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Wednesday, July 31, 2013

एक है ज़ोहरा – १


ज़ोहरा सहगल को कौन नहीं जानता. अठानवे साल की आयु में २०१० में उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘क्लोज़ अप’ प्रकाशित की. हिन्दी के पाठकों के लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि इस पुस्तक का अनुवाद हमारी कबाड़न दीपा पाठक के किया है और ‘क़रीब से’ शीर्षक अनुवाद के रूप में इसे राजकमल प्रकाशन द्वारा छाप भी दिया गया है.

इस किताब के चंद शुरुआती हिस्से दीपा की मेहरबानी से यहाँ पेश किये जा रहे हैं.


ज़ोहरा सहगल-उर्फ मुमताज़ के खानदान का लेखाजोखा
नवाब नजीब-उद-दौला (1708-1770) के खानदानी

नजीबाबाद के आखिरी हुक्मरान नवाब जलालुद्दीन खान 1857 की बग़ावत के दौरान अंग्रेज़ों की गोली से मारे गए  थे. उनकी विधवा बेगम, दो जवान बेटे और दो कमउम्र बेटियां बैलगाड़ी में छुप कर मुरादाबाद पहुंचे, जहां बेगम के भाई फौज में कमांडर थे.

बाद में बड़ा बेटा अज़िमुद्दीन खान रामपुर के जवान नवाब के रीजेंट के साथ-साथ वहां की फौज के जनरल बन गए. कई सालों बाद उनकी पोती असकरी बेगम की शादी रामपुर नवाब के वारिस राज़ा अली खान से हुई और उन्हें राफत ज़ामानी बेगम की पदवी दी गई.

छोटा बेटा, साहेबज़ादा हमिद्दुज़ार खान को देश की कई रियासतों का रीजेंट बनाया गया. उनकी छोटी बहन जाफरी बेगम की शादी रामपुर के एक इज़्जतदार और अमीर आदमी अताउल्लाह खान से हुई. उनके सबसे छोटे बेटे मुमताज़ुल्लाह खान ने अपनी रिश्ते की बहन साहेबज़ादा हमिद्दुज़फर खान की बेटी नातिका बेगम से शादी की. उनके सात बच्चे हुए जिनमें से ज़ोहरा सहगल तीसरे नंबर की संतान थीं.

जलालुद्दीन खान की सबसे बड़ी बेटी ज़ुबैदा बेगम (?) की शादी लोहारू के नवाब से हुई, जिनकी बहुत सारी बेटियां पैदा हुई, जिनकी बाद में अलग-अलग नवाबों से शादियां हुईं जैसे मालेर कोटला, पटौदी और फखरुद्दीन अली अहमद का रंगून खानदान.
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1919 -1929
बचपन और लाहौर

जीवनः खुद के साथ अंतहीन बातचीत; होश के आलम में चुप और पागलपन में सुनाई देने वाली

कोई अपने बारे में किताब क्यों लिखता है? सबसे बड़ी वजह तो यह कि इंसान मरने के बाद जीवन से अपनी पकड़ छूटने की कल्पना से डरता है . ऐसे में आत्मकथा उसे मरने के बाद भी अपने होने के भ्रम को बनाए रखने का जरिया लगता है. मुझे लगता है कि यह एक तरह की आत्ममुग्धता है, भला किसे परवाह है तुम्हारी भावनाओं की, तुम्हारे संघर्ष की, तुम्हारे सुख या दुख की? हां, शायद तुम्हारे बच्चों के लिए उनकी कुछ अहमियत हो. हालांकि वो भी दिल से तुम्हें प्यार करने और तुम्हारी देखभाल करने के बावजूद कभी-कभी ऐसा अहसास दिलाते हैं जैसे तुम उनकी जिंदगी से जुड़ा एक फालतू हिस्सा हो और तुम्हारे हटने से उन्हें राहत मिलेगी...पता नहीं पर मुझे ऐसा लगता है!

मेरे लिए इस किताब को लिखने की खास वजह एक ऐसा काम हाथ में लेना था जिसमें मैं खुद को डुबा सकूं, साथ ही मैं अपनी जिंदगी जो कुछ हुआ उन सब बातों को पूरी तरह से भूल जाने से पहले ही लिख डालना चाहती थी. इसमें से बहुत सारी बातें बहुत पुरानी हैं, ऐसा लगता है वो सब किसी और जन्म में घटा था, इसके बावजूद कुछ यादें इतनी जीवंत हैं जैसे लगता है कल ही की बात हो.


मैं 27 अप्रैल, 1912 में संयुक्त भारतीय प्रांत, जो अब उत्तर प्रदेश कहलाता है, में सहारनपुर में पैदा हुई. मेरे पिता एक पठान सरदार, मौलवी गुलाम जिलानी खान साहेब के वंशज थे. मौलवी साहेब  की नस्लीय जड़ें अफगानिस्तान के अब्दुल राशिद नाम के एक यहूदी से जुड़ी थीं, जिन्होंने 631 ईसवीं सन् में मुस्लिम धर्म अपना लिया. 1760 में गुलाम जिलानी, जो एक विद्वान और प्रसिद्ध योद्धा थे, दिल्ली में अहमद शाह के दरबार में आए जहां उन्हें बहुत सम्मान दिया गया. बाद में वे अन्य रोहिला सेनापतियों के साथ सेना में शामिल हुए. उन्हें नवाब फैजुल्लाह खान की सेना की कमान सौंप दी गई. नवाब साहब के साथ वे कोसी नदी के किनारे बसे 'रामपुरा' नाम के एक गांव में पहुंचे. इस तरह से रामपुर शहर और राज्य के रूप में विकसित हुआ. गुलाम जिलानी और बाकी ग्यारह रिसालदारों को यहां जमीन आवंटित की गई. मेरी मां के दादा जी नवाब जलालुद्दीन खान थे, जो नवाब ज़ेब्ते खान के पोते थे. नवाब ज़ेब्ते खान नजीबाबाद के संस्थापक और नवाब नजीबुद्दौला के बेटे और उत्तराधिकारी थे. मुझे अचरज होता है यह सोच कर कि हमारे पूर्वजों के जीवन का हम पर कितना प्रभाव पड़ता है, कभी सोचती हूं कि मेरे पूर्वज के व्यक्तित्व में जुड़े विद्वता और साहसिक  गुणों का का मेरे जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है.

मेरे पिता ने युवावस्था में ही रामपुर छोड़ दिया. मेरी पैदाइश के दौरान वह ब्रिटिश प्रोविंसियल सर्विस में कनिष्ठ अधिकारी थे. (एक बहुत हास्यास्पद सी बात यह थी कि बाद के वर्षों में अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें नौकरी में अच्छे प्रदर्शन के लिए खान साहेब का दर्ज़ा दिया, जबकि नवाबी खानदान से जुड़े होने के चलते यह तमगा तो जन्म के साथ ही उनके नाम से जुड़ा था.)

मैं अपने परिवार में तीसरे नंबर की संतान थी, अब क्योंकि भारतीय किसी भी और देश के मुकाबले सबसे ज्यादा रंगभेदी होते हैं,  मैं घरवालों की काफी चहेती थी सिर्फ इस वजह से कि मेरा रंग मेरे बड़े भाई और बहन के मुकाबले थोड़ा गोरा था. हालांकि मुझे लगता है कि मुझसे छोटे दो भाई-बहन के आने के साथ ही मेरी कद्र कम हो गई क्योंकि दोनों का रंग एंग्लो-इंडियन की तरह गोरा था. मेरी छोटी बहन की तो बचपन में घुंघराली सुनहरी लटें भी थी, जैसे अक्सर पठानों में होती हैं.

मेरी सबसे पुरानी याद अपने ऊपर छाए नीले आसमान की है, हांफने की आवाज के साथ-साथ बहुत धीमी गति के साथ आसमान के इस टुकड़े का फ्रेम बदलता जा रहा था. साथ में थी पसीने की गंध और मेरी पीठ किसी कठोर सतह पर टिकी थी. मैंने अपने पिता से जब यह बात की तो उन्होंने अंदाज़ा लगाया कि शायद यह 1914  में नैनीताल जाते समय की बात होगी, जब मुझे एक कुली कंधे पर बंधी बेंत की टोकरी में ले गया. उन दिनों बसें नहीं चला करती थी. आपको पहले तांगे या घोड़ा गाड़ी पर चढ़ाई करनी पड़ती थी, यात्रा का अंतिम हिस्सा घोड़े की पीठ पर करना होता था. बच्चे बेंत की टोकरियों पर बैठा कर ले जाए जाते थे.


(जारी)

Tuesday, July 30, 2013

प्रेमचंद की आत्मकथा’ का एक अंश-

कथासम्राट प्रेमचंद के जन्मदिवस के अवसर पर पहले पढ़िए मदन गोपाल द्वारा लिखित ‘प्रेमचंद की आत्मकथा’ का एक छोटा सा अंश-


मेरा जीवन सपाट, समतल मैदान है; जिसमें कहीं-कहीं गढ़े तो हैं, पर टीलों, पर्वतों घने जंगलों, गहरी घाटियों और खंडहरों का स्थान नहीं है. जो सज्जन पहाड़ों की सैर के शौकीन हैं, उन्हें यहाँ निराशा ही होगी.

जब मेरी उम्र कोई तेरह साल की रही होगी, मैं हिंदी न जानता था. उर्दू के उपन्यास पढ़ने का उन्माद था. मौलाना शरर, पं
. रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसबा, मौलवी मुहम्मद अली हरदोई निवासी उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे. इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था.

मेरा विवाह करने के साल बाद ही मेरे पिता परलोक सिधारे. उस समय मैं नौवें दर्जें में पढ़ता था. घर में मेरी स्त्री थी, विमाता थीं, उसके दो बालक थे और आमदनी एक पैसे की नहीं थी. घर में जो कुछ लेई
-पूजीं थीं वह पिताजी की छह महीने की बीमारी और क्रिया-कर्म में खर्च हो चुकी थी और मुझे अरमान था वकील बनने का और एम.. पास करने का. नौकरी उस जमाने में इतनी ही दुष्प्राप्य थी जितनी अब है. दौड़-धूप करके शायद दस-बारह की कोई जगह पा जाता; पर यहाँ तो आगे पढ़ने की धुन थी. गाँव में लोहे की अष्टधातु की वहीं बेड़ियाँ थी और मैं चढ़ना चाहता था पहाड़ पर.

मेरे हर उपन्यास में एक आदर्श चरित्र है, जिसमें मानव दुर्बलताएँ भी हैं और गुण भी; परंतु वह मूलतया आदर्शवादी है.
प्रेमाश्रममें ज्ञानशंकर है, ‘रंगभूमिमें सूरदास, ‘कायाकल्पमें चक्रधर...मेरी राय है, मेरी कृतियों में सबसे अच्छी रंगभूमिहै.....अधिकांश चरित्र वास्तविक जीवन से लिए गए हैं, गो उन्हें काफी अच्छी तरह परदे में ढक दिया गया है.

सेवासदनकी फिल्म बनी. उस पर मुझे सात सौ पचास रुपये मिले. अगर इस तंगी में वह रुपए नहीं मिल जाते तो न जाने क्या दशा होती.
.....फिर बंबई की एक फिल्म कंपनी ने बुलाया. वेतन पर नहीं, कॉण्ट्रैक्ट पर आठ हजार रुपए साल. मैं उस अवस्था में पहुँच गया था जब मेरे लिए हाँकरने के सिवा और कोई उपाय नहीं रह गया था.....बंबई गया अजंता सिनेटोन में. यहाँ दुनियाँ दूसरी है; यहाँ की कसौटी दूसरी है.....मैं इस लाइन में यह सोचकर आया था कि मुझे आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र होने का मौका मिलेगा; मैं धोखे में था. 

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पुस्तक की भूमिका में मदन गोपाल लिखते हैं -

यह पुस्तक मुंशी प्रेमचंद के जीवन, उनके लेखन तथा उनके युग की कहानी है. यह कहानी उन्हीं के अपने शब्दों में है. उनकी आत्मकथा है. इसका मूल आधार तो उनका आत्मकथांक जीवन-सारहै, जो फरवरी 1932 में हंसमें प्रकाशित हुआ था. परंतु यह उनके जीवन के पचास वर्षों का विवरण था. इसके पूर्व पाँच-छह वर्षों में प्रेमचंद ने कजाकी’, ‘चोरी’, ‘रामलीला’ ‘गुल्ली-डंडा’ ‘लॉटरीइत्यादि कहानियाँ लिखी थीं; जिसके वे स्वयं नायक हैं. इस तथ्य की पुष्टि उनकी शिवरानी देवी ने अपनी पुस्तक प्रेमचंद : घर मेंकी है. 

प्रेमचंद के परम मित्र जैनेंद्र कुमार जैन ने लिखा है कि स्वयं प्रेमचंदजी ने एक बड़ी दिलचस्प आपबीती सुनाई. एक निरंकुश युवक ने किस प्रकार उन्हें ठगा और किस सहजभाव से वह उसकी ठगाई में आते रहे.....उस चालाक युवक ने प्रेमचंद जी को ऐसा मूँड़ा किकहने की बात नहीं. सीधे-सादे रहनेवाले प्रेमचंदजी के पैसे के बल पर उन्हीं की आँखों के नीचे उस जवान ने ऐसे ऐश किए कि प्रेमचंदजी आँख खुलने पर स्वयं विश्वास न कर सकते थे. प्रेमचंद जी से उसने अपना विवाह करवाया, बहू के लिए जेवर बनवाए-और प्रेमचंद जी सीधे तौर पर सबकुछ करते गए. कहते थे-भई जैनेंद्र सर्राफा को अभी पैसे देने बाकी हैं. उसने जो सोने की चूड़ियाँ बहू के लिए दिलाई थीं उनका पता तो मेरी धर्म पत्नी को भी नहीं है. अब पता देकर अपनी शामत ही बुलाना है. पर देखों न, जैनेंद्र, वह सब फरेब था. वह लड़का ठग निकला. अब ऊपर-ही-ऊपर जो एक दो कहानियों के रुपए पाता हूँ, उससे सर्राफा का देना चुकता करता जाता हूँ. देखना, कहीं घर में कह देना. मुफ्त की आफत मोल लेनी होगी. बेवकूफ बने तो बेवकूफी का दंड भी हमें भरना है.

प्रेमचंद की यह आत्मकथासाहित्य में एक नए प्रकार का प्रयास है. इसकी पृष्ठभूमि के संबंध में कुछ निवेदन आवश्यक है. 

छप्पन वर्ष पूर्व प्रेमचंद के जीवन तथा लेखन पर अंग्रेजी में मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी. यह किसी भी भाषा में इस विषय पर सर्वप्रथम पुस्तक थी. एक सौ बीस पन्ने की यह पुस्तक प्रेमचंद के निधन के सात साल बाद छपी थी. पुस्तक किसी भी भारतीय भाषाई साहित्यकार पर किसी भारतीय द्वारा अंग्रेजी में लिखी सर्वप्रथम थी. इस पुस्तक की बड़ी चर्चा हुई. अहिंदी क्षेत्रों में ही नहीं, विदेशों में भी साहित्यकार प्रेमचंद को मान्यता मिलने में सहायता मिली. 


जब प्रेमचंद के प्रिय शिष्य जनार्दन प्रसाद झा द्विजने अपनी प्रेमचंद की उपन्यास कलानामक पुस्तक की पहली प्रति उन्हें भेंट की तो वे प्रसन्न हुए और कहा कि मेरे इस संसार से चले जाने के बाद तुम मुझ पर पाँच सौ पृष्ठों की किताब लिखना.’ ‘द्विजके बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है; परंतु बीस-पच्चीस वर्ष बाद यह काम मैंने और अमृतराय ने किया हमारी प्रेमचंद : कलम का मजदूरऔर कलम का सिपाहीदोनों को ही प्रामाणित जीवनी की मान्यता प्राप्त है. 

मेरी कलम का मजदूरए लिटरेरी बायग्राफीऔर अमृतराय की कलम का सिपाही’-इन तीनों पुस्तकों में प्रेमचंद के उन पत्रों का भरपूर प्रयोग किया गया है, जो मैंने बीस-पच्चीस वर्षों में इकट्ठे किए थे. इन पात्रों में प्रेमचंद के जीवन पर बहुत अच्छा प्रकाश पड़ता है; क्योंकि प्रेमचंद के बारे में, अपने ही शब्दों में (उत्तम पुरुष में) हैं. इनके उद्धरणों का मैंने प्रेमचंद के जीवन से संबंधित कहानियों को जोड़ने के लिए प्रयोग किया है. 

प्रेमचंद की जन्मी-शती के अवसर पर मुझे ध्यान आया था, क्यों न प्रेमचंद के जीवन, लेखन, आदर्शों तथा युग पर एक ऐसा ही प्रयास किया जाए. प्रस्तुत पुस्तक में प्रेमचंद की पंद्रह-सोलह कहानियाँ और उनके पत्रों के विभिन्न उद्धरणों का चयन कर उन्हें एक लड़ी के रूप में प्रस्तुत किया गया है. उद्धरणों के चयन के अलावा मेरा योगदान केवल वे थोड़ी सी पंक्तियाँ हैं, जिन्हें भिन्न टाइप (इटेलिक्स) में दिया गया है. वास्तव मेरा काम मालाकार का है, इससे अधिक कुछ नहीं. बाकी सब प्रेमचंद हैं. 
आशा करता हूँ कि पाठकों को इस पुस्तक पढ़ने में प्रेमचंद की आत्मकथा का रस मिलेगा.

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पुस्तक के शुरुआती अंश ये रहे -

एक

मेरा जन्म संवत 1937 में हुआ. नाम दिया गया धनपत राय. बाप का नाम था मुंशी अजायब लाल. काशी के उत्तर की ओर पांडेपुर के निकट लमही ग्राम का निवासी हूँ. पिता डाकखाने में क्लर्क थे. तबादला भी होता रहता था. बचपन की याद नहीं भूलती. वह कच्चा-टूटा घर, वह पुआल का बिछौना; वह नंगे बदन, नंगे पाँव खेतों में घूमना, आम, के पेड़ों पर चढ़ना-सारी बातें आँखों के सामने फिर रही हैं. चमरौधे जूते पहन कर उस वक्त कितनी खुशी होती थी, ‘फ्लेक्सके बूटों में भी नहीं होती. गरम पनुए रस में जो मजा था वह अब अंगूर, खीर और सोहन हलुआ में भी नहीं मिलता.

मेरी बाल-स्मृतियों में कजाकीएक न मिटने वाला व्यक्ति है. आज चालीस साल गुजर गए, कजाकी की मूर्ति अभी तक आँखों के सामने नाच रही है. मैं उन दिनों अपने पिता के साथ आजमगढ़ की एक तहसील में था. कजाकी जाति का पासी था; बड़ा ही हँसमुख, बड़ा ही साहसी, बड़ा ही जिंदादिल ! वह रोज शाम को डाक का थैला लेकर आता, रात भर रहता और सबेरे डाक लेकर चला जाता. शाम को फिर उधर से डाक लेकर आ जाता. मैं दिन भर एक उद्विग्न दशा में उसकी राह देखा करता ज्यों ही चार बजते, व्याकुल सड़क पर आकर खड़ा हो जाता और थोड़ी देर में कजाकी कंधे पर बल्लम रखे, उसकी झुनझुनी बजाता, दूर से दौड़ता हुआ आता दिखलाई देता. वह साँवले रंग का गठीला, लंबा जवान था.

शरीर साँचे में ऐसा ढला हुआ कि चतुर मूर्तिकार भी उसमें कोई कोई दोष न निकाल सकता. उसकी छोटी-छोटी मूँछें उसके सुडोल चेहरे पर बहुत ही अच्छी मालूम होती थीं. मुझे देखकर वह और तेज दौड़ने लगता. उसकी झुनझुनी और तेजी से बजने लगती और मेरे हृदय में और जोर से खुशी की धड़कन होने लगती. हर्षातिरेक में मैं भी दौड़ पड़ता और एक क्षण में कजाकी का कंधा मेरा सिंहासन बन जाता. वह स्थान मेरी अभिलाषाओं का स्वर्ग था.

स्वर्ग के निवासियों को भी शायद वह आंदोलित आनंद न मिलता होगा जो मुझे कजाकी के विशाल कंधों पर मिलता था. संसार मेरी आँखों में तुच्छ हो जाता और जब कजाकी मुझे कंधे पर लिए हुए दौड़ने लगता तब तो ऐसा मालूम होता मैं हवा के घोड़े पर उड़ा जा रहा हूँ. 

कजाकी डाकखाने में पहुँचता तो पसीने से तर रहता; लेकिन आराम करने की आदत न थी. थैला रखते ही वह हम लोगों को लेकर किसी मैदान में निकल जाता. कभी हमारे साथ खेलता, कभी बिरहे, गाकर सुनाता और कभी कहानियाँ सुनाता. उसे चोरी और डाके, मारपीट, भूत-प्रेत की सैकड़ों कहानियाँ याद थीं. मैं वे कहानियाँ सुनकर विस्मय आनंद मे मग्न हो जाता. उसकी कहानियों के चोर और डाकू सच्चे योद्धा होते थे, जो अमीरों को लूटकर दीन-दुखियों का पालन करते थे. मुझे उनपर घृणा के बदले श्रद्धा होती थी.

एक दिन कजाकी को डाक का थैला लेकर आने में देर हो गई. सूर्यास्त हो गया और वह दिखलाई न दिया. मैं खोया हुआ सा सड़क पर दूर तक आँखें फाड़-फाड़कर देखता था; पर वह परिचित रेखा न दिखलाई पड़ती थी. कान लगाकर सुनता था, ‘झुनझुनकी वह आमोदमय ध्वनि न सुनाई देती थी. प्रकाश के साथ मेरी आशा भी मलिन होती जा रही थी. उधर से किसी को आते देखता तो पूछता-कजाकी आता है ? पर या तो कोई सुनता ही न था या केवल सिर हिला देता था.

सहसा झुनझुन की आवाज कानों में आई. मुझे अँधेरे में चारों ओर भूत ही दिखलाई देते थे; यहाँ तक कि माताजी के कमरे में ताक पर रखी हुई मिठाई भी अँधेरा हो जाने के बाद मेरे लिए त्याज्य हो जाती थी. लेकिन वह आवाज सुनते ही मैं उसकी तरफ जोर से दौड़ा. हाँ, वह कजाकी ही था. उसे देखते ही मेरी विकलता क्रोध में बदल गई. मैं उसे मारने लगा, फिर रूठकर अलग खड़ा हो गया.

कजाकी ने हँसकर कहा, ‘‘मारोगे तो मैं एक चीज लाया हूँ, वह नहीं दूँगा.’’

मैंने साहस करके कहा, ‘‘जाओ, मत देना. मैं लूँगा ही नहीं.’’ 

कजाकी-‘‘अभी दिखा दूँ तो दौड़कर गोद में उठा लोगे.’’ 

मैंने पिघलकर कहा, ‘‘अच्छा, दिखा दो.’’ 

कजाकी-‘‘तो आकर मेरे कंधे पर बैठ जाओ, भाग चलूँ. आज बहुत देर हो गई है बाबूजी बिगड़ रहे होंगे.”

मैंने अकड़ कर कहा, ‘‘पहले दिखा.’’

मेरी विजय हुई. अगर कजाकी को देर का डर न होता और वह एक मिनट भी रुक सकता तो मेरा पासा पलट जाता. उसने कोई चीज दिखलाई जिसे वह एक हाथ से छाती से चिपटाए हुए था. लंबा मुँह था दो आँखें चमक रही थीं. 

मैंने उसे दौड़कर कजाकी की गोद से ले लिया वह हिरन का बच्चा था.

आह ! मेरी उस खुशी का कौन अनुमान करेगा ? तब से कठिन परीक्षाएँ पास कीं, अच्छा पद भी पाया; वह खुशी फिर न हासिल हुई. मैं उसे गोद में लिये, उसके कोमल स्पर्श का आनंद उठाता घर की ओर दौड़ा. कजाकी को आने में क्यों इतनी देर हुई, इसका खयाल ही न रहा. 

मैंने पूछा, ‘‘यह कहाँ मिला कजाकी ?’’

कजाकी-‘‘भैया, यहाँ से थोड़ी दूर पर एक जंगल है. उसमे बहुत से हिरन हैं. मेरा बहुत जी चाहता था कोई बच्चा मिल जाय तो तुम्हें दूँ. आज यह बच्चा हिरनों के झुंड के साथ दिखलाई दिया मैं झुंड की ओर दौड़ा तो सबके सब भागे. यह बच्चा भी भागा. लेकिन मैंने पीछा न छोड़ा. और हिरन तो बहुत दूर निकल गए, यही पीछे रह गया. मैंने इसे पक़ड़ लिया. इसी से इतनी देर हुई.’’ 

यों बाते करते हम दोनों डाकखाने पहुँचे. 

बाबूजी ने मुझे न देखा, हिरन के बच्चे को भी न देखा, कजाकी पर ही उसकी निगाह पड़ी. बिगड़कर बोले, ‘‘आज इतनी देर कहाँ लगाई ? अब थैला लेकर आया है, उसे क्या करूँ ? डाक तो चली गई. बता तूने इतनी देर कहाँ लगाई ?’’ 

कजाकी के मुँह से आवाज निकली. 

बाबूजी ने कहा, ‘‘तुझे शायद अब नौकरी नहीं करनी है. नीच है न, पेट भरा तो मोटा हो गया. जब भूखों मरने लगेगा तो आँखें खुलेंगी.’’ 

कजाकी चुपचाप खड़ा हो रहा. 

बाबूजी का क्रोध और बढ़ा. बोले, ‘‘अच्छा, थैला दे और अपने घर की राह ले. सूअर, अब डाक लेके आया है तेरा क्या बिगड़ेगा ! जहाँ चाहेगा, मजदूरी कर लेगा. माथे तो मेरे जाएगी, जवाब तो मुझसे तलब होगा.’’ 

कजाकी ने रुआसे होकर कहा, ‘‘सरकार अब कभी देर न होगी.’’ 

बाबूजी- ‘‘आज क्यों देर की, इसका जवाब दे ?’’

कजाकी के पास इसका कोई जवाब न था. आश्चर्य तो यह था कि मेरी जवान बंद हो गई. बाबूजी बड़े गुस्सावर थे. उन्हें काम करना पड़ता था, इसी से बात-बात पर झुँझला पड़ते थे. मैं तो उनके सामने कभी जाता ही न था. वह भी मुझे कभी प्यार न करते थे. घर में केवल दो बार घंटे-घंटे भर के लिए भोजन करने आते थे, बाकी सारे दिन दफ्तर में लिखा-पढ़ी करते थे. उन्होंने बार-बार एक सहकारी को लिए अफसरों से विनय की थी; कुछ असर न हुआ था.

यहाँ तक कि तातील (अवकाश) के दिन भी बाबूजी दफ्तर में ही रहते थे. केवल माताजी उनका क्रोध शान्त करना जानती थीं; पर वह दफ्तर में कैसे आतीं. बेचारा कजाकी उसी वक्त मेरे देखते-देखते निकाल दिया गया. उसका बल्लम, चपरास व साफा छीन लिया गया और उसे डाकखाने से निकल जाने की नादिरी हुक्म सुना दिया गया. आह ! उस वक्त मेरा ऐसा जी चाहता था कि मेरे पास सोने की लंका होती तो कजाकी को दे देता और बाबूजी को दिखा देता कि आपके निकाल देने से कजाकी का बाल भी बाँका नहीं हुआ. किसी योद्धा को अपनी तलवार पर जितना घमंड होता है

उतना ही घंमड कजाकी को अपनी चपरास पर था. जब वह चपरास खोलने लगा तो उसके हाथ काँप रहे थे और आँखों से आँसू बह रहे थे. और इस सारे उपद्रव की जड़ वह कोमल वस्तु थी, जो मेरी गोद में मुँह छिपाए ऐसे चैन से बैठी थी कि मानो माता की गोद में हो. 

जब कजाकी चला गया तो मैं धीरे-धीरे उसके पीछे चला.

मेरे घर के द्वार पर आकर कजाकी ने कहा, ‘‘भैया, अब घर जाओ; साँझ हो गई.’’ मैं चुपचाप खड़ा अपने आँसुओं के वेग को सारी शक्ति से दबा रहा था. कजाकी फिर बोला, ‘‘भैया, मैं कहीं बाहर थोड़े ही जा रहा हूँ फिर आऊँगा. फिर और तुम्हें कंधे पर बैठाकर कुदाऊँगा. बाबूजी ने नौकरी ले ली है तो क्या इतना न करने देगे. तुमको छोड़कर मैं कहीं न जाऊँगा, भैया ! जाकर अम्मा से कह दो, कजाकी जाता है. इसका कहा-सुना माफ करें.’’ 


मैं दौड़ा-दौ़ड़ा घर गया; लेकिन अम्माँजी से कुछ कहने के बदले बिलख-बिलखकर रोने लगा.
अम्माँजी रसोई से बाहर निकल कर पूछने लगीं, ‘‘क्या हुआ बेटा ? किसने मारा ? बाबूजी ने कुछ कहा है ? अच्छा, रह तो जाओ. आज घर आते हैं, पूछती हूँ. जब देखो, मेरे लड़के को मारा करते हैं. चुप रहो, बेटा, अब तुम उनके पास कभी मत जाना.’’ 

मैंने बड़ी मुश्किल से आवाज सँभालकर कहा, ‘‘कजाकी...’’ 

अम्मा ने समझा कजाकी ने मारा है. बोली, ‘‘अच्छा आने दो कजाकी को. देखो, खड़े-ख़ड़े निकलवा देती हूँ. हरकारा होकर मेरे राजा बेटा को मारे ! आज ही तो साफा, बल्लम-सब छिनवा लेती हूँ. वाह !’’
मैंने जल्दी से कहा, ‘‘नहीं, कजाकी ने नहीं मारा. बाबूजी ने उसे निकाल दिया उसका साफा, बल्लम छीन लिया; चपरास भी ले ली.’’ 

अम्माँ-‘‘यह तुम्हारे बाबूजी ने बहुत बुरा किया. वह बेचारा अपने काम में इतना चौकस रहता है. फिर भी उसे निकाला ?’’

मैंने कहा, ‘‘आज उसे देर हो गई थी.’’ 

यह कहकर मैंने हिरन के बच्चे को गोद से उतार दिया. घर में उसके भाग जाने का भय नहीं था. अब तक अम्माँजी की निगाह उस पर न पड़ी थी. उसे फुदकते देखकर वह सहसा चौंक पड़ीं और लपककर मेरा हाथ पकड़ लिया कि कहीं यह भयंकर जीव मुझे काट न खाए. मैं कहाँ तो फूटफूटकर रो रहा था और कहाँ अम्माँ की घबराहट देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ा.

अम्माँ- ‘‘अरे, यह तो हिरन का बच्चा है. कहाँ मिला ?’’ 

मैंने हिरन के बच्चे का सारा इतिहास और उसका परिणाम आदि से अंत तक कह सुनाया-‘‘अम्माँ, यह इतना तेज भागता था कि दूसरा होता तो पकड़ ही न सकता. सन-सन हवा की तरह उड़ता चला जाता था. कजाकी पाँच-छह घंटे तक इसके पीछे दौड़ता रहा, तब कहीं जाकर यह बच्चा मिला. अम्माजी कजाकी की तरह कोई दुनियाँ भर में नहीं दौड़ सकता. इसीसे तो देर हो गई. इसलिए बाबूजी ने बेचारे को निकाल दिया. चपरास, साफा, बल्लम-सब छीन लिया. अब बेचारा क्या करेगा ? भूखों मर जाएगा.’’

अम्माँ ने पूछा, ‘‘कहाँ है कजाकी ? जरा उसे बुला तो लाओ.’’ 

मैंने कहा, ‘‘बाहर तो खड़ा है. कहता था, अम्माँजी से मेरा कहा-सुना माफ करवा देना.’’ 

अब तक अम्माँजी मेरे वृत्तांत को दिल्लगी समझ रही थीं. शायद वह समझती थीं कि बाबूजी ने कजाकी को डाँटा होगा; लेकिन मेरा अंतिम वाक्य सुनकर संशय हुआ कि सचमुच तो कजाकी बरखास्त नहीं कर दिया गया. बाहर आकर कजाकीपुकारने लगीं. कजाकी का कही पता न था. मैंने बार-बार पुकारा लेकिन कजाकी वहाँ न था.

खाना तो मैंने खा लिया-बच्चे शोक में खाना नहीं छोड़ते, खासकर जब रबड़ी भी सामने हो-मगर बड़ी रात तक पड़े-पड़े सोचता रहा, मेरे पास रुपये होते तो एक लाख कजाकी को देता और कहता बाबूजी से कभी मत बोलना. बेचारा भूखों मर जाएगा. देखूँ, कल आता है कि नहीं. अब क्या करेगा आकर ? मगर आने को तो कह गया है. मैं उसे कल अपने साथ खाना खिलाऊँगा. 

यही हवाई किले बनाते-बनाते मुझे नींद आ गई.

(http://pustak.org से साभार)



Wednesday, August 11, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा: आगे का हिस्सा 7

कन्ज़रवेटर महोदय से फटकार

सितम्बर या अक्टूबर १९५६ में श्री के.सी. जैन ने कुमाऊं सर्किल के कन्ज़रवेटर फ़ॉरेस्ट्स का पद सम्हाला. इस दौरान मैं नौकरी में अपनी वरिष्ठता सम्बन्धी एक मामले को लेकर उपयुक्त माध्यमों से चीफ़ कन्ज़रवेटर फ़ॉरेस्ट्स, उत्तर प्रदेश तक अपनी बात पहुंचा चुका था. श्री जैन के पदभार सम्हालने के कुछ दिनों बाद मैं नैनीताल में उनके निवास उनसे मिलने गया. जैसे ही मैंने अपना मामला उनके सम्मुख रखा, श्री जैन नैनीताल में चारकोल और लकड़ी के प्रबन्धन में हो रही गड़बड़ियों को लेकर मुझ पर चिल्लाने लगे. वे बोले "तुम और तुम्हारे रेन्ज अफ़सर ने जब से (यानी १९५६ के शुरू से) काम सम्हाला है, सब कुछ चौपट कर डाला है." मुझे बाद में पता लगा कि वे मेरे रेन्ज अफ़सर से ज़्यादा ख़फ़ा थे बजाय मुझ से. उन्होंने मुझसे आगे पूछा कि मैं नैनीताल में क्यों पोस्टेड था जबकि मेरे जूनियर डिप्टी रेन्जर के तौर पर काम कर रहे थे. मैंने उन्हें अपने नन्हे बच्चों की शिक्षा की परेशानियों के बाबत बताया. ख़ैर, मैंने उन्हें सलाम किया और लौटते हुए मन ही मन अपने से कहा: "चौबेजी छब्बेजी बनने गए, दूबे ही रह गए." अगले साल मैंने जैन साहब द्वारा कैरेक्टर-रोल में मेरे बारे में लिखी टीप देखी: "अ वेरी स्मार्ट फ़ॉरेस्ट ऑफ़िसर, बट हिज़ सूटेबिलिटी एज़ एन आर. ओ. कैन नॉट बी सेड, अनलैस ट्राइड इन सम रेन्ज."

आकाशीय बिजली का प्रकोप

अन्तत: मुझे रेन्ज अफ़सर, बूम, टनकपुर के पद पर नियुक्त कर दिया गया. मई १९५८ में बूम प्रभाग समाप्त किए जाने के बाद मुझे एक माह की छुट्टी के बाद अस्थाई तौर पर रेन्ज अफ़सर, देवीधूरा (मुख्यालय धूनाघाट) का चार्ज मिला. दो ही महीने बाद मुझे रेन्ज अफ़सर असकोट बनाके शन्ट कर दिया गया. असकोट में पद सम्हालने से पहले मैंने अपने कन्ज़रवेटर साहिब से मुलाक़ात कर यह पूछ ही लिया कि यह पोस्टिंग स्थाई होगी या पिछले तबादलों जैसी क़तई क्षणभंगुर. इसके पीछे मेरी मंशा यह जानने भर की थी कि मुझे अपने परिवार को अपने साथ शिफ़्ट कर लेना चाहिये या नहीं. उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि मुझे अब तंग नहीं किया जाएगा. सो मेरा परिवार मेरे साथ असकोट आ गया. असकोट पहुंचने के बाद मेरा मुख्य दायित्व था वित्तीय वर्ष १९५८-५९ के समाप्त होने से पहले ही रेन्ज क्वार्टर की इमारत का निर्माणकार्य पूरा करवा लेना. इस कार्य को मैंने कर भी लिया. जून १९६१ तक असकोट में मेरा शान्तिपूर्ण निवास रहा.

जून २६, १९६१ की बात है. भीषण बारिश हो रही थी. तूफ़ान था और बिजली रह-रह कर चमकती थी. घर की चार दीवारों के बीच मुझ पर उस रात बिलजी गिर गई. इस घटना के विवरण मुझे बाद में मेरी पत्नी ने बतलाए. रात के क़रीब एक बजे हमारी सबसे छोटी बेटी उषा ने बाहर ले जाए जाने की नीयत से उसे जगाया था. मेरी पत्नी ने बच्ची को बाहर बरांडॆ के कोने में उसे ले जाकर बिठा दिया क्योंकि टॉयलेट काफ़ी दूर हुआ करता था. उसने अचानक उस जगह से एक बेहद चमकदार रोशनी को लपकते देखा जहां बच्ची बैठी हुई थी. वह डरकर भागती, चिल्लाती हुई वहां पहुंची कि कहीं बच्ची को कोई नुकसान न हो गया हो. उसे नहीं पता था कि उषा उसके पीछे पीछे आ रही थी. बाद में अन्दर पहुंचकर मेरा भिंचा हुआ चेहरा और टेढ़े हो गए हाथपैर देखकर उसे गहरा सदमा पहुंचा. डॉक्टर दास को बुलाया गया. हस्पताल रेन्ज क्वार्टर से कोई ३०-४० मीटर दूर था. मेरी पत्नी ने मुझे मुझे बाद में बताया कि होश आने में मुझे कोई घन्टे भर से ज़्यादा वक़त लगा.

जब मैं उस राह होश में आया, मैंने देखा कि लालटेन की रोशनी में मेरे परिवार के सदस्य और डॉक्टर दास मेरे गिर्द सिमटे हुए थे. उन दिनों बिजली का चलन नहीं था. डॉक्टर को देख कर मैंने पूछा कि क्या हुआ था तो अपने बंगाली लहज़े में वे बोले "शाक लौग गया है." उसके बाद जब मुझे दर्द का अहसास होना शुरू हुआ मैंने अपना दांयां हाथ अपनी दांईं पसलियों ने नीचे लगाया. मैंने पाया कि कोई चार सेन्टीमीटर व्यास का एक फफोला वहां उग आया था. उन दिनों हमारे पास एक कॉकर स्पैनीएल पिल्ला था जो मेरी खाट के नीचे सोया करता. वह भी बिस्तर से तब बाहर आया तक़रीबन जिस वक़्त मुझे होश आ रहा था. सम्भवतः बिजली उस पर भी गिरी थी.

उन दिनों रेडियो चलाने के लिए तांबे के एन्टीना लगाने पड़ते थे. हमारा वाला छत की पूरी लम्बाई पर फ़िट किया गया था. रेडियो को अलग से अनअर्थ किया जाना होता था. आमतौर पर ऐसा कोयला भरे हुए गड्ढों की मदद से किया जाता था. इस हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी मेरी थी क्योंकि मैंने अनअर्थिंग के ज़रूरी काम पूरे नहीं किये थे.

अगली सुबह यह पाया गया कि हमारी रसोई के पिछवाड़े की दीवार खुल गई थी और भीतर रखे तांबे के एक बड़े बरतन में खरोंच आ गई थी. मुझे अब भी लगता है कि आकाशीय बिजली को तांबे के उस बरतन ने अर्थ कर लिया होगा. बिजली के बाक़ी हिस्सों की अर्थिंग तांबे के तार से बने एन्टीना से होकर हमारे मरफ़ी रेडियो सैट के द्वारा हुई होगी जो मेरे सिर के नज़दीक एक अल्मारी पर रखा हुआ था. उसी सुबह यह भी पाया गया कि मेरे माथे से होकर मेरी पीठ तक जलने के निशान की एक पतली लकीर देखी जा सकती थी. जो भी हो यह एक चमत्कार था कि मैं बच गया. बाद में मुझे पता चला कि उसी रात टेहरी सर्किल में तूनी, चकराता में पोस्टेड एक रेन्ज अफ़सर अपने मकान में घुसते ही बिजली गिर जाने से अपनी जान गंवा बैठा था, जिसे उन दिनों वह चीड़ के पेड़ों के चिन्हीकरण में मुब्तिला होने के कारण आबाद किए था.

सुबह मैं हमेशा की तरह तरोताज़ा था. मैं रोज़ ही अपना अख़बार इन्डियन एक्सप्रेस लेने पोस्टऑफ़िस जाया करता था जिसे मैं १९५१ से ही पोस्ट पार्सल के मार्फ़त प्राप्त कर रहा था. जब मैं पिछली रात के हादसे के बारे में असकोट के पोस्टमास्टर को बतला रहा था, स्पेशल पुलिस फ़ोर्स के रेडियो स्टेशन अफ़सर तिवारी जी भीतर घुसे. मेरी बात सुनकर वे लतीफ़ाना अन्दाज़ में बोले "आज किस पर बिजली गिरी?" जीवन ऐसा ही होता है. असल बात तो यह है कि आप उसे कैसे लेते हैं.

१ जून १९६१ को मुझे फ़ॉरेस्ट रेन्जर के तौर पर पदोन्नत कर दिया गया.

(जारी)

Saturday, August 7, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा: आगे का हिस्सा 6

कर्तव्यनिष्ठता की एक मिसाल

१९५१ में मुझे नैनीताल के चीना पीक (जिसे अब नैना पीक कहा जाता है) की चीना चौकी मुख्यालय में स्थानान्तरित कर दिया गया. यहां मैं मई १९५४ तक रहा.

मैं अपने डी.एफ़.ओ. श्री वी. पी. अग्रवाल से सम्बन्धित कुछ बातें बताना चाहूंगा. वे खासे अनुशासनप्रिय अधिकारी थे - काम के प्रति समर्पित और मानवीयता का सम्मान करने वाले. उनकी जिस इकलौती बात ने मुझे प्रभावित किया वह ये थी कि मैं जितने भी अफ़सरों के सम्पर्क में आया था, वन-संरक्षण के प्रति श्री अग्रवाल का रवैया उन सब में सर्वाधिक अनुकरणीय था. गर्मियों के दिनों जब वे मुख्यालय में होते थे, नैनीताल के आसपास किसी भी स्थान पर जंगल में आग लगने की सूचना मिलते ही वे किराये पर घोड़ा लेकर अपने अर्दली के साथ मौके पर पहुंच जाया करते.

१९५२ में मुझे डिप्टी रेन्जर के पद पर पदोन्नत किया गया.

मई १९५३ में नैनीताल के नज़दीक लड़ियाकांटा की चोटी पर आग लगी. मैं स्थानीय फ़ॉरेस्ट गार्डों और अन्य स्टाफ़ के साथ तुरन्त उस तरफ़ निकल पड़ा. उन दिनों फ़ॉरेस्टर ट्रेनिंग के प्रशिक्षार्थी ओक पार्क, नैनीताल में ठहरे हुए थे. हमारे डी. एफ़. ओ. इन सभी को मौके पर भेज पाने में कामयाब रहे. प्रशिक्षार्थी सुबह दस बजे तक मेरे पास पहुंच गए थे. वे मेरे साथ दोपहर एक बजे तक रहने के बाद वापस अपने कैम्प चले गए.

हम लोग आग के एक हिस्से पर काबू पा सके और उसे रिज के उत्तरी हिस्से की तरफ़ बढ़ने से रोक पाए थे. शाम होते होते आगे नीचे चट्टानी हिस्से तक पहुंच गई थी. हमने आपस में मशविरा कर के यह फ़ैसला लिया कि चूंकि अब आग पर काबू पाना आसान होगा और रात के समय इस काम में लगे रहना बेवकूफ़ी होगी क्योंकि कोई भी रात के अन्धेरे में फिसल कर अपने को चोट पहुंचा सकता था. सो हमने रांची गेस्टहाउस में रात बिताकर सुबह दोबारा कार्य शुरू करने का फ़ैसला लिया.

आधी रात के बाद हमने "डिप्टी साब! डिप्टी साब!" की पुकारें सुनीं. मैं समझ गया अग्रवाल साहब अपने मुआयने पर निकले हुए हैं और उनका अर्दली मुझे पुकार रहा है. मैंने अपने साथ के लोगों को जगाया और तुरन्त पाइन्स (नैनीताल) की दिशा में बढ़ने को कहा. वहां पहुंचने पर मैंने उनसे सड़क के किनारे लगे पैरापिटों पर लेट जाने को कहा. ईसाई कब्रिस्तान की दिशा से "डिप्टी साब! डिप्टी साब!" की पुकारें आईं. मैंने साहब और उनके अर्दली के अपने से कुछ गज की दूरी तक आने का इन्तज़ार किया. मैं अचानक उठ बैठा जैसे गहरी नींद में सोया होऊं.

श्री अग्रवाल ने सीधे मुझपर झल्लाते हुए कहा कि मैंने फ़ॉरेस्टर ट्रेनिंग के प्रशिक्षार्थियों को वापस क्यों जाने दिया. मैंने जवाब दिया कि मैंने पूरी कोशिश की पर लड़कों के लिए बिना भोजन के वहां रुक सकना सम्भव न था. फिर मैंने थोड़ा ऊंची आवाज़ में कहा कि अफ़सरान आग से जूझने वालों की समस्याओं को नहीं समझ सकते. उसके बाद मैंने उन्हें नीचे लगी आग दिखाते हुए कहा कि चट्टानी इलाके में लगी होने के कारण उस वक़्त उसे बुझा पाना सम्भव नहीं होगा. मैंने उन्हें यकीन दिलाया कि सुबह आग पर काबू पा लिया जाएगा. उनकी समझ में मेरी बात आ गई और उन्होंने हमसे उनके पीछे पीछे आने को कहा. रात का बाकी हिस्सा हमने पुनः रांची गेस्टहाउस में बिताया. पाठकगण अनुमान लगा सकते हैं कि श्री अग्रवाल अपने निवास, प्रायरी, में सुबह तीन बजे के आसपास पहुंच सके होंगे.

काम के प्रति समर्पण का इस से बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है?

स्टेशन डिप्टी रेन्जर के तौर पर काम करते हुए मुझे काफ़ी लाभ हुआ. मैंने नक्शे बनाना, नई इमारतों और सड़कों के एस्टीमेट बनाना, इन कार्यों को पूर्ण करना, नैनीताल नगर के लिए चारकोल और जलाने की लकड़ी का प्रबन्धन करना और मंडल कार्यालय के सारे कार्यों को करना सीखा. यह सब मैंने अपने रेन्ज अफ़सर श्री आलम सिंह जी के निर्देशन में सीखा. मंडलीय कार्यालय का सारा कार्य आमतौर पर असिस्टैन्ट कन्ज़रवेटर फ़ॉरेस्ट्स द्वारा किया जाता था.

यहां से मई १९५४ में मेरे तबादले लीसा डिपो अफ़सर काठगोदाम और उसके बाद १९५५ में रेन्ज असिस्टैन्ट के पद पर मनोरा रेन्ज में हुए. अक्टूबर १९५५ में वहां से मुझे पुनः नैनीताल बतौर स्टेशन ड्यूटी डिप्टी रेन्जर तैनात कर दिया गया. मैंने वहां दो साल और गुज़ारे.

मुख्य सचिव की पत्नी से मुलाकात

१९५६ की गर्मियां थीं जब कुमाऊं सर्किल के तत्कालीन कन्ज़रवेटर श्री जी. एन. सिंह ने मुझसे कोयले के चूरे की बाबत उत्तर प्रदेश के तत्कालीन प्रमुख सचिव श्री ए.एन. झा की पत्नी से मिलने को कहा. जब मैं वहां गया तो श्रीमती झा ने एक बोरे में आधे भरे हुए कोयले के चूरे की तरफ़ इशारा करते हुए पूछा : "इसका क्या किया जाए?" मैंने जवाब दिया : "हमारे यहां स्थानीय लोग इसे गोबर में मिला कर उपले बनाते हैं और घर गर्म करने में इस्तेमाल करते हैं." क्या आप कल्पना कर सकते हैं मैं किस कदर बेवकूफ़ आदमी था? मुझे श्रीमती झा की बात में छुपे इशारे को समझ लेना था और चूरे को ले जा कर उसके बदले अच्छा स्तरीय कोयला पहुंचा देना था. लेकिन मेरी परवरिश इस तरह हुई थी कि मैं आदतन सही को सही और गलत को गलत कहा करता. क़िस्मत से मुझे अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इस बाबत कुछ सुनने को नहीं मिला जो श्री झा के अच्छे मित्रों में थे.

Friday, August 6, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा: आगे का हिस्सा 5

फ़ॉरेस्टर ट्रेनिंग (१९४८-१९४९)

फ़ॉरेस्टर ट्रेनिंग के लिए चयनित इक्कीस लोगों में मेरा नाम भी था. हमें १ अक्टूबर तक फ़ॉरेस्टर्स ट्रेनिंग की कक्षाओं के लिए आल्मा लॉज पहिंचने को कहा गया. यह सेन्ट लो रिज पर अवस्थित एक दुमंज़िला इमारत थी. वहां हमें १५ नवम्बर तक रहना था. हमारी दिनचर्या में सुबह सात से आठ तक परेड होती थी. दस से चार तक कक्षाएं होती थीं जिनके बीच एक घन्टा लंच का होता था. उसके बाद हम लोग फ़्लैट्स में घूमा करते थे.

तत्पश्चात हम लोग फ़ील्ड ट्रेनिंग के लिए हल्द्वानी चले गए. यहां एक बड़ा फ़र्क़ यह था कि अब से हमें डबल फ़्लाई तम्बुओं में रहना था. एक तम्बू में तीन लोगों ने रहना था. यहां से हमें बरेली ले जाया गया जहां हमें बरेली के आसपास वनाधारित उद्योगों से परिचित कराया गया. बरेली के बाद हमें पश्चिमी और पूर्वी सर्किलों में साल के जंगलों का भ्रमण करवाया गया. इसके बाद हमें एक पखवाड़े की फ़ील्ड इंजीनियरिंग ट्रेनिंग के लिए रुड़की के बंगाल इन्जीनियरिंग ग्रुप सेन्टर ले जाया गया. रुड़की में हमारा प्रशिक्षण सेना के अधिकारियों की देखरेख में हुआ. यहां से हम देहरादून गए जहां फ़ील्ड अभियानों के साथ साथ हमने फ़ॉरेस्ट रिसर्च इन्स्टीट्यूट भी देखा. यह संस्थान एक विशाल लैन्डस्केप में फैला हुआ था और अपने शिल्प और वहां प्रदर्शित काष्ठ वस्तुओं के कारण यादगार था. अप्रैल से हमारा ग्रुप पहाड़ में चीड़ सिल्वीकल्चर समझने के लिए एक माह पहाड़ों में शिफ़्ट हुआ. १५ मई १९४९ को हम अपनी ट्रेनिंग के अन्तिम हिस्से के लिए वापस आल्मा लॉज पहुंचे. जुलाई १९४९ के पहले सप्ताह में कुछ परीक्षाओं और न्यू क्लब में हुए उपाधि-वितरण समारोह के बाद ट्रेनिंग समाप्त हो गई. इस ट्रेनिंग के बारे में ग़ौर करने पर मुझे अहसास हुआ कि इस ट्रेनिंग में आदमी हरफ़नमौला तो बन जाता है पर उसे महारत किसी क्षेत्र में हासिल नहीं होती.

कन्ज़रवेटर के साथ कार में

दिसम्बर के महीने में मेरे रेन्ज अफ़सर ने मुझसे कुमाऊं सर्किल के कन्ज़रवेटर मिस्टर जे. स्टीफ़ेन्स की सेवा में उपस्थित होकर उन्हें अपने साथ रामगढ़ से भवाली के पी डब्लू डी डाकबंगले तक लाने को कहा, क्योंकि वे स्वयं नैनीताल के डीएफ़ओ मिस्टर डब्लू. एफ़. कॉम्ब्स के साथ व्यस्त थे.

मैं पैदल रामगढ़ के लिए रवाना हुआ और नियत समय पर वहां पहुंच गया. कन्ज़रवेटर महोदय का अर्दली कैम्प-किट को टट्टुओं पर लाद कर भवाली लेकर जा रहा था. ड्राइवर ले अलावा कार में बैठने वाले हम दो ही लोग थे. औपचारिकता का तकाज़ा था कि मुझे गाड़ी में ड्राइवर की बगल में बैठना था, लेकिन इन नियम क़ायदों से अनभिज्ञ मैं अपनी टोपी लगाए लगाए कन्ज़रवेटर महोदय के साथ बैठ गया.

हमने बमुश्किल दस किलोमीटर का फ़ासला तय किया था जब कन्ज़रवेटर महोदय खरखराती आवाज़ में मुझसे पूछा : "क्या यह तुम्हारा आधिकारिक हैडगीयर है?" मैंने हिम्मत जुटाते हुए जवाब दिया : "नहीं सर नहीं है. मैं इसे इसलिए पहने हूं कि यह हमारे आधिकारिक हैडगीयर से अधिक सुविधाजनक है. सूत की भारी पगड़ी बेहद अटपटी होती है." कन्ज़रवेटर महोदय ने तुरन्त कहा : "तुम सही हो. पगड़ी पुराने समय के लिए ठीक थी जब लोग उसे रस्सी की तरह भी इस्तेमाल कर लेते थे." मैंने राहत की सांस ली क्योंकि मैं डांट खाने से बच गया था.

Thursday, August 5, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा: आगे का हिस्सा 4


आग अभी बसासत से दूर थी. उस से निबटने को मेरे साथ केवल छः लोग थे और हम भवाली सैनेटोरियम से लगे जंगल को बचाने के प्रयास में जुटे हुए थे. जलते हुए लठ्ठों और चिंगारियों के कारण आग से जुझना मुश्किल हो रहा था. चूंकि हम रात का भोजन खाए बिना ही आ गए थे, हमने अपने साथ के दो लोगों को नज़दीक के गांव से कुछ खाना-पानी लेकर आने को कहा. सारे सद्प्रयासों के बावजूद हम सिर्फ़ इतना कर पा रहे थे कि दर्शक बने रहते हुए जलते हुए लकड़ी के टुकड़ों को सड़क पर आने से रोक रहे थे. सम्भवतः हम ने बारी बारी कुछ देर को नींद भी निकाली. इस समूचे मसले का दुखद पहलू यह था कि उन दिनों हमारे रेन्ज अफ़सर महोदय कैज़ुअल लीव पर गए हुए थे.

अगली सुबह चन्द और ग्रामीणों की मदद से हमने एक सूखे नाले से सटे बांज के जंगल में लगी आग को बुझाने का काम शुरू किया. इसके अलावा हम इस बात की निगरानी भी कर रहे थे कि चिंगारियां सुरक्षित इलाके को नुकसान न पहुंचा सकें. यह कार्य शाम तक चलता रहा. हम सब बेतरह थक चुके थे. उस रात हम एक नज़दीकी गांव में रहे जहां हमें अपनी नींद पूरी कर पाने का समय मिल सका. तीसरी सुबह मैंने देखा कि आग पर तकरीबन काबू पाया जा चुका था. इलाके की निगरानी करते हुए मैंने पहाड़ी से नीचे उतरते एक सन्देशवाहक को देखा. उसने पास आकर मुझे बताया कि उत्तर प्रदेश के चीफ़ कन्ज़रवेटर श्री एम. डी. चतुर्वेदी और कुमाऊं के कन्ज़रवेटर श्री जे. स्टीफ़ेन्स भवाली सैनेटोरियम कैम्पस के नज़दीक एक रिज पर मौजूद थे और मैंने तुरन्त उन्हें रिपोर्ट करना था. चूंकि मेरे तात्कालिक उच्चाधिकारी अनुपस्थित थे, मेरे कार्य की किसी भी कमी के लिए मुझे बचाने वाला कोई न था. ऊपर चढ़ते हुए मैंने अनुमान लगाया कि सम्भवतः भयभीत होकर भवाली सैनेटोरियम के सुपरिन्टेन्डैन्ट ने आला अफ़सरान को सूचित कर दिया होगा.

चूंकि उन दिनों नैनीताल राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी, हमारे विभाग के उच्चाधिकारियों से मामले को गम्भीरता से देखने को कहा गया होगा. ढाई दिनों तक आग से लड़ते हुए मेरा चेहरा काला पड़ा हुआ होगा और मेरे बालों और कपड़ों की दुर्गति अलग. मुझे ठीकठीक याद नहीं मुझसे क्या पूछा गया और मैंने क्या जवाब दिए. चूंकि उच्चाधिकारियों के सामने मैं आदतन मुखर रहा करता था मैंने ढाई दिन तक की मशक्कत और तनाव को लेकर काफ़ी कुछ कहा होगा. बाद में मुझे पता चला कि हमारे रेन्ज अफ़सर से अनुपस्थित होने के बाबत स्पष्टीकरण मांगा गया क्योंकि कैज़ुअल लीव को हमेशा ऑन-ड्यूटी माना जाता था. चीफ़ कन्ज़रवेटर ने लिखित में कहा कि उनका सामना एक बेवकूफ़ अफ़सर यानी मुझसे हुआ था.

जून के तीसरे हफ़्ते में मानसून से पहले की बारिश की मुझे आज तक याद है. हम उस दिन भी आग बुझाने में लगे हुए थे. बारिश के आने पर हम खुशी में झूम उठे और आत्मा तक उसके नीचे भीगते रहे. १९४८ के वनाग्नि काल का यह अन्त था.

Wednesday, August 4, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा: आगे का हिस्सा 3

ए आई एफ़ सी कक्षाओं का संचालन

जनवरी १९४८ में ऑफ़िसर-इन-चार्ज श्री शौरी के निर्देशन में ए आई एफ़ सी की १९४७-४९ कक्षा का प्रशिक्षण दौरा चल रहा था. वे लोग भवाली की मिलिट्री बैरकों में कैम्प किये हुए थे. मुझे चारकोल बर्निंग पर उन्हें प्रशिक्षण देने को कहा गया. नदी की धारा के बगल में स्थित होने के कारण मिलिट्री की बैरकें पाले से अटी रहती थीं. सारा इलाका जंगल से ढंका हुआ था और चारों तरफ़ सफ़ेदी नज़र आती थी. जब दोनों प्रशिक्षक कैम्प पहुंचे तो जब श्री शौरी ने पाया कि कुछ प्रशिक्षणार्थियों ने ऊन या चमड़े के दस्ताने पहने और थे सिर और गले भी ढंक रखे थे तो वे बहुत तेज़ आवाज़ में चिल्लाए: "इसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता! फ़ॉरेस्ट ट्रेनिंग अफ़सरों ने दस्ताने वगैरह पहने हुए हैं! उतारिये इन्हें!" अगले दिन मैं उन्हें नज़दीकी चीड़ के जंगल तक ले गया जहां मैंने उन्हें लीसा निकालने का तरीका बताने के साथ साथ कुमाऊं के लीसा उद्योग के इतिहास पर एक भाषण भी दिया. तीसरे दिन हम लोग नैनीताल और उसके आसपास के इलाके के भ्रमण के लिए गए. मुझे यह सब अच्छा लग रहा था क्योंकि बिना प्रशिक्षण के सिर्फ़ सवा साल की नौकरी के बाद भी मैं यह सब कर पा रहा था. इसके अलावा मेरा उठना बैठना बेहतर और स्तरीय लोगों के साथ हो रहा था. बाद के वर्शों में इन में से तीन प्रशिक्षणार्थियों के मातहत मुझे काम करने का अवसर मिला. ये थे श्री पी.सी.चटर्जी और श्री डी.सी.पाण्डे मेरे डी एफ़ ओ रहे थेजबकि श्री सी.एल.भाटिया चीफ़ कन्ज़रवेटर ऑफ़ फ़ॉरेस्ट, उ.प्र.

आग का मौसम - १९४८

यह साल मेरे लिए अविस्मरणीय था क्योंकि अप्रैल से जून के बीच मुझे चीड़ के इलाके में कुल अट्ठाइस वनाग्नियों से जूझना पड़ा. होता यह था कि जब तक हमारा स्टाफ़ गांव वालों की मदद से एक आग को बुझाता सामने की पहाड़ी पर दूसरी आग जलनी शुरू हो जाया करती. उस तरफ़ दौड़ पड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता था. कुछ घन्टों के बाद उसी पहाड़ी के किसी और हिस्से में आग की खबर मिलती. इस काम को करने के लिए काफ़ी तेज़ तेज़ पैदल चढ़ना और उतरना पड़ता था. कई बार स्टाफ़ को हकधारी ग्रामीणों के आने का इन्तज़ार करना पड़ता. समय की कमी के कारण ऊपरी हिस्सों में खासी आग लग जाया करती थी. अग्निशमन के इस काम में दिन-रात कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी.

चीफ़ कन्ज़रवेटर ऑफ़ फ़ॉरेस्ट और कन्ज़रवेटर ऑफ़ फ़ॉरेस्ट का अग्निपीड़ित स्थलों का दौरा

मई के महीने के मध्य में मुझे सूचना मिली कि पाइन्स-भवाली पैदल मार्ग पर चीड़ के जंगलों में आग लग गई है. एक स्थानीय फ़ॉरेस्ट गार्ड, बाकी स्टाफ़ और दो फ़ायर-वाचर्स के साथ मैं तुरन्त निकल पड़ा. वहां पहुचने में हमें एक घन्टा लग गया होगा. ऊपर की तरफ़ बढ़ रही आग तब तक रास्ते को पार कर लड़ियाकांटा रिज की तरफ़ बढ़ रही थी.

Sunday, August 1, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा: आगे का हिस्सा २

भर्ती बोर्ड

उक्त पद के लिए नुझे १६ अगस्त १९४६ को एक मौखिक साक्षात्कार हेतु ग्लेनथॉर्न, चीफ़ कन्ज़र्वेटर के दफ़्तर पहुंचने का निर्देश प्राप्त हुआ. भर्ती बोर्ड में तीन सदस्य थे - मि. सॉल्वोय, डाइरेक्टर रिलीफ़ एन्ड रिहैबिलिटेशन उ.प्र. और मि. डब्लू. टी. हिल, सीसीएफ़, उ.प्र. नामक दो ब्रिटिश आई सी एस और आई एफ़ एस जो अपने महकमों के मुखिया थे और तीसरे मि. एम. डी. चतुर्वेदी जो सबसे वरिष्ठ भारतीय आई एफ़ एस थे और उन दिनों कन्ज़रवेटर ऑफ़ फ़ॉरेस्ट्स वेस्टर्न सर्किल के पद पर कार्यरत थे. बाद में मि. चतुर्वेदी पहले या दूसरे इन्सपैक्टर जनरल ऑफ़ फ़ॉरेस्ट्स के पद पर भी रहे थे. यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उन दिनों वन विभाग का वेतनमान रु. ३०-१-४५ हुआ करता था जो सेना के रु. ७० से अधिक की तुलना में बहुत कम था. जहां तक मुझे याद है कुल पन्द्रह चुने गए प्रत्याशियों में मैं एक था. मुझे भवाली रेन्ज में भवाली हैडक्वार्टर में तैनात किया गया.

फ़ॉरेस्ट सबॉर्डिनेट सर्विस में प्रवेश

मैं नियत तारीख को ड्यूटी पर पहुंच गया. मेरे साथ मेरी पत्नी भी आई थी और मुझे तीन कमरों का एक निवास मिला था. कुछ दिन तक मैंने रेन्ज ऑफ़िस में काम किया और एक दिन मेरे रेन्ज ऑफ़िसर ने मुझे सड़कों और भवनों की मरम्मत के अनुमानित खर्चों का विवरण (एस्टीमेट) तैयार करने को कहा. सच तो यह है कि तब तक मैंने एस्टीमेट शब्द का नाम भी नहीं था. मैंने इस बाबत अपने रेन्ज ऑफ़िसर से पूछा. उन्होंने मुझे सब समझाया. करीब एक सप्ताह के बाद मैं रेन्ज में अपने सारे काम कर रहा था - ग्रामीणों के अधिकारों और उनकी छोटी छोटी ज़रूरतों का हिसाब रखने से लेकर एस्टीमेट बनाने और चीड़ के जंगलों में नियन्त्रित आग लगाने तक. मेरी दिनचर्या तकरीबन रोज़ यह रहती थी कि मैं सुबह घर से खाना खाकर निकलता और शाम को ही लौटता.

एक दिन मुझे पता लगा कि वायरलैस के ज़माने के मेरे कुछ साथियों को देहरादून रेन्ज में रेन्जर्स कोर्स १९४७-४९ के लिए केवल इन्टरव्यू के आधार पर ही चुन लिया गया है. मुझे अपने आप पर बहुत गुस्सा आया. बाद में मुझे अहसास हुआ कि यह मेरी बेबात की शिकायत थी. ऐसा मेरे लिए भी तब सम्भव होता जब मैंने इस सिलसिले में अप्रैल १९४६ से ही प्रयास शुरू कर दिए होते यानी अपनी अर्ज़ी को सिर्फ़ फ़ॉरेस्टर की नौकरी तक ही सीमित न रख कर उसे विभिन्न विभागों में पहुंचाया होता. मैंने इसके लिए अपनी अपरिपक्वता और सूचना के अभाव को दोषी ठहराया. मैंने मार्च १९४७ में होने वाले इन्टरमीडियेट बोर्ड के सप्लीमेन्ट्री इम्तहान के लिए अनुमति हासिल की और उसे उत्तीर्ण भी कर लिया.

बाद में मुझे यह भी पता चला कि जो राडार ऑपरेटर पदावनति के बावजूद वायुसेना में बने रहे थे, उन्हें आज़ादी के बाद दोबारा उसी वेतनमान और उसी पद पर वापस बुला लिया गया था. राडार का अविष्कार दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हुआ था जिसकी मदद से जर्मनी की लगातार बमबारी से इंग्लैण्ड कई बार बचा. राडार जर्मन जहाज़ों की टोह ले लेते थे और उन्हें आर ए एफ़ फ़ाइटरों की मदद से ध्वस्त कर दिया जाता था.

जीवन उसी सरकारी ढर्रे पर चल रहा था.

Saturday, July 31, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा - आगे का हिस्सा १

मुझे तीसेक साल पहले अपने मकान की चार दीवारों के भीतर अपने पिताजी के साथ बैठकर बातचीत करना याद आता है. ठीक जैसा मैं अब हूं वे भी अपने जीवन की गोधूलि में थे. उन्होंने ऐसे ही एक दिन कहा: "त्रिलोक, बढ़ती उम्र के साथ साथ जीवन के महत्वपूर्ण घटनाएं चाहे वे प्रीतिकर हों या कड़वी किसी फ़िल्म की तरह स्क्रीन पर नज़र आने जैसी लगती हैं मानो वे अभी हाल में ही घटी हों." इधर पिछले तीन सालों से मैं तकरीबन यही अनुभव कर रहा हूं. मुझे लगता है कि कुछ अपवादों को छोड़कर इसमें हर व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ अच्छी चीज़ें निहित रहती हैं. मैं काफ़ी समय से लगातार इस सम्बन्ध में विचार करता रहा हूं. आखिरकार मैं उन्हें मोटे मोटे विवरणों में याद करने की कोशिश कर रहा हूं. ये सब मेरी नौकरी के समय से सम्बन्धित हैं.

१९४३ में मैंने अल्मोड़ा के सरकारी इन्टरमीडियेट कॉलेज से इन्टरमीडियेट साइंस और प्री बोर्ड का इम्तहान दिया था. मैं इसमें उत्तीर्ण न हो सका अलबत्ता मुझे अंग्रेज़ी की सप्लीमेन्ट्री परीक्षा के लिए योग्य घोषित कर दिया गया. आज़ादी से पहले इस तरह के अभ्यर्थियों को उस एक विषय की परीक्षा में बैठने का अवसर अगले साल मिलता था, जबकि आज के समय में सप्लीमेन्ट्री की परीक्षा दो महीनों में हो जाया करती है. मेरे मामले में यह परीक्षा १९४४ में होती. उन दिनों हमारा परिवार भीषण दारिद्र्य से रूबरू था और मैं एक साल रुक कर और उसके बाद नौकरी तलाशने की बात सोच भी नहीं सकता था.

चूंकि वह दूसरे विश्वयुद्ध का दौर था, सार्वजनिक विभागों की नौकरियां युद्ध से लौटकर आने वालों के लिए खाली रखी जाती थीं. इसलिए मेरे पिता जी ने मुझे राय दी कि मैं सशस्त्र सेना में भर्ती हो जाऊं. वे मेरे साथ सेना भर्ती कार्यालय तक भी आए. हमने ३५ किलोमीटर की यात्रा दो दिनो में तय की क्योंकि उन दिनों अल्मोड़ा और बागेश्वर के बीच कोई मोटर मार्ग नहीं था. वहां मुझे रॉयल इन्डियन एयर फ़ोर्स में ग्राउन्ड टैक्नीशियन (पहले वायरलैस फिर राडार ऑपरेटर) के तौर पर भर्ती कर लिया गया. मेरी उम्र तब कुल साढ़े सोलह थी. १९४३ और १९४६ के बीच मैंने वायुसेना में दो साल और सात महीने काम किया.

युद्ध के समाप्त हो जाने पर १९४५ के अन्त में मैंने दो कारणों से वायुसेना से स्वैच्छिक सेवामुक्ति के लिए आवेदन किया. पहला तो यह कि १९४५ के मध्य में १८ की आयु में मेरा विवाह होने वाला था. दूसरा यह कि मेरे सामने दो विकल्प रख दिए गए थे - या तो मैं सेवामुक्ति स्वीकार कर लूं या एक लोअर ग्रेड लिपिक का पद ग्रहण करूं. मैंने पहला विकल्प चुन लिया. तीन माह का सवेतन अवकाश लेकर मैंने अप्रैल १९४६ में अल्मोड़ा के क्षेत्रीय रोजगार कार्यालय में फ़ॉरेस्टर के पद के लिए अपने को पंजीकृत करवा लिया, जैसा कि सैन्य सेवाओं से लौटने वालों के लिए निर्देशित था.

Friday, July 30, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा - आगे का हिस्सा कल से जारी

आप लोगों के इसरार पर मेरे दोस्त कुंवर साहब ने अपनी आगे की कहानी लिखना स्वीकार कर लिया है. फ़िलहाल वे आज आकर मुझे चार-पांच पन्ने लिख कर दे गए हैं और साथ ही उन्होंने अपनी कुछ पुरातन तस्वीरें मुझे स्कैन करने को दीं.

आज की पोस्ट में मैं सिर्फ़ उनकी दो तस्वीरें लगा रहा हूं. दोनों १९४३ की हैं. पहली इन्टर पास करने के बाद की है. दूसरी रॉयल एयरफ़ोर्स में नौकरी पर चले जाने के बाद की.

कल से आगे की कहानी चालू. कितने दिन यह कहानी चलेगी, कुंवर साहब को मिलने वाली फ़ुरसत पर निर्भर करेगा. वे अगले माह पिचासी साल के होने वाले हैं और मैं उन पर ज़्यादा बोझा डालना नहीं चाहता. फ़िलहाल मिलिये कथानायक से.



Monday, July 26, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा - अन्तिम हिस्सा

पिता और दोस्त

जैसे जैसे मैं बड़ा हो रहा था धीरे धीरे किशोरावस्था से ही बाबू और मेरे बीच दोस्ताना सम्बन्ध बनने शुरू हुए क्योंकि दूसरों से मेरा व्यवहार प्रीतिकर होता था, ठीक यही बात बाबू ले लिए कही जा सकती है जो मुझे बेहिचक अपने बीते समय के बारे में बताया करते थे, जिनमें मेरे बचपन के दुखों की दास्तानें छिपी हुई होती थीं.

मैं उन्हें अपने छात्रावास के दिनों के बारे में बताया करता जो मेरे लिए किसी पालने की तरह था. मैं उन्हें बचपन से ही अपनी आज़ादी के बारे में बताया करता था जिसमें "ये मत करो, वो मत करो" के लिए कोई जगह न थी. मैं उन्हें उन परिवारों के बारे में बताता था जिनके साथ मैं रहा था कि किस तरह वे मुझ पर लाड़ जताते थे और अपने बच्चों की तरह मेरा खयाल करते थे.

थोड़े शब्दों में कहूं तो बावजूद तमाम अभावों के वह मेरे जीवन का अविस्मरणीय समय था. बाद में रॉयल इन्डियन एयरफ़ोर्स में एक सामान्य एयरमैन की हैसियत से जब मैं नौकरी कर रहा था बाबू की चिठ्ठियों में लिखा रहता था : "तुम मेरे जीवन की इकलौती चमकीली रेखा हो. अगर तुम न होते तो मैं पागल हो गया होता. तुम अपनी मां के मूल्यों का प्रतिरूप हो." मुझे इस बात से बहुत तसल्ली मिलती है कि कि उनके जीवन के सबसे गहन समय में मैं उन्हें नैतिक सहारा दे सका.

एयरमैन के तौर पर नियुक्ति

हमारे परिवार की निर्धनता के कारण बाबू को विवश होना पड़ा कि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान मुझे रॉयल इन्डियन एयरफ़ोर्स में भर्ती करें. १८ साल की आयु उत्तर प्रदेश के इन्टरमीडिएट बोर्ड की विज्ञान परीक्षा अंग्रेज़ी में कम्पार्टमेन्ट आने के बाद वे मुझे अल्मोड़ा के भर्ती केन्द्र में लेकर गए.

जीवन का सबसे बड़ा पछतावा

रॉयल इन्डियन एयरफ़ोर्स में ग्राउन्ड टैक्नीशियन के तौर पर नौकरी करने लखनऊ जाने से पहली शाम मैं और बाबू मेरे चचेरे मामा ऑनरेरी लैफ़्टिनेन्ट एस. सी. बूड़ाथोकी से मिलने गए. समय सबसे बड़ा मरहम होता है, सो पिछली कड़वी बातें भुलाकर उन्होंने हमारा स्वागत किया. रात का खाना खाते समय मैंने उनसे अपनी मां की फ़ोटो दिखाने को कहा जो १९२० के दशक में एक दुर्लभ चीज़ होती थी. उन्होंने कहा कि उनके पास कोई फ़ोटो नहीं है अलबत्ता पातालदेवी के राणा परिवार से, जहां मां की पिछली ससुराल थी, इस बारे में निवेदन करने का वादा किया.

मैं जानना चाहता था कि मां कैसी दिखती थी. बाद में मुझे पता लगा कि राणा परिवार के पास भी कोई फ़ोटो नहीं थी या शायद उन्होंने परिवार की इज़्ज़त की खातिर उन्हें नष्ट कर दिया हो. इस तरह मुझे इस तथ्य को स्वीकार करना पड़ा. यह इच्छा आज भी जस की तस बनी हुई है.

बाबू के जीवन के उतार चढ़ाव

बाबू एक गरीब किसान के परिवार में पैदा हुए थे. बाबू के पिताजी यानी मेरे दादा नैनीताल के उत्तरी छोर पर स्थित राजा बलरामपुर की हवेली में माली का काम करते थे. इस लिहाज़ से बाबू किस्मत वाले थे कि उन्हें पढ़ने का मौका मिल गया हालांकि पढ़ाई उन्होंने अपेक्षाकृत देर से शुरू की. बाबू ने वहां से हाईस्कूल पास किया था. मैं उनके जीवन के बारे में मोटी मोटी बातें बता चुका हूं. अब मैं कुछ बारीक बातें बताना चाहूंगा.

पहले मैं उनके व्यक्तित्व के सकारात्मक पहलुओं के बारे में बताऊंगा. जैसा मैंने बताया पं. गोविन्द बल्लभ पन्त की इच्छा के विपरीत उन्हें डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का सचिव चुना गया. दोनों हॊ बोर्ड के महत्वपूर्ण अधिकारी थे लेकिन छः महीनों तक दोनों में बात नहीं हुई थी. वे फ़ाइलों के माध्यम से एक दूसरे से वार्तालाप बनाए रहते थे. जैसा बाबू ने बताया एक दोपहर माल रोड में टहलते हुए दोनों एक दूसरे के सामने थे. पं. पंत ने कुमाऊंनी में बात शुरू करते हुए बाबू को नाम से पुकारा - दौलत सिंह! और उन्हें बताया कि उन्होंने बोर्ड को गर्त से उठाकर काफ़ी बेहतर बना दिया है और यह कि वे इस बात से बहुत खुश हैं. पं. पंत ने इस बात का ज़िक्र १९२८ की बोर्ड रिपोर्ट में भी किया कि ठाकुर दौलत सिंह ने बोर्ड के सारे विभागों की कार्यप्रणाली का अकेले दम पर बहुत सक्षमता के साथ निरीक्षण किया है.

१९४६ के दौरान जब बाबू सार्वजनिक जीवन में अपने को पुनर्स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे, वे एक बार फिर पं. पंत से मिले. तब पंत जी यूनाइटेड प्रोविन्स के मुख्यमन्त्री बन चुके थे. उन्होंने तब ५० साल के हो चुके बाबू के लिए आयु सीमा को दरकिनार करते हुए उन्हें सार्वजनिक आपूर्ति विभाग में एरिया राशनिंग ऑफ़िसर के पद पर नियुक्त कर दिया. बाबू उस नौकरी में नहीं गए क्योंकि उसी साल उन्होंने जंगलात में ठेकेदारी का काम शुरू कर दिया.

राष्ट्रीय स्तर के एक नेता की निगाहों में इतनी ऊंची जगह रखने वाले बाबू को ऐसे ही खारिज नहीं किया जा सकता.

सिक्के का दूसरा पहलू

अब बाबू की कमज़ोरियों के बारे में कुछ. बाबू के साफ़ साफ़ दो चेहरे थे, एक अनुशासनप्रिय अधिकारी का और दूसरा एक पारिवारिक व्यक्ति का. वे दोनों इस कदर अलग अलग थे कि मुझे निश्चित नहीं मालूम कि मैं उनका बेटा होने के नाते इस बात को कितना सही सही व्यक्त कर सकूंगा.

स्त्रियों के साथ बाबू के सम्बन्धों में रूमानियत हुआ करती थी जो कि पहले बताई गई घटनाओं और परिस्थितियों के कारण बाबू के बुरी तरह टूट जाने का कारण हुआ करता था. उनकी सबसे बड़ी कमी यह नहीं थी कि वे ’दूध का जला छांछ भी फूंक फूंक कर पीता है" वाली कहावत से कोई सबक नहीं लेते थे और बार-बार वही गलती करते जाते थे.

देवी उपासना से अध्यात्म की दिशा में बढ़ने के अपने उत्साह के अतिरेक और पारिवारिक मामलों में सन्तुलन न बना सकने के कारण ही बाबू को सन्यास लेना पड़ा और परिवार के सदस्य छिन्न भिन्न हो गए.

अन्त में यह भी कि वे कमज़ोर इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति थे जिन्हें नकली या असली बाबाओं का चमत्कारिक व्यक्तित्व प्रभावित कर देता था. इस में कोई शक नहीं कि बाबा लोग पिछले सन्यासियों का साहित्य पढ़कर ज्ञान हासिल करते हैं. वे अपनी वाकपटुता के कारण प्रभावशाली वक्ता भी बन जाते हैं. इसके अलावा दुग्ध उत्पादों, मौसमी फलों, सब्ज़ियों और मावों के नियमित सेवन से वे अपने व्यक्तित्व को आकर्षक बनाए रखते हैं. बाबू की यही कमज़ोरी आकर्षक स्त्रिरों के सामने भी आ जाया करती थी.

हमारे देश के ईश्वरीय व्यक्ति

मैं शुरू में ही कह देना चाहता हूं कि इस विषय पर अपनी बात रखने से पहले मुझे क्षमा किया जाएगा, क्योंकि दो तथाकथित ईश्वरीय व्यक्तियों का शिकार बना मैं थोड़ा बहुत पक्षपातपूर्ण भी हो सकता हूं.

अपने पुराने अध्ययन के आधार पर मैं कह सकता हूं कि ईश्वरीय व्यक्तियों की बाढ़, खास तौर पर हिन्दू धर्म में, १९२० के दशक से आना शुरू हुई. इसका एक कारण यातायात और संचार के साधनों की उपलब्धता हो सकता है. इनमें से कुछ ईश्वरीय व्यक्तियों ने अपने नाम के आगे भगवान शब्द भी जोड़ा. मेरे खयाल से उनके चेले इन गुरुओं के प्रभाव की बढ़ोत्तरी में बड़ी भूमिका निभाते हैं. चेलों की संख्या बढ़ती जाती है. और अपने चुम्बकीय व्यक्तित्व से वे बहुत सारे भले लोगों को आकर्षित करने में सफल हो जाते हैं.

मैं अपने बच्चॊं से कहना चाहता हूं कि किसी भी दिशा में छलांग लगाने से पहले उस तरफ़ देख लेना चाहिए. किसी भी गुरु के पैरों पर अपना सर्वस्व रख देने से पहले उन्होंने थोड़ा परिपक्व तरीके से सोचना चाहिये. सबसे पहले काफ़ी समय तक गुरु को हर कोण से परख लेना चाहिये और इस बात को अच्छी तरह नापतौल लेना चाहिये कि क्या वे सन्यास का जीवन बिता सकेंगे.

गलतियां मनुष्य ही करते हैं. यह बात सब पर लागू होती है - गुरु पर भी और उसे मानने वाले चेले पर भी. मैं ऐसे अनेक मामले देख चुका हूं जहां इन गुरुओं का असली रूप दुनिया के सामने उजागर हुआ है.

मैं किसी ऐसे व्यक्ति को हतोत्साहित नहीं करना चाहता जो एक समर्थ गुरु के सान्निध्य में शान्ति पाता हो.

मेरा विवाह

इस आख्यान को मैं एक सुखद बात के साथ समाप्त कर रहा हूं. मेरी मंगेतर के नाम पर बाबू ने १९४४ के आसपास डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के अपने एक मातहत की सलाह पर सहमति की मोहर लगा दी थी. उनके कहने पर १९४४ के नवम्बर में मैं उससे मिला. हालांकि वह प्राइमरि स्कूल तक पढ़ी थी, मैंने उसे एक सादगीभरी और सन्तुलित लड़की पाया. हमारा विवाह १५ जून १९४५ को हुआ जब मैं अर्न्ड लीव पर बीरभट्टी, नैनीताल में था. बीस साल का होने में मुझे अभी ढाई महीने बाकी थे.

Sunday, July 25, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा - ७

गुरू के गुरु का आगमन

मैं अच्छी तरह समझ सकता था कि वे एक ऊहापोह की स्थिति में थे कि वापस उस स्थान पर कैसे जाएं जिसे वे अपने मन से छोड़ आए थे. उन्होंने अन्ततः तय किया कि बाबा सदाफल के गुरु से मिलें जिनका आश्रम मध्य प्रदेश में कहीं अवस्थित था. वहां उनका सौहार्दपूर्ण स्वागत हुआ. जब गुरू प्रवचन दे रहे थे तो बाबू ने देखा कि एक चिकित्सक ने गुरू को कोई इंजेक्शन लगाया. फेंक दी गई इंजेक्शन की शीशी को बाबू ने उत्सुकतावश देखा तो पाया कि वह सिफ़लिस नामक यौनरोग की दवा थी. बाबू ने डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सचिव रहते हुए मेडिकल बोर्ड के साथ होने वाली बैठकों के दौरान यह जानकारी इकठ्ठा की थी. उन्हें भीषण अचरज हुआ कि किस तरह तथाकथित बाबा और गुरू निर्दोष और भोले भाले लोगों को लालच देकर अपने शिकंजे में फंसाया करते हैं और उनकी कथनी और करनी में कितना अन्तर होता है.

कुछ ही दिन बाद बाबू मार्च १९४१ में गढ़वाल अपने आश्रम लौट आए. अपनी पिछली गतिविधियों और अनिश्चित भविष्य के कारण वे काफ़ी असमंजस की स्थिति में रहे होगे. मैंने यह जानने की कोशिश की कि बाबू दोबारा उसी दयनीय ज़िन्दगी में डूबने को क्यों विवश हुए. मैं निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुंचा.

बाबू की आयु ४६ साल की थी और इसके पहले वे पांच साल तक अपने गुरु की और अपनी इच्छा से सन्यासी जीवन बिता रहे थे. इसी दौरान पास के एक गांव की युवा स्त्री जो उनसे उम्र में आधी थी, किसी न किसी बहाने उनसे मिलने आ जाती थी और शायद उनके बीच धीरे धीरे नज़दीकियां बढ़ीं और वे पुनः उसी जाल में फंस गए.


एक और सौतेली मां

उसके बाद में वापस अपने साथियों के साथ अल्मोड़ा आ गया. पन्द्रह दिन बाद मुझे बाबू की चिठ्ठी मिली कि वे दर्शिनी मौसी के साथ हड़बाड़ जाकर गजे सिंह चाचा के साथ रह रहे हैं. इसी दौरान उनका एक पुत्र हुआ - रामपाल. मैंने इस बात को भारी दिल के साथ यह दिलासा देते हुए स्वीकार कर लिया कि जिस चीज़ का इलाज़ न हो सके उसका सामना करना ही होता है.

१९४० में मेरे दादा यानी बाबू के बाबू का देहान्त हो गया था. तब मैं नवीं में पढ़ता था. जब तक वे जीवित थे गांव की ज़मीन का तीन चौथाई उनके पास था जबकि एक चौथाई पर बड़ी का हक था. दादा की मृत्यु के बाद उनकी ज़मीन चाचा गजे सिंह के पास चली गई. दोनों भाई बमुश्किल एक महीना साथ रह सके. मौसी के आने के कारण चाची के भीतर ऐसी भावना आ गई थी कि घर का काम तो उन्हें करना पड़ता है जबकि मौसी उनकी मेहनत पर सुख भोगती है. बाबू भी पैसा नहीं कमाते थे. चाई इस बात को लेकर काफ़ी हल्ला मचाया करती थी. मेरे ख्याल से मौसी ने भी कड़ा प्रतिवाद किया होगा. सामूहिक परिवार की शान्ति का यूं भंग होना बाबू से बरदाश्त नहीं हुआ. बाबू ग्राम प्रधान के पास गए और अपने हिस्से की ज़मीन दिलाने की मांग की. गांव की पंचायत ने उनके पक्ष में फ़ैसला सुना दिया.

अलग गृहस्थी

उन्होंने एक कमरे के अलग घर में रहना शुरू कर दिया जिसके भीतर एक रसोई का इन्तज़ाम किया गया था. नीचे की मंजिल मवेशियों के लिए थी. जनवरी १९४३ की छुट्टियों में मैंने देखा कि उनकी सम्पन्नता के दिनों के हिसाब से वे बेहद गरीबी में रह रहे थे. मैंने इस बारे में बहुत विचार किया और खुद को बताया कि अपने कर्मों का फल आदमी को खुद ही भुगतना होता है. छुट्टियों के बाद मैं अल्मोड़ा लौटा और अप्रैल १९४३ तक अपनी परीक्षाओं तक वहीं रहा. वापस लौटने पर मैंने पाया कि वे गांव के एक कोने पर स्थित खत्ते में (यह ज़मीन दादा ने किसी और व्यक्ति से खरीदी थी) एक दो कमरों का नया घर और बगल में मवेशियों के लिए झोपड़ी बना रहे थे. निर्माण कार्य ज़मीन की सतह तक पहुंच चुका था.

नया घर

जैसी उम्मीद थी, बाबू भीषण गरीबी में थे, सो यह कार्य ऋण लेकर किया जा रहा था. मैंने बाकी मज़दूरों और मिस्त्रियों के साथ एक मज़दूर की तरह पत्थर और छत की पटालें ढोने का काम किया. थोड़ी ऊंचाई पर बना यह नया घर दक्षिण पूर्वोन्मुख था जिससे सीढ़ीदार खेतों और नीचे बह रही लोहारू धारा का विहंगम दृश्य देखा जा सकता था. हमारा घर गांव के बाकी मकानों से अलग था जो एक दूसरे बहुत नज़दीक बने हुए थे.

मकान तकरीबन समाप्त हो चुका था और जून १९४३ के शुरू में हम उसमें आ गए. बाबू और मैंने सब्ज़ियों के खेत तैयार किये और मानसून के मौसम लिए सब्ज़ियों के बीज बोए.

(जारी)

Saturday, July 24, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा - ६

रामी मौसी की याद

बाबू के सन्यास लेने के बाद रामी मौसी के लिए उन्होंने कोई भी आर्थिक व्यवस्था नहीं की थी जैसा वे हमारे लिए कर गए थे. उनके पास दो दुधारू गाएं और घर के बरतन फ़र्नीचर आदि के अलावा कुछ नहीं बचा था. मुझे पता लगा कि उन्होंने इस सारी चीज़ों को कौड़ियों के भाव बेच दिया था. अपनी गुरबत और पारिवारिक जीवन के त्रास के लिए वे बाबा सदाफल को ज़िम्मेदार ठहराती थीं. जैसी कि शहर में चर्चा थी वे १९४० के साल बाबा सदाफल के मठ में चली गई थीं.

बाबा के मठ में बवाल

अब मैं ऊपर लिखी बात का ज़िक्र करूंगा. मठ में पहुंचने के बाद रामी मौसी ने पाया कि वहां बाबा सदाफल के खिलाफ़ काफ़ी रोष और असन्तोष व्याप्त था. इनमें सबसे बड़ा पर्दाफ़ाश बाबा की एक चेली के साथ हुआ सैक्स-काण्ड था जिसके साथ उनके सम्बन्ध रहे थे. अब बाबा ने चेली की पुत्री के कौमार्य पर हाथ डालने की कोशिश की थी. इसके अलावा भी कुछ गम्भीर आरोप थे. इस तरह दोनों महिलाओं ने मिलकर मठ के अन्य प्रभावित लोगों के साथ मिलकर मोर्चाबन्दी कर ली.

अन्ततः दोनों ने बलिया की अदालत में बाबा के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज़ करा दिया. इस मुकदमे में रामी मौसी पहली अपीलकर्ता थीं. समय के साथ साथ बाबा पर अपराध साबित हुआ और उसे दो साल के लिए जेल में डाल दिया गया. बाबा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अर्ज़ी दी और उसे ज़मानत पर रिहा कर दिया गया. अजीब बात यह थी, बाबू ने मुझे बताया कि वह फ़र्ज़ी बाबा किसी तरह उच्च न्यायालय के जज को अपना चेला बना पाने में सफल हो गया. इस चेले जज ने तकनीकी कारण बताते हुए पूरे मामले को कुछ समय बाद इस कारण से रद्द कर दिया कि पहली अपीलकर्ता यानी रामी मौसी ने नैनीताल की निवासी होने कारण मुकदमा नैनीताल की अदालत में दायर करना चाहिए था न कि बलिया में. बाबा को छोड़ दिया गया. अदालत से छूट जाने के बावजूद बाबा का असली चेहरा लोगों के सामने आ गया.

बाबू की गढ़वाल यात्रा

अगस्त १९३८ में नैनीताल छोड़ने के बाद बाबू करीब सवा साल तक बाबा सदाफल के साथ छपरा, बलिया में रहे. उसके बाद उन्हें गढ़वाल के सुदूर कोने में एक आश्रम खोलने और अगले आदेश मिलने तक आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति हेतु कार्य करने को कहा गया. बाबू ने बताया कि उन्हें पत्र के माध्यम से एक विश्वसनीय सूत्र ने बाबा के आश्रम में हो रहे बखेड़े की और बाबा के खिलाफ़ मुकदमे की सूचना प्राप्त हुई. जाहिर है उनके दिल को ठेस पहुंची और १९४० के अन्तिम दिनों में वे बलिया के लिए रवाना हुए ताकि स्थिति का जायज़ा ले सकें. वहां जाकर उन्हें मालूम पड़ा कि सारी बातें सच्ची थीं. बाबू ने सम्भवतः अपने आप को गालियां दी होंगी कि वे कैसे मूर्ख थे कि सन्त के चोगे में छिपे शैतान के बहलावे में आ गए. इस सब ने उनके परिवार को तहस नहस करने के साथ उनके बच्चों को बेसहारा छोड़ दिया था.

(जारी)

Friday, July 23, 2010

एक दोस्त की आत्मकथा - ५

जून १९४१ में नैनीताल वापसी

जून के पहले हफ़्ते के आसपास मैं वापस नैनीताल पहुंचा. हमारे हाईस्कूल का परिणाम आ चुका था. ३३ छात्रों की कक्षा में औसत से ज़रा ही ऊपर रहने वाले मैंने अच्छे नम्बरों से सेकेन्ड क्लास पाई थी. अब मेरी प्राथमिकता अपने भविष्य को लेकर थी, किस कॉलेज में जाना है, कहां रहना है वगैरह. चूंकि मुझे रास्ता दिखाने वाला कोई न था, सारे फ़ैसले मुझे खुद ही लेने थे.

जैसा कि मैंने पहले बताया बाबू ने मुझे लखनऊ जाकर ओवरसीयर का कोर्स करने की सलाह दी थी. अगर मैं उनकी इच्छा का अनुसरण करता भी तो मुझे लखनऊ ले जाने वाला कोई न था. इसके अलावा पता नहीं किन वजहों से मैं डॉक्टर बनना चाहता था जबकि हमारे परिवार में कोई भी डॉक्टर नहीं हुआ था. इसके अलावा चार साल की पढ़ाई का खर्च उठाने के कोई साधन भी न थे. मैं जासूस भी बनना चाहता था, इसकी वजह यह थी कि स्कूल के दिनों में मैंने मिस्टर ब्लेक के कई हिन्दी उपन्यास पढ़ रखे थे जिनमें मुख्य नायक मिस्टर ब्लेक अपराधियों को पकड़ा करता था. मैं अंग्रेज़ी का पत्रकार भी बनना चाहता था. यह भी एक अनाथ बच्चे के किसी हवाई किले में रहने जैसा स्वप्न था.

सारी बातों को ध्यान में रखकर मैंने आखिरकार अल्मोड़ा के सरकारी इन्टर कॉलेज में विज्ञान और जीवविज्ञान के साथ इन्टरमीडियेट में दाखिला लेने का फ़ैसला किया. यह इस वजह से हुआ कि प्राइमरी स्कूल के समय से लगातार मेरे साथ रहे एम. एल. गंगोला, जिसके परिवार के साथ मेरे काफ़ी अच्छे सम्बन्ध थे, ने भी ऐसा ही करने का फ़ैसला किया था. इसके अलावा एम. एल. गंगोला के एक नज़दीकी सम्बन्धी श्री चौधरी का अल्मोड़े में अपना घर था जहां हमने रहने का निर्णय लिया. इत्तफ़ाकन सारे कुमाउं डिवीज़न में अल्मोड़ा में ही इकलौता इन्टर कॉलेज था.

अन्ततः एक दोपहर को हम अल्मोड़ा में थे. अगले दिन हमने सरकारी इन्टर कॉलेज में दाखिले के लिए अर्ज़ी लगा दी. भाग्यवश हम दोनों को एक सप्ताह के भीतर दाखिला मिल गया. वहां हमारे रहते हुए गजेसिंह चाचा एक खच्चर भर आटा, चावल और कुछ किलो दाल हर महीने भिजवाया करते थे. श्री चौधरी भले लेकिन सीमित संसाधनों वाले सज्जन थे.

उसके बाद हम दोनों के अलावा दामोदर पाण्डे और वी. डी. काण्डपाल, जो कक्षा तीन से हाईस्कूल तक हमारे साथी रहे थे, एक दिन हमें मिले और हमने एक अलग मकान किराये पर लेकर अपनी रसोई संचालित करने का फ़ैसला किया. हमें तीन कमरों का एक छोटा सा मकान झिझाड़ मोहल्ले में तीन रुपए मासिक किराये पर मिल गया. हमने मिलजुल कर बरतन खरीदे और हमारी रसोइ दो दिनों के भीतर चल पड़ी. काण्डपाल हम में सबसे बड़ा था और गांव से आया था. उसने हमारे लिए इस शर्त पर खाना बनाना मंजूर किया कि वह बरतन नहीं धोएगा. इस काम को करने के लिए हमने खुशी खुशी हामी भर दी.

दोपहरों को हम मिलकर घूमने जाया करते थे. इतवारों को हम अल्मोड़ा के नज़दीक पिकनिक पर जाते. काण्डपाल को छोड़कर हम यदा कदा रात को सिनेमा देखने जाते थे. हमारा स्तर थोड़ा बढ़ गया था और हम साढ़े चार आने यानी अठ्ठाईस पैसे का टिकट लेकर सबसे निचले दर्ज़े से एक ऊपर का टिकट ले सकते थे. हम मिल कर दैनिक अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स भी लिया करते थे जो एक आने (छः पैसे) का मिलता था.

मुझे हर महीने पच्चीस रुपये मिलने लगे थे और इस लिहाज़ से मैं एक सम्पन्न छात्र था. इस तरह काण्डपाल को छोड़कर हम तीनों इन्टरवल के दौरान चाय और हल्का नाश्ता किया करते थे. काण्डपाल आर्ट्स का छात्र था और फ़कत तेरह रुपये पाने वाले चपरासी का पुत्र होने के कारण यह खर्च वहन कर पाने में असमर्थ था. हमें जब भी अवसर मिलता हम उसकी मुफ़्त सेवा किया करते.

मेरी मित्रमण्डली में ककड़ी, गन्ना और सन्तरे चुराने का शौक था और उसे बुरा भी नहीं माना जाता था. वैसे भी हम लोग पड़ोसियों के बगीचों में आधीरात के बाद ही हमला बोला करते थे.

हमारी सर्दी की छुट्टियां जनवरी में होती थीं. जनवरी १९४२ में मैं और काण्डपाल अपने अपने गांवों क्रमशः हड़बाड़ और काण्डा के लिए पैदल निकले. हमने काण्डपाल के पकाए नाश्ते से अपनि यात्रा शुरू की और क्रमशः ३३ और ३६ किलोमीटर का फ़ासला तय करके शाम सात बजे के आसपास अपने ठिकानों पर पहुंचे. मुझे लगता है कि अगर हमने बचपन में छात्रावास में समय नहीं बिताया होता तो ऐसा कर पाने के बारे में सोच सकना भी असम्भव था. छुट्टियों के बाद हम फिर मिले और जुलाई १९४२ तक जीवन ठीकठाक चलता रहा जब हमने दूसरे वर्ष में प्रवेश लिया.

भारत छोड़ो आन्दोलन

इसी समय महात्मा गांधी के नेतृत्व में आज़ादी का आन्दोलन अपने चरम पर पहुंच चुका था, अन्ततः ९ अगस्त का दिन आया जब देश के इस छोर से उस छोर तक अंग्रेज़ो भारत छोड़ो का नारा गूंज उठा.

ज़रूरत से ज़्यादा उत्साही होने के कारण मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बन गया जो बस अड्डे की तरफ़ जा रही थी और जिसका मकसद अल्मोड़ा के जिलाधिकारी के दफ़्तर के ऊपर तिरंगा फ़हराना था. उक्त स्टेशन के उत्तर की तरफ़ जिलाधिकारी मिस्टर एटकिंसन को पुलिस दल के साथ हमारी तरफ़ आते देखा गया. वह भीड़ को तितरबितर होने का आदेश दे रहा था. लेकिन लोग आगे बढ़ते चले गए. जब हमारे बीच कुल पचास मीटर का फ़ासला रह गया, जिलाधिकारी ने हवाई फ़ायरिंग शुरू करा दी. लोग इधर उधर भागने लगे और अफ़रातफ़री मच गई.

जिलाधिकारी के दफ़्तर पर तिरंगा फ़हराने पर आमादा भीड़ का धधकता असन्तोष लोगों की बातचीत से स्पष्ट था. जिलाधिकारी का दफ़्तर बस अड्डे से करीब ७५ मीटर की ऊंचाई पर था. प्रदर्शन का विरोध कर रहे प्रशासन ने दफ़्तर की सुरक्षा के भरपूर इन्तज़ाम किए हुए थे. करीब एक घन्टे बाद यूं ही या उत्सुकतावश लोगों ने सड़क पर चलना शुरू कर दिया. मैं भी ऐसा ही कर रहा था और जिलाधिकारी के दफ़्तर को जाने वाले रास्ते पर खड़ा था जब एक खास पल मैंने कुछ झगड़ा सा होता देखा और पाया कि खिलाड़ियों की सी कदकाठी वाले नाथ सा्ह नामक एक आदमी ने एस डी एम ठाकुर मेहरबान सिंह को सशरीर उठा कर नीचे बिच्छू झाड़ियों की दिशा में दे फेंका. सो इस घटना के चन्द प्रत्यक्षदर्शियों में मैं भी था, जो उस दिन शहर भर के लोगों में चर्चा का विषय बनी रही. बाद में कुछ आन्दोलनकारियों को जिनमें हमारे स्कूल के तीन लड़के और नाथ साह शामिल थे, जेल भेज दिया गया. अल्मोड़ा जिले के दूरदराज़ हिस्सों से भी ऐसे ही प्रदर्शनों की सूचनाएं आती रहीं.

अगस्त १९४२ का महीना आमतौर पर अफ़रातफ़री वाला था जिससे हमारी पढ़ाई भी बाधित हुई. एक ही छत के नीचे रह रहे हम तीन दोस्तों ने अल्मोड़ा के एक रेस्टोरेन्ट में साढ़े सात रुपए महीने के हिसाब से खाना शुरू कर दिया. भोजन काफ़ी अच्छा होता था. काण्डपाल अब भी अपना भोजन पहले की तरह पकाया करता था. अक्टूबर १९४३ तक सब कुछ सामान्य रहा.

एक और झटका

सितम्बर १९४२ में एक दिन अल्मोड़ा की बाज़ार में घूमते हुए एक विश्वसनीय सूत्र से मुझे पता चला कि सन्यासी बन चुकने के चार साल बाद बाबू फिर से हल्द्वानी में देखे गए हैं. यह मेरे लिए उत्साहित करने वाली बात भी पर इसके आगे जो पता चला उसे सुनकर मेरा दिल रो पड़ा. बाबू ने एक शादी और कर ली थी. मैंने अपने ऊपर काबू रखा और सूचना देने वाले के सामने अपनी भावनाओं को जाहिर नहीं होने दिया. घर पहुंचकर मैंने बाबू को एक चिठ्ठी लिख कर अपनी दुर्भावनाओं का इज़हार किया. यह पहला पत्र था जो मैंने अपने बाबू को लिखा था. रात को बिस्तर में तमाम गलत बातें याद आती रहीं, रामी मौसी के हाथों पाई सज़ाएं याद आती रहीं और भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में सोचकर डर लगता रहा.

हफ़्ते भर के अन्दर मुझे बाबू का साधारण सा जवाब मिला जिसमें उन्होंने मुझसे अक्टूबर के समय दशहरे में हल्द्वानी आने को लिखा था. मैंने ऐसा किया भी. उनके लिए अपनी पुरानी बुरी भावनाओं के बावजूद मैंने उन्हें पर्याप्त आदर और सम्मान दिया.

उनके सन्यासी जीवन के बारे में होने वाली हमारी अनौपचारिक बातचीत में कि उन्होंने पिछले चार साल किस तरह बिताए थे, बाबू ने मुझे अपनी ताज़ा शादी के बारे में भी मुझे बताया. मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक पूछा कि बावजूद अपने पिछले जीवन में की गई भीषण गलतियों को नज़र अन्दाज़ करके, बावजूद हड़बाड़ में बड़ी मां की उपस्थिति के ऐसी कौन सी वजहें थीं जिनके कारण वे वापस दुनियावी समाज में लौट कर आए. बाबू ने अपना पक्ष रखते हुए कहा : "अगर सबकुछ ठीक होने वाला होता तो मैं तुम्हारी मां के साथ नहीं आ सकता था. उन्होंने कहा कि उनके स्वाभाव एक दूसरे से कतई मेल नहीं खाते थे और उनके बीच संवादहीनता की स्थिति थी.

बाद में मैंने उनसे पूछा कि उन्हें दोबारा शादी करने की क्यों सूझी तो उनका जवाब काफ़ी लम्बा था. इस ज़िक्र मैं रामी मौसी और उनकी गतिविधियों के बारे में बताते समय करूंगा.

(जारी)