Wednesday, September 7, 2011

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - 4

(पिछली पोस्ट से जारी)

1930-31 में जब हिंदुस्तानी फ़िल्मों में साउंड ट्रैक आया, उसके साथ ही इंसान की आवाज़ और भाषा का प्रयोग हुआ। मूक सिनेमा में लिमिटेसन्स थीं। चित्र के मतलब नहीं निकलते थे। इसलिए कहानी को समझाने के लिए बारबार लिखे हुए शब्दों का इंटरल्यूड परदे पर दिखाया जाता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि एक आदमी स्क्रीन के एक और खड़ा होकर शब्दों में कहानी बताता। जैसे कि जीते-जागते इंसान को भाषा से अलग नहीं किया जा सकता, जब तक बोलते-गाते इंसान फ़िल्मों में नहीं आए, तब तक फ़िल्म इंसान के बारे में थी ही नहीं।

हिंदुस्तान एक खेतिहर देश है जिसमें ज़िंदा रहने के लिए गीत एक बहुत बड़ा ज़रिया है। लोकगीत में पुरानी पीढ़ी की विज़्डम डालकर नयी पीढ़ी तक पहुँचाई गई ताकि नयी पीढ़ी अपने बुजु़र्गों के तजुर्बे का फ़ायदा उठाये और उनकी याद भी ताज़ा रखे। सिनेमा अवाम का माध्यम है इसलिए उसमें शास्त्रीय संगीत उचित नहीं था। हिंदुस्तान का लोक संगीत ही फ़िल्म का आधार बना। सिनेमा मे गीत का उपयोग कैसे होना है, संगीतकार आर सी बोराल, मास्टर गु़लाम हैदर, केशव भोले, पंकज मलिक, तिमिर बारान, अनिल विश्वास इन लोगों ने इसका जवाब निकाला। वह यह कि फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ाने का ज़रिया बनाया जाए। आज भी सबसे सफल गीत वे हैं, जब उन्हें क्रमबद्ध ढंग से रखा जाए तो सारी कहानी ख़ुद-ब-ख़ुद पता लग जाती है। गीत को किस सिचुएशन में आना चाहिए, इसका जवाब है जिसमें जज़्बा इतना बढ़े कि डाॅयलाग से काम न बनता हो, तो गीत लगाया जाए। कहानी में ऐसी सिचुएशन आती है जहाँ न तो तस्वीर और न संवाद काम करते हैं, वहाँ गीत उसे पूरा करता है। गीत कहानी को गहराई देता है। अच्छा डाइरेक्टर और संगीतकार वही है जो कहानी में गीत को पैबंद की तरह नहीं, ऐसे बुने कि वह अलग न दिखाई दे।

भाई ने एक बात और बताई कि फ़िल्मी गीत के साथ ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटोग्राफ़ी को रंगीन बनाने का मंसूबा संगीतकारों ने ही निकाला। वह था आरकेस्ट्रा। हमारे देशी संगीत में इतने वाद्य नहीं थे कि गीत को इंद्रधनुषी रंग दे सकते। पहले तो, उन्होंने पश्चिमी संगीत से वह साज़ लिये जो हमारे वाद्यों के स्वरों से मिलते-जुलते थे। जैसे, सरोद की जगह गिटार, वीणा की जगह स्लाइडिंग गिटार, बाँसुरी की जगह धातु का फ़्लूट, सारंगी की जगह वायलिन, हारमोनियम की जगह पियानो और एकोर्डियन, शहनाई की जगह ओबो और आवाज़ की जगह सेक्सोफ़ोन का इस्तेमाल किया। इन वाद्यों को अकेले बजाया जा सकता था और गीतों को रंगीन करने के लिए आरकेस्ट्रा की ज़रूरत थी। लेकिन आरकेस्ट्रा नोटेशन के बग़ैर काम में नहीं लाया जा सकता। इसलिए कलाकारों को पश्चिमी संगीत का एल्फ़ाबेट सीखना पड़ा। 1952 में जब महबूब ख़ान की रंगीन फ़िल्म आन नोवल्टी सिनेमा में दिखायी गई तो भाई ने कहा, ‘आज हिंदुस्तानी फ़िल्म भद्दी हो गई। अच्छे गाने होते हुए टेक्नीकलर की ज़रूरत नहीं थी।’

दिल में छुपाके प्यार का तूफ़ान ले चले
आज हम अपनी मौत का सामान ले चले ...
मिटता है कौन देखिए उल्फ़त की राह में


उन्होंने कहा फ़िल्म को बाज़ारू कर दिया है। वह फ़िल्म आधी छोड़कर रीगल में हम लोग फ़िल्म देखने गए और शहर में ढिंढोरा पीट दिया कि हम लोग फ़िल्म आन से बेहतर है। लेकिन सच यह है कि मेरे भाई के अलावा फ़िल्म कोई छह लोगों ने ही देखी थी।

चली जा चली जा
आहों की दुनिया
यहाँ कोई नहीं अपना न घर अपना न दर अपना।


मेरे भाई उन गिने-चुने लोगों में थे जिनकी बातों में इतना दम था कि वह कभी भूलती नहीं थीं। भाई के साथ यह सफ़र चालीस साल पहले की बात है। लेकिन लगता है, सब कुछ कल ही हुआ है। रवींद्रनाथ टैगोर के बारे में सिर्फ़ यह मालूम था कि उन्होंने बिना दरो-दीवार का स्कूल बनाया है। भाई की यह बातें सुनकर मैं यह सोचने लगा कि जिस स्कूल में मैं जाता हूँ वह तो जेल है और मेरे भाई ने चलती हुई बस को स्कूल बना दिया जिसमें मनोरंजन के साथ हम सीख भी रहे थे। वह अध्यापक थे और मैं उनका छात्र।
भाई ने बताया कि हर विदेशी वाद्य को अपने संगीत में अपनाने से पहले उसकी परीक्षा ली गई। क्या इन साज़ों में से वे बारीक स्वर निकाले जा सकते हैं जो हमारे संगीत को अभिव्यक्त कर सकें? उन्होंने कहा, बहुत से पढ़े-लिखे लोग फ़िल्मी गीत के आर्केस्ट्रा को पश्चिम का कटा-पिटा मिलावटी आरकेस्ट्रा समझते हैं। 1940 के दशक में ही हमारे संगीतकारों ने आर्केस्ट्रा का हिंदुस्तानीकरण कर लिया था। उसे अपना बना लिया था। इसकी जो दो मिसालें उन्होंने मुझे दीं वह आज भी याद है। उन्होंने अपने पार्कर पेन मुझे दिखाया और कहा, यह है विलायती लेकिन इससे मैं उर्दू लिख सकता हूँ, हिंदी लिख सकता हूँ, मैं जो भी चाहूँ लिख सकता हूँ। दूसरी मिसाल उस संगीतकार से जुड़ी है जिसके गाने की खोज में हम यह सफ़र कर रहे हैं। सज्जाद हुसैन इटली के मैंडोलिन में माहिर थे। हालाँकि मैंडोलिन में मींड नहीं है लेकिन उनमे यह क़ाबलियत थी कि वह मैंडोलिन के तार में से आधा, चैथाई स्वर निकाल कर हिंदुस्तानी संगीत दे रहे हैं।

यह कहते हुए उन्होंने थोड़ा-सा विषय बदला। अरे भाई, अगर हमने तुम्हें यह इंप्रेशन दिया है कि मोरोगोरो में हमें वह गाना सुनने को मिल जाएगा जिसे हम ढूँढ़ रहे हैं, हो सकता है नाकाम हो जाएँ। जिन्होंने अपना रिकार्ड संभाल कर रखा हुआ है वह हमें इतनी आसानी से क्यों सुनाएगा? उस समय उन्होंने वह बात कही जो मुझे आज भी याद है और आगे भी रहेगी कि हो सकता है, ख़ुदा ने इंसान को इसलिए बनाया है ताकि हमें इस बात का इल्म हो कि रूह को बचाने के लिए उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ती है।

(जारी)

Tuesday, September 6, 2011

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - 3

(पिछली पोस्ट से जारी)

फ़िल्म गीत है क्या? एक बार पूछने पर उन्होंने कहा था फ़िल्मी गीत धुन के लिफ़ाफ़े में एक पुराना पैग़ाम है जो हमारे पुरखों ने हम तक पहुँचाया है ताकि हम अपने को बेहतर बनायें। यह समझाते हुए उन्होंने आवारा फ़िल्म का ‘दम भर जो उधर मुँह फेरे ओ चंदा’ गीत लिए कहा, ‘ये धार्मिक, मज़हबी गाना है जिसमें राधा और हरि यानी कृष्ण की बातचीत हो रही है। राधा चाँद से, जो कि बलराम है, दरख़्वास्त कर रही है कि यदि वह कुछ देर के लिए बादलों की ओट में हो जाएं तो वह कृष्ण से प्यार का इज़हार कर ले।’

दम भर जो उधर मुँह फेरे ओ चंदा

उन्होंने कहा, राजकपूर - एक इंसान - के लिए ये संभावना है कि वह हरि के रूप में आए।

मैं चोर हूँ काम है मेरा चोरी

क्योंकि हरि माखन चोर थे। वह माखन चुराकर अपनी सौतेली माँ के प्यार का इम्तहान लेते थे। इस गीत में वह हीरोइन से साफ़ कह रहे हैं कि मैं तो चोर हूँ, क्या तब भी मैं प्यार के क़ाबिल हूँ? जिसका जवाब है, बेशक। गाने का अर्थ यही है कि हम दुनिया में एक दूसरे की मोहब्बत के लिए आए हैं। यदि ख़ुदा को प्रेम की ज़रूरत नहीं होती तो वह भी हमें नहीं बनाता। हम जब ईमानदारी से एक-दूसरे से प्यार करते हैं, तो हम भी ख़ुदा के क़रीब आ जाते हैं। यही है फ़िल्म आवारा का पैग़ाम। ये फ़िल्म देखने के दूसरे ही दिन मेरे भाई मोंबासा गए और वहाँ के सलीम रोड के दर्ज़ी से सफ़ेेद गैबर्डीन का कोट और काला वूल ट्राउज़र सिलवाया। उसके साथ सिल्क का मफ़लर पहने सिगरेट पीते उमस भरी गर्मी में चले आ रहे थे राजकपूर की तरह, लेकिन टांगा में।

मैं चोर हूँ, काम है मेरा चोरी, दुनिया में हूँ बदनाम
दिल चुराता आया हूँ मैं, ये ही मेरा काम।


सेकिंड क्लास के डिब्बे में जो हिंदुस्तानियों के लिए था दो घंटे में साठ मील का सफ़र करके हम कोरोग्वे पहुँचे। ये रेलगाड़ी और बसों का जंक्शन था। पंगानी नदी के तट पर बसा ये छोटा सा शहर है। जब भी नदी में बाढ़ आती, तो लोगों के घरों और दूकानों को बहा ले जाती। नदी में बड़े-बड़े मगरमच्छ थे। इस शहर में हमारे बड़े मामू रहते थे। जब भी उनके घर जाते, खाने को आलू का बढ़िया पराँठा मिलता। लेकिन इस बार हम उनके घर नहीं गए। भाई साहब ने समझाया मामू दादा फ़ाल्के की फ़िल्म हरिश्चंद्र के ज़माने के हैं। साइलेंट फ़िल्मों के समय के। फ़िल्म संगीत का रस उन्हें नहीं मालूम। अगर हमने उन्हें बताया कि हम एक फ़िल्मी गीत सुनने के लिए इतनी दूर जा रहे हैं तो वह हमें मोरोगोरो से आगे डोडोमा भेज देंगे। वहाँ टांगानिका का सबसे बड़ा पागलख़ाना था जहाँ से कोई भी लौटकर नहीं आता। भाई ने मुझसे वादा ले लिया था कि इस सफ़र का ज़िक्र कभी किसी से नहीं करोगे। इस राज़ ने हमारे बीच एक नया रिश्ता क़ायम किया।

रेलवे स्टेशन से हम शहर में बस का पता लगाने के लिए करीम भाई के टी रूम में गए। वह भाई के दोस्त थे, ख़ुशी से मिले और बताया कि शहर में निराला फ़िल्म लगी हुई है। फ़िल्म आधी ही है, अभी सिर्फ़ दो रीलें आई हैं, बाक़ी रास्ते में है।

चाय पीते हुए वह मधुबाला के बारे में बात करने लगे। करीम भाई ने बताया, मधुबाला की खू़बसूरती ढलते दिन में, सूरज की आखि़री किरण के समान हैं। चूंकि इंसान किरण को वक़्त से बचा नहीं सकता, इससे इंसान की नाकामी का अंदाज़ा मिलता है। मेरे भाई साहब को फ़लसफ़ा नज़र आया। एक अच्छी बात का अच्छे शब्दों में जबाब देना, वह अपना फ़र्ज़ समझते थे। भाई अय्यूब ने कहा, निराला फ़िल्म के गीत ‘महफ़िल में जल उठी शमा परवाने के लिए’, इसमें जो मद्धम-मद्धम क्लेरेनेट बजता है, वह साज़ की आवाज़ नहीं, बुझते चिराग़ की आह है। सी रामचंद्र ने तीन मिनट में गाना नहीं जादू दिखाया है:

महफ़िल में जल उठी शमा परवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में मर जाने के लिए


करीम भाई ने सी रामचंद्र के बारे में सुनते ही उनके सामने चाय का एक और कप रख दिया और कहने लगे, वह बहुत निराश हैं। सरकार शहर को ऊँचाई वाले इलाक़े में नये सिरे से बसाना चाहती है। जब पूछा इसमें ख़राबी क्या है, कहने लगे, ‘इस नदी और इसके सारे जीव-जंतुओं के साथ हमारा बचपन से नाता है। हम एक दूसरे के संगी साथी हैं। जब बाढ़ आती है तो नदी हमारी मेहमान होती है। नदी और इंसान को अलग-अलग करने से पता नहीं क्या-क्या खराबियां आएंगी।’ उनकी सोच हमें बड़ी अनोखी लगी। आसमान की तरफ देखा तो काले बादल लश्कर की तरह बढ़ते चले आ रहे थे। कोरोग्वे और मोरोगोरो का 170 मील का कच्चा रास्ता है जो बारिश में दलदल में बदल जाता है। उस ज़माने में यह बहुत लंबा सफ़र था, लेकिन संगीतकार सज्जाद हुसैन के गाने सुनने के लिए हम दोनों भाई किसी भी आँधी, तूफान का सामना करने के लिए तैयार थे क्योंकि यह गारंटी नहीं थी कि फिर कभी ये गीत सुनने को मिले या न मिले।

जब हम बस स्टेशन पहँुचे और ड्राइवर से पूछा सफ़र कब शुरू होगा, तो वह कहने लगा, ‘ये मोंबासा नहीं है और न ये समुंदरी जहाज़। ये बस बंबई नहीं जा रही है। ये जा रही है मोरोगोरो। शायद आप ग़लत रास्ते पर हैं।’ मेरे भाई ने कहा, ‘हम मोरोगोरो ही जा रहे हैं। बंबई से और भी दूर।’ ये सुनकर ड्राइवर सीटी में गीत गाने लगा:

मेरे दिल की घड़ी करे टिक-टिक
ओ बजे रात के बारह,
हाय तेरी याद ने मारा।


वह कहने लगा, ये है अफ्ऱीक़़ा। ये उस घड़ी पर नहीं चलता जिस पर आप चल रहे हैं। बस उस वक़्त चलेगी जब मेरी मर्ज़ी होगी। भाई ने कहा, ये है सच्चाई। अफ्ऱीक़़ी घड़ी में मिनट की सूई है ही नहीं। सिर्फ घंटे की सूई है। फिर वह गंभीर हो गए। कहने लगे, ‘ये बग़ावत है, अफ्ऱीक़़़ी विलायती घड़ी पर इसलिए नहीं चलता क्योंकि वह घड़ी उसके दास होने का प्रतीक है। इसलिए वह विलायती घड़ी को नहीं मानता। दोपहर दो बजे की बस में हम कोरोग्वे से आगे रवाना हुए। बस में फ़स्ट, सैकंड या थर्ड क्लास का कोई अंतर नहीं था। बस में इंसान, बकरियाँ, मुर्गि़याँ, छोटे, बड़े, बूढ़े सभी एक ही थे। चार पहियों पर एक गाँव साथ चला जा रहा था।

कोरोग्वे से मोरोगोरो तक - हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीत का मुखड़ा

हम शहरी अफ्ऱीक़़ा से देहाती अफ्ऱीक़़ा जा रहे थे। उस इलाक़े में जहाँ हिंदुस्तानियों की फ़©लादी लकीरें नहीं थी। हालाँकि हमारा जन्म अफ्ऱीक़़ा में ही हुआ, देहात हमारे लिए अजनबी जगह थी। ऐसी बियाबान जगह में हमें हिंदुस्तानी ख़यालों के सहारे की ज़रूरत और भी महसूस हो रही थी। हल्की बारिश ने रास्ते को कोरा काग़ज़ बना दिया था जिस पर बस कभी दो, कभी चार लकीरें बनाती आगे चली जा रही थी। मैंने भाई से पूछा, ‘हिंदुस्तानी संगीत है क्या? कहाँ से आया है?’ उन्होंने बताया, ‘यह संगीत उसी सरगम से बना है जिससे क्लासिकल और फ़ोक बना है। सरगम संगीत का एल्फ़ाबेट है।’ जब मुझे यह समझ में नहीं आया तो उन्होंने मुझे एक केला खिलाया और कहा इसका स्वाद है, ‘स’। इसके बाद बस के हर पड़ाव पर मुझे अलग-अलग स्वाद के केले खिलाए और हम ‘स’ से ‘नि’ तक पहुँच गए। एक केले और दूसरे केले के बीच जो अंतर समय और जगह का था, उन्होंने कहा ये है श्रुति। पश्चिमी संगीत की भी सरगम है। हमारी सरगम और उनकी सरगम में बहुत अंतर नहीं है, लेकिन श्रुति का उपयोग हमारे संगीत में बहुत अलग है। ‘हमारा गीत सुरों के इतने छोटे-छोटे हिस्सों में बँटा होता है कि हमें पता ही नहीं लगता कि हम एक स्वर से दूसरे स्वर पर कब पहुँच गए। स्वर नदी के पानी या कहें हवा की तरह आगे बढ़ जाता है। वेस्ट की घड़ी अटक-अटक कर चलती है इसीलिए एक स्वर से दूसरे स्वर की दूरी हमें साफ महसूस होती है। लेकिन हमारे संगीत में घड़ी लगातार एक ही रफ़्तार पर चलती है।’ हमारे संगीत में ऐसा क्यों है तो वह कहने लगे, ‘नेचर में वक़्त भी ऐसे ही चलता है, हमारा संगीत ये सिखाता है। यदि तुम जागे हुए नहीं हो तो तुम्हें पता नहीं लगेगा कि समय कब गुज़र गया और ये बहुत ख़तरनाक हो सकता है।’

उन्होंने कहा, जब बीसवीं सदी में हिंदुस्तान का इतिहास लिखा जाएगा, फ़िल्मी संगीत की ईजाद को इंडिया की एक इंक़लाबी कला का दर्जा मिलेगा। उनको इस बात का पूरा भरोसा था कि आर सी बोराल, पंकज मलिक, मास्टर ग़ुलाम हैदर, अनिल विश्वास, सी. रामचंद्र, नौशाद और सज्जाद हुसैन इनको एक दिन वही दर्जा मिलेगा जो तानसेन, बैजू बावरा, अमीर ख़ुसरो और स्वामी हरिदास का है। फ़िल्म में साउंड टेक्नोलाॅजी आने से पहले मूक सिनेमा था। आर सी बोराल जैसे संगीतकार साउंड आने से पहले लाइव आरकेस्ट्रा, जैसे आपेरा में होता है, स्क्रीन के पास बैठ के बजाते थे और यह संगीत फ़िल्म में जान डाल देता था। वर्ना सिर्फ़ तस्वीरें भूत जैसी लगती थी। हमारे लोक संगीत ने उसमें इंसानियत डाली। उनका विचार था, सही फ़िल्म संगीत रवींद्रनाथ टैगोर, नज़रुल इस्लाम, उत्तर प्रदेश के कोठों और नौटंकी से आया है। इसमें छोटे, बड़े सबका योगदान है। सिनेमा सामान्य लोगों के लिए है। इसमें शास्त्रीय संगीत नहीं चलता। रवींद्रनाथ टैगोर के लिए भी शास्त्रीय संगीत का उस्ताद रखा गया था। लेकिन उन्होंने तो सीखने से ही इंकार कर दिया। जब वह इंगलैंड गए तो उन्हें वहाँ का इंग्लिश और आयरिश सादा गीत बहुत पसंद आया। नज़रुल इस्लाम ने भी बंगाली लोक संगीत से प्रभावित होकर सादी कविता जिसे लोग समझ सकंे, सरल धुन में बाँधी जो कोई भी गुनगुना सके। उन्होंने कहा रवींद्र और नज़रुल ने फ़िल्म के लिए गीत तैयार नहीं किये, लेकिन हमारे संगीतकारों ने उनसे प्रेरणा ली कि अच्छे संदेश वाली कविता को सीधी-सादी सुंदर धुन में पिरोया जा सकता है जिससे लोगों को केवल आनंद ही नहीं कुछ सीखने को भी मिले। होशियार के लिए इशारा ही काफ़ी होता है। रवींद्रनाथ टैगोर और नज़रुल इस्लाम के गीतों से प्रेरणा लेकर हमारे संगीतकारों ने अपने गीत सजाए और फ़िल्म संगीत को इतिहास बना दिया। इसमें कोई शक नहीं कि सिनेमा एक टेक्नोलाॅजी है जिससे हिंदुस्तान की तस्वीर बनाई जा सकती थी। लेकिन फ़िल्म संगीत के बिना यह हिंदुस्तानी नहीं हो सकती थी। फ़िल्म संगीत ने इसे देशी बनाया। पुरानों धागों से नया कपड़ा बुना गया। मैंने उनसे पूछा, ‘फिर क्यों पढ़े-लिखे लोग हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत को घटिया समझते हैं?’ उनका जवाब था, ‘हर पढ़ा-लिखा आदमी अक़्लमंद नहीं होता। जो इस संगीत को घटिया कहते हैं, वे इस संगीत के बारे में नहीं अपने बारे में बता रहे होते हैं।’

(जारी)

Saturday, September 3, 2011

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - २

(पिछली पोस्ट से जारी)

साउथ एशिया की आज़ादी

हिंदुस्तान की आज़ादी ज़लज़ले की तरह आई जिसने हज़ारों मासूम लोगों को निगल लिया. हमारे यहाँ सियासी मामलों पर बात नहीं होती थी. लेकिन हिंदुस्तान के टुकड़े होने की बात चलती तो अय्यूब के चेहरे पर काले बादल छा जाते. वह कहते जिस इतिहास ने मास्टर ग़ुलाम हैदर, नूरजहाँ, खुर्शीद अनवर, फ़ीरोज़ निज़ामी, ए आर चिश्ती और रफ़ीक़ ग़ज़नवी को हिंदुस्तान से अलग कर दिया, उसमें कोई अच्छाई नहीं हो सकती. वह कहते हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत की मिठास हमेशा के लिए कम हो गई है और कम रहेगी.


साउथ एशिया की आज़ादी की ख़बर 1949 में उस दिन आई जब शहीद फ़िल्म का दो पार्ट का मार्चिंग गीत ‘वतन की राह में वतन के नौजवाँ शहीद हो’ आया. ये गाना सुनकर मेरे भाई कहने लगे, ‘लगता है वहाँ कुछ हुआ है.’ ये गीत मास्टर ग़ुलाम हैदर ने कंपोज़ किया था. हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत के वे पायोनियर संगीत निर्देशक थे जो नूरजहाँ, शमशाद बेगम, सुरेन्द्र कौर और लता मंगेशकर को फ़िल्मों में लाए. ये गीत बनाने के बाद हौसला हार कर वे पाकिस्तान चले गए. जब शहीद फ़िल्म अफ़रीक़ा में आई तो ब्रिटिश सरकार ने उसे बैन कर दिया.


भाई अय्यूब उन नौजवानों में थे, जिन्होंने थियेटर के बाहर हंगामा किया. नतीजा ये हुआ कि फ़िल्म को सेंसर कर दिखाया गया. उसमें से तिरंगा फहराने वाला दृश्य काट लिया गया. ये फ़िल्म देखने के बाद हमारे शहर के हर नौजवान की हेयर स्टाइल बदल गई थी. थोड़े ही वक़्त बाद पाकिस्तान से ख़बर आई कि ग़ुलाम हैदर चल बसे. मेरे भाई ने रात अफ़सोस में मैख़ाने में गुज़ारी.

गाँधी, नेहरू और जिन्ना से क्या हुआ, भाई की उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी. उन्हें तो कलाकारों के बिछड़ने का ग़म था. उनकी फ़ेवरेट फ़िल्म राजकपूर की आग थी. वह बड़ी ख़ुशी से मुझे दिखाने के लिए ले गए थे. फ़िल्म में हीरो का चेहरा आधा जल जाता है और वह बदसूरत हो जाता है. उन्होंने कहा, "यह फ़िल्म हीरो - हीरोइन की नहीं, एक मुल्क की कहानी है":


जिंदा हूँ इस तरह कि ज़िंदगी नहीं
जलता हुआ दिया हूँ, मगर रोशनी नहीं.



"ये हीरो कोई नहीं वह हिंदुस्तान है जो पार्टिशन में आधा जल गया." हर फ़िल्म, हर गीत उनके लिए एक किताब थी. वह उनमें हर तरह से उनका सियासी अर्थ समझने की कोशिश करते. जुगनू फ़िल्म का मशहूर गीत, ‘यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई सिवा क्या है’ इसे वे रोमांटिक गीत नहीं सियासी गीत मानते थे. उनका कहना था, कौन किससे बेवफ़ा हुआ ये निर्भर करता है, कौन बॉर्डर के किस तरफ़ है:

यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है
इसी का नाम दुनिया है.



एक हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीत की खोज के सफ़र की इब्तिदा

1953 में मेरे भाई अय्यूब टांगा से क़रीब 80 मील दूर टांगा-मोशी रेलवे लाइन पर एक साइसेल स्टेट में काम करने चले गए. साइसेल अफ़रीक़ा अफ़रीक़ा का जूट था. उससे रस्सी और बोरियाँ बनाई जाती थीं. ये व्यापार ही उस इलाके की रोज़ी रोटी का ज़रिया था. हर काम साइसेल की फ़सल से जुड़ा हुआ था. अप्रैल में बारिश का महीना शुरू ही हुआ था. मैं उस समय करीम जी सैकेंडरी स्कूल में आठवीं क्लास में पढ़ता था. घर में हिसाब के टीचर मास्टर दया भाई के डंडों के डर से पाइथोगोरस की थियोरम बारबार दोहरा रहा था. लेकिन फिर भी याद नहीं हो रही थी. मास्टर दया भाई के जगत में बहुत कुछ था पर दया का नामोनिशाँ नहीं था. उसी समय भाई अय्यूब आए. घर में अचानक हलचल-सी मच गई. हम सब अपनी अपनी परेशानियाँ भूल गए. उन्होंने मुझसे कहा, ‘कल हम सफ़र पर चलेंगे.’ उन्होंने बताया, ‘मोरोगोरो शहर में, एक हाजी के घर में ”कोई प्रेम का देकर संदेशा“ गाना है, बहुत मुश्किल से हमने बात बनाई है कि हम वहाँ जाकर गीत सुन सकते हैं.’ उन्होंने कहा, ‘यह सिनेमा संगीत की बात है, थियोरम की नहीं. वह तो तुम कल भी याद कर लोगे. अब या तो इतिहास से जुड़ जाओ या स्कूल जाओ. मास्टर जी को चिट्ठी मैं लिख दूँगा कि शादी ब्याह का मामला है, तुम्हें बाहर जाकर रहना पड़ रहा है.’ मेरे लिए ईद के दिन दिवाली हो गई. उसी रात तैयारी की. पोटली लेकर सुबह-सुबह हम दोनों ट्रेन पर चढ़ गए. आगे बढ़ती जा रही ट्रेन के दोनों ओर काजू के पेड़ों पर परिंदे मंडरा रहे थे. मुझे ऐसा लगा, ये भी काजू की ख़ू़बसूरती को एप्रीसिएट कर रहे हैं. एक के बाद एक स्टेट आते रहे. वे क़ब्रिस्तान आते रहे जिनमें हिंदुस्तान के वे सैनिक दबे थे जिनकी किसी को याद नहीं.

पढ़े फ़ातिहा कोई आए क्यों, कोई चार फूल चढ़ाये क्यों
कोई लाके शम‘अ जलाए क्यों, मैं वो बेकसी की मज़ार हूँ ...

जो उजड़ गया वो दयार हूँ.


मेरे भाई समझाने लगे, "साइसेल को साइसेल न समझो. यह वह धागा है जिससे हमारी ज़िंदगी पिरी हुई है, अगर यह टूट गया तो हम बिखर जाएंगे."

उस जगह से बहुत दूर, कोरिया की जंग हो रही थी. उससे साइसेल की क़ीमत बहुत बढ़ गई. इसे सोने का धागा कहा जाने लगा. भाई कहते जब तक जंग चलेगी, हमारी ज़िंदगी का कारोबार भी अच्छा रहेगा. लड़ाई में कौन अपाहिज हुआ और कौन मर रहा था, इसकी उन्हें कोई फ़िक्र नहीं थी. उनको इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि पड़ोस के कीनिया में माउमाउ ग़दर के साथ वहाँ आज़ादी का आंदोलन शुरू हो गया है. जब वह बात कर रहे होते, तो फ़िल्मफेयर पर उनकी निगाह होती जिसमें उनके लिए सही ज़िंदगी थी. जानूवाला की दूकान से फ़िल्मफ़ेयर उन्होंने ख़रीदा था जो उसमें कुछ सिलवटें थीं. बारबार वह उन्हें निकालने की कोशिश कर रहे थे और जानूवाला को भला-बुरा कहते जाते कि वह फ़िल्म मैगज़ीन की इज़्ज़त नहीं करता. हर पन्ने की सिलवट जानूवाला के जु़ल्म का सबूत था. पहला फ़िल्मफेयर एवार्ड बैजू बावरा के संगीतकार नौशाद को फ़िल्म के मशहूर गीत ‘तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा’ के लिए मिला.


अकेले मत जाइयो, राधे जमुना के तीर ...
ओ जी ओ, तू गंगा की मौज, मैं जमुना का धारा.


मेरे भाई को गहरा अफ़सोस था. वह कहते, "बेशक बैजू बावरा के गाने बढ़िया हैं. रागों में हैं, लेकिन ये इनाम सी रामचंद्र को अनारकली के लिए मिलना चाहिए था. उस संगीतकार को जिसने आना मेरी जान, मेरी जान संडे के संडे गीत बनाकर जैज़ संगीत के दीपक से हमारे संगीत को उजला किया." आखि़र उन्होंने कहा, "जिंदगी और इंसाफ़ का कोई तालमेल नहीं. हमारे जीने का मक़सद यही है कि हम एक दूसरे को ताक़त दें कि वह ज़िंदगी की बेइंसाफ़ी समझ सके."


गुज़रती हुई ट्रेन के बाहर उड़ते हुए बादलों की छाया दौड़ रही थी. उन्होंने कहा, "काश हमारे साथ कोई कैमरामेन होता, एक ऐसा सीन बनाते जिसमें हीरो बादलों के पीछे भाग रहा है, इस तरह जैसे इंसान वक्त को पकड़ने की कोशिश में.... हाँ, इससे भी बेहतर सीन हो सकता है, बादल इंसान के पीछे भाग रहा है, वक़्त की तरह और उसे अपने शिकंजे में ले रहा है." इस सोच पर वह खूब हँसे कि भई ज़िंदगी भी क्या चीज़ है.


हमारे बुज़ुर्ग यह भी कहते, मेरे भाई की कहानी चार लफ़्जों में लिखी जा सकती है - सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब. मेरे भाई कहते, सिगरेट उनके अकेलेपन की साथी है. शराब थोड़ी देर के लिए गुनाहों से राहत दिलाती है और सिनेमा की कहानी ज़िंदगी को समझने में मदद करती है. सिगरेट पीना उन्होंने हॉलीवुड के अभिनेता हम्फ़्री बोगार्ट से सीखा था. उन्हें बोगार्ट इसलिए पसंद था कि वह कहते बोगार्ट के चेहरे में दो पैग़ाम हैं. एक तो यह कि ज़िंदगी का रिटर्न टिकट नहीं है, और दूसरा कि जिंदगी एक बेइलाज रोग है. वह बारबार उनकी फ़िल्में यह देखने के लिए जाते कि दोनों में से किस पैग़ाम में ज्यादा सच्चाई है. बोगार्ट को लोग प्यार से बोगी कहते थे. चालीस के दशक में उन्होंने हम्फ़्री बोगार्ट की मशहूर फ़िल्म कैसाब्लान्का देखी जो उनकी ज़िंदगी में दोहराती रही. कैसाब्लान्का में बोगी ने रिक का रोल अदा किया था. एक आदमी उससे पूछता है, भई तुम सहारा में क्यों आए हो? जबाब था, पानी ढूंढ़ने आए हैं. भाई कहते यह डायलॉग तो हॉलीवुड ने प्लेजराइज़ किया है. ये ख़याल तो इंडिया से आया है. ऐसी सोच तो हिंदुस्तान के लोगों में होती है. उसके बाद तो जब कभी सफ़र पर जाते तो, तो जब भी कोई उनसे पूछता आप कहाँ गए थे, तो उनका जबाब होता पानी ढूंढ़ने.

हालाँकि वह भाई थे, मुझे उनकी शक्ल आज भी साफ नज़र नहीं आती क्योंकि उनकी आधी शक्ल तो सिगरेट के धुएँ से ढँकी रहती थी. घुआँ उनके चेहरे तक पहुँचने में रोशनी का इम्तिहान लेता. हम्फ़्री बोगार्ट की जो भी फ़िल्म टांगा के मैजेस्टिक सिनेमा में आई, वह घायल हुई. वह फ़िल्म को अपने अफ़्रीकी दोस्त उम्टो के साथ देखते थे. अगर कोई सीन पसंद आ जाता तो उम्टो उसे वहीं रोक लेता, तो फ़िल्म जल जाती और वह हिस्सा काटकर, अनवर स्टूडियो ले जाते और बोगी के सिगरेट के अंदाज़ की फ़ोटो खिंचवाते. अनवर का उनसे वादा रहता कि वह किसी ओर की ऐसी तस्वीर नहीं लेंगे. बाद में हम्फ़्री बोगार्ट द अफ़्रीकन क्वीन बनाने के लिए अफ़्रीका आए. भाई को ज़िंदगी भर अफ़सोस रहा कि ज़ायर में जहाँ वह फ़िल्म बनी थी, वह जा नहीं सके.


शराब उन्होंने पी. सी. बरुआ की फ़िल्म देवदास से सीखी जिसके नायक के एल सहगल थे. शराब के साथ वह गाना भी गाते. उन्हें हमेशा गिला रहा कि सहगल अफ़्रीका नहीं आए. बाद में जब अय्यूब की जिंदगी के बात उठती तो बुजु़र्ग कहते, बचपन में वह मोंबासा में देवदास देखकर आया था, तो फ़िल्म को उसने हाथ की लकीर बना लिया. लोग उन्हें टांगा का सहगल कहते. ‘लाई हयात आई क़ज़ा, ले चले ले चले.अपनी ख़ुशी न आए, न अपनी खु़शी चले’ (ज़ौक) उनकी पसंदीदा ग़ज़ल थी. इसमें उन्होंने ज़िंदगी का अर्थ ढूँढ़ा.


वह बताते कि फ्रांस की अस्तित्ववाद की फ़िलासोफ़ी इसी गीत में से चुराई गई है. जो फ़्रांस के लिए नयी बात थी वह हिंदुस्तान में कब से चली आ रही थी. एक दिन मैंने पूछा, यह अस्तित्ववाद है क्या? तो उन्होंने मुझे यूनान के हीरो सिसिफ़स के बारे में बताया जब उसने यूनानी ख़ुदा ज़ूस से मुकाबला किया तो ज़ूस ने उसे यह सज़ा दी कि वह एक बहुत भारी पत्थर पहाड़ पर ले जाऐ. लेकिन पत्थर ऊपर ले जाने पर नीचे लुढ़क जाता. वह ज़िंदगी भर पत्थर ढोता रहा. मैंने उनसे पूछा जू़स ने सिसिफ़स को यह सज़ा क्यों दी? तो उन्होंने समझाया यूनान का ख़ुदा ज़ूस आसमान का ख़ुदा नहीं ज़मीनी ख़ुदा था. ऐसा जिसमें इंसानी कपट भी होता है. हुआ यह कि ज़ूस को नदी के देवता की बेटी से प्यार हो गया. उसे मालूम था कि लड़की का पिता उसे लड़की कभी नहीं देगा. तो ज़ूस ने उसे चुरा लिया. मैंने उनसे पूछा. सिसिफ़स ने ज़ूस का मुक़ाबला क्यों किया. उन्होंने कहा सिसिफ़स के दिल में एक इंसान का दिल धड़क रहा था. उसे एक बाप की पीड़ा सही माप था. लेकिन सिसिफ़स ने इसे सज़ा समझा ही नहीं. उसने यह समझ लिया कि यही जिंदगी है. इसे तो करना ही है. फिर शिकायत कैसी? सिसिफ़स ने सज़ा को अपनी आज़ादी का मंसूबा बना लिया. फ़्रांस के दार्शनिक आल्बेयर कामू के अस्तित्ववाद का अर्थ उन्होंने मुझे इस तरह समझाया था.

भाई साहब बड़ी किताबें नहीं पढ़ते थे. वह कहते बड़ी किताबें मुल्लाओं, पंडितों के लिए हैं, ऊँचे लोगों के लिए हैं. उनका माध्यम था, तस्वीरों वाली पत्रिकाएँ जो आम लोग पढ़ते हैं - लाइफ़, टाइम, लुक, इलस्ट्रेटेड वीकली आफ़ इंडिया, फ़िल्मफेयर, फ़िल्म इंडिया इत्यादि. यही उनका साहित्य था. हिंदुस्तानी फ़िल्म मैगज़ीन को वह सबसे ऊँचा दर्जा देते थे. जब कभी उनके दोस्त मिलने आते तो वे उन्हें मैगज़ीन देते हुए कहते ये है वक़्त, ये है ज़िंदगी और ये ठहरी झलक, अब ख़ुद फ़ैसला कर लो. उनकी नज़र में हिंदुस्तान की बोलती, गाती, नाचती फ़िल्म दुनिया की कलाओं में सबसे ऊँची थी. वह इसलिए कि कैमरा ज़िंदगी के हर पहलू तक नहीं पहुँच सकता. यह बात हिंदुस्तान के फ़िल्म बनाने वालों ने अच्छी तरह समझ ली थी. जो चीज़ें फ़िल्म में दिखाई नहीं देतीं उन्हें फ़िल्म में कैसे लाया जाए, यह अहम मुद्दा फ़िल्म डाइरेक्टरों ने हल किया. गीत फ़िल्म में वह पार्ट अदा करता है जो कैमरा नहीं दिखा सकता, वह है जज़्बात. ऐसी फ़िल्म में हर कला एक दूसरी कला से जुड़कर एक मुकम्मल पैग़ाम देती है, जो हिंदुस्तान की संगीत के उसूलों पर है. देवदास का एक गीत भाई को बहुत पसंद था: ‘बालम आय बसो मोरे मन में’. वह कहते यह गीत इतना खू़बसूरत है कि म्यूज़ियम में तस्वीर की तरह टाँगना चाहिए. यह गीत न तो बोलों में है और न ही स्वरों में. स्वरों के बीच जो मौन है, उसमें सहगल की जाती हुई रूह की आवाज़ है. बारबार गीत बजाकर सरोद के काले स्वरों के बीच-बीच में पूछते, कुछ सुनाई पड़ रहा है? जब मैं कहता यह तो साइलेंस है, तो वह कहते तुम बहरे हो. वह मानते थे कि फ़िल्म फ़ानी है, गीत अमर है.

बालम आय बसो मोरे मन में.


(जारी)

Friday, September 2, 2011

एक मुकम्मल नदी जो हम चूक गए


दो कविताएं कुछ दिन बह कर गुम हो गई एक नदी के लिए


एक नदी जिसे हम पीना चाहते हैं

हमें चाहिए
एक नदी
उस मे कूद जाने लिए

एक नदी
उस में तैरने के लिए

एक नदी
उस मे डूब जाने लिए !

एक नदी हम सोचें
अपने आकाश
और उस की सूखती हवा के लिए

एक नदी हम खोजें
अपनी धरती
और उस की तपती मिट्टी के लिए

एक नदी हम पोसें
अपनी ज़िन्दगी
और उस मे गायब हरियाली के लिए


हमे चाहिए
एक नदी
एक मुश्त
अभी
इस चिलचिलाते समय मे

कि पीते रहें उसे किश्तों में
ता उम्र
आहिस्ता , आहिस्ता !

जुलाई/ 4, 2008




हम चूक गए कितनी ही नदियाँ

एक नदी हमारे भीतर रहती है
जिस की कोई आवाज़ नही
हमारे अंत: करण को धो डालती है
बिना हमें बताए

एक नदी आस पास बहती है
जिस की कोई शक्ल नहीं
बेरंग
खिलखिलाती
बिना हमारे सपनो को छुए ही
संभव कर देती उन्हे

एक नदी यहाँ से शुरू होती
जिस की कोई गहराई नहीं
बेखटके उतर जाते हम
बिना उसे बताए और छुए
जब कभी

कुछ नदियाँ पहाड़ लाँघती
पठार फाँदती
यहाँ तक आतीं
चुपके से डूब जातीं हम में
और हमें पता भी न चलता ........
कितनी ही नदियाँ
कितनी - कितनी तरह हमसे
कितनी – कितनी बार जुड़तीं रहीं
और हमारा अथाह खारापन
चूक गया हर बार
उन सब की मीठी ताज़गी

हर बार चूक गए हम
एक मुकम्मल नदी !

जून/25,2008

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - १

जलसा का दूसरा अंक छप कर आ चुका है. निर्वासन इस अंक की थीम है और क्या शानदार सामग्री जुटाई है सम्पादक श्री असद ज़ैदी ने.

इस अंक में मुझे सबसे ज़्यादा आकृष्ट किया जनाब अशरफ़ अज़ीज़ के क़िस्सों ने. यह कबाड़ख़ाने के पाठकों की ख़ुशक़िस्मती है कि इस शानदार रचना को हमारे लिए असद जी ने न केवल पोस्ट करने की अनुमति दी बल्कि ख़ुद ही इस पूरे गद्य को यूनीकोड में कन्वर्ट करके मुझे भेजा. बहुत शुक्रिया उनका. लीजिए पेश है पहला हिस्सा -



(द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान पूर्वी अफ़रीक़ा में मज़दूरी करने गए और फिर वहीं बस गए एक भारतीय परिवार में अशरफ़ अज़ीज़ का जन्म हुआ. हिन्दुस्तानी फ़िल्में और फ़िल्म संगीत बचपन और जवानी के साथी रहे - इन्हीं से उनने और उनके भाइयों ने अपनी हिन्दुस्तानी - बल्कि दक्षिण एशियाई - सांस्कृतिक पहचान हासिल की. तंज़ानिया और युगांडा में शिक्षाप्राप्ति के बाद वह छात्रवृत्ति पर अमरीका चले गए. वहाँ 1964 में उन्होंने विस्कॉन्सिन-मेडिसन विश्वविद्यालय से प्राणिशास्त्र में पी एच डी की. तब से वह वाशिंगटन के हॉवर्ड विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ़ मेडिसिन में शरीरविज्ञान पढ़ाते हैं. दक्षिण एशिया की पॉपुलर कल्चर पर उनका काम बहु-प्रशंसित है.

यह संस्मरणात्मक वार्ता रेडियो फ़ीचर के रूप में 1997 में वॉयस ऑफ़ अमेरिका की हिन्दी सेवा द्वारा प्रसारित की गई थी. इसे वयस ऑफ़ अमेरिका की विजयलक्ष्मी देसराम ने रिकार्ड किया. लिप्यान्तर और प्रसारण के लिए पाठ उन्हीं का तैयार किया हुआ है. रेडियो के इतिहास में ऐसी दिलचस्प और जादुई वार्ता - ख़ासकर हिन्दी-उर्दू में - शायद ही कभी सुनने को मिली हो. इसे छापने की अनुमति देने के लिए हम अशरफ़ साहब और विजयलक्ष्मी जी और पाठ की प्रति उपलब्ध कराने के लिए सिने-चिंतक जवरीमल पारख के आभारी हैं. 'जलसा' के नए अंक जलसा २०११ - निर्वासन में प्रकाशित इस वार्ता का मूल शीर्षक है : सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब उर्फ़ जाते हो तो जाओ हम भी यहाँ यादों के सहारे जी लेंगे यानी ईस्ट अफ़रीक़ा में हिंदुस्तानियों का सफ़र, हिंदुस्तानी संगीत के सहारे संगीतकार सज्जाद हुसैन की खोज में)



वो रात दिन वो शाम की गुज़री हुई कहानियाँ
जो तेरे घर में छोड़ दीं प्यार की सब निशानियाँ
- हसरत जयपुरी


साहित्य के बग़ैर इतिहास में कोई ज़िन्दगी नहीं है. वह बेमतलब की तारीख़ों की एक फ़ेहरिस्त है. फिर भी, जो इतिहास लिखा भी गया है, उसमें न तो जनता है और न जीते-जागते इंसान. शहंशाह हैं, राजा हैं, नवाब हैं या ठाकुर. लेकिन जो मुल्क को काँधे पर उठाये थे, वो बेनाम हैं. उनका नाम हमें लोक कला में मिलता है उनके लोक गीतों, पाक विद्या, उनके लिबास और उनकी कहानियों में. हिंदुस्तान का फ़िल्म संगीत उनके इंडिपिडेंस के साथ ही शुरू हुआ और इसे आज़ादी के संघर्ष से अलग नहीं किया जा सकता. मैं इतना दाना नहीं कि कहानी लिख सकूँ. हाँ, कहानी की शक्ल में अपनी कुछ पुरानी यादें साउथ एशिया की पचासवीं साल गिरह पर जागी हैं वह आप तक पहुँचाने का एक छोटा सा प्रयास है. शायद ये आपके कुछ काम आए.


1860 में हिंदुस्तानियों का पहला बनवास और उसके कारण

चाय, शक्कर, रेल और जंग हिंदुस्तान के हज़ारों लोगों की ग़ुलामी और कठोर ज़िदगी की देन बने. पिछली सदी में ब्रिटिश राज में शहंशाह बहादुरशाह ज़फ़र को रंगून में बेबस जिंदगी जीने पर मजबूर करने के बाद भारत के उत्तर और दक्षिण दोनों इलाकों से हज़ारों की संख्या में लोगों की मज़दूरी के लिए जहाज़ों में भरकर करीबियाई द्वीप, दक्षिण अफ़रीक़ा, पूर्व अफ़रीक़ा, हांगकांग, मलेशिया, सिंगापुर और फ़िजी ले जाया गया. इस तरह बहादुरशाह ज़फ़र को रंगून भेजा जाना हिंदुस्तानियों के भविष्य का संकेत बना.

हमारा परिवार ज़िला स्यालकोट से है. लेकिन मेरे माता-पिता का बचपन खडगपुर में बीता. मेरे दादा और नाना ब्रिटिश इंडिया रेलवे में कारीगर थे. मेरे दादा उस दौरान पूर्वी अफ़रीक़ा में, मोंबासा से वोई तक की सौ मील की पहली रेल पटरी डालने के लिए 1896 में पंजाब से मोंबासा गए और काम पूरा होने पर लौट आए.

हमारे बनवास का दूसरा दौर मेरे माता-पिता ने शुरू किया जो पहली जंग के बाद टांगानिका (तंज़ानिया) के टांगा शहर में बस गए. हिंद महासागर में एक छोटा सा बंदरगाह, जर्मन ईस्ट अफ़रीक़ा की राजधानी था. पहली लड़ाई में शहीद हुए हिंदुस्तानियों के निशान टांगा और मोशी के बीच बिछी रेलवे लाइन के दोनों ओर आज भी नज़र आते हैं. सेना में जो मुसलमान थे, उनके फिर भी क़ब्रों के निशान हैं लेकिन हिंदुओं और सिक्खों के वजूद तो अगरबत्ती की महक की तरह फ़िज़ा में गुल हो गए हैं. उनके बलिदान का सबूत है, ब्रिटेन की जीत.


न किसी की आँख का नूर हूँ,
न किसी के दिल का क़रार हूँ,
जो किसी के काम न आ सके
वो एक मुश्ते गु़बार हूँ.


हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत से पहली मुलाक़ात

पहली लड़ाई के बाद लीग ऑफ नेशन ने टांगानिका ब्रिटेन को सौंप दिया. फिर तो इस देश को आबाद करने के लिए और भी हिंदुस्तानी वहाँ पहुँचे. मेरे पिता टांगामोशी रेलवे के मुलाज़िम थे. इस तरह हमारी जिंदगी का कारोबार चलने लगा. मुझे इस बात पर आज भी ताज्जुब है कि वो धमाका जिसने हिरोशिमा और नागासाकी को राख बनाकर इतिहास को नया मोड़ दिया, उसकी मुझे कोई याद नहीं. लेकिन ये साफ़ याद है, 1945-46 में मेरे सबसे बड़े भाई मसूद कीनिया के सबसे बड़े पोर्ट शहर मोंबासा से एक ग्रामोफ़ोन और कुछ 78 आरपीएम रिकार्ड ख़रीद कर लाए. उस शहर में हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत ने पहला क़दम हमारे घर में रखा था. रात की दूधिया चांदनी में, घर के बरांडे में, पहला फ़िल्मी गीत जो मैंने सुना था, वह था नूरजहाँ का गाया फ़िल्म विलेज गर्ल का गीत, ‘बैठी हूँ तेरी याद का लेकर ये सहारा’. इंतज़ार के इस गीत में नूरजहाँ की आवाज़ मुझे बेहद सुरीली और जोश भरी लगी.


बैठी हूँ तेरी याद का लेकर ये सहारा
आ जाओ कि चमके मेरी क़िस्मत का सितारा.


हमारे बड़े भाई ने तुरंत कहा, ‘भाई गीत नूरजहाँ गा रही है, लेकिन संगीतकार हैं, श्यामसुंदर.’ उस दिन दूसरा गीत जो उन्होंने बजाया वह फ़िल्म दोस्त का था, लेकिन आवाज़ नूरजहाँ की ही थी. संगीतकार थे, सज्जाद हुसैन. ‘कोई प्रेम का देके संदेसा हाय लूट गया, हाय लूट गया.’ भाई साहब ने बड़े अंदाज़ से कहा, ‘जिस होनहार नौजवान संगीतकार ने संगीत दिया है, आने वाले समय में बहुत चमकेंगे.’


आज मेरे दिल का शीशा
हाय टूट गया, हाय टूट गया.


उस रात के बाद भाई जब भी मोंबासा जाते वहाँ की मशहूर सलीम रोड के शंकर दास एंड संज़ से रिकार्ड ले आते. टांगा और मोंबासा की दूरी लगभग 120 मील की है. उस ज़माने में रास्ते कच्चे थे. थोड़ी ही बरसात में कीचड़ से भर जाना आम बात थी. बारिश में वहाँ की लूंगा लूंगा नदी में पंटून (फ़ेरी) की आवाजाही बंद हो जाती. और फिर मोंबासा पहुंचने के लिए एक और फ़ेरी लिकोनी पर जाना पड़ता था. बचपन में लगता था, मोंबासा चांद के पार है. फ़िल्मी गीत वहीं से आते हैं.

सबसे बड़े भाई पिता समान थे. बहुत से कामों की शुरुआत उन्होंने की. ग्रामोफ़ोन और फ़िल्मों के गीत भी घर में वही लाए. उन्हें संगीत से लगाव था लेकिन उनसे छोटे भाई अय्यूब को तो फ़िल्मी संगीत और फ़िल्मों का जूनून था. जबकि मैं सोचता था कि हिंदुस्तानी फ़िल्मों और उनके गीतों को अलग नहीं किया जा सकता. हालाँकि अय्यूब सगे भाई थे, लेकिन मुझे लगता था कि वह आधे हमारे साथ हैं और आधे फ़िल्मों की स्क्रीन में हैं. क़द के छोटे थे, आवाज़ भारी और अदाओं की वजह से बडे़ भाई से भी बड़े लगते थे. वह पुरानी फ़िल्मों - पृथ्वी वल्लभ, सिकंदर और पुकार - का ज़िक्र करते समय एक साथ तीन-चार भूमिकाएँ करते. उन्हें इन फ़िल्मों का एक एक डायलॉग याद था. जो फ़िल्में मैंने नहीं देखी थीं, उनकी एक्टिंग से मुझे आज भी लगता है कि मैं उन्हें देख चुका हूँ. यह फ़िल्में उन्होंने बचपन में मोंबासा में देखी थीं. पुकार फ़िल्म में चंद्रमोहन और सोहराब मोदी की एक्टिंग और डायलॉग को वो सिनेमा की कला की हद मानते थे. उनका कहना था कि अभिनेताओं के बीच दो बातें नहीं हो रही थीं, तलवारें चल रही थीं. और उनके डायलॉग से कहानी आगे बढ़ रही थी. उनकी नज़र में मोतीलाल और अशोक कुमार ही सिनेमा के सही आर्टिस्ट थे क्योंकि इन दोनों की एक्टिंग बड़ी सधी हुई थी. लेकिन ये बड़ी दिलचस्प बात थी कि भाई स्वयं सोहराब मोदी और चंद्रमोहन की (पारसी) थियेटर वाली एक्टिंग करते थे. इस बारे में उनकी सोच थी कि अगर वे ख़ुद भी सिनेमा में होते तब वह मोतीलाल बनते.

ये मेरी खु़शकिस्मती है कि अय्यूब मुझसे उम्र में काफ़ी बड़े थे, परंतु उनका हर छोटे, बड़े के साथ दोस्त का सा व्यवहार था. उनके साथ बैठकर कभी महसूस नहीं हुआ कि बड़े भाई के साथ बैठे हैं, बल्कि जिगरी दोस्त का एहसास होता.

हमारे शहर के पहले सिनेमाघर का नाम था मैजेस्टिक. ये पहले युद्ध के सिपाहियों के क़ब्रिस्तान के सामने था. भाई ने समझाया था, सिनेमा और क़ब्रिस्तान का गहरा संबंध है. सिनेमा इंसान की मौत का रिकार्ड है. कहते, सहगल चल बसे लेकिन देवदास फ़िल्म में हम उन्हें बारबार मरते देख सकते हैं. मैजेस्टिक में हमने पहली हिंदुस्तानी फ़िल्म रतन देखी थी. वो मुझे कंधे पर बिठा कर ले गए थे. शाम का समय था. ऊंचाई से मैंने देखा, क़ब्रिस्तान लोगों से भरा हुआ है. ये वह लोग थे जिन्हें फ़िल्म के टिकट नहीं मिले थे. वहाँ अच्छी खासी जंग चल रही थी. मुझे लगा, ऐसी हालत में आज तो फ़िल्म नहीं देख सकेंगे. भाई ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘हमने सब बंदोबस्त किया हुआ है.’ बड़े भाई अय्यूब की दोस्ती सिनेमा के प्रोजेक्शनिस्ट अफ़रीक़ी भाई उम्टो से थी. उन्होंने उम्टो को समोसे खिलाकर पहले ही टिकट लिये हुए थे. फ़िल्म रतन में करन दीवान और स्वर्णलता पर फ़िल्माए गीतों की याद आज भी ताज़ा है. ‘अँखियां मिलाके, जिया भरमाके, चले नहीं जाना/ ओ, ओ चले नहीं जाना’. रतन के गीतों ने विलेज गर्ल और दोस्त के गीतों को धूमिल कर दिया. लेकिन ये गीत पुराने गीत जो चमड़े के ख़ूबसूरत बैग में संभालकर रखे हुए थे, हम लोग कभी कभी रात की तनहाई में बजाते.


‘अँखियाँ मिलाके...’

संगीतकार सज्जाद अपनी बदमिज़ाजी की वजह से मशहूर होते रहे. उनके साथ के संगीतकार थोड़े ही वक़्त में एक के बाद एक सीढ़ियाँ चढ़ते आगे बढ़ गए. एक दिन मेरे भाई मसूद के एक दोस्त ने ‘कोई प्रेम का देके संदेशा’ रिकार्ड लिया, तो कभी लौटाया नहीं. हमारे यहाँ उसूल था कि कोई हमारे यहाँ से कोई चीज़ उधार लेकर गया है, तो वही लौटाएगा, हम उसे याद नहीं दिलाते. आज तक उस रिकार्ड के खोने का अफ़सोस पूरे परिवार को है. कभी-कभी भूली बिसरी याद की तरह उस रिकार्ड का ख़़याल आता तो हम उस रात की बातें करते जब हमने यह गीत पहली बार अपने घर में सुना था. सज्जाद के बारे में चर्चा होती कि वह क़ुदरत का ऐसा तराशा हुआ हीरा है, जिसका इल्म न तो हिंदुस्तानी फ़िल्म इंडस्ट्री को, न ही फ़िल्म संगीत को चाहने वालों को है.

(जारी)

(जलसा की अपनी प्रति बुक कराने हेतु दांई तरफ़ की पट्टी में लगे लिंक में लिखे पते/ नम्बर पर सम्पर्क करें)

Thursday, September 1, 2011

आज का फ़ोटो


(फ़ोटोग्राफ़र: अलेक्सिस पेरेवोशिकोव)

आई लव रम


"भौजैया बनावें हलवा" और "सोनार तेरी सोना पे मेरी बिस्वास है" जैसा शानदार चटनी संगीत कबाड़ख़ाने में पहले भी लगाया जा चुका है. इसके लिए हमें अपने कबाड़ी भाई विमल वर्मा का कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने इस संगीत से हमारा पहला परिचय कराया था. कैरिबियाई द्वीपों में रहने वाले भारतीयों की हालिया दो पीढ़ियों ने इसी तरह के संगीत से अपनी भारतीयता को बचाया हुआ है. हेमन्त कुमार के गाए एक अत्यन्त लोकप्रिय फ़िल्मी गीत के बैकग्राउन्ड में रचा गया यह गीत ख़ास आप के लिए खोज कर लाया हूं. गायक हैं निषाद सुल्तान -



(यह पोस्ट रम प्रेमी मित्रों दीपराज मेहरा, अक्षय शाह और लखनऊ में रहने वाले बड़े भाई अशोक शाह जी के साथ साथ रम के सभी चाहने वालों के वास्ते)

उन्हीं को इब्तेदा कहिये, उन्हीं को इन्तेहा कहिये


बाबा नुसरत से सुनिये यह कम सुनी गई क़व्वाली - अर्श-ए-आज़म का दूल्हा बड़ी चीज़ है.



नुसरत फ़तेह अली ख़ान

Wednesday, August 31, 2011

कबाड़ख़ाने की दो हज़ारवीं पोस्ट

यह कबाड़ख़ाने की दो हज़ारवीं पोस्ट है. विन्सेन्ट वान गॉग की जीवनी "लस्ट फ़ॉर लाइफ़" का यह टुकड़ा इस ब्लॉग के लिए लगातार एक पथप्रदर्शक का कार्य करता रहा है -

"दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है. आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है. वह ऐसे ही ईमानदार बनने को भी नहीं आया है. वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है. वह उदारता प्राप्त करने को आया है. वह उस बेहूदगी को पार करने आया है जिस में ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है."

इन शब्दों को याद करता हुआ मैं इस पोस्ट में अतुलनीय चित्रकार और मनुष्य विन्सेन्ट वान गॉग की कुछ महान पेन्टिंग्स साझा कर रहा हूं.
















और विन्सेन्ट की याद में डॉन मैक्लीन का गाया गीत "स्टारी स्टारी नाइट" -



और अन्त में प्रिय कवयित्री अनीता वर्मा की एक कविता -

वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत

अनीता वर्मा

एक पुराने परिचित चेहरे पर
न टूटने की पुरानी चाह थी
आंखें बेधक तनी हुई नाक
छिपने की कोशिश करता था कटा हुआ कान
दूसरा कान सुनता था दुनिया की बेरहमी को
व्यापार की दुनिया में वह आदमी प्यार का इन्तज़ार करता था

मैंने जंगल की आग जैसी उसकी दाढ़ी को छुआ
उसे थोड़ा सा क्या नहीं किया जा सकता था काला
आंखें कुछ कोमल कुछ तरल
तनी हुई एक हरी नस ज़रा सा हिली जैसे कहती हो
जीवन के जलते अनुभवों के बारे में क्या जानती हो तुम
हम वहां चल कर नहीं जा सकते
वहां आंखों को चौंधियाता हुआ यथार्थ है और अन्धेरी हवा है
जन्म लेते हैं सच आत्मा अपने कपड़े उतारती है
और हम गिरते हैं वहीं बेदम

ये आंखें कितनी अलग हैं
इनकी चमक भीतर तक उतरती हुई कहती है
प्यार मांगना मूर्खता है
वह सिर्फ किया जा सकता है
भूख और दुख सिर्फ सहने के लिए हैं
मुझे याद आईं विन्सेन्ट वान गॉग की तस्वीरें
विन्सेन्ट नीले या लाल रंग में विन्सेन्ट बुखार में
विन्सेन्ट बिना सिगार या सिगार के साथ
विन्सेन्ट दुखों के बीच या हरी लपटों वाली आंखों के साथ
या उसका समुद्र का चेहरा

मैंने देखा उसके सोने का कमरा
वहां दो दरवाज़े थे
एक से आता था जीवन
दूसरे से गुज़रता निकल जाता था
वे दोनों कुर्सियां अन्तत: खाली रहीं
एक काली मुस्कान उसकी तितलियों गेहूं के खेतों
तारों भरे आकाश फूलों और चिमनियों पर मंडराती थी
और एक भ्रम जैसी बेचैनी
जो पूरी हो जाती थी और बनी रहती थी
जिसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता था

एक शान्त पागलपन तारों की तरह चमकता रहा कुछ देर
विन्सेन्ट बोला मेरा रास्ता आसान नहीं था
मैं चाहता था उसे जो गहराई और कठिनाई है
जो सचमुच प्यार है अपनी पवित्रता में
इसलिए मैंने खुद को अकेला किया
मुझे यातना देते रहे मेरे अपने रंग
इन लकीरों में अन्याय छिपे हैं
यह सब एक कठिन शान्ति तक पहुंचना था
पनचक्कियां मेरी कमजोरी रहीं
ज़रूरी है कि हवा उन्हें चलाती रहे
मैं गिड़गिड़ाना नहीं चाहता
आलू खाने वालों और शराव पीने वालों के लिए भी नहीं
मैंने उन्हें जीवन की तरह चाहा है

अलविदा मैंने हाथ मिलाया उससे
कहो कुछ कुछ हमारे लिए करो
कटे होंठों में भी मुस्कराते विन्सेन्ट बोला
समय तब भी तारों की तरह बिखरा हुआ था
इस नरक में भी नृत्य करती रही मेरी आत्मा
फ़सल काटने वाली मशीन की तरह
मैं काटता रहा दुख की फ़सल
आत्मा भी एक रंग है
एक प्रकाश भूरा नीला
और दुख उसे फैलाता जाता है।

Tuesday, August 30, 2011

मानें या न मानें: अन्ना परिघटना पर कुछ सवाल

व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार

आनंद स्वरूप वर्मा, संपादक, समकालीन तीसरी दुनिया

जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाय। व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधें का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। शासन की बागडोर किसके हाथ में हो इस मुद्दे पर सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न गुटों के बीच चलती खींचतान से आम जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है पर जहां तक इस वर्ग के उदधारक् की साख बनाये रखने की बात है, विभिन्न गुटों के बीच अद्भुत एकता है। यह एकता 27 अगस्त को छुट्टी के दिन लोकसभा की विशेष बैठक में देखने को मिली जब कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी और भाजपा की सुषमा स्वराज दोनों के सुर एक हो गये और उससे जो संगीत उपजा उसने रामलीला मैदान में एक नयी लहर पैदा कर दी। सदन में शरद यादव के भाषण से सबक लेते हुए अगले दिन अपना अनशन समाप्त करते समय अण्णा ने बाबा साहेब आंबेडकर को तो याद ही किया, अनशन तोड़ते समय जूस पिलाने के लिए दलित वर्ग और मुस्लिम समुदाय से दो बच्चों को चुना।

अण्णा हजारे का 13 दिनों का यह आंदोलन भारत के इतिहास की एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें लाखों लोगों की भागीदारी रही या टीवी चैनलों ने लगातार रात दिन इसका प्रसारण किया। किसी भी आंदोलन की ताकत या समाज पर पड़ने वाले उसके दूरगामी परिणामों का आकलन मात्र इस बात से नहीं किया जा सकता कि उसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। अगर ऐसा होता तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स को केंद्र में रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट पर आरक्षण विरोधी आंदोलन जैसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान हुए ऐसे आंदोलनों में लाखों की संख्या में लोगों की हिस्सेदारी रही। किसी भी आंदोलन का समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेलने में सफल/ असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस आंदोलन को नेतृत्व देने वाले कौन लोग हैं और उनका ‘विजन’ क्या है? अब तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना कर जनभावनाओं का दोहन किया जाता रहा है। अण्णा के व्यक्तित्व की यह खूबी है कि इस खतरे से लोग निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि रालेगण सिदधी के इस फकीरनुमा आदमी को सत्ता नहीं चाहिए।

अण्णा का आंदोलन अतीत के इन आंदोलनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न है क्योंकि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों के बीच यह ध्रुवीकरण का काम करेगा। किसी भी हालत में इस आंदोलन के मुकाबले देश की वामपंथी क्रांतिकारी शक्तियां न तो लोगों को जुटा सकती हैं और न इतने लंबे समय तक टिका सकती हैं जितने लंबे समय तक अण्णा हजारे रामलीला मैदान में टिके रहे। इसकी सीधी वजह यह है कि यह व्यवस्था आंदोलन के मूल चरित्र के अनुसार तय करती है कि उसे उस आंदोलन के प्रति किस तरह का सुलूक करना है। मीडिया भी इसी आधार पर निर्णय लेता है। आप कल्पना करें कि क्या अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/ अघनिष्ठ रूप से जुड़े/ बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध् फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उदधारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है।

क्या इस तथ्य को बार बार रेखांकित करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार का मूल स्रोत सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं? इन नीतियों ने ही पिछले 20-22 वर्षों में इस देश में एक तरफ तो कुछ लोगों को अरबपति बनाया और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मेहनतकश लोगों को लगातार हाशिये पर ठेल दिया। इन नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए अपार संभावनाओं का द्वार खोल दिया और जल, जंगल, जमीन पर गुजर बसर करने वालों को अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापित किया और प्रतिरोध् करने पर उनका सफाया कर दिया। इन नीतियों की ही बदौलत आज मीडिया को इतनी ताकत मिल गयी कि वह सत्ता समीकरण का एक मुख्य घटक हो गया। जिन लोगों को इन नीतियों से लगातार लाभ मिल रहा है वे भला क्यों चाहेंगे कि ये नीतियां समाप्त हों। इन नीतियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जो उथल-पुथल चल रही है उससे सत्ताधारी वर्ग के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है जिसका जीवन निष्कलंक हो, जिसके अंदर सत्ता का लोभ न दिखायी देता हो और जो ऐसे संघर्ष को नेतृत्व दे रहा हो जिसका मकसद समस्या की जड़ पर प्रहार करना न हो तो उसे यह व्यवस्था हाथों हाथ लेगी क्योंकि उसके लिए इससे बड़ा उदधारक कोई नहीं हो सकता। अण्णा की गिरफ्रतारी, रिहाई, अनशन स्थल को लेकर विवाद आदि राजनीतिक फायदे-नुकसान के आकलन में लगे सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोधें की वजह से सामने आते रहे हैं। इनकी वजह से मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

अण्णा के आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रहों और आंदोलनों की उन लोगों को याद दिला दी जिन्होंने तस्वीरों या फील्मों के माध्यम से उस आंदोलन को देखा था। गांधी के समय भी एक दूसरी धारा थी जो गांधी के दर्शन का विरोध् करती थी और जिसका नेतृत्व भगत सिंह करते थे। जहां तक विचारों का सवाल है भगत सिंह के विचार गांधी से काफी आगे थे। भगत सिंह ने 1928-30 में ही कह दिया था कि गांधी के तरीके से हम जो आजादी हासिल करेंगे उसमें गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हो जायेंगे क्योंकि व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा। तकरीबन 80 साल बाद रामलीला मैदान से अण्णा हजारे को भी यही बात कहनी पड़ी कि गोरे अंग्रेज चले गये पर काले अंग्रेजों का शासन है। इन सबके बावजूद भगत सिंह के मुकाबले गांधी को उस समय के मीडिया ने और उस समय की व्यवस्था ने जबर्दस्त ‘स्पेस’ दिया। वह तो टीआरपी का जमाना भी नहीं था क्योंकि टेलीविजन का अभी आविष्कार ही नहीं हुआ था। तो भी शहीद सुखदेव ने चंद्रशेखर आजाद को लिखे एक पत्र में इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि मीडिया हमारे बयानों को नहीं छापता है और हम अपनी आवाज जनता तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जब भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने वाली ताकतें सर उठाती हैं तो उन्हें वहीं खामोश करने की कोशिश होती है। अगर आप अंदर के रोग से मरणासन्न व्यवस्था को बचाने की कोई भी कोशिश करते हुए दिखायी देते हैं तो यह व्यवस्था आपके लिए हर सुविधा मुहैया करने को तत्पर मिलेगी।

अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ , दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।

उसके भीतर से समुद्र गायब हो गया है शायद

प्रिय कवि चन्द्रकान्त देवताले की एक कविता और -


वह औरत

चन्द्रकान्त देवताले

रेतीले मैदान के बीचोबीच
हमेशा अपनी किसी गुमशुदा चीज़ को
तलाशती हुई आँखों के साथ एक औरत
सफ़ेद चट्टान की तरह खड़ी है

उसके हाथों में ज़रूर टहनियों की
वैसी हरकत है जिसे कोई
बारिश का इन्तज़ार कह सकता है

उसके भीतर से समुद्र गायब हो गया है शायद
और सफ़ेद रोशनी की जगह
एक काला पत्थर रख दिया है किसी ने

अपने अँधेरे को कुछ-कुछ जानकर भी
वह अदृश्य जल-प्रवाह को सुनती है
और उसके होंठों पर नन्हें पक्षियों की तरह
भयभीत शब्द फड़फड़ाते हैं

वह औरत अपने को सहसा
एक पेड़ की तरह
और फिर उससे निकट कर
अंधी उँगलियों से टोहती है एक फूल
उसी पेड़ पर

जो वह ख़ुद अभी थी

लन्दन के हाइड पार्क का एक पुराना फ़ोटो