इन कलाकारों की कविता पोस्टर प्रदर्शनियाँ भी लगाई जायेंगी। इसके अलावा शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली तथा प्रतिलिपि प्रकाशन, जयपुर अपनी पुस्तकों की प्रदर्शनियाँ भी लगायेंगे और जयपुर के जाने-माने युवा पेंटर तथा कवि अमित कल्ला कविता आधारित पेंटिग्स का प्रदर्शन भी करेंगे। 

दो जिप्सी गीत


'वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सौलिट्यूड' में बुएंदिया खानदान के प्रथमपुरुष होसे अर्कादियो बुएंदिया की एक जिप्सी 'मेल्कियादस' से दोस्ती का ख़ूब ज़िक्र हुआ है. इस महा आख्यान में इस चमत्कारी जिप्सी की मातृभाषा संस्कृत बताई गयी है, जो उसके या उसके पूर्वजों के मूल देश की तरफ एक संकेत है.
दुनिया के कोने कोने में बसे जिप्सी भले ही संस्कृत न बोलते हो पर शारीरिक बाह्याकृति के साथ साथ भाषाई आधार पर भी इन संगीतप्रेमी घुमक्कड़ों को भारतीय मूल का ही माना गया है. इनके बारे में एक अन्य पर बेहद महत्त्वपूर्ण पहलु ये है कि ये इतिहास के सर्वाधिक उत्पीड़ित समूहों में से एक हैं.
इन्हीं जिप्सियों बारे में भिक्षु चमनलाल की पुस्तक 'जिप्सी- भारत की विस्मृत संतति' (अनुवाद-डॉ.सत्यपाल रूहेला) में कुछ जिप्सी गीतों को भी संकलित किया गया है.इन्हीं कुछ में से दो गीत आपके लिए. इसी पुस्तक से साभार.

चिडियाँ और तारे

"मुझे बताओ, बूढ़े मित्र, यदि तुम बता सको
स्वर्ग में सितारों के लिए रोमानी क्या है?"
"हाँ, मेरे स्वामी, हम सितारों को शिरकी कहते हैं
और यह शब्द 'चिरीकल्स' या चिड़ियों से बना है
क्योंकि चिडियाँ और सितारे प्रकृति में समान है
सितारे स्वर्ग में प्रकाशपक्षी ही हैं
जो सदैव हमारे सिरों से ऊपर उड़ते रहते हैं
आर्डन पक्षी जो केवल अँधेरे में ही उड़ते हैं
और- चाँद स्वर्ग का स्वामी है
जो हर रात को अवश्य आता है
चारागाहों पर अपने मुर्गी के बच्चों को दाना खिलाने के लिए".

सर्वाधिक सुंदरी

"ओह, तुम यह कैसे जानती हो, मेरी पुत्री, कि तुम्हारा चेहरा सुन्दर है?"
"अवश्य, अवश्य, ऐसा ही है, मेरी माँ."
"लेकिन देखो, यहाँ घर में तो एक भी आइना नहीं है,
तुम यह कैसे जानती हो, मेरी पुत्री?"
"ओह,सड़क के ऊपर और नीचे, गोरे और भूरे लोग
कहते हैं कि कस्बे भर में मेरे जैसी सुंदरी दूसरी नहीं है."
"वे कैसे तुमसे बात करते हैं? जल्दी उत्तर दो,
और कोई झूठ न बोलना, मेरी पुत्री,
क्या वे गोर्सियो हैं या पुरानी रोमानी बोलते हैं?"
"ओह, उन्हें एक भी शब्द बोलने की ज़रूरत नहीं हैं, मेरी माँ,
उन्हें तो बस एक मृदु मुस्कान चाहिए
और मुझे यह समझते देर नहीं लगती,
कि मेरी जैसी सुंदरी देश भर में नहीं है."

(Image courtesy-Wikimedia)

Saturday, February 5, 2011

चाइल्डलाइक इनोसेंस

छटी क्लास में नये दोस्त बने थे कुछ , तो उनमें से एक था सुनील | सुनील अव्वल दर्जे का चोर था | वो घर से पैसे चुराकर लाता था, और हमें कुछ कुछ खिलाकर स्टाइल मारता था | मुझे भी उसकी संगति में मजा आने लगा था | हालांकि वो मुझे ज्यादा भाव नहीं देता था, लेकिन फिर भी अहसान सा करके मुझे भी अपने गिरोह में रहने की इजाजत दे देता था | घर में पैसों की बचत पर बहुत ध्यान दिया जाता था, इसलिए सुनील के साथ चोकोबार आइसक्रीम पहली बार खाई , वीडिओगेम पार्लर में खेला, और विद्या मन्दिर जैसे स्कूल से बंक मारा | एक दिन घर लाने वाली गाड़ी छूट गयी, पैदल घर पहुँचा तो बहुत देर हो गयी थी | माँ ने खाना खिलाया, और सिर्फ इतना पूछा कि इतनी देर क्यूँ हो गयी | मैं रो पड़ा, रोते रोते मैंने सब बताया कि सुनील घर से पैसे चुराकर लाता है, सबको खिलाता है और मैं भी उसके साथ खाता हूँ | माँ ने कुछ नहीं कहा, मैं रोता रहा और गुस्सा होता रहा | उसके बाद मैं कभी सुनील के साथ नहीं गया, जिसको लेकर अगले तीन सालों तक शाम को घर आते समय वे लोग हमेशा मुझसे लड़ते थे | मैं जितना लड़ सकता था, लड़ता रहा | सच की लड़ाई लड़ने की ऐसी कोई महान प्रेरणा मेरे अन्दर नहीं जागी थी, या थोपी नहीं गयी थी | न माँ ने मुझे मारा था, न सजा दी थी | न ही माँ ने फिर कभी मुझसे पूछा कि तू अब भी सुनील के साथ जाता है क्या? ये मेरे अन्दर ही कोई चीज़ थी , जिसने मुझे ये अहसास करा दिया था कि ये गलत है | इसी को मैं चाइल्डलाइक इनोसेंस कहता हूँ | सजा कभी कोई भी चीज़ सही नहीं कर सकती , सजा सिर्फ तुम्हारे मन में उस चीज को लेकर डर पैदा कर सकती है, लेकिन सही गलत का फर्क नहीं समझा सकती | चाइल्डलाइक इनोसेंस हम सबके अन्दर होती है , कहीं न कहीं हमारे अन्दर दस्तक देती भी होगी | अरबों खरबों को बेहद छोटी संख्या बना देने वाले नेताओं को भी रात को अचानक उठकर गला सूखता सा महसूस होता होगा | इटालियन मार्बल के फर्श पर चलते हुए शायद उनके अवचेतन मस्तिष्क में कहीं न कहीं ये बात आती होगी कि खैरु या मंगरू या उनका कोई बच्चा या कोई भी बच गया होता अगर ... | या कि बिहार का पूरा का पूरा गाँव शिक्षित होता अगर ये करोड़ों की कारें हमने अपनी मेहनत से कमाई होती | या कि भूस्खलन और दैवीय आपदाएं शायद उतनी विनाशक नहीं होती, जितनी हमने बना दीं हैं | जिस विश्वास और भरोसे के साथ हमने देश को चलाने के लिए एक किताब छापी थी , जिसका एक एक पन्ना हमसे गीता-कुरआन की तरह पवित्र मानने की उम्मीद की गयी थी, काश हमने माना होता | गढ़वाल में राजा को बोलंदा बदरी (बोलने वाले बद्रीविशाल, भगवान) कहा जाता था | वैसा ही कुछ विश्वास हमें मिलोर्ड पर भी होता है , आज भी है, न्याय की गद्दी पर बैठने वाला कभी गलत नहीं कर सकता | ये चाइल्डलाइक इनोसेंस हर एक को उनकी नींद से जगाये, उनका गला सुखाये , उन्हें शर्म आये, यही उम्मीद है ... 



Thursday, February 3, 2011

गब्बर सिंह का चरित्र चित्रण

अभी अभी मेल पर मुझे यह प्राप्त हुआ है , तो आप लोग भी आनन्द लें




1. सादा जीवन, उच्च विचार: उसके जीने का ढंग बड़ा सरल था. पुराने और मैले कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी, महीनों से जंग खाते दांत और पहाड़ों पर खानाबदोश जीवन. जैसे मध्यकालीन भारत का फकीर हो. जीवन में अपने लक्ष्य की ओर इतना समर्पित कि ऐशो-आराम और विलासिता के लिए एक पल की भी फुर्सत नहीं. और विचारों में उत्कृष्टता के क्या कहने! 'जो डर गया, सो मर गया' जैसे संवादों से उसने जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला था.

२. दयालु प्रवृत्ति: ठाकुर ने उसे अपने हाथों से पकड़ा था. इसलिए उसने ठाकुर के सिर्फ हाथों को सज़ा दी. अगर वो चाहता तो गर्दन भी काट सकता था. पर उसके ममतापूर्ण और करुणामय ह्रदय ने उसे ऐसा करने से रोक दिया.


3. नृत्य-संगीत का शौकीन: 'महबूबा ओये महबूबा' गीत के समय उसके कलाकार ह्रदय का परिचय मिलता है. अन्य डाकुओं की तरह उसका ह्रदय शुष्क नहीं था. वह जीवन में नृत्य-संगीत एवंकला के महत्त्व को समझता था. बसन्ती को पकड़ने के बाद उसके मन का नृत्यप्रेमी फिर से जाग उठा था. उसने बसन्ती के अन्दर छुपी नर्तकी को एक पल में पहचान लिया था. गौरतलब यह कि कला के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने का वह कोई अवसर नहीं छोड़ता था.


4. अनुशासनप्रिय नायक: जब कालिया और उसके दोस्त अपने प्रोजेक्ट से नाकाम होकर लौटे तो उसने कतई ढीलाई नहीं बरती. अनुशासन के प्रति अपने अगाध समर्पण को दर्शाते हुए उसने उन्हें तुरंत सज़ा दी.

5. हास्य-रस का प्रेमी: उसमें गज़ब का सेन्स ऑफ ह्यूमर था. कालिया और उसके दो दोस्तों को मारने से पहले उसने उन तीनों को खूब हंसाया था. ताकि वो हंसते-हंसते दुनिया को अलविदा कह सकें. वह आधुनिक युग का 'लाफिंग बुद्धा' था.


6. नारी के प्रति सम्मान: बसन्ती जैसी सुन्दर नारी का अपहरण करने के बाद उसने उससे एक नृत्य का निवेदन किया. आज-कल का खलनायक होता तो शायद कुछ और करता.


7. भिक्षुक जीवन: उसने हिन्दू धर्म और महात्मा बुद्ध द्वारा दिखाए गए भिक्षुक जीवन के रास्ते को अपनाया था. रामपुर और अन्य गाँवों से उसे जो भी सूखा-कच्चा अनाज मिलता था, वो उसी से अपनी गुजर-बसर करता था. सोना, चांदी, बिरयानी या चिकन मलाई टिक्का की उसने कभी इच्छा ज़ाहिर नहीं की.


8. सामाजिक कार्य: डकैती के पेशे के अलावा वो छोटे बच्चों को सुलाने का भी काम करता था. सैकड़ों माताएं उसका नाम लेती थीं ताकि बच्चे बिना कलह किए सो जाएं. सरकार ने उसपर 50,000 रुपयों का इनाम घोषित कर रखा था. उस युग में 'कौन बनेगा करोड़पति' ना होने के बावजूद लोगों को रातों-रात अमीर बनाने का गब्बर का यह सच्चा प्रयास था.


9. महानायकों का निर्माता: अगर गब्बर नहीं होता तो जय और वीरू जैसे लुच्चे-लफंगे छोटी-मोटी चोरियां करते हुए स्वर्ग सिधार जाते. पर यह गब्बर के व्यक्तित्व का प्रताप था कि उन लफंगों में भी महानायक बनने की क्षमता जागी.

Wednesday, February 2, 2011

ओ रे नील दोरिया.....

कुछ दिन पहले एक दोस्त ने इस गाने का लिंक भेजा. बांग्ला समझ पाने की डींग हांकने के बावजूद पूर्वी बंगाल की बांग्ला पूरी तरह समझ तो नहीं पाया, लेकिन स्वर और संगीत ने मानों कलेजा बींध दिया..विशेषकर शुरुआत में गायिका की धीमी पुकार ने सरोबार कर दिया. आप सब को सुनाने का लोभ संवरण नहीं कर पाया. 'अर्नब एंड फ्रेंड्स' के बारे में कुछ नहीं जानता सिवाय इसके कि एक बांग्लादेशी बैंड है.. इनके कुछ और गाने यहाँ सुन सकते हैं.
(विडियो यूट्यूब से लिया गया है)