Saturday, September 10, 2011

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - 7

(पिछली पोस्ट से जारी)

एक पुराने गीत से नयी मुलाक़ात


ये कहकर उन्होंने अपने एक मुलाज़िम को आवाज़ दी तो हुक़्क़ा आ गया। उन्होंने कहा, ‘सज्जाद हुसैन उस्ताद अली बख़्श (मीना कुमारी के पिता) के असिस्टेंट थे। अली बख़्श को एक नयी फ़िल्म का संगीत मिला वो थी दोस्त। एक दिन अली बख़्श बीमार होने की वजह से रिकार्डिंग पर नहीं आए। उनकी ग़ैर हाज़िरी में सज्जाद हारमोनियम में धुन बजाने लगे जिसे सुनकर नूरजहाँ वहाँ आ गईं। उन्हें वह धुन इतनी अच्छी लगी कि अली बख़्श को निकाल दिया गया और सज्जाद को ले लिया गया। हाजीभाई ने फिर मेरी तरफ़ घूर कर देखा और कहने लगे, ‘ऐसे इंसान को बड़ों का आशीर्वाद नहीं मिल सकता और उसके बग़ैर बात नहीं बनती। लेकिन हम दाद देंगे नूरजहाँ की। फ़िल्मी गीतों में एक क्रांति लाने में उनका हाथ था। कभी-कभी इंसान को ज़िंदगी का कारोबार बढ़ाने के लिए ग़लत काम भी करना पड़ता है।’ ये कहकर हाजीभाई उठ कर अंदर गए और चमड़े का एक अटैची केस उठाकर लाए। नौकर को आवाज़ दी, जो पहले एक छोटी टेबल लेकर आया, उस पर ग्रामोफ़ोन रखा। हाजीभाई ने उसमें चाबी भरी। नयी सूई लगाई और फिर बस्ते से एक रिकार्ड निकाला। उसको रखा और वह गाना जो हमने बरसों नहीं सुना था, ‘कोई प्रेम का देके संदेसा हाय लूट गया, हाय लूट गया’, फिर हमारे कानों तक पहुँचा।

कोई प्रेम का देके संदेसा हाय लूट गया, हाय लूट गया।



गाना ख़त्म होने पर उन्होंने कहा, ‘यह गाना है ही नहीं। यह ज़िंदगी की नाकामियों पर, इंसान की एक ठंडी साँस है। तो ये है सच्चाई।’ यह कहते हुए वह रिकार्ड उठाने लगे तो मैंने कहा, ‘इसके पीछे क्या है, वह भी बजाकर सुनाइये।’ तो उन्होंने मेरे गाल पर चुटकी काटी और कहा, ‘मैं तो हूँ चोर, तू डाकू बनेगा। यह सफ़र जो तुमने इस रिकार्ड की एक साइड सुनने के लिए किया, वह दोबारा करना तब हम दूसरी साइड सुनाएँगे।’ रिकार्ड को झोले में डालकर अटैची के अंदर रख लिया। रिकार्ड हमारी आँखों से ओझल हो गया जो आज तक ओझल है।

फिर कहने लगे, हर मुजरिम को अपने जुर्म का भार उठाने की थकान होती है, इसीलिए उसको अपना जुर्म बाँटकर हल्का करना होता है। आज रात वही हो रहा है। मैं आप लोगों का शुक्रगुजार हू, आप लोग भी इसे बाँट रहे हैं क्योंकि यह रिकार्ड मैंने चुराया था। मैं आपको पहले की कह चुका हूँ कि मैं सच्चा हाजी नहीं हूँ। लेकिन चोरी मेरा पेशा नहीं है। किसी बुज़ुर्ग को छोटों को नसीहत देने का कोई अधिकार नहीं, जब तक वह ख़ुद ऐसा अघिकार हासिल नहीं करना चाहता। और मुझे पास बुलाकर बताया कि ये चोरी उन्होंने कैसे की।

एक रात मोरोगरो स्टेशन पर एक गाड़ी देर तक रुकी। एक हिंदुस्तानी सज्जन उसी समय हिंदुस्तान से लौटे थे। वह तबोरा जा रहे थे। वक़्त था, उनसे मुलाक़ात हुई, बातें होने लगीं। उन्होंने बताया कि वह इंडिया से कुछ रिकार्ड लेकर आए हैं। इनमें से कुछ दारेस्सलाम में उन्हें सुनने का मौक़ा मिला। उन्होंने कहा, इनमें कुछ तो बहुत बेकार हैं जो उन्हें नहीं चाहिएँ। चूँकि उन्हें वज़न कम करना था, तो कहा, अगर आपको चाहिएँ तो ले लीजिए। मैंने रिकार्ड देखे। दिल ने कहा, उनसे कहूँ, आप ख़ज़ाना लुटा रहे हैं। जोश ने साथ नहीं दिया। और मैंने रिकार्ड जल्दी से उनसे ले लिये। ये गाना उन्हीं में से था। उन्होंने कहा, यह जानते हुए कि कोई चीज़ क़ीमती है, यह न बताना भी एक तरह की चोरी है। हाजीभाई अपने क़ीमती ख़ज़ाने को बस्ते में डालकर घर के अंदर जाकर रख आए। जब वापस आए तो संगीतकार सज्जाद के बारे में और भी कहानियाँ सुनाई।

(जारी)

Friday, September 9, 2011

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - 6

(पिछली पोस्ट से जारी)

हाजीभाई से मुलाक़ात: हिंदुस्तानी फ़िल्मी कहानी का अंतरा

बातों बातों में हम रेलवे शेड पहुँचे तो उन्होंने कारख़ाने के बाहर ही रुकने को कहा और अंदर जाकर एक बुजु़र्ग से बातें करने लगे। थोड़ी देर में उन्हें लेकर हमारे पास आ गए। हम लोगों से हाथ मिलाया और कहा, ‘मेरा नाम है, हाजीभाई। आप में ग़लतफ़हमी पैदा न हो, मैं कभी मक्का-मदीना नहीं गया। मेरे पिता जी गए थे। उनके अच्छे कामों का नाम मुझे मिल गया है।’ उन्होंने मेरे भाई से पूछा, ‘आप लोग क्या करते हैं?’ भाई ने कहा, ‘हम आधे मुसलमान हैं।’ ये सुनकर वह चैंके और कहा, ‘भई ये कैसे?’ भाई ने जवाब में कहा, ‘ख़ुदा को मानते हैं लेकिन डरते नहीं।’ उन्होंने कहा, ‘ये क्या चक्कर है?’ भाई बोले, ‘हम मस्जिद नहीं जाते, रोज़ा नहीं रखते। लेकिन ईद मनाते हैं।’ यह सुनकर हाजीभाई बहुत हँसे और बोले आज का खाना हमारे घर।


दोपहर का वक़्त गुज़ारने के लिए हमने बरसात फ़िल्म देखी। बालू सिंह ने पिक्चर की फ़ोटोग्राफ़ी पर लेक्चर पर लेक्चर दिये। शाम को हम हाजीभाई के घर पहुँचे। वह बाहर बरामदे में हमारे इंतज़ार में बैठे थे। फिर से सलाम दुआ हुई। कुर्सियाँ आईं और हमें बिठा कर ख़ुद घर के अंदर चले गए। थोड़ी देर में मुर्ग़े की चीख़ सुनाई दी। तब बालूसिंह ने कहा, ‘मुझे लगता है आपका काम बन जाएगा।’ इतने में हाजीभाई भी आ गए थे। बैठकर बातें होने लगीं। वे कहने लगे मुझे उन लोगों पर ताज्जुब होता है जो रूह की सच्चाई को नहीं मानते। मुर्ग़े के गले पर जब छुरी चलती है, तो वह उड़ने की कोशिश करता है। परों की आवाज़ रूह के उड़ने का सबूत है। फिर उन्होंने पूछा, ‘आज क्या किया?’ तो बताया, बरसात पिक्चर देख कर आए हैं। उन्होंने यह सुनते ही कहा, ‘पृथ्वीराज के बेटे की फ़िल्म तो...’ उन्होंने दो गालियाँ राजकपूर को दीं। बोले, इस नौजवान पर तो बड़ों का आशीर्वाद नहीं होगा जिसने राम गांगुली को निकाल दिया और शंकर जयकिशन को लिया। फ़िल्म आग का ‘न आँखों में आँसू, न होठों पे हाय’ (मजरूह सुलतानपुरी) जिसने ऐसा डायमंड गीत दिया उसके साथ ऐसी बेवफ़ाई तो हमने कभी नहीं देखी।

न आँखों में आँसू न होठों पे हाय
मगर एक मुद्दत हुई मुसकराये।


बोले, ‘शंकर जयकिशन में क्या है? ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म में लाल दुपट्टे की बात कर रहे हैं। इनकी मत मारी गई है। कौन इन पागलों को सुनेगा?’ ये सुनकर बालूसिंह अपना सिर हिलाने लगे। यह होता है नतीजा फ़िल्म को कान से सुनने का। हाजीभाई के घर के दरवाज़े के पीछे एक साया इधर-उधर जा रहा था। मैं समझ गया, वो एक कुएँ में गिर गए हैं। ये एक्सप्रेशन हमारे बुज़ुर्ग उन हिंदुस्तानियों के लिए करते थे जिनकी शादी काली अफ्रीकी औरतों से होती थी।


ज्यों ही शाम होने लगी कि लगा हाजीभाई अपने आप में इतिहास हैं। सिनेमा संगीत का इतना ज्ञान था, वह और मेरे भाई ऐसे बैठे मानो सिनेमा संगीत के महान ज्ञानी हों। उन्होंने बताया वह बहुत दिनों में इस पसोपेश में हैं कि उन्हें यह समझ में नहीं आता कि फ़िल्म बैजू बावरा में नौशाद कहना क्या चाहते हैं? लोक संगीत को क्लासिकल संगीत के ज़रिए महलों तक पहुँचाया जाए या शास्त्रीय संगीत को लोक संगीत की तरह सरल बनाकर आम लोगों तक पहुँचाया जाए। क्या बात सच है इसका जवाब न मिलने के कारण काम में भी मन नहीं लगता। मेरे भाई ने कहा, अंत में तो वही गीत है, ‘तू गंगा की मौज मैं जमना की धारा’ आप जो जवाब ढूँढ़ रहे हैं, वह इसी गीत में है। उन्होंने कहा, ‘ये तो आपने अच्छी बात सुझाई। हो सकता है कल मैं अपना काम ठीक से कर पाऊँगा।’ फिर कहने लगे, ‘अगर मरते वक़्त उनके कानों में ये गीत ”झूले में पवन के आई बहार प्यार छलके“ सुनाई पड़ेगा तो उन्हें लगेगा वह स्वर्ग छोड़ कर जा रहे हैं।’

झूले में पवन के आई बहार प्यार छलके


बातों-बातों में ही खाना आ गया। उससे पहले हाजीभाई ने कहा, ख़ुदा का शुक्र है उन्होंने मुर्ग़े को मुर्ग़ा और हमें आदमी बनाया, नहीं तो कौन जाने, कौन किसको खा रहा होता।

खाना ख़त्म हुआ। रात के लिए गैस का लैंप जला। चाय का एक दौर हुआ और फिर हाजीभाई कहने लगे, हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत का न तो लोक संगीत और न ही शास्त्रीय संगीत से ही कोई गहरा ताल्लुक़ है। यह हिंदुस्तान में नया इंक़लाब है। ये नयी बोतल में पुराना नशा नहीं, नयी बोतल में नया नशा है। यह इसलिए कि हर टेक्नोलाजी अपने आप में एक नया पैग़ाम है। पहले तो माइक्रोफ़ोन ने हमारी गायकी बदली। माइक्रोफ़ोन के बगैर तलत महमूद जैसे गायक अपना काम नहीं चला सकते थे। फिर 78 आरपीएम का रिकार्ड साढ़े तीन मिनट में जो कहना है, वो कह देता है। यह ऐसा गीत नहीं है जब मूड आया बना लिया। ये कहानी की सिचुएशन के लिए, कहानी को आगे बढ़ाने के लिए है। अगर हम फ़िल्मी गीत को सुनते हैं, तो उसमें धुन को बाँटा हुआ है। प्रिल्यूड और इंटरल्यूड वाले भाग में हमें आर्केस्ट्रा मिलता है और अगर वह सिर्फ़ धुन को दोहराये तो वह हिंदुस्तानी रहेगा। लेकिन विदेश से हारमनी और रंग को भी हमारे संगीतकारों ने प्रयोग किया। हमारा परंपरागत संगीत लकीर की तरह फ़्लैट है। हारमनी ने उस पर मंज़िलें बनाईं। उससे गीत को और भी ख़ूबसूरत बनाया जा सका, उसमें बारीकियाँ डाली जा सकीं। इसके पायनियर संगीतकार थे, आर सी बोराल और पंकज मलिक। ये वे नौजवान थे जो अपनी संस्कृति की बहुत इज़्ज़त करते थे। उन्हें पता था कि धुन पुरानी चीज़ है, उसमें विदेशी वाद्य, प्रिल्यूड और इंटरल्यूड में लगाये और धुन को साफ़ सुथरा रखा। आवाज़ में इंसान की रूह बोलती है। धुन को उससे जोड़ा, फिर बोलों ने कहानी को आगे बढ़ाया। आम गीत इसी स्ट्रेटेजी पर बने हैं।


संगीतकार सज्जाद हुसैन ने इस सिद्धांत को नहीं अपनाया क्योंकि वह ख़ुद वादक थे। सज्जाद हुसैन का नाम सुनकर हम चैंके। लेकिन बाहर से ज़रा भी उत्सुकता नहीं दिखाई ताकि उनको कोई शक न हो। हम हाजीभाई को धोखा देने में कामयाब रहे। हाजीभाई ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा सज्जाद हुसैन जानते थे कि एक माहिर कलाकार के हाथ में वाद्य भी गा सकता है और आवाज़ वाद्य भी बन सकती है। उनका कहना था कि जिन गीतों में बोल ऊँचे दर्जे पर हैं और साज़ नीचे, तो वह बराबर नहीं है। अब जब बोलती गाती फ़िल्म 1931 में आई तो हिंदुस्तान की आज़ादी का आंदोलन तेज़ी पर था। आज़ादी के बाद लोगों में एकता होगी, लोग बराबर होंगे। सज्जाद ने अपने गीतों में साज़ और आवाज़ में एकता पैदा की। जो लोग समाज में एकता और बराबरी नहीं चाहते उन्हें सज्जाद हुसैन का संगीत पसंद नहीं आएगा। जहाँ गौतम बुद्ध अपने इसी मक़सद में कामयाब नहीं हुए, तो सज्जाद हुसैन की क्या बिसात! एक शायर ने कहा है- ‘तम्हीदे ख़राबी की तकमील ख़राबी है’ - सीमाब। हाजीभाई ने कहा, ‘मैं इसकी कहानी बताता हूँ।

(जारी)

Thursday, September 8, 2011

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - 5

(पिछली पोस्ट से जारी)


इन बातों ने ऐसा सुरूर पैदा किया कि हमें वक़्त और जगह का अहसास ही नहीं रहा। बाहर देखा तो लहर पर लहर दिखाई दे रही थी और शाम का सुर्मा फ़िज़ा पर छा रहा था। रात होते ही हम हंडेनी पहंच गए। हमारी बस बाज़ार के बीच रुकी। रात की वजह से सफ़र वहीं बंद हो गया और सबको बस में ही रहने की हिदायत दी गई। हम बस के बाहर निकले तो हज़ारों जुगनू सितारों की तरह उड़ रहे थे। ऐसा लग रहा था एक आसमान हमारे नीचे है और एक ऊपर। भाई ने ऊपर की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘यह जो चमकते हुए सितारे नज़र आ रहे हैं, करोड़ों बरस सफ़र करने के बाद इनकी रौशनी हम तक पहुँच रही हैं। जब इनकी रोशनी का सफ़र शुरू हुआ था, कृष्ण, राम, मूसा, ईसा, बुद्ध और मोहम्मद पैदा भी नहीं हुए थे। इस रोशनी ने सब दौर देखे हैं। हमें भी देख रही है।’ हम रात की यह ख़़ूबसूरती थोड़ी ही देर सराह सके। मच्छरों के लश्कर ने हम पर हमला कर दिया। फिर तो रात हमने बड़ी मुश्किल से गुज़ारी। एक घंटा भाई सोते तो मैं मच्छर उड़ाता और जब मैं सोता तो वह। हंडेनी के मच्छर दुनिया के सबसे ज़हरीले मच्छर हैं। सुबह शरीर पर लाल-लाल चकत्ते नज़र आ रहे थे। भाई ने कहा, ये थी पानीपत की लड़ाई जिसमें दो फ़ौजों ने एक दूसरे का ख़़़ून किया। लेकिन फ़र्क़ यह है कि हमारे बदन पर जो ख़़ून था वह अपना ही था। मुझे ताज्जुब हो रहा था, मैं तो मुसीबत में था, वह ख़ुश नज़र आ रहे थे। उन्होंने कहा बलिदान के बगै़र कुछ काम नहीं बनता। अब मुझे यक़ीन है कि हमें गाना सुनने को मिलेगा।

दूसरे दिन बस का सफ़र फिर शुरू हुआ। लेकिन शहर के कुछ मील बाहर पहुँचते ही देखा सिंगासी नदी में बाढ़ आई हुई है। पुल पानी में डूबा हुआ है। सारा दिन इंतज़ार में गुज़रा कि नदी का पानी कब जाए और बस आगे बढ़े। बस में, साथ जा रहे अफ्ऱीक़़ी लोगों की देहाती मासूमियत का सबूत मिलने लगा। उनके पास खाने पीने के लिए जो कुछ भी था, बाँटकर खाने लगे। हमें भी दिया। रंग, भेदभाव सब कुछ ख़त्म हो गया। सब लोग बस यही चाहते थे कि पानी उतर जाए तो बस पुल के पार हो। शाम तक नदी पुल के नीचे उतर गई। जब पानी से पुल निकला तो बड़ा डरावना लग रहा था जिसे आज भी सोचकर दहशत होती है। पक्का पुल तो पिछले साल टूट गया था। उसकी जगह बाँस का पुल साइसेल की रस्सी से लटकाया गया था। बस ड्राइवर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा। ये एक्सप्रेस बस है, रुक नहीं सकती। यही पुल पार करके जाएगी। अगर आप लोगों को यहीं जंगल में रुकना है, तो यहाँ के भूखे शेर, चीते देख रहे हैं, वह आप सबको हड़प जाएंगे। अब आप लोगों की मर्ज़ी रुकिए या चलिये। पाँच मिनट में बस में नहीं बैठे तो मैं समझ जाऊँगा कि आप लोगों को नहीं जाना है।


उस वक़्त मेरे भाई के मुँह से यह मिसरा पहली बार मैंने सुना, ‘क़दो गेसू में क़ैसो कोहकन की आज़माइश है’ (ग़ालिब)। उन्होंने कहा, इस पुल को साइसेल की रस्सी ने बाँघा है। इसी रस्सी के बल पर हम सब एक हैं। मुझे भरोसा है यह रस्सी टूटेगी नहीं। पुल को फिर से देखकर मेरे दिमाग़ में एक बादल सा उठा और एक ख़याल दिमाग़ में आया कि क्यों हम अफ्ऱीक़़ा के बियाबान जगहों में इंडिया से और भी दूर एक फ़िल्मी गाना ढूँढ़ने के लिए जा रहे हैं? अगर यह पागलपन नहीं है तो हमारे दिमाग़ के ढीले स्क्रू का सबूत ज़रूर है। ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी थी। फ़ैसले के लम्हे सामने थे, यह ख़याल दूर हो गया।

जिस चीज़ ने हमें रोटी दी है अगर हम उसके वफ़ादार नहीं हैं तब हम न तो इंसान हैं, न आदमी। मेरे भाई को साइसेल पर भरोसा था और मुझे भाई पर। ज्योंही हम दोनों बस पर चढ़े सब काँपते-काँपते साथ हो लिये। बस पुल पर आ गई है और हिंडोेले जैसे पुल पर झूलते हुए आगे बढ़ने लगी। पुल के दूसरी ओर पहँुचने पर ड्राइवर ने गाड़ी रोककर ताली बजाई और कहा जब आप जैसे लोग सफ़र करते हैं तो लगता है हमारे साथ सेना है। आप लोगों ने हमारी लाज रख ली। आज तो आप लोगों ने एक नयी कहानी गढ़ी है। मैं अब ये बात सबको बताऊँगा कि हमने पुल कैसे पार किया। ड्राइवर ने कहा आज मेरी एक ग़लतफ़हमी दूर हो गई कि ये दो मुहिंदी (हिंदुस्तानी) जिनकी नस्ल को हम डरपोक व्यापारी समझते हैं ऐसा सोचना ग़लत है। मेरे भाई ने कहा, ‘मुझे आज फिर भरोसा हुआ कि साइसेल के बल पर हमारी ज़िंदगी का चक्कर चलता रहेगा और दुनिया इसे क्यों सुनहरा धागा मानती है। सुनहरी इनकी क़ीमत है। लेकिन इसमें स्टील की ताक़त है। सफ़र के दूसरी ओर पहाड़ियों की दीवार नज़र आई। भाई ने बताया वह उलूगरू पहाड़ है। उनकी गोदी में है मोरोगोरो शहर, जहाँ हम जा रहे हैं। थोड़े ही आगे जाने पर रेल नज़र आने लगी। ट्रेन देखते ही हमने इत्मीनान की साँस ली क्योंकि ट्रेन अफ्ऱीक़़ा में हिंदुस्तान की लकीर है।

मोरोगोरो में बालूसिंह से मुलाक़ात

दोपहर को हम मोरोगोरो पहुँचे। सीधे भाई के दोस्त बलवंत बालूसिंह के यहाँ गए। दो बच्चों के साथ वह घर के बाहर ही बैठे थे। देखते ही बड़ी ख़ुशी ज़ाहिर की। हम लोग नहाये, घोये। चाय नाश्ते के लिए तैयार हो गए। तब उन्होंने अपनी राम कहानी सुनाई। कहने लगे वक़्त बहुत ख़राब हो गया है। कभी भी उनकी नौकरी जा सकती है। वो दारेस्सलाम-टबोरा रेलवे लाइन में इंजिन के फ़ायरमैन थे। कहने लगे, ‘कोयले का इंजिन जाने वाला है और डीज़ल इंजिन आ जाएगा तो हमारी नौकरी चली जाएगी। अगर कहीं श्मशान घाट की कोई नौकरी हो तो बता देना। एक बहुत माहिर आग का काम करने वाला है।’ इस पर हम लोग बहुत हँसे। उन्होंने कहा, भाभी को नहीं बताना। हमने उन्हें कुछ ख़बर नहीं की है। मुझे लगा था, इन्हीं के पास वह गाना होगा। उनकी नौकरी जाने का मज़ाक़ खत्म हुआ तो वह बहुत गंभीर हो गए। कहने लगे, ‘मुझे नहीं लगता कि जिस गीत को सुनने के लिए आप आए हैं, वह काम पूरा हो जाएगा। क्योंकि हाजीभाई जिनके पास रिकार्ड है, शक्की भी हैं। तुम लोग एक दिन लेट आए हो। उनके मुताबिक़ अच्छा समय निकल गया। फिर भी चलो, कोशिश करके देखते हैं। कोशिश करना इंसान के हाथ में है।’ वह हमें रेलवे शेड में ले गए हाजीभाई से मिलने के लिए। जाते समय उन्होंने नसीहत दी, रिकार्ड का नाम मुँह पर न लाना। ऐसा कुछ भी हुआ तो ज़रा भी काम नहीं बनेगा। मैं बस कहूँगा, मेहमान आए हैं तो आपसे मिलाने के लिए ले आया। बाक़ी उन्होंने तो इंतज़ाम किया हुआ होगा। शेड की तरफ़ जाते समय रास्ते से गुज़रे तो वहाँ सिनेमा में फ़िल्म बरसात लगी हुई थी। बालूसिंह ने बताया ‘सब लोग शंकर जयकिशन के संगीत पर इस फ़िल्म को बारबार देख रहे हैं। लेकिन मैं फ़ाली मिस्त्री की जादूगरी देखने जाता हूँ। उन्होंने धूप और छाँव मिला कर एक रंगीन फ़िल्म बनाई है। गीत ”हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का“ जो फ़िल्म के ब्लैक एंड व्हाइट होते हुए भी लाल नज़र आता है और कोयला जब जलता है तो इसमें से कितने ही रंग निकलते हैं।’


हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का
ओ जी ओ जी...


वह ठीक कह रहे थे। फ़ाली मिस्त्री बहुत अच्छे कैमरामेन थे। फिर भाई और बलवंत में बहस हो गई। उन्होंने कहा, ‘अय्यूब, तुम्हें फ़िल्म संगीत अच्छा लगता है कि तुम कुछ और देखते ही नहीं। सिवाय नौशाद, सी रामचंद्र, शंकर जयकिशन के अलावा तुम्हें फ़िल्म में किसी और की कला नज़र ही नहीं आती। उनका विचार था फ़िल्म पहले आँख के लिए है, फिर कान के लिए है। संगीतकारों ने इंडियन पब्लिक को अंधा बना दिया है। वह फ़ाली मिस्त्री, आर डी माथुर, फ़रीदून ईरानी, जाल मिस्त्री इनकी कारीगरी पहचानते ही नहीं। भाई ने इसके जवाब में कहा, बालू यह तुम्हारी ग़लतफ़हमी है। हिंदुस्तानी फ़िल्म पहले कानों तक पहुचती है, फिर आँखों तक।

(जारी)

क्या हम जनता से मुखातिब हैं?

क्या हम जनता से मुखातिब हैं?

कविता कृष्णन


'मैं अन्ना हूं' या 'वन्दे मातरम्' बोलने वाले सभी लोग न तो संघी हैं, न ही कारपोरेट समर्थक. वे हमारी वे सब बातें सुनने के लिए खुला रुख रखते हैं जो हमें कारपोरेट भ्रष्टाचार या उदारीकरण की नीतियों के बारे में उनसे कहनी हैं. सवाल यह है क़ि क्या हम इतने अहंकारी, श्रेष्ठ और पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो चले हैं क़ि हम उनसे बात भी न कर सकें?

सारी गरमी भर आल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन (आइसा) तथा इंकलाबी नौजवान सभा (आरवाईए) के कार्यकर्ता इसी कष्टप्रद कार्य में महीनों लगे रहे. उन्होंने सारे देश में अभियान चलाया- ऐसे मुहल्लों, गाँवों, बाज़ारों में जहां वामपंथ की कोई प्रत्यक्ष उपस्थिति नहीं थी. ऐसा नहीं है क़ि ये इलाके 'बड़े लोगों' की बहुलता वाले इलाके थे. अधिकांशतः ये इलाके ऐसे थे जिनमें मध्य और निम्न मध्यम वर्ग, मजदूर तबके के लोग तथा कैम्पसों के नजदीक छात्रों की बसावट वाले इलाके थे. अधिकांश जगह इन कार्यकर्ताओं को देख लोग यह मानने से शुरू करते थे क़ि वे अन्ना हजारे का अभियान लेकर उनके बीच आये हैं. जब ये छात्र कार्यकर्ता नौ अगस्त के संसद जाम करने के अपने आह्वान के बारे में बताते तो उनसे पूछा जाता था- 'जब अन्ना एक अभियान चला ही रहे हैं तो उससे अलग किसी अभियान की क्या जरूरत है?' तब वे उन्हें यह बताते क़ि वे एक प्रभावी भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून के लिए इस आन्दोलन का समर्थन करते हैं, ताकि भ्रष्टाचारी दण्डित होने से बच न पायें. लेकिन इस तरह के क़ानून बनने मात्र से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होगा क्योंकि यह भ्रष्टाचार उन नीतियों का परिणाम है जो क़ि जल-जंगल-जमीन, खनिज, स्पेक्ट्रम, बीज आदि की कारपोरेट लूट को बढ़ावा देती है. कार्यकर्ताओं ने बिना लफ्फाजी के लोगों के साथ संवाद बनाना सीखा. बातचीत के दौरान वे उस राज्य से कारपोरेट लूट और भ्रष्टाचार के उदाहरण देते, जिस राज्य में वे अभियान को लेकर थे. वे लोगों को राडिया टेपों, पूंजी घरानों, सत्ताधारी कांग्रेस, विपक्षी भाजपा तथा मीडिया की भ्रष्टाचार में भूमिका के बारे में बताते थे.

बगैर अपवाद के उन्हें कहीं भी लोगों के शत्रुतापूर्ण रवैय्ये का सामना नहीं करना पड़ा. यह भी स्पष्ट था क़ि अन्ना के अभियान ने भ्रष्टाचार के सवाल पर लोगों में गहरी दिलचस्पी जगा दी थी, साथ ही सरकार के खिलाफ जमीनी कार्यवाही के प्रति भारी समर्थन भी भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को जमीन और संसाधनों की कारपोरेट लूट, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा के निजीकरण, बेरोजगारी और महंगाई, ए एफ एस पी ए और ग्रीन हंट जैसी दमनकारी नीतियों के खिलाफ चल रहे संघर्षों के साथ जोड़ना, बहस-मुबाहिसे के दौरान आसान हो चला था.

हाँ, कैम्पसों और दूसरे इलाकों में विद्यार्थी परिषद् और संघ कार्यकर्ताओं ने अन्ना टोपी लगाकर 'अराजनीतिक' भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का समर्थक होने का मुखौटा लगाए जरूर दिखे और उन्होंने आइसा और दूसरे जन संगठनों को अपने बैनर और नारों के साथ स्वतन्त्र भ्रष्टाचार विरोधी प्रतिरोध से हरचंद रोकने की कोशिश की. हमने उनका जवाब देते हुए उनसे मांग की क़ि येदुरप्पा और बेल्लारी पर, नितीश सरकार के अधीन BIADA जमीन घोटाले, जिसके चलते फारबिसगंज में गोली चली, पर वे अपना रुख स्पष्ट करें. ऐसा करते ही उनका आवरण तार-तार हो जाता था और उन्हें आन्दोलन के आम समर्थकों से अलगा देना संभव होता था. आन्दोलन में शामिल गैर-संघी लोगों के लिए हमारा नारा 'कांग्रेस-भाजपा दोनों यार, देश बेचने को तैयार!' लोकप्रिय हो जाता था और संघी तत्व अलगाव में पड़ जाते थे.

ऐसे में हम सभी जो इस बात से चिंतित हैं क़ि संघ कहीं अन्ना के आन्दोलन पर सवार होकर आन्दोलन को फासीवादी दिशा न दे दे, उन्हें क्या करना चाहिए? क्या हमें इस बात की सुविधा है क़ि हम सुरक्षित रास्ता लें, पुस्तकालय में घुस जाएँ, उच्च आसन से आंदोलन का विश्लेषण करें, कयामत के दिन की भविष्यवाणी करें ताकि बाद को कह सकें क़ि हमने कहा था न! क्या हमें इसके गुजर जाने का इंतज़ार करना चाहिए? क्या हमें मैदान संघ परिवार के लिए खुला और निर्विरोध छोड़ कर हट जाना चाहिए? या क़ि हमें संघर्ष के मैदान में जाकर आम स्त्री-पुरुषों के साथ सड़कों पर कंधे से कंधा मिलाकर भ्रष्टाचार से लड़ते हुए अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए भ्रष्टाचार विरोधी विमर्श को राजनीतिक बनाने की ओर बढना चाहिए?

बाबा रामदेव की औकात बता दी गई और यह संघ के लिए बड़ा भारी झटका था. संघ, अन्ना के नेतृत्व वाले आन्दोलन का फ़ायदा उठाने के लिए ढंके-छिपे तौर तरीकों से प्रयासरत है क्योंकि उन्हें मालूम है क़ि अपनी पहचान के साथ सामने आने पर उन्हें भाजपा के खुद के भ्रष्टाचार- चाहे वह कर्नाटक में हो या गुजरात में या पैसा लेकर सवाल पूछने का मामला हो, इन सब का जवाब देना होगा. प्रगतिशील ताकतों के लिए लोगों के बीच अपनी पहुँच को बढाने का भी यह मौक़ा है, जब लोगों को बेल्लारी और बस्तर की याद दिलाई जा सकती है. मोदी के गढ़ गुजरात में आइसा का अनुभव सबक लेने लायक है. मोदी यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और दमन के खिलाफ अन्ना के समर्थन में बढ़-चढ़ कर बोलते रहे. आइसा और इंकलाबी नौजवान सभा ने सात सौ छात्रों का भावनगर में एक जुलूस निकाला जिसमें उन्होंने न केवल केंद्र सर्कार बल्कि गुजरात में भ्रष्टाचार, कारपोरेट लूट, फर्जी मुठभेड़ तथा साम्प्रदायिक हिंसा पर पर्दा डालने की मोदी सरकार की कोशिशों के खिलाफ नारे लगाए. मोदी के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के साथ होने के दावे को तार-तार करते हुए पुलिस ने जुलूस पर लाठी-चार्ज किया तथा नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं युनुस जकारिया, जिगनाब राना, सोनल चौहान और फरीदा जकारिया को जेल भेज दिया. अगले ही दिन इन गिरफ्तारियों के खिलाफ भावनगर के इंजीनियरिंग और मेडिकल कालेगों सहित तमाम कालेजों ने आइसा और इंकलाबी नौजवान सभा के आह्वान पर हड़ताल की. पांच हज़ार छात्रों ने स्थानीय प्रशासन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर गिरफ्तार किये गए कार्यकर्ताओं की रिहाई को मजबूर किया. वामपंथी छात्र-युवा संगठनों ने अपने ही झंडे तले पहलकदमी अपने हाथ में ली, जिसके परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार विरोधी गुस्से को उन्होंने मोदी सरकार के खिलाफ मोड़ दिया.

यह कांग्रेस थी जिसने पहले-पहल अन्ना के नेतृत्व में चल रहे आन्दोलन पर अनशन के द्वारा संसद को 'ब्लैकमेल' करने, संघ समर्थित, फासीवादी, संविधान विरोधी, लोकतंत्र के लिए खतरनाक होने के आरोप मढ़े. अब इन आरोपों की प्रतिध्वनि न केवल कांग्रेस के समर्थकों में बल्कि कुछ दूसरे असम्भाव्य से लगने वाले हलकों में भी सुनाई पड़ रही है. दो गंभीर व्याख्याकारों ने हाल ही में इस विषय पर तफसील से अपने विचार प्रकट किये हैं. एक हैं प्रभात पटनायक (जो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं) तथा दूसरी हैं अरुंधति राय.

प्रभात पटनायक ने अन्ना के अनशन पर 'संसद पर बंदूक तानने' का आरोप लगाया है. सवाल है क़ि कोई भी अनशन किस बिंदु पर जाकर लोकतांत्रिक नहीं रह जाता? क्या इरोम शर्मिला का अनशन 'ब्लैकमेल' है? या क़ि मजदूरों और छात्रों के आन्दोलनों में समय समय पर किये जाने वाले अनशन 'ब्लैकमेल' हैं? क्या मजदूरों की हडतालों को अनगिनत बार 'ब्लैकमेल' नहीं कहा जाता रहा है? ऐसा क्यों है क़ि अनशन तभी 'ब्लैकमेल' करार दिए जाते हैं जब उन्हें जन समर्थन मिलने लगता है या जब सरकार उनका दबाव महसूस करने को विवश होती है?

प्रभात पटनायक का कहना है क़ि लोगों को विरोध का अधिकार है ताकि वे 'चुने हुए प्रतिनिधियों को अपनी भावना से अवगत करा सकें'. उनका कहना है क़ि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी होती है लेकिन कोई भी अकेली भावना सब पर भारी नहीं पड़ने दी जाती और सब कुछ बहस-मुबाहिसे से तय होता है. क्या सचमुच ऐसा होता है? क्या सेज का क़ानून जोकि भूमि हड़प का दस्तावेज है, संसद में बगैर किसी बहस या आपत्ति के पारित नहीं हो गया? राडिया टेपों ने दिखलाया क़ि किस तरह संसद में क़ानून बनाए जाते हैं और नीतियाँ तय की जाती हैं. कैसे मंत्री, सांसद, विपक्ष के नेता, मुकेश अंबानी या रतन टाटा के हितों की सुरक्षा के लिए काम करते हैं. क्या यह सब निर्णय बहस-मुबाहिसे से लिए जाते हैं? सोचकर बड़ी हंसी आती है.

क्या किसानों, मजदूरों और आदिवासियों को 'संसदीय सर्वोच्चता' के आगे सर झुका देना चाहिए, जब संसद उनके अधिकारों को छीन लेने वाले क़ानून बनाती है? क्या उन्होंने अनेक मौकों पर ऐसे कानूनों की अवज्ञा नहीं की है? क्या जनता के संघर्षों को इतना ही अधिकार है क़ि वे संसद को अपनी 'भावना से अवगत कराएं'? क्या उन्हें यह अधिकार नहीं क़ि वे आवश्यक प्रभावकारी दबाव निर्मित करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके क़ि संसद ऐसे सवालों पर उनकी भावनाओं का सम्मान करे जो उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गए हैं? एक ऐसी परिस्थिति में जब क़ि चुने हुए प्रतिनिधियों और उन्हें चुनने वाली जनता के बीच गहरे तौर पर एक गैर-बराबरी का रिश्ता है, क्या हम अनशन या हड़ताल जैसे तरीकों को 'अलोकतांत्रिक' करार दे सकते हैं?

प्रभात पटनायक कहते हैं क़ि जनता को महज अन्ना की जयजयकार करने वालों तथा समर्थक मात्र बने रहने वालों तक सीमित कर दिया गया है. इसी तरह अरुंधति राय की दलील है क़ि लोग 'खुद को भूखा मार देने की धमकी दे रहे' एक बूढ़े आदमी का नज़ारा देखने वाले 'दर्शक' मात्र रह गए हैं. हममें से कई लोग जंतर-मंतर पर अनशन कर रही मेधा पाटेकर के साथ शामिल हो गए थे. क्या हम भी महज दर्शक थे? क्या यह कहना अहंकार नहीं है कि 'हम जानते हैं कि हम क्या कर रहे हैं, हम प्रबुद्ध हैं, लेकिन ये लोग जो सड़कों पर अभी निकले हुए हैं, वे महज वर्ल्ड कप की ताली बजाऊ भीड़ हैं, मीडिया की पैदा की हुई भेड़ियाधसान हैं जिसे एक गुप्त एजेंडा के हित में बरगलाया गया है'. हमें इस बात से सावधान रहना चाहिए क़ि मीडिया इस आन्दोलन के साथ वही बर्ताव न कर सके जो वह दूसरे अधिकांश आन्दोलनों के साथ करती है. वामपंथी रैलियों में जुटी भारी भीड़ को 'किराए की भीड़' या सिखा-पढ़ा कर जुटाई गई भीड़ कहना अथवा माओवादियों पर भोले-भाले आदिवासियों और किसानों को बरगलाने का आरोप मढना मीडिया की ऐसी ही भंगिमाएं हैं. हमें इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि आम लीगों की भारी संख्या एक भ्रष्ट और दमनकारी सरकार को चुनौती देने और उसका सामना करने में एक नया आत्मविश्वास महसूस कर रही है. जनता की इस लामबंदी की प्रेरक शक्ति अन्ना के प्रति कोई अतार्किक श्रद्धा नहीं है. यह प्रेरक शक्ति सरकार के भ्रष्ट और तानाशाह होने, सरकारी लोकपाल के मसौदे के वाहियात होने में लोगों का दृढ विश्वास है. अधिकांश मीडिया भाले ही जनता को 'जयजयकार' करने वालों के रूप में प्रस्तुत कर रहा हो, हमें अवश्य ही जनता को उसके खुद के मूल्यांकन के आधार पर समझना होगा. पर्चा बांटने, जुलूस निकालने, सत्याग्रह आयोजित कराने, सांसदों और पुलिस बल का सामना करने, गिरफ्तारी देने में जो जनता की पहलकदमी खुली है, हमें उसका आदर करना चाहिए. आन्दोलन में शामिल युवाओं के एक बड़े तबके के लिए यह किसी भी जन कार्यवाही में भाग लेने का पहला अनुभव है. हमें उनके साथ संवाद का रिश्ता कायम करना चाहिए.

प्रभात पटनायक की दलील है कि अन्ना का 'मसीहापन' बुनियादी तौर पर अलोकतांत्रिक है. क्या गांधी द्वारा अपनाई गई रणनीति में मसीहापन के मजबूत तत्व नहीं थे? निस्संदेह 'महात्मा' के रूप में नेता का विचार अपने चरित्र में मसीहाई है. क्या इससे स्वाधीनता संग्राम जिसमें गांधी ने नेतृत्वकारी भूमिका निभाई, 'अलोकतांत्रिक' हो गया? इस तरह की रणनीति की आलोचना करना, यह कहना कि आन्दोलनों को और अधिक लोकतांत्रिक होना चाहिए, कि कोई भी एक नेता पवित्र गाय नहीं है, पूजा की वस्तु नहीं है, यह अलग बात है लेकिन यह कहना कि आन्दोलन लोकतंत्र के लिए खतरा है, अतिशयोक्ति है.

कोई यह याद कर ही सकता है कि नंदीग्राम के सवाल पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे कोलकाता के बुद्धिजीवियों पर भी प्रभात पटनायक ने 'मसीहाई नैतिकतावाद' का आरोप मढ़ा था. ये बुद्धिजीवी एक समय माकपा के कट्टर समर्थक थे, लेकिन उन्होंने जमीन हड़पने के खिलाफ आंदोलनरत गरीब किसानों पर पुलिस फायरिंग के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया था. पश्चिम बंगाल में कोई अन्ना नहीं था. तब वहां 'मसीहा' कौन था- नंदीग्राम या सिंगूर के किसान?

माकपा पोलितब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा है कि 'अन्ना की दलीलें संघ परिवार और भाजपा द्वारा इस्तेमाल की गई दलीलों के समतुल्य हैं जिनके अनुसार उनका कहना था कि भारत की अस्सी फीसदी जनता (हिन्दू जनता) विवादात्मक बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाना चाहती है... क्या संसद को इस मांग के आगे झुक जाना चाहिए?' क्या इस तरह की तुलना जायज है? फासीवाद किसी मांग की राजनीतिक अंतर्वस्तु में निहित होता है या कि हम किसी भी ऐसे आन्दोलन को फासीवादी कह सकते हैं जो संसद पर दबाव डालता हो? आईये इस सवाल को एक भिन्न तरीके से देखें- मान लीजिये कि भाजपा का संसद में पूर्ण बहुमत होता, और वह उसके बल पर अयोध्या में मंदिर निर्माण को बढ़ती. क्या इसे 'संवैधानिक' या 'लोकतांत्रिक' इस लिए कह दिया जाता कि संसद की ऐसी मंशा थी? स्पष्ट है कि मस्जिद गिराया जना और मंदिर अभियान असंवैधानिक थे- इसलिए नहीं कि वे संसद पर गैर-संसदीय दबाव डाल रहे थे, बल्कि इसलिए कि वे बहुसंख्यकवादी वर्चस्व तथा अल्पसंख्यकों के स्वातंत्र्य और अधिकारों को कुचलने की कोशिश कर रहे थे. जन लोकपाल बिल के मसौदे में ऐसा कुछ भी नहीं है जोकि संविधान या अल्पसंख्यकों के अधिकारों को चुनौती देता हो.

सड़क पर उतरे हुए लोग एक कानून की मांग कर रहे हैं जो कि पिछले बयालीस सालों से संसद की सूची में दर्ज है. जनता यह मांग कर रही है कि सरकारी लोकपाल बिल को जनमत द्वारा खारिज किये जाने का संसद आदर करे, और ऐसा कानून पारित करे जोकि जन भावनाओं के अनुरूप एक प्रभावी भ्रष्टाचार विरोधी संस्था का निर्माण करे.

प्रभात पटनायक यह मान कर चले हैं कि जो जनता विरोध में उतरी है, उसे सरकारी बिल और जन लोकपाल बिल के बीच फर्क की बारीकियां पता नहीं हैं. उनका कहना है कि आन्दोलन एक मसीहा पर निर्भर है और उसने तथ्यों के बारे में लोगों को शिक्षित नहीं किया. मेरा मानना है कि तथ्य कुछ और ही कहते हैं. सच तो यह है कि लम्बे समय के बाद पहली बार सामान्य जनता एक कानून के मसौदे की तफसीलों पर इतनी शिद्दत के साथ बहस कर रही है. आन्दोलन के नेताओं ने दोनों बिलों के बीच फर्क की बारीकियों को लोगों तक पहुंचाने के लिए काफी मेहनत की. रामलीला मैदान पर सवाल-जवाब के सत्रों के माध्यम से तथा देश भर में अनेक अन्य आयोजनों के जरिये, वीडियो और इंटरनेट के जरिये उन्होंने यह काम किया है. जन लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वालों से पूछे गए सवालों के जवाब धैर्यपूर्वक दिए गए हैं और कुछ आलोचनाओं को भी स्वीकार किया गया है. जरूरी नहीं कि हम जन लोकपाल बिल के हर प्रावधान से सहमत हों, या उसके बारे में बढ़े-चढ़े दावों से, लेकिन यह बहुत बड़ी बात होगी यदि संसद में लाये जाने वाले हरेक विधेयक को इसी तरह जन-निरीक्षण और बहस-मुबाहिसे की प्रक्रिया से गुजरा जाय, जैसा कि लोकपाल विधेयक के मसले में हो रहा है. इन कानून के मसौदों को न केवल राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् और उदारवादी अभिजनों के बीच निरीक्षण और बहस के लिए रखा जाना चाहिए बल्कि आम जनता के बीच भी.

अनेकशः अन्ना द्वारा संसद के सामने समय सीमा रखने के 'अलोकतांत्रिक' व्यवहार की आलोचना की गई किन्तु तथ्य यह है क़ि हमारे अधिकांश सांसदों को अमेरिका द्वारा निश्चित की गई 'समय-सीमा' का पालन करने से कोई गुरेज नहीं था. उदाहरण के लिए परमाण्विक समझौते के मसले पर.

अरुंधति राय ने जन लोकपाल के आन्दोलन की तुलना माओवादी आन्दोलन से करते हुए फरमाया कि उसका उद्देश्य 'भारतीय राजसत्ता को उखाड़ फेंकना' है. आश्चर्य है कि सरकार भी ऐसी ही तुलना करती आयी है. अंतर महज यह है कि अरुंधति के अनुसार सरकार 'खुद अपने आपको उखाड़ फेंकने' की मुहिम में शामिल है.

अगर सरकार वास्तव में इस खेल में शामिल है, अगर अवह खुद को उखाड़ फेंकने में सहयोग कर रहही है, अगर जन लोकपाल उसके कारपोरेट समर्थक एजेंडा और विश्व-बैंक निर्देशित सुधारों के कार्यक्रमों के अनुकूल है, तो क्यों नहीं उसने शुरू में ही जन लोकपाल के मसौदे को स्वीकार कर लिया? अन्ना हजारे को सार्वजनिक रूप से गालियाँ देकर और बाद में गिरफ्तार कर क्यों अपनी हुज्ज़त कराई? क्यों भाजपा भी इस मसौदे का समर्थन करने से अब तक मुंह चुराती रही? क्या जन लोकपाल का अभियान राजसत्ता को उखाड़ फेंकने का अभियान है? या तथ्यतः यह राजसत्ता के प्रति विश्वास की कमी को रोकने का प्रयास है? एक समय था जब न्यायपालिका, राजसत्ता की विश्वसनीयता को बहाल करने वाली संस्था मानी जाती थी. आज यह संस्था लोकपाल है.

अन्ना के अधिकांश आलोचक इस बात पर सहमत हैं कि लोकपाल का सरकारी मसौदा नख-दांत विहीन और कमजोर है. क्या एक प्रभावकारी और स्वतन्त्र लोकपाल का प्रावधान करने वाला कोई भी विधेयक दमनकारी है? क्या टीम अन्ना द्वारा बनाया जन लोकपाल बिल 'सुपर पुलिस' और 'कुलीनतंत्र' के समतुल्य है, जैसा कि उसे अनेकशः बताया जा रहा है? मुझे तो लगता है कि जन लोकपाल के अधिकारों के दायरे में पटवारी और चपरासी से प्रधानमंत्री तक, भ्रष्टाचार के सभी मामलों में जांच करने, निगरानी रखने और दण्डित करने के जो प्रावधान हैं, वे सी बी आई को पहले से ही प्राप्त हैं. दोनों के बीच बड़ा अंतर यह है कि लोकपाल के चयन और क्रिया-कलाप सरकार से अपेक्षया अधिक स्वतन्त्र होगा, और चयन की प्रक्रिया जनता की भागीदारी या हस्तक्षेप की भी इसमें कुछ न कुछ गुंजाईश है. जन लोकपाल के मसौदे में किन्हीं ख़ास धाराओं को हटाने या उनमें परिवर्तन करने अथवा उसके अधिकारों में नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली की मांग करना एक बात है लेकिन पूरे मसौदे को ही दमनकारी बताना एकदम दूसरी बात है.

निस्संदेह हमें यह मांग करनी चाहिए कि कारपोरेट जगत, मीडिया, बड़ी फंडिंग वाले एनजीओ और राजनीतिक पार्टियां भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों के दायरे में लाये जाने चाहिए. क्या एक जन लोकपाल अकेले ही भ्रष्टाचार से निपट पायेगा? आज अधिकांश भ्रष्टाचार सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की सह-भागेदारी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) के दायरे का है. लिहाजा वे उपाय जो सार्वजनिक क्षेत्र के भ्रष्टाचार की रोक-थाम के लिए किये जायेंगें, वे सिर्फ आंशिक रूप से प्रभावकारी होंगें. जैसा कि प्रशांत भूषण अक्सर कहा करते हैं कि इस तरह का कानून भ्रष्टाचार के 'आपूर्ति पक्ष' (सप्लाई साइड) को ही संबोधित कर सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार का 'मांग पक्ष' (डिमांड साइड) तब भी बना रहेगा, जब तक कि प्राकृतिक संसाधनों और सेवाओं के निजीकरण की नीतियां बनी रहती हैं. एक कानून जो कि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वालों के भ्रष्टाचार पर ही केन्द्रित है वह इस समस्या का महज आंशिक समाधान ही करता है. वह रामबाण नहीं है. लेकिन क्या यह बात उसे दमनकारी और कारपोरेट हितो के लिए फायदेमंद बनाती है? मुझे ऐसा नहीं लगता. आखिर 'निजी' लुटेरों को 'सार्वजनिक' लुटेरों की जरूरत होती है- टाटा और अंबानी को ए राजा की जरूरत होती है, जिंदल, एस्सार, रियो टिंटो को मधु कोड़ा जैसों की जरूरत होती है. एक कानून जो राजाओं और कोडाओं से निपटने के लिए बने, वह भ्रष्टाचार के रोग के लिए रामबाण भले ही न हो, लेकिन एक अत्यंत आवश्यक उपाय जरूर है.

कुछ अखबार भ्रष्टाचार का इलाज उदारीकरण की बढ़ी हुई खुराक से करने का सुझाव अवश्य ही दे रहे हैं, जैसा क़ि कारपोरेट सेक्टर के विभिन्न स्वर. क्या इसका मतलब यह है कि भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में जो लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं, वे सब उसी शिद्दत के साथ अधिक उदारीकरण की मांग करने लग जायेंगें, जिस शिद्दत से वे जन लोकपाल की मांग कर रहे हैं? संभवतः नहीं. हाल-फिलहाल तक मीडिया ने भावी पीढी को उदारीकरण के उत्साही समर्थकों के बतौर प्रस्तुत किया था. क्या इस आन्दोलन में युवाओं की भागीदारी महंगी शिक्षा और असुरक्षित रोजगार की परिस्थिति में उदारीकरण के वायदों के खिलाफ इनके बढ़ते हुए मोहभंग को सूचित नहीं करती? क्या इस बात के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं क़ि सडको पर उतरे हुए लोगों का गुस्सा महज भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं बल्कि महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ भी है? उनमें से एक बहुत बड़ी संख्या ऊर्जा के निजीकरण के चलते उनके बिजली के बिलों में बढ़ोत्तरी की शिकायत कर रही है, वे महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ शिकायत दर्ज करा रहे हैं. यदि नव-उदारवादी विचारक और कारपोरेट मीडिया रोग को ही निदान बता रहे हैं तब निश्चय ही ज्यादा रेडिकल राजनीतिक ताकतों को इस क्षण आन्दोलन में उतरे लोगों के साथ संवाद बनाने की और भी ज्यादा जरूरत है ताकि भ्रष्टाचार और उदारीकरण के बीच गहरे संबंध को उजागर किया जा सके, ताकि जल-जंगल-जमीन, बिजली, खनिज, स्पेक्ट्रम, गैस, शिक्षा, सड़क, हाईवे, एयरपोर्ट आदि के निजीकरण के जरिये कारपोरेट लूट का भंडाफोड़ किया जा सके.

टीवी चैनल अधिकांशतः आन्दोलन को तो चढ़ा रहे हैं, पर उसमें निहित मुद्दों को दबा रहे हैं. लेकिन इससे पहले कि हम कांस्पिरेसी या षडयंत्र के निष्कर्ष तक पहुंचे, हमें याद रखना चाहिए कि अधिकांश अखबारों ने आन्दोलन के समर्थन की जगह निर्णय लेने की प्रक्रिया में 'संसदीय सर्वोच्चता' को ही अपने सम्पादकीयों में स्थापित किया है. कुछ अपवादों को छोड़कर मीडिया की भूमिका और कवरेज समस्याग्रस्त और चुनिंदा चीजों को ही रेखांकित करने वाली है. उसने कारपोरेट भ्रष्टाचार पर किसी बहस-मुबाहिसे को शायद ही सतह पर आने दिया हो. लेकिन बड़े पैमाने पर जनता की लामबंदी को मीडिया के भड़कावे का परिणाम मानना पूरी तौर पर गलत है. अप्रैल के महीने में कई लोगों ने भविष्यवाणी की, 'पुलिस दमन और गिरफ्तारियों की संभावना का इन्तजार कीजिये, ये भीड़ मिनटों में छंट जायेगी.' इसके उलट अगस्त में लोगों ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां दीं. अब कुछ संशयात्मा लोग कह रहे हैं, 'टीवी कैमरे हटा लीजिये, और देखिये कि लोग कैसे छूमंतर हो जाते हैं.' मुझे ऐसा नहीं लगता.

अनिवार्यतः अन्ना के राजनीतिक दर्शन और उनकी सामाजिक दृष्टि को लेकर अनेक सवाल बहस तलब हैं. राजनीतिक और लोकतांत्रिक सवालों- मसलन जाति, साम्प्रदायिकता, राज्य दमन, आर्थिक नीतियां, आदि पर सुसंगतता की मांग हर आन्दोलन से की ही जानी चाहिए. अन्ना के पंद्रह अगस्त के भाषण ने जमीन की कारपोरेट लूट और पुलिस फायरिंग जैसे ज्वलंत सवालों को स्पर्श किया. लेकिन येदुरप्पा और बेल्लारी पर उनकी चुप्पी ज्यादा प्रकट थी. एक भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से निश्चय ही यह अपेक्षा की जाती है कि किसी सवाल पर अगर किसी मुख्यमंत्री को गद्दी छोड़नी पड़ी हो वह भी उस रिपोर्ट के आधार पर जिसे जन लोकपाल बिल बनाने वालों में से एक जस्टिस हेगड़े ने तैयार किया हो तो वह उसका जरूर ही स्वागत करे. भाषण दर भाषण येदुरप्पा और बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं पर चुप्पी और राजा, सिब्बल और कलमाडी जैसों के खिलाफ मुखर होना राजनीतिक अवसरवाद है.

राजनीतिक ताकतों के प्रति ही अन्ना के नेतृत्व वाले समूह का रवैया विरोधाभाषी है. काफी पहले मार्च 2011 में उन्होंने सभी राजनीतिक पार्टियों को आन्दोलन का समर्थन करने के लिए आमंत्रित किया था. लेकिन राजनीतिक कार्यकर्ता उनके मंचों पर हूट किये जाते हैं- भ्रष्टाचार पर उनके रवैय्ये के कारण नहीं, बल्कि सिर्फ उनकी राजनीतिक पहचान के चलते. समाजवादी विचारधारा के एक दल के कार्यकर्ताओं को रामलीला मैदान में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कार्यकर्ताओं द्वारा एक पुस्तिका के वितरण से रोक दिया गया जिसमें भ्रष्टाचार की परिघटना का विश्लेषण किया गया था. विडम्बना यह है कि इस पुस्तिका का लोकार्पण प्रशांत भूषण ने किया था. दूसरी ओर तमाम तरह के दक्षिणपंथी समूह न केवल खुले तौर पर अपना साहित्य वितरित कर रहे हैं बल्कि उन्हें मंच पर भी जगह मिल रही है- अनेक प्रकार के गैर-राजनीतिक आवरण 'राजनीति धोखा है' जैसी अराजनीतिक विचारधारा पर अन्ना का एकाधिकार नहीं है. दूसरे अनेक समूह हैं जो 'जन आन्दोलनों' को अराजनीतिक बताते हैं. हम इस परभाषा को स्वीकार नहीं कर सकते लेकिन सड़कों पर जनता के बीच उतरे बगैर हम इस विचार से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते, और न इसे चुनौती दे सकते हैं.

हममें से तमाम लोग, जिनके पास भ्रष्टाचार या संगठित राजनीतिक आन्दोलन का राजनीतिक विश्लेषण है, उनके लिए अन्ना आन्दोलन ऐसा नहीं है जिसके साथ आसान, सुविधाजनक, निरपेक्ष एकजुटता या समर्थन संभव हो. एकता और संघर्ष, उसके भीतर कार्यरत अन्य राजनीतिक शक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा की जरूरत हैं, लेकिन क्या अधिकांश बड़े आन्दोलन आमतौर पर उबड़-खाबड़ और अस्त-व्यस्त नहीं होते? क्या उनमें एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती ताकतें नहीं होतीं? तहरीर चौक का आन्दोलन ऐसा ही था. जेपी आन्दोलन निश्चय ही ऐसा था. भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन भले ही तहरीर चौक या जेपी आन्दोलन (जिनका केन्द्रीय मुद्दा लोकतंत्र था) जितना महत्वपूर्ण न हो, लेकिन 'लोकपाल' के लिए आन्दोलन में उतरी जनता के लिए 'लोकतंत्र' का सवाल (जिसमें विरोध का अधिकार तथा जन आकांक्षाओं के मुताबिक़ संसद में कानून बनाने को सुनिश्चित करना शामिल है) प्रभावी हो चला है. हव्वा खड़ा करने की जगह हमें आन्दोलन के बीचो-बीच होना चाहिए और वास्तविक चुनौतियों और खतरों का मुकाबला करना चाहिए. हमें 'भ्रष्टाचार' और 'लोकतंत्र' की परिभाषाओं को विस्तारित करने की जरूरत है.

क्या भारतीय राजसत्ता के लिए संकट और उथल-पुथल का यह समय फासीवादी दिशा ले सकता है? निस्संदेह ऐसा हो सकता है. लेकिन क्या वामपंथी और प्रगतिशील ताकतें इस संकट के फासीवादी समाधान को अनिवार्य नियति के तौर पर स्वीकार करते हुए विरोध करने वाले लोगों को 'प्राक-आधुनिक' कहकर उनका अवमूल्यन कर सकती हैं? क्या हम विरोध कर रहे लोगों के बीच 'संसद की सर्वोच्चता' का प्रचार कर शासक वर्ग के साथ बिरादराना कायम कर सकते हैं? क्या इसकी जगह हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों की भावना और संकल्प का स्वागत नहीं करना चाहिए? ऐसा करते हुए क्या हमें शुद्ध कानूनी लड़ाई जो क़ि भ्रष्टाचार के नीतिगत आधारों पर चुप है, उसके आगे का रास्ता प्रशस्त नहीं करना चाहिए? अपने राजनीतिक झंडों को झुकाकर और 'अराजनीतिक' दिखने के दबाव के आगे घुटने टेकने की जगह, यह समय है क़ि हम साहसपूर्वक सड़कों पर उतरें और विरोध में उमड़ी जनता के साथ भ्रष्टाचार के बारे में अपनी राजनीतिक समझ के आधार पर संवाद कायम करें.

इधर अन्ना के अनशन को इरोम के अनशन से तुलना कर अलगाने का फैशन बढ़ चला है. समाचार लेकिन यह है कि इरोम ने अन्ना के साथी अखिल गोगोई के आमंतरण के जवाब में अन्ना के "आश्चर्यजनक धर्मयुद्ध" का गर्मजोशी से समर्थन किया है, इरोम ने इंगित किया क़ि जहां अन्ना को अहिंसक तरीके से विरोध करने की स्वतंत्रता मिली, वाहें उन्हें यह स्वतंत्रता नहीं दी गई. इरोम ने अन्ना से अपनी रिहाई के लिए काम करने की अपील की और उन्हें मणिपुर की यात्रा का निमंत्रण दिया. क्या यह संभव नहीं कि हम इरोम की परिपक्वता से हम कोई सबक लें.

(समकालीन जनमत से साभार.)

Wednesday, September 7, 2011

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - 4

(पिछली पोस्ट से जारी)

1930-31 में जब हिंदुस्तानी फ़िल्मों में साउंड ट्रैक आया, उसके साथ ही इंसान की आवाज़ और भाषा का प्रयोग हुआ। मूक सिनेमा में लिमिटेसन्स थीं। चित्र के मतलब नहीं निकलते थे। इसलिए कहानी को समझाने के लिए बारबार लिखे हुए शब्दों का इंटरल्यूड परदे पर दिखाया जाता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि एक आदमी स्क्रीन के एक और खड़ा होकर शब्दों में कहानी बताता। जैसे कि जीते-जागते इंसान को भाषा से अलग नहीं किया जा सकता, जब तक बोलते-गाते इंसान फ़िल्मों में नहीं आए, तब तक फ़िल्म इंसान के बारे में थी ही नहीं।

हिंदुस्तान एक खेतिहर देश है जिसमें ज़िंदा रहने के लिए गीत एक बहुत बड़ा ज़रिया है। लोकगीत में पुरानी पीढ़ी की विज़्डम डालकर नयी पीढ़ी तक पहुँचाई गई ताकि नयी पीढ़ी अपने बुजु़र्गों के तजुर्बे का फ़ायदा उठाये और उनकी याद भी ताज़ा रखे। सिनेमा अवाम का माध्यम है इसलिए उसमें शास्त्रीय संगीत उचित नहीं था। हिंदुस्तान का लोक संगीत ही फ़िल्म का आधार बना। सिनेमा मे गीत का उपयोग कैसे होना है, संगीतकार आर सी बोराल, मास्टर गु़लाम हैदर, केशव भोले, पंकज मलिक, तिमिर बारान, अनिल विश्वास इन लोगों ने इसका जवाब निकाला। वह यह कि फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ाने का ज़रिया बनाया जाए। आज भी सबसे सफल गीत वे हैं, जब उन्हें क्रमबद्ध ढंग से रखा जाए तो सारी कहानी ख़ुद-ब-ख़ुद पता लग जाती है। गीत को किस सिचुएशन में आना चाहिए, इसका जवाब है जिसमें जज़्बा इतना बढ़े कि डाॅयलाग से काम न बनता हो, तो गीत लगाया जाए। कहानी में ऐसी सिचुएशन आती है जहाँ न तो तस्वीर और न संवाद काम करते हैं, वहाँ गीत उसे पूरा करता है। गीत कहानी को गहराई देता है। अच्छा डाइरेक्टर और संगीतकार वही है जो कहानी में गीत को पैबंद की तरह नहीं, ऐसे बुने कि वह अलग न दिखाई दे।

भाई ने एक बात और बताई कि फ़िल्मी गीत के साथ ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटोग्राफ़ी को रंगीन बनाने का मंसूबा संगीतकारों ने ही निकाला। वह था आरकेस्ट्रा। हमारे देशी संगीत में इतने वाद्य नहीं थे कि गीत को इंद्रधनुषी रंग दे सकते। पहले तो, उन्होंने पश्चिमी संगीत से वह साज़ लिये जो हमारे वाद्यों के स्वरों से मिलते-जुलते थे। जैसे, सरोद की जगह गिटार, वीणा की जगह स्लाइडिंग गिटार, बाँसुरी की जगह धातु का फ़्लूट, सारंगी की जगह वायलिन, हारमोनियम की जगह पियानो और एकोर्डियन, शहनाई की जगह ओबो और आवाज़ की जगह सेक्सोफ़ोन का इस्तेमाल किया। इन वाद्यों को अकेले बजाया जा सकता था और गीतों को रंगीन करने के लिए आरकेस्ट्रा की ज़रूरत थी। लेकिन आरकेस्ट्रा नोटेशन के बग़ैर काम में नहीं लाया जा सकता। इसलिए कलाकारों को पश्चिमी संगीत का एल्फ़ाबेट सीखना पड़ा। 1952 में जब महबूब ख़ान की रंगीन फ़िल्म आन नोवल्टी सिनेमा में दिखायी गई तो भाई ने कहा, ‘आज हिंदुस्तानी फ़िल्म भद्दी हो गई। अच्छे गाने होते हुए टेक्नीकलर की ज़रूरत नहीं थी।’

दिल में छुपाके प्यार का तूफ़ान ले चले
आज हम अपनी मौत का सामान ले चले ...
मिटता है कौन देखिए उल्फ़त की राह में


उन्होंने कहा फ़िल्म को बाज़ारू कर दिया है। वह फ़िल्म आधी छोड़कर रीगल में हम लोग फ़िल्म देखने गए और शहर में ढिंढोरा पीट दिया कि हम लोग फ़िल्म आन से बेहतर है। लेकिन सच यह है कि मेरे भाई के अलावा फ़िल्म कोई छह लोगों ने ही देखी थी।

चली जा चली जा
आहों की दुनिया
यहाँ कोई नहीं अपना न घर अपना न दर अपना।


मेरे भाई उन गिने-चुने लोगों में थे जिनकी बातों में इतना दम था कि वह कभी भूलती नहीं थीं। भाई के साथ यह सफ़र चालीस साल पहले की बात है। लेकिन लगता है, सब कुछ कल ही हुआ है। रवींद्रनाथ टैगोर के बारे में सिर्फ़ यह मालूम था कि उन्होंने बिना दरो-दीवार का स्कूल बनाया है। भाई की यह बातें सुनकर मैं यह सोचने लगा कि जिस स्कूल में मैं जाता हूँ वह तो जेल है और मेरे भाई ने चलती हुई बस को स्कूल बना दिया जिसमें मनोरंजन के साथ हम सीख भी रहे थे। वह अध्यापक थे और मैं उनका छात्र।
भाई ने बताया कि हर विदेशी वाद्य को अपने संगीत में अपनाने से पहले उसकी परीक्षा ली गई। क्या इन साज़ों में से वे बारीक स्वर निकाले जा सकते हैं जो हमारे संगीत को अभिव्यक्त कर सकें? उन्होंने कहा, बहुत से पढ़े-लिखे लोग फ़िल्मी गीत के आर्केस्ट्रा को पश्चिम का कटा-पिटा मिलावटी आरकेस्ट्रा समझते हैं। 1940 के दशक में ही हमारे संगीतकारों ने आर्केस्ट्रा का हिंदुस्तानीकरण कर लिया था। उसे अपना बना लिया था। इसकी जो दो मिसालें उन्होंने मुझे दीं वह आज भी याद है। उन्होंने अपने पार्कर पेन मुझे दिखाया और कहा, यह है विलायती लेकिन इससे मैं उर्दू लिख सकता हूँ, हिंदी लिख सकता हूँ, मैं जो भी चाहूँ लिख सकता हूँ। दूसरी मिसाल उस संगीतकार से जुड़ी है जिसके गाने की खोज में हम यह सफ़र कर रहे हैं। सज्जाद हुसैन इटली के मैंडोलिन में माहिर थे। हालाँकि मैंडोलिन में मींड नहीं है लेकिन उनमे यह क़ाबलियत थी कि वह मैंडोलिन के तार में से आधा, चैथाई स्वर निकाल कर हिंदुस्तानी संगीत दे रहे हैं।

यह कहते हुए उन्होंने थोड़ा-सा विषय बदला। अरे भाई, अगर हमने तुम्हें यह इंप्रेशन दिया है कि मोरोगोरो में हमें वह गाना सुनने को मिल जाएगा जिसे हम ढूँढ़ रहे हैं, हो सकता है नाकाम हो जाएँ। जिन्होंने अपना रिकार्ड संभाल कर रखा हुआ है वह हमें इतनी आसानी से क्यों सुनाएगा? उस समय उन्होंने वह बात कही जो मुझे आज भी याद है और आगे भी रहेगी कि हो सकता है, ख़ुदा ने इंसान को इसलिए बनाया है ताकि हमें इस बात का इल्म हो कि रूह को बचाने के लिए उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ती है।

(जारी)

Tuesday, September 6, 2011

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - 3

(पिछली पोस्ट से जारी)

फ़िल्म गीत है क्या? एक बार पूछने पर उन्होंने कहा था फ़िल्मी गीत धुन के लिफ़ाफ़े में एक पुराना पैग़ाम है जो हमारे पुरखों ने हम तक पहुँचाया है ताकि हम अपने को बेहतर बनायें। यह समझाते हुए उन्होंने आवारा फ़िल्म का ‘दम भर जो उधर मुँह फेरे ओ चंदा’ गीत लिए कहा, ‘ये धार्मिक, मज़हबी गाना है जिसमें राधा और हरि यानी कृष्ण की बातचीत हो रही है। राधा चाँद से, जो कि बलराम है, दरख़्वास्त कर रही है कि यदि वह कुछ देर के लिए बादलों की ओट में हो जाएं तो वह कृष्ण से प्यार का इज़हार कर ले।’

दम भर जो उधर मुँह फेरे ओ चंदा

उन्होंने कहा, राजकपूर - एक इंसान - के लिए ये संभावना है कि वह हरि के रूप में आए।

मैं चोर हूँ काम है मेरा चोरी

क्योंकि हरि माखन चोर थे। वह माखन चुराकर अपनी सौतेली माँ के प्यार का इम्तहान लेते थे। इस गीत में वह हीरोइन से साफ़ कह रहे हैं कि मैं तो चोर हूँ, क्या तब भी मैं प्यार के क़ाबिल हूँ? जिसका जवाब है, बेशक। गाने का अर्थ यही है कि हम दुनिया में एक दूसरे की मोहब्बत के लिए आए हैं। यदि ख़ुदा को प्रेम की ज़रूरत नहीं होती तो वह भी हमें नहीं बनाता। हम जब ईमानदारी से एक-दूसरे से प्यार करते हैं, तो हम भी ख़ुदा के क़रीब आ जाते हैं। यही है फ़िल्म आवारा का पैग़ाम। ये फ़िल्म देखने के दूसरे ही दिन मेरे भाई मोंबासा गए और वहाँ के सलीम रोड के दर्ज़ी से सफ़ेेद गैबर्डीन का कोट और काला वूल ट्राउज़र सिलवाया। उसके साथ सिल्क का मफ़लर पहने सिगरेट पीते उमस भरी गर्मी में चले आ रहे थे राजकपूर की तरह, लेकिन टांगा में।

मैं चोर हूँ, काम है मेरा चोरी, दुनिया में हूँ बदनाम
दिल चुराता आया हूँ मैं, ये ही मेरा काम।


सेकिंड क्लास के डिब्बे में जो हिंदुस्तानियों के लिए था दो घंटे में साठ मील का सफ़र करके हम कोरोग्वे पहुँचे। ये रेलगाड़ी और बसों का जंक्शन था। पंगानी नदी के तट पर बसा ये छोटा सा शहर है। जब भी नदी में बाढ़ आती, तो लोगों के घरों और दूकानों को बहा ले जाती। नदी में बड़े-बड़े मगरमच्छ थे। इस शहर में हमारे बड़े मामू रहते थे। जब भी उनके घर जाते, खाने को आलू का बढ़िया पराँठा मिलता। लेकिन इस बार हम उनके घर नहीं गए। भाई साहब ने समझाया मामू दादा फ़ाल्के की फ़िल्म हरिश्चंद्र के ज़माने के हैं। साइलेंट फ़िल्मों के समय के। फ़िल्म संगीत का रस उन्हें नहीं मालूम। अगर हमने उन्हें बताया कि हम एक फ़िल्मी गीत सुनने के लिए इतनी दूर जा रहे हैं तो वह हमें मोरोगोरो से आगे डोडोमा भेज देंगे। वहाँ टांगानिका का सबसे बड़ा पागलख़ाना था जहाँ से कोई भी लौटकर नहीं आता। भाई ने मुझसे वादा ले लिया था कि इस सफ़र का ज़िक्र कभी किसी से नहीं करोगे। इस राज़ ने हमारे बीच एक नया रिश्ता क़ायम किया।

रेलवे स्टेशन से हम शहर में बस का पता लगाने के लिए करीम भाई के टी रूम में गए। वह भाई के दोस्त थे, ख़ुशी से मिले और बताया कि शहर में निराला फ़िल्म लगी हुई है। फ़िल्म आधी ही है, अभी सिर्फ़ दो रीलें आई हैं, बाक़ी रास्ते में है।

चाय पीते हुए वह मधुबाला के बारे में बात करने लगे। करीम भाई ने बताया, मधुबाला की खू़बसूरती ढलते दिन में, सूरज की आखि़री किरण के समान हैं। चूंकि इंसान किरण को वक़्त से बचा नहीं सकता, इससे इंसान की नाकामी का अंदाज़ा मिलता है। मेरे भाई साहब को फ़लसफ़ा नज़र आया। एक अच्छी बात का अच्छे शब्दों में जबाब देना, वह अपना फ़र्ज़ समझते थे। भाई अय्यूब ने कहा, निराला फ़िल्म के गीत ‘महफ़िल में जल उठी शमा परवाने के लिए’, इसमें जो मद्धम-मद्धम क्लेरेनेट बजता है, वह साज़ की आवाज़ नहीं, बुझते चिराग़ की आह है। सी रामचंद्र ने तीन मिनट में गाना नहीं जादू दिखाया है:

महफ़िल में जल उठी शमा परवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में मर जाने के लिए


करीम भाई ने सी रामचंद्र के बारे में सुनते ही उनके सामने चाय का एक और कप रख दिया और कहने लगे, वह बहुत निराश हैं। सरकार शहर को ऊँचाई वाले इलाक़े में नये सिरे से बसाना चाहती है। जब पूछा इसमें ख़राबी क्या है, कहने लगे, ‘इस नदी और इसके सारे जीव-जंतुओं के साथ हमारा बचपन से नाता है। हम एक दूसरे के संगी साथी हैं। जब बाढ़ आती है तो नदी हमारी मेहमान होती है। नदी और इंसान को अलग-अलग करने से पता नहीं क्या-क्या खराबियां आएंगी।’ उनकी सोच हमें बड़ी अनोखी लगी। आसमान की तरफ देखा तो काले बादल लश्कर की तरह बढ़ते चले आ रहे थे। कोरोग्वे और मोरोगोरो का 170 मील का कच्चा रास्ता है जो बारिश में दलदल में बदल जाता है। उस ज़माने में यह बहुत लंबा सफ़र था, लेकिन संगीतकार सज्जाद हुसैन के गाने सुनने के लिए हम दोनों भाई किसी भी आँधी, तूफान का सामना करने के लिए तैयार थे क्योंकि यह गारंटी नहीं थी कि फिर कभी ये गीत सुनने को मिले या न मिले।

जब हम बस स्टेशन पहँुचे और ड्राइवर से पूछा सफ़र कब शुरू होगा, तो वह कहने लगा, ‘ये मोंबासा नहीं है और न ये समुंदरी जहाज़। ये बस बंबई नहीं जा रही है। ये जा रही है मोरोगोरो। शायद आप ग़लत रास्ते पर हैं।’ मेरे भाई ने कहा, ‘हम मोरोगोरो ही जा रहे हैं। बंबई से और भी दूर।’ ये सुनकर ड्राइवर सीटी में गीत गाने लगा:

मेरे दिल की घड़ी करे टिक-टिक
ओ बजे रात के बारह,
हाय तेरी याद ने मारा।


वह कहने लगा, ये है अफ्ऱीक़़ा। ये उस घड़ी पर नहीं चलता जिस पर आप चल रहे हैं। बस उस वक़्त चलेगी जब मेरी मर्ज़ी होगी। भाई ने कहा, ये है सच्चाई। अफ्ऱीक़़ी घड़ी में मिनट की सूई है ही नहीं। सिर्फ घंटे की सूई है। फिर वह गंभीर हो गए। कहने लगे, ‘ये बग़ावत है, अफ्ऱीक़़़ी विलायती घड़ी पर इसलिए नहीं चलता क्योंकि वह घड़ी उसके दास होने का प्रतीक है। इसलिए वह विलायती घड़ी को नहीं मानता। दोपहर दो बजे की बस में हम कोरोग्वे से आगे रवाना हुए। बस में फ़स्ट, सैकंड या थर्ड क्लास का कोई अंतर नहीं था। बस में इंसान, बकरियाँ, मुर्गि़याँ, छोटे, बड़े, बूढ़े सभी एक ही थे। चार पहियों पर एक गाँव साथ चला जा रहा था।

कोरोग्वे से मोरोगोरो तक - हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीत का मुखड़ा

हम शहरी अफ्ऱीक़़ा से देहाती अफ्ऱीक़़ा जा रहे थे। उस इलाक़े में जहाँ हिंदुस्तानियों की फ़©लादी लकीरें नहीं थी। हालाँकि हमारा जन्म अफ्ऱीक़़ा में ही हुआ, देहात हमारे लिए अजनबी जगह थी। ऐसी बियाबान जगह में हमें हिंदुस्तानी ख़यालों के सहारे की ज़रूरत और भी महसूस हो रही थी। हल्की बारिश ने रास्ते को कोरा काग़ज़ बना दिया था जिस पर बस कभी दो, कभी चार लकीरें बनाती आगे चली जा रही थी। मैंने भाई से पूछा, ‘हिंदुस्तानी संगीत है क्या? कहाँ से आया है?’ उन्होंने बताया, ‘यह संगीत उसी सरगम से बना है जिससे क्लासिकल और फ़ोक बना है। सरगम संगीत का एल्फ़ाबेट है।’ जब मुझे यह समझ में नहीं आया तो उन्होंने मुझे एक केला खिलाया और कहा इसका स्वाद है, ‘स’। इसके बाद बस के हर पड़ाव पर मुझे अलग-अलग स्वाद के केले खिलाए और हम ‘स’ से ‘नि’ तक पहुँच गए। एक केले और दूसरे केले के बीच जो अंतर समय और जगह का था, उन्होंने कहा ये है श्रुति। पश्चिमी संगीत की भी सरगम है। हमारी सरगम और उनकी सरगम में बहुत अंतर नहीं है, लेकिन श्रुति का उपयोग हमारे संगीत में बहुत अलग है। ‘हमारा गीत सुरों के इतने छोटे-छोटे हिस्सों में बँटा होता है कि हमें पता ही नहीं लगता कि हम एक स्वर से दूसरे स्वर पर कब पहुँच गए। स्वर नदी के पानी या कहें हवा की तरह आगे बढ़ जाता है। वेस्ट की घड़ी अटक-अटक कर चलती है इसीलिए एक स्वर से दूसरे स्वर की दूरी हमें साफ महसूस होती है। लेकिन हमारे संगीत में घड़ी लगातार एक ही रफ़्तार पर चलती है।’ हमारे संगीत में ऐसा क्यों है तो वह कहने लगे, ‘नेचर में वक़्त भी ऐसे ही चलता है, हमारा संगीत ये सिखाता है। यदि तुम जागे हुए नहीं हो तो तुम्हें पता नहीं लगेगा कि समय कब गुज़र गया और ये बहुत ख़तरनाक हो सकता है।’

उन्होंने कहा, जब बीसवीं सदी में हिंदुस्तान का इतिहास लिखा जाएगा, फ़िल्मी संगीत की ईजाद को इंडिया की एक इंक़लाबी कला का दर्जा मिलेगा। उनको इस बात का पूरा भरोसा था कि आर सी बोराल, पंकज मलिक, मास्टर ग़ुलाम हैदर, अनिल विश्वास, सी. रामचंद्र, नौशाद और सज्जाद हुसैन इनको एक दिन वही दर्जा मिलेगा जो तानसेन, बैजू बावरा, अमीर ख़ुसरो और स्वामी हरिदास का है। फ़िल्म में साउंड टेक्नोलाॅजी आने से पहले मूक सिनेमा था। आर सी बोराल जैसे संगीतकार साउंड आने से पहले लाइव आरकेस्ट्रा, जैसे आपेरा में होता है, स्क्रीन के पास बैठ के बजाते थे और यह संगीत फ़िल्म में जान डाल देता था। वर्ना सिर्फ़ तस्वीरें भूत जैसी लगती थी। हमारे लोक संगीत ने उसमें इंसानियत डाली। उनका विचार था, सही फ़िल्म संगीत रवींद्रनाथ टैगोर, नज़रुल इस्लाम, उत्तर प्रदेश के कोठों और नौटंकी से आया है। इसमें छोटे, बड़े सबका योगदान है। सिनेमा सामान्य लोगों के लिए है। इसमें शास्त्रीय संगीत नहीं चलता। रवींद्रनाथ टैगोर के लिए भी शास्त्रीय संगीत का उस्ताद रखा गया था। लेकिन उन्होंने तो सीखने से ही इंकार कर दिया। जब वह इंगलैंड गए तो उन्हें वहाँ का इंग्लिश और आयरिश सादा गीत बहुत पसंद आया। नज़रुल इस्लाम ने भी बंगाली लोक संगीत से प्रभावित होकर सादी कविता जिसे लोग समझ सकंे, सरल धुन में बाँधी जो कोई भी गुनगुना सके। उन्होंने कहा रवींद्र और नज़रुल ने फ़िल्म के लिए गीत तैयार नहीं किये, लेकिन हमारे संगीतकारों ने उनसे प्रेरणा ली कि अच्छे संदेश वाली कविता को सीधी-सादी सुंदर धुन में पिरोया जा सकता है जिससे लोगों को केवल आनंद ही नहीं कुछ सीखने को भी मिले। होशियार के लिए इशारा ही काफ़ी होता है। रवींद्रनाथ टैगोर और नज़रुल इस्लाम के गीतों से प्रेरणा लेकर हमारे संगीतकारों ने अपने गीत सजाए और फ़िल्म संगीत को इतिहास बना दिया। इसमें कोई शक नहीं कि सिनेमा एक टेक्नोलाॅजी है जिससे हिंदुस्तान की तस्वीर बनाई जा सकती थी। लेकिन फ़िल्म संगीत के बिना यह हिंदुस्तानी नहीं हो सकती थी। फ़िल्म संगीत ने इसे देशी बनाया। पुरानों धागों से नया कपड़ा बुना गया। मैंने उनसे पूछा, ‘फिर क्यों पढ़े-लिखे लोग हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत को घटिया समझते हैं?’ उनका जवाब था, ‘हर पढ़ा-लिखा आदमी अक़्लमंद नहीं होता। जो इस संगीत को घटिया कहते हैं, वे इस संगीत के बारे में नहीं अपने बारे में बता रहे होते हैं।’

(जारी)

Saturday, September 3, 2011

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - २

(पिछली पोस्ट से जारी)

साउथ एशिया की आज़ादी

हिंदुस्तान की आज़ादी ज़लज़ले की तरह आई जिसने हज़ारों मासूम लोगों को निगल लिया. हमारे यहाँ सियासी मामलों पर बात नहीं होती थी. लेकिन हिंदुस्तान के टुकड़े होने की बात चलती तो अय्यूब के चेहरे पर काले बादल छा जाते. वह कहते जिस इतिहास ने मास्टर ग़ुलाम हैदर, नूरजहाँ, खुर्शीद अनवर, फ़ीरोज़ निज़ामी, ए आर चिश्ती और रफ़ीक़ ग़ज़नवी को हिंदुस्तान से अलग कर दिया, उसमें कोई अच्छाई नहीं हो सकती. वह कहते हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत की मिठास हमेशा के लिए कम हो गई है और कम रहेगी.


साउथ एशिया की आज़ादी की ख़बर 1949 में उस दिन आई जब शहीद फ़िल्म का दो पार्ट का मार्चिंग गीत ‘वतन की राह में वतन के नौजवाँ शहीद हो’ आया. ये गाना सुनकर मेरे भाई कहने लगे, ‘लगता है वहाँ कुछ हुआ है.’ ये गीत मास्टर ग़ुलाम हैदर ने कंपोज़ किया था. हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत के वे पायोनियर संगीत निर्देशक थे जो नूरजहाँ, शमशाद बेगम, सुरेन्द्र कौर और लता मंगेशकर को फ़िल्मों में लाए. ये गीत बनाने के बाद हौसला हार कर वे पाकिस्तान चले गए. जब शहीद फ़िल्म अफ़रीक़ा में आई तो ब्रिटिश सरकार ने उसे बैन कर दिया.


भाई अय्यूब उन नौजवानों में थे, जिन्होंने थियेटर के बाहर हंगामा किया. नतीजा ये हुआ कि फ़िल्म को सेंसर कर दिखाया गया. उसमें से तिरंगा फहराने वाला दृश्य काट लिया गया. ये फ़िल्म देखने के बाद हमारे शहर के हर नौजवान की हेयर स्टाइल बदल गई थी. थोड़े ही वक़्त बाद पाकिस्तान से ख़बर आई कि ग़ुलाम हैदर चल बसे. मेरे भाई ने रात अफ़सोस में मैख़ाने में गुज़ारी.

गाँधी, नेहरू और जिन्ना से क्या हुआ, भाई की उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी. उन्हें तो कलाकारों के बिछड़ने का ग़म था. उनकी फ़ेवरेट फ़िल्म राजकपूर की आग थी. वह बड़ी ख़ुशी से मुझे दिखाने के लिए ले गए थे. फ़िल्म में हीरो का चेहरा आधा जल जाता है और वह बदसूरत हो जाता है. उन्होंने कहा, "यह फ़िल्म हीरो - हीरोइन की नहीं, एक मुल्क की कहानी है":


जिंदा हूँ इस तरह कि ज़िंदगी नहीं
जलता हुआ दिया हूँ, मगर रोशनी नहीं.



"ये हीरो कोई नहीं वह हिंदुस्तान है जो पार्टिशन में आधा जल गया." हर फ़िल्म, हर गीत उनके लिए एक किताब थी. वह उनमें हर तरह से उनका सियासी अर्थ समझने की कोशिश करते. जुगनू फ़िल्म का मशहूर गीत, ‘यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई सिवा क्या है’ इसे वे रोमांटिक गीत नहीं सियासी गीत मानते थे. उनका कहना था, कौन किससे बेवफ़ा हुआ ये निर्भर करता है, कौन बॉर्डर के किस तरफ़ है:

यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है
इसी का नाम दुनिया है.



एक हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीत की खोज के सफ़र की इब्तिदा

1953 में मेरे भाई अय्यूब टांगा से क़रीब 80 मील दूर टांगा-मोशी रेलवे लाइन पर एक साइसेल स्टेट में काम करने चले गए. साइसेल अफ़रीक़ा अफ़रीक़ा का जूट था. उससे रस्सी और बोरियाँ बनाई जाती थीं. ये व्यापार ही उस इलाके की रोज़ी रोटी का ज़रिया था. हर काम साइसेल की फ़सल से जुड़ा हुआ था. अप्रैल में बारिश का महीना शुरू ही हुआ था. मैं उस समय करीम जी सैकेंडरी स्कूल में आठवीं क्लास में पढ़ता था. घर में हिसाब के टीचर मास्टर दया भाई के डंडों के डर से पाइथोगोरस की थियोरम बारबार दोहरा रहा था. लेकिन फिर भी याद नहीं हो रही थी. मास्टर दया भाई के जगत में बहुत कुछ था पर दया का नामोनिशाँ नहीं था. उसी समय भाई अय्यूब आए. घर में अचानक हलचल-सी मच गई. हम सब अपनी अपनी परेशानियाँ भूल गए. उन्होंने मुझसे कहा, ‘कल हम सफ़र पर चलेंगे.’ उन्होंने बताया, ‘मोरोगोरो शहर में, एक हाजी के घर में ”कोई प्रेम का देकर संदेशा“ गाना है, बहुत मुश्किल से हमने बात बनाई है कि हम वहाँ जाकर गीत सुन सकते हैं.’ उन्होंने कहा, ‘यह सिनेमा संगीत की बात है, थियोरम की नहीं. वह तो तुम कल भी याद कर लोगे. अब या तो इतिहास से जुड़ जाओ या स्कूल जाओ. मास्टर जी को चिट्ठी मैं लिख दूँगा कि शादी ब्याह का मामला है, तुम्हें बाहर जाकर रहना पड़ रहा है.’ मेरे लिए ईद के दिन दिवाली हो गई. उसी रात तैयारी की. पोटली लेकर सुबह-सुबह हम दोनों ट्रेन पर चढ़ गए. आगे बढ़ती जा रही ट्रेन के दोनों ओर काजू के पेड़ों पर परिंदे मंडरा रहे थे. मुझे ऐसा लगा, ये भी काजू की ख़ू़बसूरती को एप्रीसिएट कर रहे हैं. एक के बाद एक स्टेट आते रहे. वे क़ब्रिस्तान आते रहे जिनमें हिंदुस्तान के वे सैनिक दबे थे जिनकी किसी को याद नहीं.

पढ़े फ़ातिहा कोई आए क्यों, कोई चार फूल चढ़ाये क्यों
कोई लाके शम‘अ जलाए क्यों, मैं वो बेकसी की मज़ार हूँ ...

जो उजड़ गया वो दयार हूँ.


मेरे भाई समझाने लगे, "साइसेल को साइसेल न समझो. यह वह धागा है जिससे हमारी ज़िंदगी पिरी हुई है, अगर यह टूट गया तो हम बिखर जाएंगे."

उस जगह से बहुत दूर, कोरिया की जंग हो रही थी. उससे साइसेल की क़ीमत बहुत बढ़ गई. इसे सोने का धागा कहा जाने लगा. भाई कहते जब तक जंग चलेगी, हमारी ज़िंदगी का कारोबार भी अच्छा रहेगा. लड़ाई में कौन अपाहिज हुआ और कौन मर रहा था, इसकी उन्हें कोई फ़िक्र नहीं थी. उनको इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि पड़ोस के कीनिया में माउमाउ ग़दर के साथ वहाँ आज़ादी का आंदोलन शुरू हो गया है. जब वह बात कर रहे होते, तो फ़िल्मफेयर पर उनकी निगाह होती जिसमें उनके लिए सही ज़िंदगी थी. जानूवाला की दूकान से फ़िल्मफ़ेयर उन्होंने ख़रीदा था जो उसमें कुछ सिलवटें थीं. बारबार वह उन्हें निकालने की कोशिश कर रहे थे और जानूवाला को भला-बुरा कहते जाते कि वह फ़िल्म मैगज़ीन की इज़्ज़त नहीं करता. हर पन्ने की सिलवट जानूवाला के जु़ल्म का सबूत था. पहला फ़िल्मफेयर एवार्ड बैजू बावरा के संगीतकार नौशाद को फ़िल्म के मशहूर गीत ‘तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा’ के लिए मिला.


अकेले मत जाइयो, राधे जमुना के तीर ...
ओ जी ओ, तू गंगा की मौज, मैं जमुना का धारा.


मेरे भाई को गहरा अफ़सोस था. वह कहते, "बेशक बैजू बावरा के गाने बढ़िया हैं. रागों में हैं, लेकिन ये इनाम सी रामचंद्र को अनारकली के लिए मिलना चाहिए था. उस संगीतकार को जिसने आना मेरी जान, मेरी जान संडे के संडे गीत बनाकर जैज़ संगीत के दीपक से हमारे संगीत को उजला किया." आखि़र उन्होंने कहा, "जिंदगी और इंसाफ़ का कोई तालमेल नहीं. हमारे जीने का मक़सद यही है कि हम एक दूसरे को ताक़त दें कि वह ज़िंदगी की बेइंसाफ़ी समझ सके."


गुज़रती हुई ट्रेन के बाहर उड़ते हुए बादलों की छाया दौड़ रही थी. उन्होंने कहा, "काश हमारे साथ कोई कैमरामेन होता, एक ऐसा सीन बनाते जिसमें हीरो बादलों के पीछे भाग रहा है, इस तरह जैसे इंसान वक्त को पकड़ने की कोशिश में.... हाँ, इससे भी बेहतर सीन हो सकता है, बादल इंसान के पीछे भाग रहा है, वक़्त की तरह और उसे अपने शिकंजे में ले रहा है." इस सोच पर वह खूब हँसे कि भई ज़िंदगी भी क्या चीज़ है.


हमारे बुज़ुर्ग यह भी कहते, मेरे भाई की कहानी चार लफ़्जों में लिखी जा सकती है - सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब. मेरे भाई कहते, सिगरेट उनके अकेलेपन की साथी है. शराब थोड़ी देर के लिए गुनाहों से राहत दिलाती है और सिनेमा की कहानी ज़िंदगी को समझने में मदद करती है. सिगरेट पीना उन्होंने हॉलीवुड के अभिनेता हम्फ़्री बोगार्ट से सीखा था. उन्हें बोगार्ट इसलिए पसंद था कि वह कहते बोगार्ट के चेहरे में दो पैग़ाम हैं. एक तो यह कि ज़िंदगी का रिटर्न टिकट नहीं है, और दूसरा कि जिंदगी एक बेइलाज रोग है. वह बारबार उनकी फ़िल्में यह देखने के लिए जाते कि दोनों में से किस पैग़ाम में ज्यादा सच्चाई है. बोगार्ट को लोग प्यार से बोगी कहते थे. चालीस के दशक में उन्होंने हम्फ़्री बोगार्ट की मशहूर फ़िल्म कैसाब्लान्का देखी जो उनकी ज़िंदगी में दोहराती रही. कैसाब्लान्का में बोगी ने रिक का रोल अदा किया था. एक आदमी उससे पूछता है, भई तुम सहारा में क्यों आए हो? जबाब था, पानी ढूंढ़ने आए हैं. भाई कहते यह डायलॉग तो हॉलीवुड ने प्लेजराइज़ किया है. ये ख़याल तो इंडिया से आया है. ऐसी सोच तो हिंदुस्तान के लोगों में होती है. उसके बाद तो जब कभी सफ़र पर जाते तो, तो जब भी कोई उनसे पूछता आप कहाँ गए थे, तो उनका जबाब होता पानी ढूंढ़ने.

हालाँकि वह भाई थे, मुझे उनकी शक्ल आज भी साफ नज़र नहीं आती क्योंकि उनकी आधी शक्ल तो सिगरेट के धुएँ से ढँकी रहती थी. घुआँ उनके चेहरे तक पहुँचने में रोशनी का इम्तिहान लेता. हम्फ़्री बोगार्ट की जो भी फ़िल्म टांगा के मैजेस्टिक सिनेमा में आई, वह घायल हुई. वह फ़िल्म को अपने अफ़्रीकी दोस्त उम्टो के साथ देखते थे. अगर कोई सीन पसंद आ जाता तो उम्टो उसे वहीं रोक लेता, तो फ़िल्म जल जाती और वह हिस्सा काटकर, अनवर स्टूडियो ले जाते और बोगी के सिगरेट के अंदाज़ की फ़ोटो खिंचवाते. अनवर का उनसे वादा रहता कि वह किसी ओर की ऐसी तस्वीर नहीं लेंगे. बाद में हम्फ़्री बोगार्ट द अफ़्रीकन क्वीन बनाने के लिए अफ़्रीका आए. भाई को ज़िंदगी भर अफ़सोस रहा कि ज़ायर में जहाँ वह फ़िल्म बनी थी, वह जा नहीं सके.


शराब उन्होंने पी. सी. बरुआ की फ़िल्म देवदास से सीखी जिसके नायक के एल सहगल थे. शराब के साथ वह गाना भी गाते. उन्हें हमेशा गिला रहा कि सहगल अफ़्रीका नहीं आए. बाद में जब अय्यूब की जिंदगी के बात उठती तो बुजु़र्ग कहते, बचपन में वह मोंबासा में देवदास देखकर आया था, तो फ़िल्म को उसने हाथ की लकीर बना लिया. लोग उन्हें टांगा का सहगल कहते. ‘लाई हयात आई क़ज़ा, ले चले ले चले.अपनी ख़ुशी न आए, न अपनी खु़शी चले’ (ज़ौक) उनकी पसंदीदा ग़ज़ल थी. इसमें उन्होंने ज़िंदगी का अर्थ ढूँढ़ा.


वह बताते कि फ्रांस की अस्तित्ववाद की फ़िलासोफ़ी इसी गीत में से चुराई गई है. जो फ़्रांस के लिए नयी बात थी वह हिंदुस्तान में कब से चली आ रही थी. एक दिन मैंने पूछा, यह अस्तित्ववाद है क्या? तो उन्होंने मुझे यूनान के हीरो सिसिफ़स के बारे में बताया जब उसने यूनानी ख़ुदा ज़ूस से मुकाबला किया तो ज़ूस ने उसे यह सज़ा दी कि वह एक बहुत भारी पत्थर पहाड़ पर ले जाऐ. लेकिन पत्थर ऊपर ले जाने पर नीचे लुढ़क जाता. वह ज़िंदगी भर पत्थर ढोता रहा. मैंने उनसे पूछा जू़स ने सिसिफ़स को यह सज़ा क्यों दी? तो उन्होंने समझाया यूनान का ख़ुदा ज़ूस आसमान का ख़ुदा नहीं ज़मीनी ख़ुदा था. ऐसा जिसमें इंसानी कपट भी होता है. हुआ यह कि ज़ूस को नदी के देवता की बेटी से प्यार हो गया. उसे मालूम था कि लड़की का पिता उसे लड़की कभी नहीं देगा. तो ज़ूस ने उसे चुरा लिया. मैंने उनसे पूछा. सिसिफ़स ने ज़ूस का मुक़ाबला क्यों किया. उन्होंने कहा सिसिफ़स के दिल में एक इंसान का दिल धड़क रहा था. उसे एक बाप की पीड़ा सही माप था. लेकिन सिसिफ़स ने इसे सज़ा समझा ही नहीं. उसने यह समझ लिया कि यही जिंदगी है. इसे तो करना ही है. फिर शिकायत कैसी? सिसिफ़स ने सज़ा को अपनी आज़ादी का मंसूबा बना लिया. फ़्रांस के दार्शनिक आल्बेयर कामू के अस्तित्ववाद का अर्थ उन्होंने मुझे इस तरह समझाया था.

भाई साहब बड़ी किताबें नहीं पढ़ते थे. वह कहते बड़ी किताबें मुल्लाओं, पंडितों के लिए हैं, ऊँचे लोगों के लिए हैं. उनका माध्यम था, तस्वीरों वाली पत्रिकाएँ जो आम लोग पढ़ते हैं - लाइफ़, टाइम, लुक, इलस्ट्रेटेड वीकली आफ़ इंडिया, फ़िल्मफेयर, फ़िल्म इंडिया इत्यादि. यही उनका साहित्य था. हिंदुस्तानी फ़िल्म मैगज़ीन को वह सबसे ऊँचा दर्जा देते थे. जब कभी उनके दोस्त मिलने आते तो वे उन्हें मैगज़ीन देते हुए कहते ये है वक़्त, ये है ज़िंदगी और ये ठहरी झलक, अब ख़ुद फ़ैसला कर लो. उनकी नज़र में हिंदुस्तान की बोलती, गाती, नाचती फ़िल्म दुनिया की कलाओं में सबसे ऊँची थी. वह इसलिए कि कैमरा ज़िंदगी के हर पहलू तक नहीं पहुँच सकता. यह बात हिंदुस्तान के फ़िल्म बनाने वालों ने अच्छी तरह समझ ली थी. जो चीज़ें फ़िल्म में दिखाई नहीं देतीं उन्हें फ़िल्म में कैसे लाया जाए, यह अहम मुद्दा फ़िल्म डाइरेक्टरों ने हल किया. गीत फ़िल्म में वह पार्ट अदा करता है जो कैमरा नहीं दिखा सकता, वह है जज़्बात. ऐसी फ़िल्म में हर कला एक दूसरी कला से जुड़कर एक मुकम्मल पैग़ाम देती है, जो हिंदुस्तान की संगीत के उसूलों पर है. देवदास का एक गीत भाई को बहुत पसंद था: ‘बालम आय बसो मोरे मन में’. वह कहते यह गीत इतना खू़बसूरत है कि म्यूज़ियम में तस्वीर की तरह टाँगना चाहिए. यह गीत न तो बोलों में है और न ही स्वरों में. स्वरों के बीच जो मौन है, उसमें सहगल की जाती हुई रूह की आवाज़ है. बारबार गीत बजाकर सरोद के काले स्वरों के बीच-बीच में पूछते, कुछ सुनाई पड़ रहा है? जब मैं कहता यह तो साइलेंस है, तो वह कहते तुम बहरे हो. वह मानते थे कि फ़िल्म फ़ानी है, गीत अमर है.

बालम आय बसो मोरे मन में.


(जारी)

Friday, September 2, 2011

एक मुकम्मल नदी जो हम चूक गए


दो कविताएं कुछ दिन बह कर गुम हो गई एक नदी के लिए


एक नदी जिसे हम पीना चाहते हैं

हमें चाहिए
एक नदी
उस मे कूद जाने लिए

एक नदी
उस में तैरने के लिए

एक नदी
उस मे डूब जाने लिए !

एक नदी हम सोचें
अपने आकाश
और उस की सूखती हवा के लिए

एक नदी हम खोजें
अपनी धरती
और उस की तपती मिट्टी के लिए

एक नदी हम पोसें
अपनी ज़िन्दगी
और उस मे गायब हरियाली के लिए


हमे चाहिए
एक नदी
एक मुश्त
अभी
इस चिलचिलाते समय मे

कि पीते रहें उसे किश्तों में
ता उम्र
आहिस्ता , आहिस्ता !

जुलाई/ 4, 2008




हम चूक गए कितनी ही नदियाँ

एक नदी हमारे भीतर रहती है
जिस की कोई आवाज़ नही
हमारे अंत: करण को धो डालती है
बिना हमें बताए

एक नदी आस पास बहती है
जिस की कोई शक्ल नहीं
बेरंग
खिलखिलाती
बिना हमारे सपनो को छुए ही
संभव कर देती उन्हे

एक नदी यहाँ से शुरू होती
जिस की कोई गहराई नहीं
बेखटके उतर जाते हम
बिना उसे बताए और छुए
जब कभी

कुछ नदियाँ पहाड़ लाँघती
पठार फाँदती
यहाँ तक आतीं
चुपके से डूब जातीं हम में
और हमें पता भी न चलता ........
कितनी ही नदियाँ
कितनी - कितनी तरह हमसे
कितनी – कितनी बार जुड़तीं रहीं
और हमारा अथाह खारापन
चूक गया हर बार
उन सब की मीठी ताज़गी

हर बार चूक गए हम
एक मुकम्मल नदी !

जून/25,2008

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - १

जलसा का दूसरा अंक छप कर आ चुका है. निर्वासन इस अंक की थीम है और क्या शानदार सामग्री जुटाई है सम्पादक श्री असद ज़ैदी ने.

इस अंक में मुझे सबसे ज़्यादा आकृष्ट किया जनाब अशरफ़ अज़ीज़ के क़िस्सों ने. यह कबाड़ख़ाने के पाठकों की ख़ुशक़िस्मती है कि इस शानदार रचना को हमारे लिए असद जी ने न केवल पोस्ट करने की अनुमति दी बल्कि ख़ुद ही इस पूरे गद्य को यूनीकोड में कन्वर्ट करके मुझे भेजा. बहुत शुक्रिया उनका. लीजिए पेश है पहला हिस्सा -



(द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान पूर्वी अफ़रीक़ा में मज़दूरी करने गए और फिर वहीं बस गए एक भारतीय परिवार में अशरफ़ अज़ीज़ का जन्म हुआ. हिन्दुस्तानी फ़िल्में और फ़िल्म संगीत बचपन और जवानी के साथी रहे - इन्हीं से उनने और उनके भाइयों ने अपनी हिन्दुस्तानी - बल्कि दक्षिण एशियाई - सांस्कृतिक पहचान हासिल की. तंज़ानिया और युगांडा में शिक्षाप्राप्ति के बाद वह छात्रवृत्ति पर अमरीका चले गए. वहाँ 1964 में उन्होंने विस्कॉन्सिन-मेडिसन विश्वविद्यालय से प्राणिशास्त्र में पी एच डी की. तब से वह वाशिंगटन के हॉवर्ड विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ़ मेडिसिन में शरीरविज्ञान पढ़ाते हैं. दक्षिण एशिया की पॉपुलर कल्चर पर उनका काम बहु-प्रशंसित है.

यह संस्मरणात्मक वार्ता रेडियो फ़ीचर के रूप में 1997 में वॉयस ऑफ़ अमेरिका की हिन्दी सेवा द्वारा प्रसारित की गई थी. इसे वयस ऑफ़ अमेरिका की विजयलक्ष्मी देसराम ने रिकार्ड किया. लिप्यान्तर और प्रसारण के लिए पाठ उन्हीं का तैयार किया हुआ है. रेडियो के इतिहास में ऐसी दिलचस्प और जादुई वार्ता - ख़ासकर हिन्दी-उर्दू में - शायद ही कभी सुनने को मिली हो. इसे छापने की अनुमति देने के लिए हम अशरफ़ साहब और विजयलक्ष्मी जी और पाठ की प्रति उपलब्ध कराने के लिए सिने-चिंतक जवरीमल पारख के आभारी हैं. 'जलसा' के नए अंक जलसा २०११ - निर्वासन में प्रकाशित इस वार्ता का मूल शीर्षक है : सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब उर्फ़ जाते हो तो जाओ हम भी यहाँ यादों के सहारे जी लेंगे यानी ईस्ट अफ़रीक़ा में हिंदुस्तानियों का सफ़र, हिंदुस्तानी संगीत के सहारे संगीतकार सज्जाद हुसैन की खोज में)



वो रात दिन वो शाम की गुज़री हुई कहानियाँ
जो तेरे घर में छोड़ दीं प्यार की सब निशानियाँ
- हसरत जयपुरी


साहित्य के बग़ैर इतिहास में कोई ज़िन्दगी नहीं है. वह बेमतलब की तारीख़ों की एक फ़ेहरिस्त है. फिर भी, जो इतिहास लिखा भी गया है, उसमें न तो जनता है और न जीते-जागते इंसान. शहंशाह हैं, राजा हैं, नवाब हैं या ठाकुर. लेकिन जो मुल्क को काँधे पर उठाये थे, वो बेनाम हैं. उनका नाम हमें लोक कला में मिलता है उनके लोक गीतों, पाक विद्या, उनके लिबास और उनकी कहानियों में. हिंदुस्तान का फ़िल्म संगीत उनके इंडिपिडेंस के साथ ही शुरू हुआ और इसे आज़ादी के संघर्ष से अलग नहीं किया जा सकता. मैं इतना दाना नहीं कि कहानी लिख सकूँ. हाँ, कहानी की शक्ल में अपनी कुछ पुरानी यादें साउथ एशिया की पचासवीं साल गिरह पर जागी हैं वह आप तक पहुँचाने का एक छोटा सा प्रयास है. शायद ये आपके कुछ काम आए.


1860 में हिंदुस्तानियों का पहला बनवास और उसके कारण

चाय, शक्कर, रेल और जंग हिंदुस्तान के हज़ारों लोगों की ग़ुलामी और कठोर ज़िदगी की देन बने. पिछली सदी में ब्रिटिश राज में शहंशाह बहादुरशाह ज़फ़र को रंगून में बेबस जिंदगी जीने पर मजबूर करने के बाद भारत के उत्तर और दक्षिण दोनों इलाकों से हज़ारों की संख्या में लोगों की मज़दूरी के लिए जहाज़ों में भरकर करीबियाई द्वीप, दक्षिण अफ़रीक़ा, पूर्व अफ़रीक़ा, हांगकांग, मलेशिया, सिंगापुर और फ़िजी ले जाया गया. इस तरह बहादुरशाह ज़फ़र को रंगून भेजा जाना हिंदुस्तानियों के भविष्य का संकेत बना.

हमारा परिवार ज़िला स्यालकोट से है. लेकिन मेरे माता-पिता का बचपन खडगपुर में बीता. मेरे दादा और नाना ब्रिटिश इंडिया रेलवे में कारीगर थे. मेरे दादा उस दौरान पूर्वी अफ़रीक़ा में, मोंबासा से वोई तक की सौ मील की पहली रेल पटरी डालने के लिए 1896 में पंजाब से मोंबासा गए और काम पूरा होने पर लौट आए.

हमारे बनवास का दूसरा दौर मेरे माता-पिता ने शुरू किया जो पहली जंग के बाद टांगानिका (तंज़ानिया) के टांगा शहर में बस गए. हिंद महासागर में एक छोटा सा बंदरगाह, जर्मन ईस्ट अफ़रीक़ा की राजधानी था. पहली लड़ाई में शहीद हुए हिंदुस्तानियों के निशान टांगा और मोशी के बीच बिछी रेलवे लाइन के दोनों ओर आज भी नज़र आते हैं. सेना में जो मुसलमान थे, उनके फिर भी क़ब्रों के निशान हैं लेकिन हिंदुओं और सिक्खों के वजूद तो अगरबत्ती की महक की तरह फ़िज़ा में गुल हो गए हैं. उनके बलिदान का सबूत है, ब्रिटेन की जीत.


न किसी की आँख का नूर हूँ,
न किसी के दिल का क़रार हूँ,
जो किसी के काम न आ सके
वो एक मुश्ते गु़बार हूँ.


हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत से पहली मुलाक़ात

पहली लड़ाई के बाद लीग ऑफ नेशन ने टांगानिका ब्रिटेन को सौंप दिया. फिर तो इस देश को आबाद करने के लिए और भी हिंदुस्तानी वहाँ पहुँचे. मेरे पिता टांगामोशी रेलवे के मुलाज़िम थे. इस तरह हमारी जिंदगी का कारोबार चलने लगा. मुझे इस बात पर आज भी ताज्जुब है कि वो धमाका जिसने हिरोशिमा और नागासाकी को राख बनाकर इतिहास को नया मोड़ दिया, उसकी मुझे कोई याद नहीं. लेकिन ये साफ़ याद है, 1945-46 में मेरे सबसे बड़े भाई मसूद कीनिया के सबसे बड़े पोर्ट शहर मोंबासा से एक ग्रामोफ़ोन और कुछ 78 आरपीएम रिकार्ड ख़रीद कर लाए. उस शहर में हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत ने पहला क़दम हमारे घर में रखा था. रात की दूधिया चांदनी में, घर के बरांडे में, पहला फ़िल्मी गीत जो मैंने सुना था, वह था नूरजहाँ का गाया फ़िल्म विलेज गर्ल का गीत, ‘बैठी हूँ तेरी याद का लेकर ये सहारा’. इंतज़ार के इस गीत में नूरजहाँ की आवाज़ मुझे बेहद सुरीली और जोश भरी लगी.


बैठी हूँ तेरी याद का लेकर ये सहारा
आ जाओ कि चमके मेरी क़िस्मत का सितारा.


हमारे बड़े भाई ने तुरंत कहा, ‘भाई गीत नूरजहाँ गा रही है, लेकिन संगीतकार हैं, श्यामसुंदर.’ उस दिन दूसरा गीत जो उन्होंने बजाया वह फ़िल्म दोस्त का था, लेकिन आवाज़ नूरजहाँ की ही थी. संगीतकार थे, सज्जाद हुसैन. ‘कोई प्रेम का देके संदेसा हाय लूट गया, हाय लूट गया.’ भाई साहब ने बड़े अंदाज़ से कहा, ‘जिस होनहार नौजवान संगीतकार ने संगीत दिया है, आने वाले समय में बहुत चमकेंगे.’


आज मेरे दिल का शीशा
हाय टूट गया, हाय टूट गया.


उस रात के बाद भाई जब भी मोंबासा जाते वहाँ की मशहूर सलीम रोड के शंकर दास एंड संज़ से रिकार्ड ले आते. टांगा और मोंबासा की दूरी लगभग 120 मील की है. उस ज़माने में रास्ते कच्चे थे. थोड़ी ही बरसात में कीचड़ से भर जाना आम बात थी. बारिश में वहाँ की लूंगा लूंगा नदी में पंटून (फ़ेरी) की आवाजाही बंद हो जाती. और फिर मोंबासा पहुंचने के लिए एक और फ़ेरी लिकोनी पर जाना पड़ता था. बचपन में लगता था, मोंबासा चांद के पार है. फ़िल्मी गीत वहीं से आते हैं.

सबसे बड़े भाई पिता समान थे. बहुत से कामों की शुरुआत उन्होंने की. ग्रामोफ़ोन और फ़िल्मों के गीत भी घर में वही लाए. उन्हें संगीत से लगाव था लेकिन उनसे छोटे भाई अय्यूब को तो फ़िल्मी संगीत और फ़िल्मों का जूनून था. जबकि मैं सोचता था कि हिंदुस्तानी फ़िल्मों और उनके गीतों को अलग नहीं किया जा सकता. हालाँकि अय्यूब सगे भाई थे, लेकिन मुझे लगता था कि वह आधे हमारे साथ हैं और आधे फ़िल्मों की स्क्रीन में हैं. क़द के छोटे थे, आवाज़ भारी और अदाओं की वजह से बडे़ भाई से भी बड़े लगते थे. वह पुरानी फ़िल्मों - पृथ्वी वल्लभ, सिकंदर और पुकार - का ज़िक्र करते समय एक साथ तीन-चार भूमिकाएँ करते. उन्हें इन फ़िल्मों का एक एक डायलॉग याद था. जो फ़िल्में मैंने नहीं देखी थीं, उनकी एक्टिंग से मुझे आज भी लगता है कि मैं उन्हें देख चुका हूँ. यह फ़िल्में उन्होंने बचपन में मोंबासा में देखी थीं. पुकार फ़िल्म में चंद्रमोहन और सोहराब मोदी की एक्टिंग और डायलॉग को वो सिनेमा की कला की हद मानते थे. उनका कहना था कि अभिनेताओं के बीच दो बातें नहीं हो रही थीं, तलवारें चल रही थीं. और उनके डायलॉग से कहानी आगे बढ़ रही थी. उनकी नज़र में मोतीलाल और अशोक कुमार ही सिनेमा के सही आर्टिस्ट थे क्योंकि इन दोनों की एक्टिंग बड़ी सधी हुई थी. लेकिन ये बड़ी दिलचस्प बात थी कि भाई स्वयं सोहराब मोदी और चंद्रमोहन की (पारसी) थियेटर वाली एक्टिंग करते थे. इस बारे में उनकी सोच थी कि अगर वे ख़ुद भी सिनेमा में होते तब वह मोतीलाल बनते.

ये मेरी खु़शकिस्मती है कि अय्यूब मुझसे उम्र में काफ़ी बड़े थे, परंतु उनका हर छोटे, बड़े के साथ दोस्त का सा व्यवहार था. उनके साथ बैठकर कभी महसूस नहीं हुआ कि बड़े भाई के साथ बैठे हैं, बल्कि जिगरी दोस्त का एहसास होता.

हमारे शहर के पहले सिनेमाघर का नाम था मैजेस्टिक. ये पहले युद्ध के सिपाहियों के क़ब्रिस्तान के सामने था. भाई ने समझाया था, सिनेमा और क़ब्रिस्तान का गहरा संबंध है. सिनेमा इंसान की मौत का रिकार्ड है. कहते, सहगल चल बसे लेकिन देवदास फ़िल्म में हम उन्हें बारबार मरते देख सकते हैं. मैजेस्टिक में हमने पहली हिंदुस्तानी फ़िल्म रतन देखी थी. वो मुझे कंधे पर बिठा कर ले गए थे. शाम का समय था. ऊंचाई से मैंने देखा, क़ब्रिस्तान लोगों से भरा हुआ है. ये वह लोग थे जिन्हें फ़िल्म के टिकट नहीं मिले थे. वहाँ अच्छी खासी जंग चल रही थी. मुझे लगा, ऐसी हालत में आज तो फ़िल्म नहीं देख सकेंगे. भाई ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘हमने सब बंदोबस्त किया हुआ है.’ बड़े भाई अय्यूब की दोस्ती सिनेमा के प्रोजेक्शनिस्ट अफ़रीक़ी भाई उम्टो से थी. उन्होंने उम्टो को समोसे खिलाकर पहले ही टिकट लिये हुए थे. फ़िल्म रतन में करन दीवान और स्वर्णलता पर फ़िल्माए गीतों की याद आज भी ताज़ा है. ‘अँखियां मिलाके, जिया भरमाके, चले नहीं जाना/ ओ, ओ चले नहीं जाना’. रतन के गीतों ने विलेज गर्ल और दोस्त के गीतों को धूमिल कर दिया. लेकिन ये गीत पुराने गीत जो चमड़े के ख़ूबसूरत बैग में संभालकर रखे हुए थे, हम लोग कभी कभी रात की तनहाई में बजाते.


‘अँखियाँ मिलाके...’

संगीतकार सज्जाद अपनी बदमिज़ाजी की वजह से मशहूर होते रहे. उनके साथ के संगीतकार थोड़े ही वक़्त में एक के बाद एक सीढ़ियाँ चढ़ते आगे बढ़ गए. एक दिन मेरे भाई मसूद के एक दोस्त ने ‘कोई प्रेम का देके संदेशा’ रिकार्ड लिया, तो कभी लौटाया नहीं. हमारे यहाँ उसूल था कि कोई हमारे यहाँ से कोई चीज़ उधार लेकर गया है, तो वही लौटाएगा, हम उसे याद नहीं दिलाते. आज तक उस रिकार्ड के खोने का अफ़सोस पूरे परिवार को है. कभी-कभी भूली बिसरी याद की तरह उस रिकार्ड का ख़़याल आता तो हम उस रात की बातें करते जब हमने यह गीत पहली बार अपने घर में सुना था. सज्जाद के बारे में चर्चा होती कि वह क़ुदरत का ऐसा तराशा हुआ हीरा है, जिसका इल्म न तो हिंदुस्तानी फ़िल्म इंडस्ट्री को, न ही फ़िल्म संगीत को चाहने वालों को है.

(जारी)

(जलसा की अपनी प्रति बुक कराने हेतु दांई तरफ़ की पट्टी में लगे लिंक में लिखे पते/ नम्बर पर सम्पर्क करें)

Thursday, September 1, 2011

आज का फ़ोटो


(फ़ोटोग्राफ़र: अलेक्सिस पेरेवोशिकोव)

आई लव रम


"भौजैया बनावें हलवा" और "सोनार तेरी सोना पे मेरी बिस्वास है" जैसा शानदार चटनी संगीत कबाड़ख़ाने में पहले भी लगाया जा चुका है. इसके लिए हमें अपने कबाड़ी भाई विमल वर्मा का कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने इस संगीत से हमारा पहला परिचय कराया था. कैरिबियाई द्वीपों में रहने वाले भारतीयों की हालिया दो पीढ़ियों ने इसी तरह के संगीत से अपनी भारतीयता को बचाया हुआ है. हेमन्त कुमार के गाए एक अत्यन्त लोकप्रिय फ़िल्मी गीत के बैकग्राउन्ड में रचा गया यह गीत ख़ास आप के लिए खोज कर लाया हूं. गायक हैं निषाद सुल्तान -



(यह पोस्ट रम प्रेमी मित्रों दीपराज मेहरा, अक्षय शाह और लखनऊ में रहने वाले बड़े भाई अशोक शाह जी के साथ साथ रम के सभी चाहने वालों के वास्ते)

उन्हीं को इब्तेदा कहिये, उन्हीं को इन्तेहा कहिये


बाबा नुसरत से सुनिये यह कम सुनी गई क़व्वाली - अर्श-ए-आज़म का दूल्हा बड़ी चीज़ है.



नुसरत फ़तेह अली ख़ान